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Friday, September 30, 2011

नरगिसी चिन्तन...... अहमक बतियाँ.....

          आज सुबह ऑफिस जाते समय FM चैनल पर महिला RJ ने चहकते हुए कहा - You Know नरगिस फकरी,..... She is coming with रणवीर कपूर in Rockstar. पुरूष RJ ने कहा - hey, b carefull while Taking her name.....नरगिस फक्करी.....


      और दोनों ही खिलखिला उठे।

         जेहन में बात आई कि ये नरगिस कोई अमरीकी मॉडेल है, आधी पाकिस्तानी, आधी चेक रिपब्लिकन। पिछले दिनों काफी सुनने में आ रहा था कि बेहद बोल्ड मॉडलिंग के लिये कुख्यात रही है। इसी सोच विचार के बीच मौसम का वो बेहद खूबसूरत गीत बजने लगा जिसमें शाहिद कपूर गाँव के दिलकश माहौल में अपनी प्रेमिका को निहारते हैं। छत पर दौड़ते भागते नजर आते हैं, एक ओर कंडे रखे हैं तो एक ओर कुछ सुखाया जा रहा है। हिट रहा यह गाना। वैसे मैंने एक बात नोटिस की है कि जिस किसी गाने में छत का जिक्र हो या लोकेशन छत पर हो वह गाना हमेशा से ही हिट रहा है। चाहे वह छत पर लाल मिर्ची का अचार बनाते ससुराल गेंदा फूल गीत हो या प्यासा फिल्म का गुरूदत्त पर फिल्माया 'कशिश' गीत।

       याद किजिये गुरूदत्त की 'प्यासा' फिल्म जिसमें गुरूदत्त छत पर खड़े हुए गहन सोच में डूबे हैं और नायिका गुरूदत्त के करीब जाना चाहती है। उसी वक्त वैष्णव भक्तगणों की एक टोली नीचे गा बजा रही होती है जिसके बोल होते हैं -


आज सजन मोहे अंग लगा लो, जनम सफल हो जाय
हृदय की पीड़ा देह की अग्नि सब शीतल हो जाय

यह गाना अपने समय में खूब चला था।

      इसी तरह 'मेरा साया' फिल्म के हिट टाईटल गीत में भी कुछ अंश महल की छत पर फिल्माये गये थे। चुपके चुपके का एक गीत जिसमें जया छत पर गा रही होती हैं - चुपके-चुपके चल री पुरवाई वह भी हिट रहा था। ऐसे कई गाने बरबस ही याद हो आते हैं। कुछ में लोकेशन भले ही छत की बजाय लैंडस्केप हो, इनडोर हो लेकिन वहां यदि छत शब्द का इस्तेमाल हुआ है तो वह भी हिट रहा है। गुलज़ार का लिखा मौसम फ़िल्म का ही - दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन - गाने में भी छत शब्द का इस्तेमाल हुआ है। गुलज़ार लिखते हैं -


ठंडी सफ़ेद चादरों पे जागें देर तक
तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुये

           वहीं दिलीप कुमार अपने समय के हिट फिल्म नया दौर में नायिका से गुजारिश करते दिखे कि - तू छत पर आ जा गोरिये, तुझे चांद के बहाने देखूं । यह अलग बात है कि नायिका इन्कार करते हुए कहती है कि - अभी छेड़ेंगे गली के सब लड़के कि चांद बैरी छुप जाने दे......

इस तरह के ढेरों गीत हैं।    खैर,   आगे कई और भी गीत बजे, कुछ अच्छे कुछ बुरे, कुछ ढिंका चिका, तो कुछ छम्मकछल्लो टाइप। उसी दौरान एक विज्ञापन भी आया - Oral Contraceptive Pills यानि गर्भनिरोधक गोलियों का। वैसे भी इस तरह के विज्ञापन अब आम हो चले हैं लेकिन इधर कुछ दिनों पहले तक इनका आना कुछ कम हुआ था अब फिर से दिखाई सुनाई देने लगे हैं। तभी याद आया कि आजकल नवरात्री का मौसम है, युवक युवतियां डांडिया खेलने जाते हैं। काफी देर रात तक गरबा-डांडिया का कार्यक्रम चलता रहता है। ऐसे में मार्केटिंग कम्पनीयां भी जरूर चाहेंगी कि इस तरह के उनके उत्पाद जरूर बिकें, भले ही नाम जागरूकता का ही क्यों न लिया जाय।

        अभी पिछले साल कहीं अखबार में पढ़ा था कि नवंबर, दिसंबर में अबॉर्शन केसेस बढ़ जाते हैं जिसके मूल में होता है यही नवरात्री के गरबा-डांडिया वाली उछृंखलता। बड़े बड़े कॉरपोरेट हाउसेस ये शो ऑर्गेनाइज करते हैं, दस दस हजार रूपये के टिकट दिये जाते हैं, तमाम हाई फाई डीजे, लाठी लक्कड का इंतजाम खूब लाखों करोड़ों का बिजनेस। जिसे लेकर बाल ठाकरे ने भी टीका-टिप्पणी की थी कि संस्कृति का इस तरह बाजारीकरण उचित नहीं। यूं भी देख रहा हूं कि पहले मुम्बई में बहुत कम दुर्गा पूजाएं होती थी। कम लोग मूर्तियां प्रतिस्थापित करते थे। जिस किसी को पूजा करनी होती अपने घर में ही दुर्गा जी के चित्र आदि के आगे अपनी पूजा करता था। न इतना गरबा-डांडिया का शोर शराबा होता था न कुछ। कहीं होता भी था तो हल्के से जमावड़े के रूप में। अब तो ये हाल है कि FM चैनलों पर एक ओर गरबा-डांडिया के 'कपल पासेस' दिये जाने की घोषणा होती है और उसके पीछे ही पीछे गर्भनिरोधक गोलियों का विज्ञापन भी आता है।

      अभी थोड़ी देर पहले फिर वही 'नरगिस फकरी जी' उच्चारित की जा रही थीं....... खिलखिलाहट के साथ महिला RJ बता रही थीं - मैं डांडिया के कपल पासेस देने जा रही हूं.....आपको बताना है कि नरगिस फकरी किस फिल्म में रणबीर कपूर के अपोजिट आ रही हैं..... 'कप्पल डांडिया पासेस' जीतने के लिये कॉल करें या SMS ब्ला ब्ला ब्ला........

       सोचता हूं - ये सारे बदलाव ये सारी 'घोषित उच्छृंखलताएं' कहीं उस 'घोटुल' परंपरा के बिगड़े हुए रूप तो नहीं जिसमें कि कुछ आदिवासी समूहों में विवाह योग्य नवयुवक-नवयुवतियां अपने जोड़े बनाने के लिये जंगल में आयोजित उत्सव में शामिल होते हैं, जोड़े चुनते हैं, परखते हैं, एक दूसरे का साथ निबाहने की बातें कहते हैं और फिर निकल पड़ते हैं नये जीवन सफर की ओर। अपने आप में ये घोटुल परंपरा उपर से भले ही उच्छृंखल नजर आए लेकिन आदिवासीयो की जरूरतों, उनके रीति रिवाजों के हिसाब से उनके लिये यह विवाह परंपरा का आवश्यक अंश है जिसके तहत गोल घेरा बनाकर नाचने, गाने, एक दूसरे को परखने आदि मौके के रूप में देखा जाता है।

       खैर, इतिहास दुहराये चाहे एकहर ही रह जाय, किंतु इतना जरूर महसूस होता है कि इस तरह से सांस्कृतिक बाजारीकरण और उसके अपशिष्ट कहीं न कहीं भक्ति भावना पर चोट करते हैं। कहीं न कहीं देवी की आराधना हेतु बरती जाने वाली शुचिता को आहत करते लगते हैं।

      वैसे भी अब यह मान्य हो चला है कि परंपराओं और आधुनिकीकरण के बीच झूलते हुए पीढ़ीयों का संघर्ष यूं ही चलता रहेगा, फर्क रहेगा तो केवल उन साधनों में, माध्यमों में जो कि समय के साथ साथ परिष्कृत (?)  होते रहेंगे,  कहीं गाढ़े तो कहीं तिक्त होते रहेंगे।

इन हालात को देखते हुए  अकबर इलाहाबादी का यह  शेर बेहद सटीक लगता है जिसमें  वह फरमाते हैं 

पुरानी   रोशनी  में  और  नई  में  फ़र्क   है    इतना
उसे कश्ती नहीं मिलती,  इसे साहिल नहीं मिलता


- सतीश पंचम

Tuesday, September 27, 2011

बर्ल्ड टूरिजम डे बजरिये चुल्ली गुरूजी :-)

  देखिये आझ 'बर्ल्ड टूरिज्म डे' है। जिस किसी को घूमने फिरने का मन हो तो घूम ऊम आये। न हो तो हमारे गाँव की बस में आ जाइये, घुमा देंगे। हां, थोड़ा सा भदेस रंग से जूझना पड़ेगा। उधर देख रहा हूँ अभिषेक ओझा भी पटना से हो आये। कुछ कुछ मेरा भी मन गाँव  जाने के लिये लहक आया है लेकिन फिलहाल मौका नहीं मिल रहा। देखता हूं कब तक अपने उसी खालिस परिवेश में पहुंच पाता हूं जहां पर पहुंचते ही लगता है कि असल भारत जैसे यही है, बाकि तो केवल टिकटिम्मा है।
        
वैसे  यह नया तो नहीं, लेकिन इतना पुन्ना भी नहीं। चाहे जिस ओर नजर घुमा दिजिए किसी गँवई बस में यही रंग दिखेगा।..... एकाध गाली-गुफ्तार है....हो सके तो झेल लिजियेगा औ न झेल पायेंगे तो भी कौन सा टैक्स लग रहा है,  सब्सिडी पर ही तो चल रहे थे, समझिये कि वही  वापस ले ली गई बस्    :-)

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        बस अड्डे पर खलासी का चिल्लमचिल्ल………..एक सवारी एक सवारी……रोक के.... रोक के…….चलाsss……ए भाई साईकिल उपर……अरे तनिक गठरी उहां रखिये…..हां किसका किसका बनेगा……अरे बच्चा है तो उसे गोद में लेकर बैठिए…….हां जी आप जाकर बच्चे वाली सीट पर बैठिए…….टिकस लिया है तो बच्चे का लिया है पूरे का नहीं……सीट पर आप बैठ जाईये मां जी…..हाँ…..कहां जाना है………ऐ रिक्शा……अरे तोहरी हरामी क आँख मारौं ……चाँपे चले आव सारे……..ए दाहिने कट के….थोड़ा और……. ए सारेsssss……..

       आज मुलैमा क रैली है…..मायावतीया भी कम नहीं है……लई मूरती….लई मूरती मार पाट दिया है लखनऊ को………अरे त रोजगारौ त मील रहा है……लांण रोजगार मिल रहा है……ससुर जा के देख त मालूम पड़ी……अदालती अस्टे क चक्कर में सिल्पकार लोग बदहाल हुए जा रहे हैं …….. बकि आंबेडकर भी त सिल्पकार……हां…..संविधान…….ए भाई तनिक गाड़ी इस्लो होने दो तब थूको…….हवा ईधरै का है …….
 
      काल सरजू बावन बो दिया……सोनालिका भी ठीक है…..उपज ठीकै है…….…चुल्ली गुरूजी पढ़ाते थे ….. चुल्ली…. उनका चिढ़ौना नाम रख दिया गया……एक निबंध लिखने कहे…..विज्ञान ने हमारे जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन किया है……..हमहूं लिखे...... बड़ी मार पड़ी……बताओ…..आमूल तो आमूल ये चूल क्या है…….…..रोक के….. रोक के……उतरना है …….ए भाई सामान आगे करो………आप वहां बईठो……..अरे तो आधे पर ही बैठो भाई……जल्दीऐ पहुंच जाओगे……..काहे जल्दियान हो……सामान पर जोर मत डालिए…..फूटेगा नही….. अरे चिंता मत किजिए………ओजिन नहीं हूं

       बीड़ी छूआ जाएगा….हाथ उधरिये रखिये……कुर्ता बड़ा रजेस खन्ना कट लिहल बा हो……समधियाने जात हऊवा का ……..अरे तोहरी बहिन क……… काहे भीड़ है आर…….बारात नाराज हो गई …….चार चक्का के बजाय दू चक्का ……बडा करेर दहेजा पड़ा……..…..अरे त हां भाई स्वागत सत्कार खूब किया कि………..


      का हो नईहरे से…….अरे तबै तोहार भऊजी नाराज हईन…… सास कुल सामान उठा के बिटियन के दई दिया….. सूप…..पिसान…..दउरी…..लूगा……नईहर से एतना लेकर आई हो…….केतना भी हो….पर बिटिया के लिये महतारी मयागर रहती है भाई………..बेटवा लोग के न पूछी ओतना………अरे का बिलाना……..पतोहिया बहुत तबर्रा बोलती है……...रोक के…….रोक के ssss……….


     हाँ भाई…….आ जाओ…..उतरिए जल्दी………उतर रहे हैं……कहां हवाई जहाज चला रहे हो……….


- सतीश पंचम

Sunday, September 25, 2011

वह जो एक रेखा है

 आज देखा विदेश में प्रधानमंत्री जी भाषण दे रहे थे,  इधर चिदम्बरम पर लोग लट्ठ लेकर पीछे पड़ गये हैं कि तुम भी 2जी मामले में इस्तीफा दो,  चिदम्बरम अपनी सफ़ेद तहमद लपेटते लुपुटते कह रहे हैं मैं क्यों दूँ.....उधर भाजपा बोल रही है नहीं,  दो....  हमको चाहिये :)

 खैर, चिदम्बरम इस्तीफा दें या न दें लेकिन इधर  हाल ही में योजना आयोग के द्वारा गरीबी के लिये जो मानक तय किये गये उसे पढ़कर एकबारगी लगा गलती से सन् इक्यावन वाली रपट सन् ग्यारह की रपट के साथ नत्थी होकर आ गई होगी और समझने में कुछ भूल हुई होगी लेकिन नहीं, सारे अखबार सारा मीडिया चीख चीख कर कह रहा था कि यही रपट है। यही है जिसमें कहा गया है कि रोज का 32 रूपये कमाने वाला शहरी और 26 रूपये कमाने वाला गाँवई गरीब नहीं माना जायगा। मैंने भी सोचा जब बेचारा इतना चीख चीख कर कह रहा है तो सच ही होगा, वरना अब तक तो बैन लग गया,  प्रसारण अधिकार छिन गया,लायसेंस कैंसल हो गया होता इस तरह बिना सेंस के 'लाय' बोलने के लिये। 

     खैर,  ये रपट रूपुट बना ओना कर आयोग फिर से जुट गया होगा अपनी नई योजना से सम्बन्धित विमर्शों में। आखिर योजना बनाने में दिमाग लगता है। चपरासी को इत्तला दी गई होगी -  सादा वाला बिस्कुट मत लाना वो मन की शक्ति तन की शक्ति जगाता बिस्कुट आता है न, वही लाना और हां देखना वो शंखपुष्पी वाला बोरा खाली हो गया हो तो भरवा लेना, मीटिंग के दौरान कम नहीं पड़ना चाहिये। वो क्या है कि याददाश्त मजबूत रखनी पड़ती है आंकड़ों का मामला ठहरा। उधर मीडिया में डायस पर खड़े होकर चार नेता बहस कर रहे होंगे - अरे आप बताइये....अरे आप...आप मेरी सुनिये....पहले आप बताइये कि कैसे कोई 32 रूपये में भोजन कर सकता है, कैसे उसे अमीर माना जा सकता है, कैसे उसे अरे आप चुप रहिये....आप मुझे बोलने ही नहीं दे रहे....आप...आप..... चुप साले (पीं.ईई)......

    Anyway, ये सब तो चलता ही रहेगा।  आप लोग तनिक शरद जोशी जी के एक लेख 'वह जो एक रेखा है'  का अंश पढ़िये जिसे 'नावक के तीर' से साभार पेश कर रहा हूँ।      

शरद जी लिखते हैं -

     सत्ताधारी, जैसा मौसम होता है, रेखा की उँचाई और निचाई का वैसा भाष्य करते हैं। जब वे भीख माँगने या उधार लेने विदेश जाते हैं, वे बताते हैं कि रेखा ऊपर है और भारत के लोग उसके काफी नीचे हैं। जब वे चुनाव लड़ने आते हैं, वे कहते हैं कि रेखा काफी नीचे है और हम उसके ऊपर आ गये हैं। अभी-अभी आये हैं। इन पाँच सालों में ही आये हैं। और सत्ताधारी प्राय: इन दो बातों में से किसी एक पर उलझे रहते हैं। या तो वे उधार माँगते रहते हैं या चुनाव की तैयारियां करते रहते हैं। इसलिये कभी समझ नहीं आता कि गरीबी की रेखा हमारी शर्ट या पतलून की जेब से कितने उपर या कितने नीचे खिंची है। गरीबी की यह रेखा अजीबोगरीब रेखा है। गरीब कितने हैं, पता नहीं, अजीब जरूर है। 

.......
.......

हमारा जीवन गरीबी की रेखा से पिरोया-सा लगता है। यदि इस रेखा को एक डोरा मान लें, तो हमारा हर फटा उसी से सिला है। 
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आँगन में बँधी एक डोर है गरीबी की रेखा। मध्यवर्गीय एक कुरते या किसी पाजामे की तरह उस डोर पर लटका हुआ है। उसका अधिकांश भाग नीचे है, फिर भी कहने को वह डोर के ऊपर है। बड़ी मजेदार स्थिति है। 
...........

   ये सब पढ़कर लगता है कि योजना आयोग तब भी उतनी ही 'मुस्तैदी' से काम कर रहा था जैसा कि अब कर रहा है। एक तरह की कंसीस्टेंसी है। लेकिन यह 'मुस्तैदी' असल में होती क्या है यह आजतक किसी की समझ नहीं आया। जिस दिन समझ आयेगा उस दिन मुझे लगता है मीडिया वाले कैमरा लेकर चिल्ला चिल्ला कर कहेंगे - मैं फिर से कहूंगा....ध्यान से देखिये  यही है वो 'मुस्तैदी' जिसकी सबको तलाश थी...जिसे देश की एजेंसियां ढूँढ रही थीं। 

-  सतीश पंचम

Saturday, September 24, 2011

'ओढ़नीया ब्लॉगिंग' चालू आहे........

        यूं तो तीन साल से ज्यादा पुरानी अपनी ब्लॉगिंग में कई रंग देख चुका हूं इस ब्लॉगजगत के और अब भी देख रहा हूं। आप लोगों को याद होगा कि एक 'पलक' वाला मामला था। 'पलक' नाम के छद्म प्रोफाइल से कोई शख्स हर ब्लॉगर के यहां ओठों वाली फोटो के साथ जा-जाकर कमेंट किया करता था और लिंक देकर अपना ब्लॉग देखने के लिये बाकायदा आमंत्रण देता था। लिंक के जरिये वहां जाने पर पता चलता कि किसी महिला के आकर्षक तस्वीर के साथ अड़ी सड़ी कविता चेंपी गई है। लोग देखते ही वाह वाह कर उठते। एकदम लहालोट। कोई कोई तो एकदम रूपा फ्रण्टलाईन पहन जैसे तैयार ही बैठे दिखते कि इधर 'पलक फर्नीचर मार्ट'  की पोस्ट आई उधर सबसे पहले वही रूपा बनियान पहने कमेंट करते दिखाई देते। जबकि कविता के नाम पर उसमें क्या था मैं आज तक नहीं जान पाया लेकिन लोगों को 'पलक' की कवितई खूब समझ आ रही थी :)


      खैर, पलक की कविताएं दनादन्न प्रचारित हो उठीं। जमकर लोगों ने वाह वाह की। इसी बीच कुछ लोगों ने बवाल किया कि पलक फर्जी प्रोफाइल है ये है वो है। एक महिला इस तरह खुलेआम ओठों की तस्वीर के साथ, फलां अंग के साथ कविता नहीं चेंप सकती। तब हुआ ये कि पलक ने हंगामा करने वालों के नाम अपनी कविताएं समर्पित करनी शुरू कर दीं।  "मेरी अगली पोस्ट फलां सर के नाम समर्पित"....... "मेरी पिछली पोस्ट ढेकां सर के नाम समर्पित है"।  उसका इस तरह कवितायें समर्पित करना था कि लोग एकदम से लहालोट हो उठे। एक से एक प्रबुद्धगण जाकर टिपिया आये। आनंदित हुए प्रमुदित हुए। मगन हुए छगन हुए कुल मिलाकर बहुत कुछ हुए।  आगे भी पोस्ट दर पोस्ट ब्लॉगरों को चुन चुन कर समर्पण जारी रहा। यह समर्पण देख  मुझे गाँवों में नाच नौटंकी के दौरान होने वाले नाच की याद आ गई। 
  नौटंकी के दौरान नचनीया नाचते नाचते अचानक ही स्टेज से उतर किसी के पास जाएगी और भीड़ में से ही किसी एक को अपनी ओढ़नी या घूँघट ओढ़ा देगी। आसपास के लोग तब ताली बजाएंगे और लहालोट हो जाएंगे। कुछ के तो कमेंट भी मिलने लगेंगे जिया राजा, करेजा काट, एकदम विलाइती।  और जो ओढ़नी के भीतर ओढ़ा दिया होगा वह अंदर ही अंदर नचनीया पर मुस्की मार रहा होगा और मुस्की मारते हुए जेब से पांच दस रूपए अपना नाम बताते हुए दे देगा। नचनीया फिर नाचते नाचते अपने स्टेज पर पहुंचेगी, हारमोनियम मास्टर तान पर तान छेडे रहेगा और इसी बीच वह घोषणा करेगी कि – ढेलूराम टेलर, केराकत चौराहा वाले की ओर से दस रूपईया इनाम और एही के लिए मैं अगला गीत उन्हें समर्पित करती हूँ कि – गर्मी के महीना, बाली उमरिया...... टप्प टप्प चुए पसीना बलम तनि पंखा चलाय द हो.......इतना कहना होगा कि भीड़ एकदम लहालोट.....सीटी बजने लगेगी, सुगंधित केवड़ा जल वाली पिचकारी भीड पर फौवारा कर रही होगी और जिसका नाम स्टेज पर से घोषित होगा और जिसके नाम पर गीत समर्पित होगा वह ढेलूराम टेलर अंदर ही अंदर मगन होगा कि चलो इसी बहाने मेरी दुकान का प्रचार हो रहा है।



       यही सब याद कर मैंने वो ओढ़निया ब्लॉगिंग वाली पोस्ट लिखा था जिसमें बताया था कि कैसे ओढ़निया ओढ़ा कर ब्लॉगिंग की जाती है, कैसे मजमा जुटाया जाता है, कैसे लोग लहालोट होकर अड़ी सड़ी पोस्ट, गली सिकुड़ी कविता पर टिप्पणी दर टिप्पणी चेपते जाते हैं।

        खैर, जब लिखा था तब लिखा था अब तो मजमा जुटाने के तरीके में भी गुणात्मक बदलाव आया है। अब मजमा छद्म नारीवाद पर भी जुटाया जाता है, अपने अबला होने पर गुहार लगाते भी जुटाया जाता है, हिन्दी भाषा पर संकट आने की हुड़क लगाई जाती है, मां - बाप, सखी सहेली की लिस्ट लगातार अपडेट करते हुए मजमा जुटाया जाता है। न कुछ हुआ तो किसी को समर्पित एक चुभती बिछलाती पोस्ट लिख दी जाती है, टंकी और गुंबद पर चढ़ जाने की बात की जाती है।

     हाल ही में अनुराग जी पर छींटाकशी करती पोस्ट लिखी गई।  मजमा जुटाया गया, जमकर टीका-टिप्पणी की गई। वैसे भी देखा गया है कि  यदि आरोप लगाने वाला पक्ष खुद को अबला के रूप में प्रचारित करे तो उसके फेवर में लोग बिना कुछ सोचे समझे ही तन कर खड़े हो जाते हैं, यह प्रवृत्ति यहां बखूबी दिखाई देती है।

       आप लोगों को यदि याद हो तो मुंशी प्रेमचंद जी की एक कहानी थी - 'बड़े घर की बेटी' . इसमें उन्होंने लिखा है - स्त्रियों के ऑंसू पुरुष की क्रोधाग्नि भड़काने में तेल का काम देते हैं।

    शब्दश:  वही बात यहां भी देखने मिली । महिला का छद्म प्रलाप सुन कोई खुद को गुण्डा बनाने पर तुल गया तो किसी को गुस्से से कंपकपी छूट गई तो कोई न जाने क्या अल्लम गल्लम सांट गया।  खूब विषवमन हुआ। लेकिन लोग यह भूल गये कि इस प्रकार के बेवजह  सपोर्टिंग  किसी  की  घनघोर आत्ममुग्धता बनाये रखने में एक कारक भी होते हैं। लोग कहेंगे कि थोड़ी बहुत आत्ममुग्धता तो सबमें होती है.....  हां होती है,  आत्ममुग्धता सभी में होती है, विशेषकर जो रचनात्मक कर्म से जुड़े हैं, लेखन, कला आदि से जुड़े हैं उन सबमें आत्ममुग्धता होती है।
  
    दूर क्यूं जाना आप अपने आप को ही देखिये।  जब आप-हम कोई लेख लिखते हैं, कोई पोस्ट लिखते हैं  तो  एक बार हल्के से जरूर  मुग्ध होते हैं कि वाह, इसे मैंने लिखा है। यह आत्ममुग्धता स्वाभाविक भी है। होनी भी चाहिये।  किंतु  एक हद तक ही सही लगती है ऐसी आत्मप्रशंसा/ आत्ममुग्धता।  एक हद से आगे जाने पर वही आत्ममुग्धता घातक साबित होती है। तब इंसान अपनी रचनात्मकता वहीं बिखेर बैठता है। धीरे धीरे प्रबल होती उसकी  आत्मप्रशंसा की भावना उसे यह अहसास कराने लगती है कि  उसका काम उच्च कोटि का है, उसका लेखन बहुत स्तरीय है, लोग उसे देखते हैं,  लोग उससे जलते हैं........ऐसे में जो अगला खटका होता है वह सीधे ही आलोचना से दुराव के रूप में सामने आता है। ऐसा शख्स आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाता और सही सलाह भी उसे अपने खिलाफ एक साजिश सी लगती है। नतीजतन अपने संपर्क क्षेत्र से एक एक को निकाल बाहर करता है, ब्लॉग हो तो बैन करता है, चैट हो तो ब्लॉक करता है, मेल आई डी हो तो स्पैम में डालने लगता है। यानि वो सारे काम करता है जिससे कि उसका आलोचक सामने न पड़े।

     ऐसे में जब जरूरत होती है कि लोगों तक अपनी बात पहुंचाने की, आत्मप्रशंसा की खुराक पूरी करने की तो हल्ला मचाया जाता है, कुछ न कुछ हंगामा खड़ा किया जाता है,  ध्यानाकर्षण किया जाता है।  जाहिर है लोग जुटेंगे ही।   तुर्रा यह, कि उसका हल्ला सुन लोग सहानुभूति भी जल्द प्रकट कर देते हैं, बहुत खूब, बहुत बढ़िया, सही कहा, पूरी तौर पर सहमति......। ऐसे में वह इंसान और गहरे में न धंसे तो क्या हो।  इस हालात में उस शख्स की मनोरूग्णता बनाये रखने में वही लोग ज्यादा दोषी हैं जो कि उसके शुभचिंतक बने फिरते हैं। सही सलाह देने की बजाय गुडी गुडी बातें करते हैं।  स्त्रीदुख: कातरता से चुपड़ी रोटीयां परोसी जाती हैं, जबकि  कड़वी दवाई की ऐसे में सख्त जरूरत होती है भले ही वह टिप्पणियों के माध्यम से हो या वैचारिक पोस्ट के जरिये। तब भी यदि डायबिटीज के मरीज की तरह परहेज न करते हुए चाशनी घोलकर पिलाई जायेगी तो आगे ईश्वर ही मालिक है। ऐसी  बद-दिमागियत  और ऐसी बेवजह  छींटाकशी का दौर चलता ही रहेगा और जो लोग अभी  शांति और सद्भाव बनाये रखने की बात करते हैं, बात बढ़ जाने पर तब बगले झांकते नजर आएंगे।


- सतीश पंचम

( सभी चित्र नेट से साभार )

(इस पोस्ट पर मुझे लगता है कि अब तक काफी कुछ कहा सुना जा चुका है। अब और कुछ कहना नाहक वाद विवाद को आगे खेंचने की कवायद होगी। अत: इस मसले को यहीं विराम देते हुए अब इस पोस्ट पर कमेंट ऑप्शन बंद कर रहा हूं ताकि आगे की ओर पठन पाठन चले, रचनात्मक उर्जा का अपव्यय न होने पाये। आप सभी की प्रतिक्रिया हेतु आभार! )

Sunday, September 18, 2011

तुम जो इतना टिप्पणिया रहे हो........

        अक्सर देखा है कि लोग टिप्पणी करते वक्त अपनी पोस्टों के लिंक बिखेरते चलते हैं ( 'लिंक बिखेरना' शब्द संजय अनेजा जी से उधार-अधिभार सहित  ले रिया हूं :)    किसी पोस्ट के विषय से संबंधित अपनी टिप्पणी में बात कहने के लिये लिंक देना तो एक बार समझ आता है और यह जरूरी भी है ताकि  लिंक आदि के जरिये विषय का विस्तार मिले। किंतु उनका क्या जो इस लिंक बिखेरू प्रवृत्ति पर ही आश्रित हैं।  देखा यह गया है कि लोग तब तक अपनी टिप्पणी नहीं करते जब तक कि खुद की कोई नई पोस्ट न लिखें हो। यहां उन्होंने नई पोस्ट लिखी और वहां दूसरे ब्लॉगों पर टिप्पणी चेपते चले। यह प्रवृत्ति तब भी थी जब ब्लॉगवाणी, नारद, चिट्ठाजगत जैसे संकलक थे और अब भी है।   हांलाकि यह लिंक बिखेरने वाली प्रवृत्ति कुछ कम जरूर हुई है लेकिन अब भी यदा कदा 'दृष्टगोचर'.........ओह...ये 'दृष्टिगोचर' तो कुछ ज्यादा ही क्लिष्ट हो गया लगता है ....थोड़ा नीचे उतरता हूं :) 

 इसे ऐसे पढ़ें - हांलाकि लिंक बिखेरने वाली यह प्रवृत्ति कुछ कम जरूर हुई है लेकिन अब भी यदा कदा  दिखाई दे जाती है।

      हां, ये वाक्य कुछ जमा है इस  'दिखाई दे जाने'  वाले शब्द में किसी के द्वारा कुछ 'दिये जाने का भाव' है :) 

        खैर,  इस प्रवृत्ति पर  मैंने सितंबर 2008 में अर्थ फिल्म के एक गीत पर आधारित  'पैरोडी टाइप' कटाक्ष किया था। हल्के फुल्के मूड़ में लिखी उस पैरोडी को फिलहाल आप भी हल्के फुल्के मूड़ में ही पढ़ें। ज्यादा सिरियस होकर पढ़ने से कपार में पीर हो जाय तो जिम्मेवार हम नहीं 'आपहि' होंगे  :)

   एक बात और जिसे मैं महसूस करता हूं कि संकलकों की कमी के चलते नये ब्लॉगरों द्वारा इस तरह टिप्पणियों में लिंक देना लाजिमी है,  किंतु कुछ पुराने हो चुके ब्लॉगर जब नयकों की तरह बिहेव करते हैं तो 'टहोकना' जरूरी हो जाता है, इन प्रवृत्तियों पर हल्की फुल्की मौज लेते रहना चाहिये :)

      वैसे भी  ब्लॉग, ब्लॉगिंग, ब्लॉगत्व पर आजकल कुछ जियादे लिखा जा रहा है तो हम सोचे इस घटाटोप में हमहूं तर-बतर हो लें। झूट्ठे ही याद कर लें कि अचानक हमको कुछ अपना पुराना याद आ गया है....याकि आज अलमारी साफ करते यह पंक्तियां हाथ लगीं....याकि....चलिये छोड़िये....आप तो बस इन पंक्तियों पर गौर फरमायें.....गुर्रायें.....घनघनायें :)

 तो मैंने  लिक्खा था कि........

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तुम इतना जो टिप्पणीया रहे हो,
क्या कोई पोस्ट लिखी जो  बता रहे हो।

हमने लंगडी-लूली पोस्ट लिखी बेकार ,
पर मुझे खूब जमा बता रहे हो,


बन जाएंगे लिक्खाड लिखते-लिखते,
ऐसा वहम क्यूं पाले जा रहे हो,


जिन मुद्दों को सबने छोड दिया,
तुम क्यूं उन्हें फिर छेडे जा रहे हो,


क्या कोई पोस्ट लिखा जो बता रहे हो।

लिखते हो पोस्टों में, खाया है मुर्ग-मुसल्लम,
गौर से देखा तो   दाल भात खा रहे हो


ब्लॉग जगत मे दहाडते हो शेर की तरह,
घर में देखा तुम लात खा रहे हो

टिप्पणीयों का खेल है ब्लॉगिंग,
टिप्पणीयों में ही मात खा रहे हो,

तुम इतना जो टिप्पणीया रहे हो,

क्या कोई पोस्ट लिखी जो बता रहे हो।

 तीन साल पुरानी  इस पैरोडी में जिसे भी 'किसी का' या 'खुद का'  अक्स -उक्स दिखे तो चुपै रहियेगा.....वो क्या है कि  'अक्स' अक्सर 'अक्स'  न होकर 'नुक्स' होते हैं जिन्हें हम अपने में पाकर 'झुठलाने' लगते हैं और दूसरों में पाकर 'खिलिखलाने' लगते हैं  :)

- सतीश पंचम

Saturday, September 17, 2011

भोज्य तक.......

       मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में भोजन जरूर है लेकिन देखा गया है कि मानव सभ्यता में इसकी पूर्ति हमेशा से ही कई किस्म की जद्दोजहद से होकर गुजरी है, गुजर रही है और आगे भी गुजरते रहने की संभावना है।  


     यूं भी महसूस किया है  कि लोगों को सबसे पहले धर्म-सम्मत खाद्य अखाद्य के मसलों से जूझना पड़ता है। शाकाहर है तो किस कोटी का शाकाहार है। तामसिक है, शीतल है, जड़ है या तना। समझना पड़ता है कि ज्ञानी-ध्यानी, पंडित आदि उसे किस कैटेगरी में विभक्त करते हैं। यदि उगने वाला खाद्य पदार्थ है तो जमीन के नीचे उगने वाला पदार्थ है या जमीन के उपर उगने वाला है ....लहसुन है...प्याज है....क्या है आखिर।

        इतने से भी मन न माने तो दूध और अण्डे को लेकर बहसें होती हैं। गाय के शरीर से निकलने वाला दूध मांसाहार की श्रेणी में आता है या शाकाहार के। यदि अण्डे में चूजा जनने की क्षमता है तो नॉनवेज हुआ, बाँझ अण्डा हो तो वेज हुआ। इतनी धुआँधार बहसें कि मानों हमारा धर्म अण्डों में सुरक्षित हो।

       उधर मौलवी इमाम भी अपने हिसाब से भोजन विभक्त करते दिखते हैं। फलां चीज हराम है या नहीं, मज़हब उसे मानता है या नहीं। उंट है तो क्या होना चाहिये, खस्सी हो तो कितनी उम्र होनी चाहिये, कलिया खाना है तो पता करो वह 'झटका' है या 'हलाल' है। यानि वो सभी बातें पहले धर्म की छन्नी से होकर गुजरें तो समझो खाद्य है वरना अखाद्य।

       इन्हीं सब चीजों को प्रदर्शित करती एक कलाकृति मुंबई के काला घोड़ा फेस्टिवल के दौरान प्रदर्शित हुई थी जिसे बाकी लोगों की तरह  मैंने भी  अपने कैमरे में कैद किया था। इस कलाकृति   में एक टेबल के चारों ओर कुछ लोग बैठे हैं और उनके बीच प्याज आदि खाद्य पदार्थ रखे गये हैं। ध्यान देने पर पता चलता है कि टेबल के किनारे किनारे कुछ धार्मिक चिन्ह हैं जो विभिन्न धर्मों के प्रतीक हैं। उसके पास ही रोजगार के औजार जैसे आरी, हथौड़ी, छेनी आदि रखे हैं। इन सारी चीजों को घेरे हुए लोग बहस मुबाहसों में तल्लीन हैं। यह बहसें किसी भी चीज पर हो सकती हैं, किसी भी मुद्दे पर हो सकती हैं - पूंजीवाद, गरीबी, जनसंख्या, दंगे-फसाद, लोग, धर्म, आस्था, कर्तव्य, निवेदन सभी विषयों पर। किंतु इन सभी चीजों में जो चीज जरूरी है वह है भोजन, अन्न,  जिसके बगैर सारी बहसें फ़िजूल होंगी। किंतु विडंबना यह है कि खेती के महत्व को जानते हुए भी खेती योग्य जमीनें पूंजीवाद, शहरीकरण की भेंट चढ़ रही हैं। विकास के नाम पर  प्रतिवर्ष खेतों के अधिग्रहण, मुआवजे के चक्कर में कृषियोग्य भूमि की कमी होती जा रही है किंतु बहसें हैं कि थमने का नाम नहीं ले रहीं। बहुत संभव है अंतहीन बहसों से ही पेट भरता हो।

मेरे फोटोब्लॉग - Thoughts of a Lens  में प्रदर्शित छायाचित्र 

-  सतीश पंचम

Thursday, September 15, 2011

'सेंकैया' जमात वाले....

      इस देश में दूसरों के गर्म तवे पर अपनी रोटी सेंकने वाले सेंकैया जमात के लोग बहुतायत में हैं, इफ़रात हैं। 'गझिन'  इतने, कि कहीं से भी आती रोशनी को अपने तक ही रोक लें, समाहित कर लें। एक तरह से इन्हें जीते जागते 'ब्लैक होल' कहा जा सकता हैं। अब ताजा प्रकरण विभिन्न दलों के राजनेताओं द्वारा किये जाने वाले उपवास (?) कार्यक्रमों का है। वे भी अन्ना की राह पर उपवास करने जा रहे हैं, लोगों से विश्वास अर्जित करना चाहते है। उपवास, जिसकी राह चलकर अन्ना ने एक सशक्त आंदोलन खड़ा किया, जनता का अपने उपर विश्वास हासिल किया और लोगों में उम्मीद की एक किरण जगाई। अब उसी किरण से उपजे प्रकाश को सोखने विभिन्न राजनीतिक दल अपने अपने दल बल के साथ जुट गये हैं।


      सुन रहा हूं कि गुजरात के मुख्यमंत्री उपवास करने जा रहे हैं। जनता को अपने मन की स्वच्छता से परिचित कराना चाहते हैं। उधर गुजरात में विपक्षी कांग्रेस भला क्यों चुप रहती। उसने भी अपनी ओर से उपवास पुरूष खोजा और शंकर सिंह वाघेला को आगे कर दिया। अब वो भी उपवास करेंगे। जनमत को अपने स्तर पर प्रभावित करेंगे।

      खैर, वे सब राजनेता हैं, उन्हें हर मुद्दे का तोड़ रखना पड़ता है, हर माहौल के हिसाब से ढलना-चलना पड़ता है। लोग समझ भी रहे हैं इन राजनीतिक उपवासों की हकीकत, मंद मंद मुस्करा भी रहे हैं लेकिन वही बात कि किया भी क्या जा सकता है, जैसे और नौटंकीयां देखते रहे हैं, यह भी देख लें। उधर लालकृष्ण आडवाणी को अपनी भूली बिसरी रथयात्रा याद आ गई है। वैसे भी वे ज्यादातर भूले बिसरे भूतकाल अंदाज में सबके सामने आते हैं....मैं जब पाकिस्तान गया था....मैं जब बाजपेई जी से मिला था.... तो उन्होंने कहा था.....जब जसवंत आतंकवादी लेकर एक्सचेंज करने गये थे ....तो मुझे नहीं पता था...था...था .....। हद है राजनीतिक तकधिनवा की। सुना है वे भी भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी रथयात्रा निकालना चाहते हैं। देश में अलख जगाना चाहते हैं। पता नहीं वो अपनी रथयात्रा में कर्नाटक रखेंगे या नहीं, वो खदानें रास्ते में आएंगी या नहीं जिनपर रेड्डी बंधुओं ने कब्जा जमाया था या ऐसे ही रथ को सरपट हाइवे से निकाल ले जायेंगे।

        खैर, इतना जरूर है कि इस उपवासी राजनीति, रथयात्रा, क्रांग्रेस और विभिन्न पार्टियों के अल्लम-गल्लमादि से अन्ना के आंदोलन और उससे जुड़े प्रतीकों पर कहीं न चोट पहुंच रही है। जिस अंदाज में अन्ना ने अपने उपवास/अनशन के प्रति अलग तरह की भावना से लोगों को परिचित कराया वह भावना कहीं न कहीं आहत होती लगती है। बहुत संभव है यह 'खेल-प्रतिखेल' ज्यादा चला तो लोग उपवास आदि पर वह दृढ़ता, वह विश्वास आगे से न जता पायें जैसा कि अभी अन्ना  आंदोलन के दौरान जताया। ऐसे में जरूरत है ऐसे छद्म उपवासों वाले 'राजनीतिक सेंकैयों' से सावधान रहने की, उनकी दूषित मनोवृत्तियों, निहित स्वार्थों से दूरी बनाये रखने की ताकि वास्तविक आंदोलनों की शुचिता और विश्वास पर आँच न आये। 


- सतीश पंचम

Tuesday, September 13, 2011

क्लिष्टता के ठठेरे और हिन्दी डे सेलिब्रेशन

        कल 'हिन्दी डे' है। हां भई वही 'हिन्दी डे' जब  हर ओर हरर हरर हिन्दी की हवा बहवाई जाती है।   हिन्दी विभागों में तो इस दिन को पर्व के रूप में मनाया जाता है। ये अलग बात है कि रागदरबारी के रचियता श्रीलाल शुक्ल जी इसे हिन्दी दिवस न मानकर एक प्रकार का पाखण्ड पर्व कहते रहे और कुछ हद तक मैं उनसे सहमत भी हूँ। मैं ही क्या बहुतों की सहमति होगी कि एक दिन हिन्दी दिवस मनाने से या कुछ ज्यादा मयगर हुए तो पखवाड़ा मनाने से हिन्दी का भला भी कभी हुआ है। हां, ये जरूर हुआ है कि जो लोग हिन्दी के नाम पर संस्कृति या भाषा प्रचारक बनते हैं उन्हें जरूर ऐसे समय में फण्ड आदि की थोड़ी सी सुविधा हो जाती है।

      खैर, यह भी देखा गया है कि जिस किसी के नाम पर उसका डे मनाया जाता है उसी दिन उसकी ज्यादा से ज्यादा अवमानना भी होती है। पंद्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी के दिन पूरे देश में जहां सुबह के वक्त कागजों से बने तिरंगे को लोग सीने से लगाये सभा समारोहों में बड़ी बड़ी बातें करते दिखते हैं, शाम होते होते वही कागज के झण्डे जमीनों पर पाये जाते हैं। लोग देखते हुए भी अनजान बने उन पर पैर रखते, खांचते चले जाते हैं।  इसके उलट यहीं मुम्बई में मैंने कुछ ऐसे लोगों को भी देखा है जो 15 अगस्त या 26 जनवरी की शाम हाथ में प्लास्टिक का थैला लिये जगह जगह पड़े कागज के तिरंगों को बटोरते चलते हैं ताकि लोगों के पैरों के नीचे जाने से बचें, तिरंगे का अपमान होने से बच जाय। लेकिन यह और इस किस्म की कवायद कम ही हो पाती है।

          एक और उदाहरण है। जितने श्रद्धा - विश्वास से लोग गंगा को नमन करते हुए हरिद्वार-वाराणसी आदि के घाटों पर गंगा पूजा करते हैं, आरती उतारते हैं, गंगा नहाते हैं, पता चला गंगा सबसे ज्यादा प्रदूषित भी वहीं होती है। अधजले शव, मृत पशु, सूखे फूलों के ढेर आदि  मिलकर गंगा को बाकी क्षेत्रों के मुकाबले यहां ज्यादा ही प्रदूषित करते हैं। एक घटना का उल्लेख काशी का अस्सी में है जिसमें गंगा को प्रदूषण मुक्त करने हेतु गंगा किनारे विद्वजनों की ओर से एक कार्यक्रम का आयोजन होता है। खूब धुआंधार भाषण होता है, खूब बड़ी बड़ी बातें होती हैं कि गंगा को बचाना चाहिये, गंगा को प्रदूषण मुक्त करना चाहिये। फलां होना चाहिये, ढेकां होना चाहिये लेकिन कार्यक्रम के खत्म होने के बाद लोग समोसा खाकर, चाय पीकर, पैकेज्ड मिनरल वाटर वाली बोतलें खलिया कर चलते बने और पीछे रह गये पत्तलों के ढेर, प्लास्टिक की बोतलें, थैलियां, प्लेटें । जाहिर है ये सब जाकर वहीं गंगा जी में ही समाहित होंगे, आखिर चिंता भी तो उन्हीं के बारे में की गई थी।

         मुझे कुछ कुछ वही हालात हिन्दी के लगते है। इस दिन हिन्दी को लेकर भी खूब बढ़-चढ़कर कहा जाता है। लोग जगह जगह हिन्दी की पुड़िया बांटते मिलते हैं कि हमें हिन्दी सेवा करनी चाहिये, हमें हिन्दी में काम करना चाहिये। हिन्दी बढ़ेगी तो देश बढ़ेगा। ये अलग बात है कि कार्यक्रम के समापन पर हाथ मिलाते हुए - नाइसली मैनेज्ड कहकर Thanks कहना नहीं भूलते। इसके अलावा एक मुश्किल यह भी देखी गई है कि कर्मचारी जब हिन्दी में एक दिन के लिये काम करते हैं तो बात बात में हिन्दी पर तंज कसना नहीं भूलते - अरे पांडे जी देखिये 'र' है कि 'ख' .....हिन्दी दिवस क्या हो गया हमारे लिये 'इसकूलिहा दिवस' हो गया।

       खैर, बड़े बड़े हिन्दी सेवी देखे हैं जो अपने बच्चों को अंग्रेजी मिडियम में पढ़ाते हैं। मैं खुद उसी परिपाटी को जारी रखे हूं तो किस मुंह से उनकी निंदा करूं। हम अपने बच्चों को हिन्दी मिडियम में नहीं पढ़ाना चाहते क्योंकि वास्तविकता जानते हैं। मैं खुद हिन्दी माध्यम से पढ़ा हूं लेकिन तब की और अब की परिस्थितियों में जमीन आसमान का फर्क है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

फिर ?   हिन्दी का क्या कोई उज्जवल भविष्य नहीं है ?  या  हिन्दी एकदम से गई गुजरी हो चुकी है ?

नहीं,  हिन्दी का भविष्य जरूर है, किंतु आम लोगों के बोलचाल में ही, या बहुत हुआ तो विज्ञापन में, फिल्मों आदि में हिन्दी अभी खूब बढ़ेगी। सच मायनों में हिन्दी के प्रचार प्रसार में आमजनों का ही योगदान ज्यादा है न कि हिन्दी डे के नाम पर  फण्ड उगाहने वाले गाल बजाउ  खर-चिन्तकों के दम पर।  आज कोई दक्षिण भारतीय जब उत्तर की ओर जाता है तो हिन्दी जल्दी सीखता है। उसे पता है कि उसे दैनंदिन कार्यों में लोगों से सम्पर्क करने में यही हिन्दी भाषा सहज रूप से उपयोगी है।   दूसरी ओर दक्षिण भारत में हिन्दी फिल्मों के असर से कामचलाउ हिन्दी ने भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है।

     वहीं कुछ ऐसे हिन्दी वाले  ठठेरे  हैं जो जबरिया क्लिष्ट हिन्दी की ठकर-ठकर लगाये रहते हैं कि हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों का आना ठीक नहीं, इससे हिन्दी का नुकसान होता है, पवित्रता नष्ट होती है। जबकि सच्चाई यह है कि ऐसे लोगों के क्लिष्टता प्रेम से ही हिन्दी के प्रचार प्रसार पर लगाम सी लग जाती है। ऐसे लोग क्लिष्टता की कलगी लगाये समझते हैं कि बहुत विशिष्ट लग रहे हैं जबकि यही कलगी उन्हें आमजन से दूरी बनाने हेतु मजबूर करती है। जहां लोग सामान्य बोलचाल में अपना काम कर ले जा रहे हैं वहां भला वे 'खाता आहरण', आदि भयंकर शब्दों को क्यों तवज्जों दें। वह सीधे अंग्रेजी को सहज पाकर उसकी ओर आकर्षित हो लेते हैं।

अंग्रेजी पढ़ने के कारण विवाह में ज्यादा तिलक की मांग करता
एक वैवाहिक गीत  ...  (साभार: विवेकी राय) 
      जहां तक इंटरनेट पर हिन्दी के प्रसार प्रचार की बात है तो वह लोगों के शौक के वजह से बढ़ रही है न कि किसी हिन्दी सेवी के प्रवचनादि के बूते। लोग शौक से अपने लेख ब्लॉग पर लिख रहे हैं, कविता लिख रहे हैं, व्यंग्य लिख रहे है, उसे हिन्दी जैसे सरल भाषा के माध्यम से पेश कर रहे हैं। और जहां तक मैं समझता हूं हिन्दी इसी तरह बढ़ेगी, पनपेगी, फूलेगी, फलेगी बिना किसी सरकारी सहायता के जैसे कि अब तक फलती फूलती आई है। उसे किसी सरकारी क्लिष्टता से जितना दूर रखा जाय उतना अच्छा रहेगा। हां, इतना जरूर है कि 14 सितम्बर का दिन हिन्दी दिवस के रूप में मनाने से एक प्रकार की खुशफहमी जरूर मिलती है। लोग थोड़ा सा मिठाई-सिठाई खा लेते हैं। एकाध गरदनों में फूल मालाएं सुशोभित हो जाती है। फूलों के गुलदस्ते लिये-दिये जाते हैं, फोटू-फाटू खिंच जाता है, ताली-ओली बज जाती है..... बस और क्या चाहिये हिन्दी को।

    Afterall Hindi is the Language of the People, for the People and by the People... है, कि नहीं :)


-  सतीश पंचम

Friday, September 9, 2011

जेंडर बायस के गुलगुलौवे में एक मुश्किल ऐसी भी

         हाल ही में मुझे मुम्बई के एक नामी कॉलेज में ऑफिस की ओर से एक सॉफ्टवेयर आदि के सिलसिले में जाना पड़ा। वहां जाने पर पता चला कि कल कॉलेज में एक फंक्शन है जिसके सिलसिले में कॉलेज के लड़के-लड़कियाँ तैयारी कर रहे हैं। उसी फंक्शन में हमारी कंपनी के सॉफ्टवेयर को प्रदर्शित करना था। कॉलेज का आयोजन बड़े पैमाने पर था, इसलिये वहां हर कोई काम में लगा था। कोई पोस्टर बना रहा था, कोई परदे आदि का इंतजाम कर रहा था। कोई वालंटियर लाइटें ठीक से लगा रहा था। काफी तामझाम था।

( कतिपय कारणों से मुम्बई के उस कॉलेज का नाम और फंक्शन के डिटेल्स आदि यहां नहीं लिख सकता, उम्मीद है पाठक समझ बनाये रखेंगे : )

      तो  ऐसे ही माहौल में एक ओर मेरे ऑफिस के कलिग्स के साथ मैं सॉफ्टवेयर आदि के काम में जुटा था, इंस्टालेशन टेस्टिंग आदि का काम जोरों पर चल रहा था। तभी मेरी नजर हॉल में एक ओर बैठी कुछ लड़कियों पर गई। वे लोग थर्माकोल को कट करके, उसे गोंद आदि के जरिये रंगीन पेपरों से सजा संवार रही थीं। रह रहकर उनकी हिंग्लिश भी सुनाई पड़ती। Hey, did u see my कैंची.....hey...just get that गम्स.....hey give me little bit चिवड़ा....इसी तरह की मिली जुली आधुनिक बोली वे बच्चियां बोल रही थीं। उनकी कॉन्वेन्ट स्टाईल की हिन्दी इंग्लिश सुनकर जहां अजीब सा लगता वहीं उनकी मेहनत देख अच्छा भी लग रहा था। पूरे हॉल को इन लड़कियों ने तरह तरह से सजाया था। कहीं रंगीन फीते लगे थे तो कहीं कुछ। मैंने उन लोगों पर थोड़ा ध्यान दिया तो पता चला कि सभी मध्यम वर्गीय परिवारों से हैं। कोई जीन्स पहने थी तो कोई पंजाबी सूट। वहां कुछ लड़के भी थे, लेकिन लड़कियों के मुकाबले कम संख्या में थे। वे लोग भी काफी भागमभाग कर हॉल को सजा रहे थे।

           इसी बीच कैफेटेरिया की ओर जाना हुआ तो वहां बैठी लड़कियों  के कपड़ों में दो चार के कपड़े काफी भड़कीले लगे। मेरी मध्यवर्गीय मानसिकता ने वहां अपनी औकात से सोचना शुरू किया जिसका पहला जुमला यही होता है कि - ये लड़कियां यहां पढ़ने आती हैं या फैशन करने :)  वहीं कुछ लड़के ऐसे भी दिखे जो कि स्प्राईट के मॉडल लगते थे....थ्रीफोर्थ पहने हुए....झकड़ा दाढ़ी रखे हुए.....कोई- कोई तो तिल्लीनुमा दाढ़ी रखे हुए था तो किसी की हेयर स्टाईल रॉक स्टॉर की तरह थी। किसी को तो देख लगता कि यह सोकर उठा होगा और सीधे कॉलेज चला आया होगा।

           इन्हीं सब के बीच होते होते शाम के सात बजने आ गये। अब जो बच्चियां हॉल में लगी थीं वे अपने अपने घर जाने को उतावली होने लगीं। उनके चेहरे के हाव भाव से लग रहा था कि उन्हें देर हो रही है । इस बीच एकाध के घर से फोन भी आ गया कि कितनी देर लगा रही हो, जल्दी घर आओ। उधर लड़कियों के जी जान से मेहनत करने के बावजूद अभी भी कुछ पोस्टर लगने बाकी थे। उधर हम लोग भी फ्री नहीं थे कि उन्हें मदद कर सकें। दनदनाकर सॉफ्टवेयर का काम चल रहा था....चैट पर फाइलें डाउनलोड अपलोड की जा रही थीं....तमाम आपाधापी वाला काम चल रहा था। अगले दिन के फंक्शन के लिये पूरा सेटअप रेडी करना था।

           इसी सब में साढ़े सात पौने आठ होने को आये और लड़कियां चिंतित नजर आईं कि इतना काम बाकी है। उपर से घर वाले फोन पर फोन करे जा रहे थे। ऐसे में मुझे कॉलेज के लड़कों पर गुस्सा आ रहा था कि कहां मर गये कम्बख्त, जरा भी मदद नहीं कर रहे इन लड़कियों की। सारे के सारे पता नहीं कहां चले गये थे। उसी दौरान उस कॉलेज के प्रोफेसर भी देखने आये कि कल के लिये तैयारी पूरी हुई कि नहीं। काफी कुछ देख ताक कर वे बाकी के काम निपटाने के लिये चले गये। उन्हें भी गेस्ट आदि की तैयारी में दुपहर से लगे देखा था।

            इधर एकाध लड़की ने दूसरी से कहा कि - 'तू जा हम लोग देख लेंगे'। 'तू निकल तेरी मम्मी 'वरी' कर रही होगी। एकाध और को ऐसा कहा गया। मन मारकर दो तीन लड़कियों ने अपना बैग उठाया और कल सुबह जल्दी आउंगी कहकर जाने लगीं। जो बची रह गईं वो लोग फिर जुट गईं अपने काम में। इस बीच एक दो के घरों से और फोन आये। वो लोग भी अपने घर वालों से मनुहार करती लगीं कि बस थोड़ा सा काम और रह गया है मम्मी...... बस half an hour.... उन लोगों की बेबसी देख मुझे महसूस हो रहा था कि इन लड़कियों को कितना कुछ झेलना पड़ रहा है भले ही वो एक अच्छे और नेक काम में क्यों न लगी हों, किन्तु उन्हें घर वालों की चिंताओं के बीच अपनी क्रियेटिवीटी, अपनी पढ़ाई, अपने प्रोजक्ट्स आदि पूरे करने हैं।

         याद आता है मेरे घर का वाकया। बेटी को स्कूल में एनूअल डे के लिये डांस आदि की तैयारी करनी थी। उसने मूझसे पूछा कि पापा डांस में जाउं.....ज्यादा नहीं बस आधा घंटा रोज ज्यादा लगेगा। उसकी पढ़ाई और तमाम बातों को ध्यान रखते हुए मैंने मना कर दिया। उसने फिर भी जिद की लेकिन मैं नहीं माना, उसके एक्जाम नजदीक थे सो ऐसा करना ठीक भी लगा। बाद में चार पांच महीनों बाद कोई बात उभरी तो उसने बताया कि पापा मैं तो डांस में फर्स्ट आई थी। मैंने सुना तो पहले समझ ही नहीं आया कि ये कब गई थी डांस में, इसे तो मना किया था। पूछने पर उसने बताया कि वह रिसेस पिरियड में स्कूल में डांस सेक्शन में जाती थी। वहीं उसकी बाकी सहेलियां भी प्रैक्टिस करती थीं । सुनकर मैं श्रीमती जी का मुंह देख रहा था वो मेरा मुंह देख रही थीं। तब तक छोटे बेटे ने कहा कि उसको पता था कि पूजा डांस सेक्शन में जाती है लेकिन उसने नहीं बताया। जब उस बारे में पूछा गया तो पता चला कि पूजा ने अपने छोटे भाई को टॉफी का लालच दिया था घर में न बोलने के लिये। उन दोनों भाई-बहन की बातें सुन जहां एक ओर हंसी आ रही थी वहीं बिटिया के टैलेंट को देख अच्छा भी लग रहा था कि बिना प्रोत्साहन के डांस कम्पटीशन में वह फर्स्ट आई और उस एक्जाम में नंबर भी अच्छे लाई।

            खैर, यहां कॉलेज की उन लड़कियों द्वारा सुबह से लेकर रात आठ बजे तक जुटे रहने, उनकी मेहनत से तमाम हॉल के अरेंजमेंट आदि करता देख मन ही मन उनके प्रति आदरभाव सा लगा कि कितना तो सहती हुई अपना काम किये जा रही हैं। उपर से घर वालों के फोन, तमाम डिस्टर्बेंस....सचमुच बहुत मेहनत की उन लड़कियों ने।

         दूसरी ओर अभिभावकों का अपनी लड़कियों के प्रति चिन्ता करना कुछ हद तक जायज भी लग रहा था। आजकल माहौल ही ऐसा है। बताया न कि वहीं कैफेटेरिया में कुछ लड़कियां बड़े बोल्ड कपड़े पहने हुए थीं। सो रात साढ़े दस बजे हम लोग अपना काम खत्म कर जाने लगे तो एक उसी बोल्ड ग्रुप वाली दिखी कॉलेज के कॉरीडोर में किसी लड़के के साथ खड़े हुए। बहुत संभव है उसने भी घर पर कॉलेज में फंक्शन की तैयारी आदि की बात कही हो, बहाना बनाया हो जबकि असल मेहनती लड़कियां रात आठ, साढे-आठ बजे तक अपने अपने घरों को रवाना हो गई थीं। इन सब चीजों को देखने पर यही लगता है कि जहां एक ओर अभिभावकों की चिंता जायज है तो वहीं लड़कियों की पढ़ाई और उनकी मेहनत को मान देना भी जरूरी है। बहुत संभव है अभिभावक अपने बच्चों के प्रति विश्वास रखते हों कि वह कोई गलत काम नहीं करेंगे लेकिन माहौल और दूषित मनोवृत्तियों से दूरी बनाये रखना जरूरी भी है। कहां कब क्या घट जाय कोई नहीं कह सकता। एक ओर विचलन वाला माहौल है, दूषित मनोवृत्तियां हैं, तो दूजी ओर लड़कियों की पढ़ाई है, उनकी आगे बढ़ने की जद्दोजहद है....तिस पर अभिभावकों की स्वाभाविक चिंताएं.....।


- सतीश पंचम

Sunday, September 4, 2011

दर्शन....वर्शन....विचार...सिचार

             मंदिरों में जाते हुए जितना मैं जूता चोरों से सशंकित रहता हूं उससे ज्यादा अड़चन मुझे उन फूल माला बेचने वालों से रहती है जो ठेलम-ठाल करते हुए घेर लेते हैं कि आइये हमारे यहां से फूल लिजिये.....चप्पल यहां उतारिये.....पांच मिनट में जल्दी दर्शन मिलेगा....इधर आइये। कम्बख्त दिमाग खराब कर देते हैं। आज मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर में गया था वहां भी यही सब देखा। टैक्सी से उतरते ही एक हिजड़ा आकर खड़ा हो गया। उससे पार पाया तो आगे फूल वाले घेर लिये। एक ने कहा -अंदर तीन घंटे लाइन है, इधर हमारे दुकान के बगल के रास्ते से जाएंगे तो पांच मिनट में दर्शन मिलेगा। एक तो रविवार और दूजे गणेश जी के त्यौहार के चलते यह भीड़ होना लाजिमी भी है।


        खैर, उन फूलवालों को यूं ही छोड़ श्रीमती जी के साथ अंदर मंदिर की ओर चल पड़ा। भीतर जाने पर पता चला कि उतनी भीड़ नहीं है सिद्धिविनायक में जितना कि बाहर फूलवाला कह रहा था। संभवत: ज्यादातर लोगों ने लालबाग के राजा की ओर रविवार के दिन जाना ठीक समझा हो या हो सकता है घरों में ही लोगों ने गणेश जी को इन दस दिनों में पूजन योग्य समझा हो। कम भीड़ के चलते केवल पांच मिनट में सिद्धिविनायक मंदिर में जाकर दर्शन हो गये। बाहर निकला तो फिर एक दूसरा किन्नर समुदाय का सदस्य आकर खड़ा हो गया। देखा गया है कि ऐसे लोगों को पैसे न दो तो अनाप शनाप बोल बैठते हैं। नाहक कौन उनकी बात सुने इसलिये ज्यादातर लोग दे भी देते हैं। मैंने भी दो-चार रूपये देने की सोचा लेकिन श्रीमती जी का मूड देख मुंह दूसरी ओर फेर टैक्सी का इंतजार करने लगा। पता नहीं क्या तो बोलकर वह किन्नरी वहां से चला गया। थोड़ी देर बाद हम दुन्नू परानी लोग घर आ गये। रास्ते में मन ही मन किन्नरों से संबंधित दो चार वाकये याद आ गये । उनमें से एक तो मेरे मित्र के साथ वाकया हुआ जब वह अपनी गर्ल फ्रेण्ड के साथ पार्क में बैठा था। तभी वहां हिजड़ा आ पहुंचा और उससे पचास रूपये की मांग करने लगा। मित्र परेशान, उसकी गर्ल फ्रेण्ड परेशान कि ये कहां से आ गया। मित्र पैसे देने में आनाकानी करने लगा तो वह लगा वहीं अनाप शनाप बोलने। गर्ल फ्रेण्ड के चक्कर में बेचारे ने जल्दी से पचास का नोट जेब से निकाला और उसे देकर अपनी पीछा छुड़ाया।

       एक और वाकया याद आता है। मुंबई से चलने वाली लंबी दूरी की गाड़ियों में अक्सर कल्याण के पास कुछ किन्नर ग्रुप बनाकर चढ़ते हैं और हर डिब्बे में पैसे लेते हैं। जो नहीं देता उससे झगड़ने भी लगते हैं। एक बार एक शख्स अड़ गया तो एक ने खुलेआम अपना घाघरा ही उपर को उठा दिया। देखने वाले हं..हं...करते रह गये लेकिन उसने सामने वाले को लजवा कर ही छोड़ा। दस रूपये की बजाय बीस रूपये झटक कर चल दिया। ये और इस तरह के वाकये किन्नर समुदाय के प्रति लोगों में अजीब सा संशय उत्पन्न करते हैं। ट्रैफिक सिग्नल पर कई बार इस समुदाय के लोगों को देखा है और कई बार उनमें आपस में मारपीट भी होती देखी है ( संभवत: एक दूसरे के कैचमेंट एरिया में अतिक्रमण को लेकर मारपीट हुई हो) ।

     खैर, ईश्वरीय अन्याय के इन जीते जागते लोगों को देख एक ओर दया भी आती है तो थोड़ी सा अजीब भी लगता है। सरकार भी इस समुदाय के लिये कुछ रोजगारपरक या उनके अधिकारों के लिये कोई ठोस कार्यक्रम नहीं बनाती दिखती ( यूं भी आम सहज जीवन वाले लोगों के कार्यक्रम बनाने में कौन सा बाकी उठा रखा है सरकार ने). समाज में भी एक नकारात्मक छवि सी बनी हुई लगती है। जाने कब तक यह धुंधलका छंटे।

     वैसे मंदिरों या धार्मिक स्थलों के बाहर छिटपुट पैसा मांगते, यदा कदा नंगई फानते ये लोग मुझे राजनीति के उस समुदाय से ज्यादा ठीक लगते हैं जोकि मंदिर-मस्जिद के नाम पर धन उगाहने, लोगों में विद्वेष फैलाकर पॉलिटीकल गेन पाने के लिये राजनीतिक नंगई फानते हैं।
 
- सतीश पंचम

Saturday, September 3, 2011

खड़े-खड़ समिती बजरिये 'बैलही' ठसक.....

      सुन रहा हूं कि बैल क्म्यूनिटी नाराज है कि उसको कभी कोई कोट क्यों नहीं करता, अब उसकी उपमा क्यों नहीं दी जाती किसी को। ट्रैक्टर से खेत जोता जाता है इसका मतलब ये थोड़ी है कि बैलों की घटती संख्या के चलते उन्हें अपनी उक्तियों, मुहावरों से भी बेदखल कर दिया जाय। उनका मुख्य गुस्सा इंग्लैंड के खिलाड़ी पर था जिसने भारतीय खिलाड़ियों में से एक दो को गधा कह दिया था। उस खिलाड़ी ने गधा कह दिया तो कह दिया लेकिन उसके चलते सचमुच के गधों का तो रंग ही नहीं मिल रहा है, एकदम हवा में है आजकल उनका दिमाग कि देखो वो हमारी ही कम्यूनिटी का है और आज लाखों-करोड़ों कमाकर रख दे रहा है। जाहिर है गधों की यह खुशी बैलों से नहीं देखी जा रही।


     उधर विद्वजनों का मानना है कि बैल कम नहीं हुए हैं बल्कि बढ़ रहे हैं। बैलों का नाराज होना किसी राजनीतिक साजिश का नतीजा है, जरूर उन्हें किसी ने बहकाया है। यह सूचना बैलों को पहुंचा भी दी गई कि विद्वजनों के अनुसार उनकी संख्या बढ़ रही है लेकिन वे मानने को तैयार नहीं हैं। इस देश का यही दुर्भाग्य है कि विद्वानों के द्वारा कही गई बातों को कोई जल्दी मानता नहीं वरना देश कहां से कहां पहुंच जाता। वैसे भी सुना है देश अभी हाल्ट पर है। जिस किसी को चायपानी करनी होती है, वह देश की चिंता करता हुआ सामने की दीवार की ओर लपक लेता है और वहां खड़े खड़े चिंता करता है कि स्टैंडिंग कमेटी में कौन आया कौन गया। एक दो को तो ये भी चिंता थी कि सितंबर आ गया, हिंदी-उन्दी लिखने पढ़वाने का समय नज़दीक है लेकिन सरकार अब भी अंग्रेजी में ही स्टैंडिंग कमेटी कहती है। क्यों नहीं उसके लिये कोई हिन्दी शब्द लोकप्रिय बनाती। इस जायज चिंता पर एक नाजायज चिंतक ने कहा कि स्टैंडिंग कमेटी के लिये हिन्दी शब्द उपलब्ध है लेकिन वह जनता को समझ में आ जायगा इसमें संदेह है अत: बिना सन्देह वाला शब्द ही इस्तेमाल किया जा रहा है।

         उधर सुनने में यह भी आ रहा है कि और भी चौपायों ने अपनी अपनी बिरादरी से पक्षपात करने का आरोप लगाया है। भैंसों को यह शिकायत है कि आजकल कोई किसी को भैंसा नहीं कहता जबकि एक समय था कि लोग किसी को भी जब जी चाहता भैंसा कह देते थे और सामने वाला हंसते हुए उसकी बात को कुछ यूं लेता मानों भैंसे की उपमा उसके खाते पीते घर से होने की ओर इंगित हो। वहीं कौआ और गिद्ध भी कुछ इसी तरह के प्रश्नों से जूझ रहे है, न सिर्फ जूझ रहे हैं बल्कि कुछ ने तो खड़े-खड़ कमेटी भी बना ली है कि जैसे ही कोई मामला आए तुरंत खड़े खड़े उसका निपटान कर दिया जाय, उसे बैठने की जरूरत ही न पड़े। अब जहां इतनी सारी हलचल मची हो, कोलहर मची हो वहां लोग क्रिकेट पर ध्यान केन्द्रित करें यह थोड़ा अजीब लगता है। तब तो और जब हमारे बहादुर खिलाड़ी एक दूसरे की शर्ट पकड़े छुक छुक गाड़ी खेल रहे हों और पूरी सीरिज बुरी तरह से हारने के बाद भी गधा कह दिये जाने से नाराज हों। समझ में नहीं आ रहा कि आखिर क्या बात हो गई कि अभी चंद महीनों पहले वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम लगातार हारते चले गई।

        बैलगण, आप लोग दुखी न हों, इतना कहने सुनने के बाद भी जब भारतीय खिलाड़ियों पर कोई असर न पड़ेगा तो लोग सहज भाव से उन्हें बैल कहने लगेंगे। ऐसे में जरूरी है कि आप लोग अपना स्वभाविक धैर्य बनाये रखें......  :)

- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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