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Wednesday, August 31, 2011

छुई-मुई सांसदगिरी बजरिये चच्चा जेम्स वॉट

      सुनने में आया है कि संसद में अभिनेता ओम पुरी और किरण बेदी पर विशेषाधिकार हनन के सिलसिले में कार्यवाही करने की बात हो रही है। हमारे छुईमुई सांसदों को उनके द्वारा अपनी खिंचाई करना अखर गया है। कुछ सांसद लोग इस पक्ष में हैं कि उन लोगों के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिये क्योंकि उन्होंने विशेषाधिकार हनन किया है। 

  इस घटना से पता चलता है कि बड़े नाजुक हैं हमारे सांसद गण। एकदम गुलाब के पंखुड़ियों की तरह। जिस तरह पाकिजा फिल्म में मीना कुमारी के पांव देखकर राजकुमार ने कहा था - अपने पाँवों को जमीन पर मत उतारना, मैले हो जायेंगे....कुछ उसी तरह हमारे सांसदों के बारे में भी कहा जा सकता है - कि कृपया हवा में ही बने रहें, जमीन पर कदम रखते ही मैले हो जाएंगे...जमीन या सांसद ये आप तय करें।

      खैर, इस प्रकरण से जिन्हें अब तक नहीं पता था कि विशेषाधिकार नाम की कोई चिड़िया भी होती है, उन्हें भी पता चल गया कि यह क्या चीज है। अब लोग डरेंगे सांसदों का मजाक उड़ाते हुए, उन पर व्यंग्य करते समय सोचेंगे कि कुछ कहें या न कहें....कल को कहीं संसद में न बुलवा लिया जाय। वैसे ये संसद भवन के स्थापत्य को निहारने का स्वर्णिम मौका है। जिन लोगों ने अब तक संसद को अंदर से न देखा हो वे इस तरह के छुई-मुई हननादि के जरिये जुगाड़ बना सकते हैं।

       उधर देख रहा था कि शरद यादव संसद में बहस के दौरान बढ़ चढ़ कर बोल रहे थे। बोल रहे थे - ऐसा कहा जा सकता है। बाकि तो मान्यतायें हैं.....कहां तक तर्क ढूँढियेगा। हां तो मैं कह रहा था कि शरद यादव संसद में बोल रहे थे। उनके अनुसार सांसदों का इस तरह पब्लिक में मजाक उड़ाया जाना अच्छी बात नहीं है। इसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिये। चलिये, हम भी मानते हैं, हम ही क्या सभी लोग मानते हैं कि सांसदों का पब्लिक में मजाक नहीं उड़ाना चाहिये लेकिन उनका क्या जो मजाक मजाक में ही सांसद बन जाते हैं, मजाके-मजाक में पूरा पांच साल खींच ले जाते हैं। इतना ही नहीं, अगली बार फिर मजाक करने के लिये मुंह लेकर खड़े हो जाते हैं। काम करो चाहे न करो लेकिन मजाक जरूर करो। अब ऐसे में थोड़ा बहुत मजाक जनता भी आप लोगों से कर ले तो इससे आप लोग चिढ़ जाते हैं। कल को कहीं जनता ने सिरियस होकर सोच समझकर वोट देना शुरू किया तो आप लोगों का संसद पहुंचना मुश्किल हो जायगा बंधुओ। इतने भी न इतराओ कि फिल्मी हिरोइनें इनफिरियरिटी कॉम्पलेक्स से घिर जांय।

       फिलहाल मेरा मन आप लोगों को गंगा-जमुना फिल्म दिखाने का हो रहा है। गंगा-जमुना फिल्म तो देखे होंगे। अरे वही जिसमें बड़ा भाई गंगा एकदम गंवार है, मेहनत मजूरी करके छोटे भाई जमुना को पढ़ाता है ताकि उसका भाई 'निसपिट्टर' बने , बड़ा आदमी बने ताकि दोनों भाई मिलकर घर को संभाल ले जांय, गरीबी दूर हटे, मुफलिसी के दिन बीतें। यही सब सोच कर गंगा अपने छोटे भाई जमुना के लिये अलग से 'फउन्टन पेन' का इंतजाम करता है, दूध दही से लेकर वो तमाम चीजें उसके लिये मुहैय्या कराता है जो उसकी पढ़ाई में मदद करे, उसे निसपिट्टर बनाये।

       यहां तक तो फिल्म की कहानी थी। अब मान लिजिये कि एक ट्वीस्ट आ जाय। छोटा भाई जमुना पढ़ने की बजाय मटरगश्ती करने में लग जाय, यहां वहां घूमने टहलने लगे, भाई के मेहनत से कमाये पैसों पर मौज उड़ाने लगे तब बड़े भाई को गुस्सा आएगा कि नहीं.....। इसी बीच पता चले कि सारी सुविधाओं के बावजूद जमुना फेल हो गया, तब ? तब तो और गुस्सा आयेगा। पढ़ा लिखा सब बेकार, पैसा गया सो अलग।

        इसके बावजूद बड़े ने छोटे पर विश्वास बनाये रखा, सोचा कहीं कुछ गड़बड़ हो गई होगी, न पढ़ पाया होगा, चलो अगली बार पास हो जायगा। फिर से जमुना की पढ़ाई की तैयारी हुई। फिर से बड़े ने मेहनत मजूरी करके, बोझ ढोकर, जांगर ठेठाकर उसे पैसे दिये। लेकिन नतीजा सिफर। तंग आकर एक दिन बड़े भाई गंगा ने छोटे को भला बुरा कह दिया, उसके खर्चों-उसके नाज नखरों को लेकर सवाल उठाया तो छोटा उखड़ गया। उसने यह कहकर बड़े को आश्चर्य में डाल दिया कि दूध-दही, अलग से कमरा, लालटेन और वो तमाम सुविधाएं उसके विशेषाधिकार हैं, ये सब पढ़ने लिखने के लिये जरूरी हैं। पढ़ाई लिखाई कोई हल-बैल तो नहीं हैं, कि बैल को जुए में सटाया, हल नाधा और चल पड़े खेत जोतने। पढ़ाई के कलम लगती है, किताब लगती है, इंसानी दिमाग इस्तेमाल करना पड़ता है। ऐसे में उसके विशेषाधिकारों पर दखल न दिया जाय।

        बड़े ने अब अपने अधिकार का उपयोग किया। एक झन्नाटेदार चांटा छोटे के गाल पर पड़ा। प्यार के समय प्यार, दुलार के समय दुलार लेकिन उसके सामने विशेषाधिकार की बात वही छोटा भाई करे जिसके सुख सुविधा के लिये उसने मेहनत मजूरी की, उसे पढाया लिखाया तो यह तो ठीक नहीं है बंधुगण। आप लोगों की हालत उसी छोटे भाई जमुना सी है। कितना भी सुख सुविधा दे दो, दूध दही खिला दो लेकिन नतीजा वही सुन्न बटा सुन्न। ऐसे में रात दिन खटने वाला जांगर ठेठाने वालों का प्रतीक गंगा, यदि दो चार बात बोल दे तो आप लोगों को सुनना पड़ेगा, न सिर्फ सुनना बल्कि उसी हिसाब से अपने काम काज के तौर-तरीकों को बदलना पड़ेगा।

        आज दो चार जनों को संसद में बुलाकर आप लोग लताड़ लगाकर खुश हो लेंगे लेकिन भविष्य का क्या। अच्छा है कि थोड़ा थोड़ा भाप जनता के भीतर से प्रतिक्रिया के रूप में निकलने दिया जाय। यह दोनों ही पक्षों के लिये उचित है। वरना तो जेम्स वॉट चच्चा ने केतली के ढक्कन के जरिये बताया ही है कि भाप की शक्ति क्या क्या कर सकती है। अच्छा होगा केतली के उपर लगे ढक्कन की ठकर ठकर को सुना जाय, उस पर तवज्जो दी जाय न कि विशेषाधिकार का बहाना बनाकर खुद की लुटिया डुबोई जाय।


- सतीश पंचम

Sunday, August 28, 2011

कपिलौठी वाले बाबा v / s अन्ना हजारे

कड़क गड़न दुरजन बचन, रहे सन्त जन टारि ।
बिजुली  परै  समुद्र  में,  कहां   सकेगी  जारि ।।
       भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान अन्ना हजारे पर कबीर की यह उक्ति सचमुच साकार हो गई है। जिस तरह से सरकारी लण्ठों ने अपनी लण्ठई के चलते अन्ना पर तीखे वार किये, उन्हें भ्रष्ट बताया, उनपर विभिन्न संघटनों से सांठ-गांठ का आरोप लगाया वह सब कुछ झेलते हुए भी अन्ना हजारे ने जिस अंदाज में अपने आंदोलन को अहिंसक बनाये रखा और सरकार से अपनी बात मनवाई वह वाकई काबिले तारीफ है। वरना जिस भारी संख्या में लोग जुटे, गाँव-गाँव, शहर-शहर जुटते चले गये वैसे हालात में कहीं भी स्थिति बिगड़ने के अंदेशे थे। कुछ जगह हल्के फुल्के हुड़दंग भी देखने में आये लेकिन कुल मिलाकर आंदोलन शांतिपूर्ण रहा।

         अब जब कि आंदोलन का वर्तमान दौर खत्म हो गया है ऐसे में कुछ नई बातें भी सामने आ रही हैं जिनसे कि पता चलता है कि टीम अन्ना में कैसे घुसपैठिये आ जुड़े थे। ताजा घटनाक्रम स्वामी अग्निवेश से संबंधित है जिनके नाम के आगे स्वामी लगाना अनुचित लग रहा है। महाशय भगवा रंग में विवेकानंद की तरह ड्रेस पहन कर फोन पर किसी कपिल से आंदोलन की चर्चा बड़े हल्के ढंग से कर रहे थे और अन्ना की तुलना पागल हाथी से किये जा रहे थे। ये कपिलौठी छुपी रह जाती यदि किसी ने उसे रिकार्ड न कर लिया होता। इस तरह के भगवा लोगों के चलते ही साधु-सन्तों पर जल्दी मैं विश्वास नहीं करता और न ही विश्वास करने का आगे मन ही है। कबीर ने ही कहा है कि -

बहता  पानी  निरमला,  बन्धा  गन्दा  होय ।
साधु जन रमता भला, दाग न लागे कोय ।।

    लेकिन स्वामी (?) अग्निवेश और वो तमाम बापू-सापू कम्बख्त इसके ठीक उलट चल रहे हैं। बड़ी बड़ी कोठियों, जमीनों, सुविधाओं की उम्मीद में लोगों को भरमाते हुए नारंगी- भगवा हुए जा रहे हैं और लोग भी हैं कि उनके बारे में जानते हुए भी एक विश्वास के तहत कुछ कर नहीं पाते। अभी कुछ साल पहले किसी न्यूज चैनल ने धार्मिक गुरूओं के बारे में स्टिंग आपरेशन किया था जिसमें दिखाया गया था कि कैसे हर धर्म के गुरू लोग अनैतिक कामों में लगे हैं। भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। रूपये पैसे यहां वहां से दाब दूब रहे हैं। एक संत को देखा जिसे कि एनजीओ के नाम पर पैसे देते समय बंदे ने वाईट करवाने के लिये कहा तो संत जी बोले - आप फिक्र न करें, इतने के तो हम बाकायदा चटनी बनाकर आपको वाइट करके देंगे फिक्र न करें। आप आये आप का काम हो जायगा। ऐसे ही क्रिश्चियन, मौलवी आदि का भी स्टिंग हुआ था जिसमें उन्हें विभिन्न संघटनों, फतवों, डोनेशन के जरिये करोड़ों रूपयों को इधर-उधर से दबाते दिखाया गया था। उस विडियो को देखते हुए विश्वास करना मुश्किल होता था कि यह वही संत है जो रोज सुबह प्रवचन देता है। एक चंद्रास्वामी और उसका कोई मामा था जिन्हें देखते ही लगता था कि दोनों एक नंबरी सत्ता के दलाल है। समय बदलता गया और उसी के साथ ढेरों दलाल अपने अपने चेलों चपाटों के जरिये बनते बिगड़ते रहे। इस पूरे मामले में वही है कि जो पकड़ उठा समझो वही चोर है वरना तो सभी साधू संत हैं। ऐसा नहीं कि जनता ऐसे लोगों को नहीं समझती लेकिन वह भी अपने पुराने संस्कारों के चलते सीधे कुछ कहने करने से बचती है। नतीजा यह होता है कि शरद यादव जैसों को संसद में कहने का मौका मिल जाता है कि क्या देश अब बाबाओं की मध्यस्थता से चलेगा ? यह स्वामी (?) अग्निवेश जैसे कुछ लोगों के कपिलौठी के कारण ही अच्छे भले आंदोलन पर लोगों को उंगली उठाने का मौका मिलता है।

दूरदर्शी जनतंत्र : Strong to The FINISH
    बहरहाल इतना जरूर है कि इस भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन के चलते कइयों की माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई होंगी। पहले तो कपिलौठी विचारधारा वाले लोग जोकि अब तक अपने को निर्द्वद्व मान कर चलते थे अब थोड़ा सकुचायेंगे, न भी सकुचायें तो कम से कम प्रकट रूप में कुछ ऐसा वैसा करने से बचेंगे। कुछ ऐसे भी लोग होंगे जिनके अवचेतन में इस आंदोलन की कुछ बातें कहीं न कहीं असर किये हों जो कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के कम करने में सहायक होंगे। यदि कुछ न भी हो तो एक तरह की जनचेतना तो आई है लोगों में कि भ्रष्टाचार से दूरी बनाकर रखी जाय। अब यह तो समय बतायेगा कि आगे क्या और कैसे असर दिखेगा लेकिन वक्ती तौर पर हमें एक परिवर्तन के साक्षी होने का मौका जरूर मिला है। इतिहास को सामने बनते देखने का मौका मिला है। उम्मीद करता हूं आगे भविष्य एकदम से स्याह न सही कुछ उजला तो होगा ही।

- सतीश पंचम

Saturday, August 27, 2011

डॉ. अमर.....मेरी नज़र से.

       डॉ. अमर के निधन की खबर पढ़कर पहली बार इस वर्चुअल दुनिया में कहीं गहरे तक असहज हो उठा। ऐसा पहली बार हुआ कि जिनसे मैं प्रत्यक्ष न कभी मिला न कभी आमने सामने देखा लेकिन उनके निधन की खबर से भीतर तक बिंध गया। उस दिन सुबह काफी देर तक अनमने रहने के बाद धीरे धीरे सामान्य क्रियाकलापों में लग गया लेकिन मन अब भी डॉ. अमर के बारे में सोच रहा था। उनसे हुई मीठी नोक-झोंक, तीखे तंज, उनकी टिप्पणियों में मिलने वाली एक अलग किस्म की बेबाकी।


          टिप्पणियां तो खैर वे काफी पहले से मेरे ब्लॉग पर यदा कदा देते रहे थे, मैं भी उन्हें पढ़ता रहता था लेकिन दिसंबर 2008 में कुछ ऐसा घटा कि मैं उनसे खुलकर हंसी ठिठोली करने लगा। उन्हें मस्त अंदाज में पढ़ने लगा।  दरअसल दिसंबर 2008 का  यह वह दौर था जब लोगों ने अपने ब्लॉग पर ताले लगाना शुरू किया था। ताले से तात्पर्य 'राइट क्लिक प्रोटेक्टेड' जिससे कि कोई उनके ब्लॉग पर से कॉपी पेस्ट न कर सके। अमर जी ने भी अपने ब्लॉग पर ताला लगाया था जिससे चिट्ठाचर्चा के दौरान अनूप जी वहां से कापी पेस्ट न कर पाते थे। मौज लेते हुए अनूप जी ने  चिट्ठाचर्चा में  लिखा कि -

    कापी प्रोटेक्टेड का चलन अभी कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। डा.अमर कुमार, प्रत्यक्षा और अन्य तमाम साथी भी जिनका लिखा कभी कापी करके सबको पढ़ाने का मन करता है वह सब ताले में बंद है।


   डा.अमरजी, कित्ता तो फ़न्नी बात है कि फ़ौज के युद्दाभ्यास की फोटो कहीं न कहीं से लाकर आप अपने ब्लाग पर सटा दिये और उस पर अपना ताला लगा दिये। कहीं कोई चुरा न ले। ये वैसा ही है भाई जान कि आप खलिहान से अनाज लाकर अपनी बखारी में जमा करके उस पर अलीगढ़ी ताला सटा दिये।
मुझे दूरगामी परिणाम पता नहीं लेकिन अगर आप सच में चाहते हैं कि हिंदी का प्रचार-प्रसार हो तो आपको अपना लिखा सब कुछ सबके लिये सुलभ रखना चाहिये।


     उनके इस पोस्ट पर कॉपी प्रोटेक्शन को लेकर लंबी बहस हुई और उसी दौरान मैंने कमेंट किया -

सतीश पंचम said... @ December 07, 2008 10:41 AM

अपने लिखे को प्रचारित-प्रसारित करने के लिये Microsoft की Policy अपनानी चाहिये, जितना ज्यादा नकल होता है, पायरेटेड सॉफ्टवेर बनता है बनने दो, जाने-अनजाने वह Microsoft का ही प्रचार कर रहे हैं और उससे जुडे हैं। अपने सॉफ्टवेर की लोगों को इतनी आदत डाल दो कि क्या पायरेटेड और क्या ओरिजिनल सब एक बराबर, जिसके बिना लोगों का काम न चले। यही वह पॉलिसी रही जिसके कारण आज ज्यादातर कम्प्यूटर Microsoft based हैं।

हाँ थोडा कंट्रोल जरूरी है ताकि कोई आपके लिखे को सीधे-सीधे अपने नाम से न छाप डाले।


उसके बाद अमर जी का अपने ब्लॉग पर की गई तालाबंदी को लेकर कमेंट आया

डा. अमर कुमार said... @ December 07, 2008 12:18 PM

ताले का कोई महत्व भी होता है क्या ? मैं स्वयं ही नहीं जानता, फिर भी यह लगा तो है, ही ?

सही है, क्या लेकर आये हैं, क्या लेकर जायेंगे .. और मैं तो अपना सबकुछ लगभग दान कर चुका हूँ !


अब तो समेटने की तैयारी है , फिर ?
फिर.. बीते हुये समय और श्रम को लौटाया तो नहीं जा सकता, न ?
पर, यही मेरे कुछ तो है, के साथ हो चुका है..
कैसा लगता है, जब आप एक दिन सुबह उठ कर पाते हैं,
कि आपके अपने ब्लाग का एडमिनिट्रेटिव प्रिविलेज़ आपके पास है ही नहीं !
आप अपना ही कुछ भी एडिट कर सकने में अक्षम हैं, तो ?
......

.....

     आगे भी यह बहस लंबी चली जिसमें सभी ने कुछ न कुछ योगदान दिया। लेकिन डॉ साहब ने मुझे चौंका दिया जब उन्होंने मेरी बात को मुझ पर ही बूमरैंग करते हुए मेरी एक पोस्ट को अपने ब्लॉग पर छापते हुए लिखा -

 
अब ढूँढ़िये, इसका मूल लेखक ?
यदि आप जागरूक पाठक हैं, तो पहचान ही जायेंगे..
इस पोस्ट के मूल लेखक को… नहीं पहचाना ? कोई बात नहीं., फिर तो..
यह रचना मेरा हिन्दी के प्रसार में योगदान माना जाये


      उस पोस्ट की टिप्पणियों में कुछ लोगों ने उसे अमर जी की ही पोस्ट माना और तब अमर जी ने मेरी Microsoft पायरेटेड Policy वाली टिप्पणी के एवज में हंसी ठिठोली करते लिखा -


@ भाई सतीश पंचम जी,


अब कुछ कुछ समझ आ रहा है, भाई जी ?
अब तक के 50% आगंतुक इसे मेरी पोस्ट होने का श्रेय दे रहे हैं,


       दरअसल इस कॉपी पेस्ट के जरिये अमर जी ने बताया कि कैसे लोग किसी के लिखे को अपने नाम से छाप सकते हैं, ऐसे में ज्यादा नहीं तो कुछ तो अपने से उपाय करना चाहिये कि ब्लॉग कंटेट लेखक के नाम ही बना रहे। इस घटना से पता चलता है कि अमर जी लेखन और उसके स्वामित्व को लेकर कितने संजीदा थे।
 
     इस घटना के बाद मैं उन्हें और पढ़ने लगा। कई बार उनके लिखे में एब्सट्रैक्ट भी होता था। यदा कदा अमूर्त तत्वों की बहुलता की वजह से उनके कुछ लेख मुझे कम समझ में आते लेकिन अच्छा लगता था उन्हें पढ़ना। वैसे भी उनकी टिप्पणियां अलग तरह की होती थीं। अरविन्द मिश्र जी ने उन्हें ब्लॉगजगत का एक तरह से स्फिंक्स कहा है और काफी सही कहा है। उनकी टिप्पणियाँ अपने बेबाकी के लिये जानी जाती हैं। कभी उनमें तंज होता, कभी मीठी झिड़की तो कभी उत्साह बढ़ाने वाली बातें भी।

  खैर, विधि को यही मंजूर था। उनका हमारा साथ यहीं तक लिखा था।ईश्वर उनकी आत्मा शान्ति दे और परिवार को इस हादसे से उबरने की शक्ति.

अंत में डॉ अमर की एक टिप्पणी का अंश जिसे उन्होंने चिट्ठाचर्चा पर लिखा था जिसे पढ़ते हुए लगता है जैसे डॉ अमर अब भी हमारे बीच हैं -


अब आपलोग चलिये.. चलिये,
ऎसा कुछ नहीं हुआ है..
आप सब अपने अपने ब्लाग पर चलिये
जाकर कुछ सार्थक लिखिये-पढ़िये..
लंतरानी फ़ेंक कर टिप्पणी बटोरने का मोह छोड़िये ।
चर्चित न हुये, तो क्या आपके ब्लाग का अस्तित्व मिट जायेगा ?
अग़र अपना ही मोहल्ला शरीफ़ न हुआ,
तो टिप्पणीकार ब्लागर को सतायेगा
और चर्चाकार ? वह बेचारा अल्ल्सुबह ताला-पुराण लिखेगा,
उसकी भी मज़बूरी समझें, वह स्वांतः सुखाय टाइम खोटी कर रहा है..
हर ब्लागर और हर पोस्ट को शामिल किये जाने की अपेक्षा ही क्यों की जाये ?
बस, जाकर कुछ ऎसा उछालिये, कि आप भी चर्चा में दिखें..
बस्स, यही तो ? सो, चलिये चलिये.... मौज़ मत लीजिये
अपने अपने ब्लाग पर जाकर पोस्ट लिखिये !

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- सतीश पंचम

Tuesday, August 23, 2011

मन्नाद......

        आज फिर मुम्बई में जगह जगह नेताओं के घोड़े जैसे मुँह वाले पोस्टर देखा जिसमें वह अपील करते दिखे कि अन्ना हम आपके साथ हैं। कम्बख्तों को शर्म भी नहीं आई यह कहते कि कहां अन्ना और कहां ये टुच्चे नेता। अन्ना जैसे व्यक्तित्व को छूने भर की कूवत न रखने वाले ये नेता खुद को अन्ना से करीबी जताना चाहते हैं। मन तो कर रहा है कि लोकपाल पास हो तो पहले इन्हीं टुच्चे नेताओं को अंदर किया जाय जोकि आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए फ्लैक्स बैनरों पर अपने दांत दिखाते नजर आते हैं। कुछ समय पहले ऐसे पोस्टरों बैनरों को देखकर मन्नाद लिखा था। मन्नाद.....यानि मन का नाद..... एक तरह से मन की आवाज जोकि सामने दिखते मंजर से खुद ब खुद प्रकट हो जाय। कुछ कुछ कोलाज की तरह.......

पेश है वही  री-पोस्ट....


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        सड़क पर चला जा रहा हूँ.............सारिका साड़ी सेन्टर............महमूद गैरेज.......इंडियाना जोन्स रेस्टोरेण्ट.......सामान बेचते दुकानदार...... कोई सब्जीवाला ......... कोई फ़ल वाला........कोई पान वाला......एक मोची दिख रहा है.......कीलें ज़मीन पर गिराकर सही कील ढूँढ़ रहा है........एक गुटके का रैपर गिरा है........गोवा गुटका.......टन्न्........ मंदिर में किसी ने घंटी बजाई है........गन्ने के जूस वाले ने अपनी जूस मशीन में घुंघरू बांधे हैं.......... वही बज रहे हैं शायद..........कोई ग्राहक जूस पीने आया होगा.........बर्फ मत डालना.............ये अख़बारों की सजी धजी कतारें...........हेडलाईन में थरूर.........कोई अहम खबर है शायद............ग्लैंमर वाली खबरे पढ़ रहा है अखबार वाला........जानता नहीं........... एक शैंपेन पर ख़बरें मुलम्मेदार हो जाती हैं......पढ़ रहा होगा शिल्पा को फलां ने किस किया..........राखी को गुस्सा आया........शाहरूख बोले..........अमिताभ ने.........



     वो कौन खड़ा है.........दीवार पर तो लिखा है देखो गधा......पिशाबी गन्ध.....फ्लैक्स बैनर......नेताओं के बड़े बड़े चेहरे लगे हैं......... देख कर डर लगता है..........इन्हें ऐसी जगह पर लगे होने में शर्म....... नहीं..............बदबू खैर क्या आती होगी.............सुलभ के ठीक उपर ही तो लगा है.... हंसता हुआ नेता का चेहरा..................................पार्टी चिन्ह भी है..........धार मारने वाले का फोर्स उतने उपर क्यों नहीं जाता.................टन्न्.......भगवान.........मंदिर में आरती शुरू हो गई है.........ओम जय जगदीश......ह.............नगर पालिका की गाड़ी आ गई....... चोर गाड़ी आ गई.......अवैध दुकानदारी.........भाग..................समेट ............ठेलेवाले ने भागते समय टमाटर गिरा दिया .......गाय टमाटर की ओर बढ़ रही है...........पान वाला सबसे आगे भाग रहा है......बचा ले गया...........सब्जीयां चढ़ाई जा रही हैं गाड़ी पर........अंगूरी लड़ीयां बिखर गई हैं.......गज़रा बेचती औरत जल्दी कर रही है............कर्मचारी...... फुर्तीदार हैं.......... ........आईस्क्रीम वाले का खोमचा पकड़ा गया.........डिलाईट कुल्फ़ी.......गाड़ी में ठेले के चार पहिये उपर की ओर ............केले जमीन पर गिर पड़े ......... बच्चे उठा रहे हैं............सेब वाला हाथ जोड़ रहा है............लोहे की अंगुठी.......एक शनि के लिए..........एक गुरू के लिए...........मंगल फेर................सारिका साड़ी सेन्टर........दुकानदार चाय पी रहा है........अरे खीरे की टोकरी लेकर दुकान में कहाँ आ रहा है .......टोकरी ज्यादा अंदर मत रख..........उधर रखेगा तो भी चलेगा...........नहीं पकड़ेगा.........बोलो बहनजी..........कुँवर अजय वाली साड़ी कल ही आई है......दिखाऊँ...खटाउ........ पहनने में नरम रहती है.............चिंगुरेगी नहीं...........


चिंगुरेगी नहीं........नहीं नहीं.........



ऊँ..........शांति शांति............शांति.......


- सतीश पंचम

(  अण्णा के अभियान की सफलता की कामना करते हुए  उम्मीद करता हूँ  सरकार कुछ ढिल्ल टिल्ल होगी,  मिटींग खत्म कर कुछ सकारात्मक बातें बतायेगी  ) 

Saturday, August 20, 2011

कवचों, ढक्कनों, रैपरों से युक्त लोकायुक्त........

मैं जब कभी कालजयी लेखकों के बारे में सोचता हूं तो मन में यह जरूर आता है कि क्या ये लेखक हमेशा ऐसे ही कालजयी रहेंगे ?   उनकी लेखनी कभी  तो अप्रासंगिक होती होगी ?  कभी तो काल, परिवेश से परे उनकी लेखनी रूक जाती होगी ?   लेकिन नहीं,  मैं  जितना ही इन प्रश्नों के बारे में सोचता हूं, उतना ही इसका जवाब एक सीधे सपाट धरातल पर आकर मिलता है कि - काल, परिवेश, लोग भले बदल जांय लेकिन कालजयी लेखन  की आत्मा सदैव अमर रहती है। वह अपना असर हर दौर में  दिखाती है। 

 कुछ इन्हीं बातों से रूबरू हुआ जब मैं अपनी  पिछली पोस्ट  के लेखन के दौरान शरद जी के व्यंग्य को पढ़ रहा था। उसमें लिखी बातें पढ़ते हुए लगा ही नहीं कि ये कोई पुराना लेख है, बल्कि कुछ यूं लगा मानो हाल फिलहाल में ही लिखा गया है और सब्जेक्ट भी क्या - लोकायुक्त....जिससे संबंधित बातों को लेकर आजकल बवाल मचा हुआ है।  शरद जी ने यह आलेख तब लिखा था जब लोकायुक्त का पद बस बनने के दौर में ही था या बन चुका था। आज ठीक वही परिस्थितियां लोकपाल को लेकर हैं। ठीक वही दौर चल रहा है। ऐसे में शरद जी के इस आलेख लोकायुक्त को पढ़ना मुझे जरूरी लग रहा है। पेश है उन्हीं के व्यंग्य संग्रह - नावक के तीर से यह आलेख जिसे पढ़ शरद जी के कालजयी लेखन को नमन करने का मन करता है।

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                                                       लोकायुक्त

       सरकारी नेता अक्सर किसी ऐसे शब्द की तलाश में रहते हैं जो लोगों को छल सके, भरमा सके और वक्त को टाल देने में मददगार हो। आजकल मध्यप्रदेश में एक शब्द हवा में है - लोकायुक्त। पता नहीं यह नाम कहाँ से इनके हाथ लग गया, कि पूरी गवर्नमेंट बार-बार इस नाम को लेकर अपनी सतत बढ़ती गंदगी ढंक रही है। इसमें पता नहीं, लोक कितना है और आयुक्त कितना है, पर मुख्यमंत्री काफी हैं। इस शब्द को विधानसभा के आकाश में उछालते हुए मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने कहा था कि लोकायुक्त यदि जरूरी हो, तो मुख्यमंत्री के विरूद्ध शिकायत की भी जांच कर सकता है। अपने लोकायुक्त पर पूरा भरोसा हुए बिना कोई मुख्यमंत्री ऐसा बयान नहीं देगा। तभी यह शुभहा हो गया कि लोकायुक्त कितना मुख्यमंत्री के पाकिट में है और कितना बाहर। जाहिर है, यह शब्द सत्ता के लिये परम उपयोगी है। वह इसके जरिये किसी भी घोटाले को एक साल के लिये आसानी से टाल सकते हैं। इसके सहारे अपने वालों को ईमानदार प्रमाणित करवा सकते हैं और अपने विरोधियों को नीचा दिखा सकते हैं।

  •   विधानसभा के सदस्य जब मामला उठाएँ, उनसे कहा जा सकता है कि मामले को लोकायुक्त को भेजा जाएगा।
  • दूसरे सत्र में जब सवाल करें तब कहें - मामला लोकायुक्त को भेजा जा रहा है।
  • तीसरे सत्र में उत्तर यह कि मामला लोकायुक्त को भेज दिया गया है।
  • चौथे सत्र में उत्तर यह कि मामला लोकायुक्त के विचाराधीन है।
  • पाँचवे में यह कि अभी हमें लोकायुक्त से रिपोर्ट प्राप्त हो गई है, शासन उस पर विचार कर रहा है। .......इस तरह हर उत्तेजना को समय में लपेटा जा सकता है। धीरे- धीरे बात ठंडी पड़ने लगती है। लोग संदर्भ भूलने लगते हैं। तब आसानी से कहा जा सकता है कि वह अफसर, जिस पर आरोप था, निर्दोष है।


       आज से 15-20 वर्ष पूर्व (आलेख लेखन काल से) मध्यप्रदेश में ऐसे ही एक सतर्कता आयोग था विजिलेंस कमीशन की स्थापना की गयी थी। उसके भी बड़े हल्ले थे। तब कहा जाता था कि बस इस आयोग के बनते ही राज्य से भ्रष्टाचार इस तरह दुम दबाकर भागेगा कि लौटने का नाम ही नहीं लेगा। बड़ी ठोस तस्वीर पेश की गई शासन की। अब उस बात को कई बरस बीत गये। बदलते समय में लोगों को भ्रमित करने के लिये नया शब्द चाहिये ना। अब लोकायुक्त का डंका बजाया जा रहा है।

       बहुत पहले मैंने एक चीनी कथा पढ़ी थी। गुफा में एक अजगर रहता था, जो रोज बाहर आकर चिड़ियों के अंडे, बच्चे और छोटे-मोटे प्राणियों को खा जाता। जंगल के सभी प्राणी अजगर से परेशान थे। एक दिन वे सब जमा होकर अजगर के पास आये और अपनी व्यथा सुनायी कि आपके कारण हमारा जीना मुहाल है। अजगर ने पूरी बात सुनी। विचार करने का पोज लिया और लंबी गर्भवती चुप्पी के बाद बोला - हो सकता है, मुझसे कभी गलती हो जाती है। जब भी मेरे विरूद्ध कोई शिकायत हो, आप गुफा में आ जाइए। मैं चौबीसों घंटे उपलब्ध हूं। यदि कोई बात हो तो मैं अवश्य विचार करूँगा।

    जाहिर है, किसी पशु की हिम्मत नहीं थी कि वह गुफा में जाता और अजगर का ग्रास बनता।

   तंत्र जब अपने चेहरों को छुपाने के लिये एक और चेहरा उत्पन्न करता है, उस पर वे सब कैसे आस्था रख सकते हैं, जो तंत्र के चरित्र और स्वभाव से परिचित हैं।

     मान लिजिये एक अफसर ने खरीद में घोटाला किया। कमीशन खाया, रिश्तेदारों, दोस्तों को टेंडर-मंजूरी में तरजीह दी, खराब माल खरीदा। रिद के रिद रहे, हाथ से जन्नत न गई। विधानसभा के सदस्य इस प्रकरण पर शोर मचाते हैं, सवाल पूछते हैं, बहस खड़ी करते हैं। आपका चक्कर जो भी हो, मुख्यमंत्री उस अफसर को बचाना चाहते हैं, तो इसके पूर्व कि विधानसभा की कोई कमेटी जाँच करे, वे उछलकर घोषणा कर देंगे कि मामला लोकायुक्त को सौंपा जाएगा। चलिए करतल ध्वनि हो गई। अखबारों में छप गया। लगा कि सरकार बड़ी न्यायप्रिय है।

      अब दिलचस्प स्थिति यह होगी कि वह अफसर, जिसके विरूद्ध सारा मामला है, उसी कुर्सी पर बैठा है, जिस पर बैठ उसने घोटाला किया था। उसी को अपने खिलाफ मामला तैयार कर लोकायुक्त को भेजना है और यदि जाँच हो तो अपनी सफाई भी पेश करनी है। वह मामला बनाता ही नहीं, क्योंकि स्वंय के विरूद्ध उसे कोई शिकायत ही नहीं है। वह कह देगा कि विधायकों के भाषणों में शिकायतें स्पष्ट नहीं हैं।

    लोकायुक्त एक सील है, प्रमाणपत्र देने का दफ्तर है । यहाँ से उन अपनेवालों को, जो भ्रष्टाचार कर चुके और आगे भी करने का इरादा रखते हैं, इमानदारी के प्रमाणपत्र बाँटे जायेंगे। लोकायुक्त एक खाली जगह है जो भ्रष्टाचार और उसकी आलोचना के बीच सदा बनी रहेगी। यह सरकार का शॉक एब्जॉर्बर है, जो कुरसियों की रक्षा करेगा। एक कवच है, ढक्कन है, रैपर है, जो सरकारी खरीद, टेंडरी भ्रष्टाचार, निर्माण कार्यों में कमीशनबाजी, टेक्निकल हेराफेरी से ली गई रिश्वतें आदि लपेटने, छिपाने और सुरक्षित रखने के काम आएगा। यह विरोधियों के विरोध का मुँहतोड़ सरकारी जवाब है। एक स्थायी ठेंगा है, जो मंत्री जब चाहे तब किसी को दिखा सकता है। विजिलेंस कमीशन ने 15 साल भुलावे में रखा। अब 15 वर्ष लोकायुक्त काम आएगा। सरकारी बाग की एक कँटीली बाड़ है, जिसमें भ्रष्टाचार के पौधे सुरक्षित हैं।

    जब विजिलेंस कमीशन उर्फ सतर्कता आयोग बना था तो एक व्यापारी से मैंने कहा था - जब सतर्कता आयोग बन गया है, अब क्या करोगे ? वह लंबी सांस लेकर बोला - क्या करेंगे। टेंडर में पाँच परसेंट उसका भी रखेंगे। लोकायुक्त के लिये भी वह शायद ऐसा ही कुछ कहेगा।
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शरद जोशी के व्यंग्य संग्रह - 'नावक के तीर' ( किताब घर प्रकाशन) से साभार.

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प्रस्तुति - सतीश पंचम

क्लिपिंग

           दूरदर्शन पर प्रसारित कुछ  कार्यक्रम अपने आप में एक अलग तरह का आकर्षण संजोये  रखते हैं। बेहद दिलचस्प होते हैं।  ऐसे ही एक प्रसारण को मैंने पिछले हफ्ते  सुबह सुबह दूरदर्शन पर देखा और मन लहक गया। वह क्लिपिंग्स खादी पर आधारित भारतबाला प्रॉडक्शन की थी जिसे कि ब्लैक एण्ड वाइट में फिल्माया गया था।    दक्षिण भारत के परिवेश में खादी तैयार करने, उससे आम जन की भागीदारी, उसके निर्माण चक्र को  चरखे और उससे जुड़ी वस्तुओं के जरिये बहुत ही अलग अंदाज में दिखाया गया था। हममें से कइयों को अब भी नहीं पता कि चरखा आखिर चलाया कैसे जाता है, उसके रेशों से चरखे पर सूत किस तरह काता जाता है, खादी के धागे किस तरह के बिना मशीनी सहायता के प्रोसेस किये जाते हैं।

     दूरदर्शन पर देखने के बाद मन में आया कि देखूं कहीं YouTube पर तो नहीं है यह क्लिपिंग। संजोग देखिये, मिल गई।  इधर अन्ना के आंदोलन के चलते जब सारा परिवेश गाँधी की ओर सिमटने लगा है तो मन हुआ इस चरखे-खादी वाली क्लिपिंग को भी आपसे शेयर किया जाय।  तो लिजिये पेश है  भारतबाला प्रॉडक्शन की वही खादी पर आधारित  प्यारी सी क्लिपिंग।

- सतीश पंचम

Note :  ई-मेल सब्सक्रिप्शन के जरिये मिली पोस्ट में जावास्क्रिप्ट वाले Embedded Code का लिंक नहीं दिख रहा। अत:  खादी वाली इस फिल्म को देखने के लिये  ई-मेल के अंत में सफेद घर लिंक पर क्लिक करें जिससे कि यह पोस्ट खुल जायेगी और तब खादी वाली फिल्म देखी जा सकेगी।

 आप लोग भी कहेंगे बड़ी जहमती पोस्ट है.......फिर भी....जहमत उठाईये हुजूर :)


Wednesday, August 17, 2011

इमरजेंसी मोहन-जोदड़ो, हड़प्पा काल में भी लगी थी प्यारे :)

                आजकल जिसके मुँह से सुनो इमरजेंसी को याद कर रहा है। कुछ इस तरह मानों इमरजेंसी में वो भी एक भुक्तभोगी रह चुका है।  हद तो तब हो जाती है  जब कोई  आह भरते हुए कहता है यदि इमरजेंसी न होती  तो मेरे  दो चार भाई-बहन और  होते। कम्बख्त  संजय गाँधी ने पिता जी को रास्ते में घूमते धर लिया और नसबंदी कर दी :) 

 खैर, अपने-अपने दुख, अपनी-अपनी यादें। कोई उस काल को स्वर्ण काल कहते हुए वापस इमरजेंसी की हिमायत करता है तो कोई इतने साल बाद भी इंदिरा गाँधी को कोसता दिखता है। वैसे यह शोध का विषय है कि तब के लोगों के मन में इमरजेंसी के बारे में क्या विचार थे। उस जमाने में ट्विटर और फेसबुक का चलन भी तो नहीं था कि कोई लिखता - आज नुक्कड़ पर मैं धर लिया गया.......कम्बखतों ने कहीं का न छोड़ा। नसबंदी करके ही माने।   कोई लिखती -  मैं छज्जे पर कपड़ा उतारने गई थी कि  नसबंदी वालों की जीप आती दिखी, मैंने झट से चुन्नू के बापू को भूसा घर में  घुसा दिया।

    उस जमाने में फिल्म स्टार लोग ट्वीट करते हुए लिखते -  आजकल फिल्मी डायलाग तक इमरजेंसी के डर में लिखने पड़ रहे हैं। कोई भी हिरोइन यह नहीं कह सकती कि -  "रमेश बाबू,  मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ"

तुरंत कैंची चल जायेगी :)

            बहरहाल मुझे उस जमाने में लिखे शरद जोशी का एक लेख पढ़ने का मौका मिला जिसे उन्होंने अक्तूबर 1977 में 'नावक के तीर'  स्तंभ में  लिखा था।  अपने लेख में शरद जोशी जी इमरजेंसी की मौलिकता और उसके इतिहास पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि  - 
  
यह कहना गलत है कि इमरजेंसी इंदिरा गाँधी की भारतीय राजनीति को मौलिक देन है।


मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से शुरू किजिए। वे खँडहर क्यों हो गये ? उन्हें किसने तोड़ा, क्यों तोड़ा ? जाहिर है वे अनऑथराइज्ड कंस्ट्रक्शन रहे होंगे। जब  इमरजेंसी लागू हुई, तुड़वा दिये गये।

     .......मोहनजोदड़ो में एक स्विमिंग पूल निकला है। निश्चित ही किसी स्मगलर के बँगले में रहा होगा। इमरजेंसी में स्मगलरों पर क्या गुजरती है, सब जानते हैं। घर वीरान हो गये, स्वीमिंग पूल सूख गये। मुझे तो मोहनजोदड़ो की सील देख कर ही शक हो गया था। लिपि समझ में नहीं आई किसी के, अर्थात कोड वर्ड में है। सील पर साँड बना है। इमरजेंसी में प्रशासन की यही प्रकृति हो जाती है। साँड बने घूमते हैं। तब की सरकार ने इमरजेंसी लागू करने के बाद ही यह सील बनाई होगी। .....


       शरद जोशी जी यहीं तक नहीं रूके। आगे उन्होंने वैदिक काल को भी लपेटते हुए लिखा है कि -

वैदिक काल में भी इमरजेंसी लगी थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छिन गयी थी और सेंसरशिप लागू हो गयी थी। स्पष्ट है, अन्यथा चार वेद लिखे जाने के बाद पाँचवा, छठा और सातवाँ वेद क्यों नहीं लिखा गया ? सरकारी बंदिश और संविधान की धारा बदल दी जाने के अतिरिक्त और कोई कारण नहीं हो सकता कि एक अच्छा खासा चलता हुआ काम रूक जाये। तब की सरकार अपने आपातकाल जन्य थोथे अहंकार में नहीं चाहती होगी कि लोग सरकारी सूत्रों के अतिरिक्त किन्हीं अन्य सूत्रों से भाष्य करें। सो वेद की लिखाई आगे से रूकवा दी गई।


   इसके आगे उन्होंने रामायण काल को टटोला। रामायण काल के बारे में शरद जोशी जी लिखते हैं कि - 

        माना, कैकेयी बड़ी पावरफुल थी, पर भरत कोई संजय गाँधी थे कि साहब राजगद्दी पर वही बैठेंगे, कोई दूसरा नहीं बैठ सकता, चाहे वह भगवान राम ही क्यों न हों। राम-न्याय की खातिर मुकदमा लड़ने कचहरी क्यों नहीं गये ? जाते कैसे ? अनुशासन पर्व जो लागू था। धाराएं रद्द हो जाने से वकील ने कहा होगा, राम जी, फिलहाल कोई उम्मीद नहीं, आज्ञा मान जाइये, वरना अंदर हो जायेंगे। ऐसी जेलों से तो वनवास अच्छा। घर से दूर रहोगे मगर खुली हवा में घूमोगे तो सही।
जरा सोचिए कि चौदह साल बाद जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस हद तक हो गयी थी कि एक साधारण धोबी सीता के चरित्र पर कमेंट कर सकता था, जबकि उस जमाने में अयोध्या का रामप्रेमी पुरजन कैकेयी के खिलाफ नारे भी नहीं लगा सकता था।.........


    खैर, ये तो हुई रामायण की बात। आगे महाभारत काल के बारे में भी शरद जी अपने विचार कुछ यूँ प्रकट करते हैं।


     महाभारत काल के असल मूल में किस्सा कुर्सी का था। बारह साल बाद पांडव वनवास से लौटे तो पता चला कि दुर्योधन ने अंधे धृतराष्ट्र से दस्तखत करवाकर अध्यादेश जारी कर दिया है कि दस साल से जमीन पर जिसका कब्जा रहा, वही जमीन का असल मालिक है। अंधे धृतराष्ट्री की स्थिति राष्ट्रपति की तरह थी। जिस कागज पर बोलो, जहां बोलो, दस्तखत कर दे। पांडवों ने कहा जमीन हमारी है। दुर्योधन ने कहा, भूमि सुधार के नये कानून बन गये हैं। अब आपका कोई हक न रहा। छिड़ गया महाभारत, क्योंकि कचहरी में जाने में कोई तुक नहीं था। कानून दुर्योधन के पक्ष में थे।

   इतना सारा विश्लेषण करते हुए अंत में शरद जी अंत में कहते हैं कि   अभी तो मौर्यकाल, मुगलकाल नहीं आया है। तब तो इमरजेंसी के और प्रमाण मिलेंगे :)

   बहरहाल आप लोग तैयार रहिये। अपने-अपने ट्विटर, फेसबुक, ब्लॉगर फ्लॉगर अकाउंटों को  धो- माँजकर,  सुखा लिजिये, धूप बत्ती, अगरबत्ती आदि दिखा दिजिये। क्या पता आप लोगों को भी इस सरकार के कर-कमलों से इमरजेंसी का स्वाद मिले और आप ट्विटियायें -  Hey dude....Lets celb Emergency......After all, Z.N.M.D..............Zindagi Na Milegi Dobara,  dude   :)

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UPDATE -   एक चीज मैंने ऑबजर्व की है कि संभवत: मोहनजोदड़ो हड़प्पा काल के दौरान भी एक कलमाड़ी था क्योंकि यदि उत्खनन के दौरान पाई चीजों को देखा जाय तो उसमें एक दाढ़ी वाले की मूर्ति भी है, साथ ही ढेर सारे खेल से संबंधित अवशेष भी मिले हैं :)


- सतीश पंचम
( सभी चित्र : गूगल  बाबा से साभार ) 

सर.....सर.....हां सर.....बिल्कुल सर


वैधानिक चेतावनी संख्या 1 -  इस वार्तालाप के सभी पात्र काल्पनिक हैं

वैधानिक चेतावनी संख्या 2 -  उपर्युक्त पंक्ति ही काल्पनिक है  :)

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- सर वो जेल से बाहर जाने के लिये तैयार ही नहीं है सर

- सर बहुत कोशिश की लेकिन फिर भी तैयार नहीं हो रहा

- खाना भी नहीं खा रहा सर

- सर बूढ़ा आदमी है, ज्यादा देर तक भूखा रखना अच्छा नहीं है

- जी

- जी

- नहीं सर वो गांव जाने को भी तैयार नहीं है

- वो सब हम लोग पहले ही कर चुके हैं सर, उसको खाली तीन दिन के अनशन करने की बात भी की लेकिन वो बोलता है कि - हमको रामदेव मत समझो

- जी

- जी

- सर बहुत कैदी देखे लेकिन इस जैसा कैदी अपनी पूरी जिंदगी में नहीं देखा

- सर वो किसी की बात सुनने को तैयार नहीं

- जी

- सर जो कुछ करना है जल्दी किजिये, इधर जेल में कैदी लोग भूख हड़ताल करने जा रहे हैं

- नहीं सर, वो तो राउरकेला जेल

- हां, सर वहां के कैदियों ने भी भूख हड़ताल करने का मन बनाया है

- सर इधर का कैदी भी बदल के देखा लेकिन कोई भी खाना बनाने के लिये तैयार नहीं है सब कैदी लोग खिलाफ है खाना बनाने और खाने के

- सर कैदी लोग बोलता है जब तक वो भूखे हैं तब तक न जेल में खाना बनने देंगे और ना ही किसी को खाने देंगे

- सर ऐसी बात नहीं है सर, सब के सब कैदी लोग भूखा नहीं रहना चाहता।

- सर दो चार कैदी लोग तो खुद ही खाना बनाने और खाने के लिये  तैयार थे।

- सर दो तो वो टू जी वाले केस के कैदी थे, एक वो कॉमनवेल्थ वाला दाढ़ी वाला कोई था, एकाध साउथ का लेडीज कैदी भी तैयार था जेल में खाना बनाने के लिये

- सर वो लोग मिल के खाना बना ही रहे थे लेकिन एक दूसरे कैदी ने उनके गूंथे आंटे में कनस्तर भर पानी मिला दिया

- हां सर, सर सब आटा खराब हो गया

- सर आप की बात मानता हूं, अगर ये लोग खुद से खाना बना के जेल में खा लेते तो आप जेल में भूख हड़ताल की बात का मीडिया में खंडन कर सकते थे सर लेकिन अभी क्या करूं, सब कैदी लोग खिलाफ हो गये हैं

- सर कैदी लोग थाली, कनस्तर, चम्मच, मग वगैरह बजा रहे हैं, उसी का आवाज आ रहा है

- सर शांत कराने का कोसिस किया लेकिन कोई तैयार ही नहीं है....सब जोर जोर से थाली, मग बजा रहे हैं

- हां सर

- सर जेल में सबको प्लास्टिक का बर्तन देते तो अच्छा था, अभी वो लोग अलमूनियम का बर्तन बजा बजा कर कान खा रहे हैं कि भ्रष्टाचार हटाओ

- हां सर अलमूनियम का बर्तन बहुत आवाज करता है सर

- सर टेंडर निकालिये ना सर

- अपना ही समझिये......

- सर,  मेरे साले का ही है प्लास्टिक फैक्टरी -  भारत प्लास्टिको इंडिया मार्ट, चौचकपुरा
- हां सर......सस्ते में दिला दूंगा सर

- जरूर सर

- हां सर....उसके बारे में आप बेफिक्र रहें.....

- बिल्कुल सर..........बीस टक्का तो पक्का है सर

- जरूर सर.....

- सर मंत्री जी को मेरा गुडमार्निग जरूर बोलियेगा .....

- जी सर

- जी

- नहीं सर,  सिचुएशन अंडर कंटरोल है सर.....

- जी

- जी

- जयहिंद सर

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- सतीश पंचम      

Monday, August 15, 2011

बिछड़े सभी बारी बारी........

          मुंबई के फोर्ट इलाके में स्थित है डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा पुरानी लाइब्रेरी J.N.Petit. सन् 1856 में बनी इस ऐतिहासिक लाइब्रेरी को मूलत: पारसी समुदाय के कुछ अध्ययन प्रेमी लोगों ने शुरू किया था। गोथिक कला शैली में बनी इस खूबसूरत इमारत के हर हिस्से में जैसे एक कलात्मक बौद्धिकता सी नज़र आती है। कुछ हिस्से तो ज्यों के त्यों अपनी मूल शैली में इतिहास को जैसे थामें हुए हैं। यहां लगे पुरानी शैली के पंखों को देख लोग एकाएक उन दिनों में पहुंच जाते हैं जब पंखों का लगना बस शुरू ही हुआ था। आम पंखे हों तो समझा भी जा सकता है लेकिन रीडिंग रूम की सीलींग ही तीस फूट उंची है और वहां से जो पंखे नीचे की ओर छड़ के जरिये लटकते हैं तो कुछ अलग ही अनुभव होता है । पिछले छह सात सालों से मैं इस लाइब्रेरी में अक्सर रविवार या शनिवार के दिन पठन-पाठन के लिये जाता हूं। आसपास ढेरों बच्चे दिखते हैं जोकि IAS, PCS, MBA, CA... आदि की तैयारी करते दिखते हैं। कुछ लेखक भी कभी-कभी नजर आते हैं जो फर्रे दर फर्रे लिखे जा रहे होते हैं तो कुछ लोग केवल पढ़ने के लिये शांत माहौल की ललक में वहां लगी तिरछी आराम कुर्सीयों पर लेटे नजर आते हैं। जब थक जाते हैं तो आंखें बंद कर सो भी जाते हैं। कोई रोक टोक नहीं। हां, शांत रहने की शर्त जरूरी है। यदि किसी का शोर हो सकता है तो केवल कबूतरों या चिड़ियों का वरना तो सभी अपने अपने में मस्त पठन पाठन में जुटे दिखते हैं।


        कल दोपहर मैं वहीं था। शनिवार- रविवार की छुट्टी के कारण मन हुआ कि कुछ लिखा जाय। लेकिन बच्चों की भी छुट्टियां थी तो घर में थोड़ा सा टिन्न पिन्न होने का अंदेशा था। सो मन हुआ चलूं अपनी उसी लाइब्रेरी में। वैसे भी एक महीने से ज्यादा हो गया था वहां गये। वहां के शांत माहौल में लिखना अच्छा भी लगता है। एक दिक्कत यह है कि अब  कुछ लिखना होता है तो सीधे लैपटाप पर लिखता हूं लेकिन पेटिट लाइब्रेरी के रीडिंग हॉल में लैपटाप के लिये पावर कनेक्शन नहीं है। वहां जो कुछ लिखना होता है  केवल पेपर कलम के जरिये ही लिखा जा सकता है। अच्छा है। कहीं तो ऐसी जगह बची है जो मोबाइल, लैपटाप आदि के टिकटिम्मे से दूर ले जाती है।

       तो रविवार वहीं अपनी धुनि रमाई। लिखने बैठा तो कुछ सूझे ही नहीं। हांय, ये क्या हो रहा है। थोड़ा सा अपने पुराने लिखे संदर्भ को देखा और फिर उससे तारतम्य बिठाते हुए अगली कड़ी लिखने की सोचा लेकिन कलम बढ़े ही नहीं। समझ ही नहीं आ रहा था। सोचा आंख बंद कर थोड़ा तिरछी वाली आराम कुर्सी पर लेट जाउं तो कुछ बात बने लेकिन आठ दस मिनट बाद भी कुछ बात नहीं बनी। जी उचट गया। मन हुआ थोड़ा गेटवे ऑफ इंडिया की तरफ पैदल हो आउं तो कुछ आइडिया आये लेकिन बाहर हो रही बारिश के कीच काच में जाने का मन नहीं किया। अब क्या हो। थोड़ी देर बैठे बैठे ख्याल आया कि अपने बैग में बहुत दिन से बिमल मित्र की किताब लिये घूम रहा हूं लेकिन पढ़ नहीं पा रहा। उसे ही देखता हूं। क्या पता मन लग जाय। झटपट बैग से वह किताब निकाली - बिछड़े सभी बारी बारी। किताब के कवर पेज पर गुरूदत्त की वही चिरपरिचित मुस्कान वाली तस्वीर थी। एक नजर कवर पेज पर डाल अंदर पढना शुरू किया तो देखा वाणी प्रकाशन वालों ने लिखा है कि - वाणी प्रकाशन का लोगो मशहूर चित्रकार एम एफ हुसैन ने बनाया है। अच्छी बात है। एम एफ हुसैन ने बनाया है तो और अच्छी बात है लेकिन यह बताने बुताने वाली बात कुछ समझ नहीं आई , खैर अपने अपने मार्केटिंग फंडे हैं। ऑथेंटिसिटी बरकरार रखने की छटपटाहट है। अपने को क्या........ पढ़ने से मतलब चाहे लोगो एम एफ हुसैन ने बनाया हो या लल्लू सिंह 'छटांक' ने।

       किताब को पढ़ना शुरू किया....एक पन्ना...दो पन्ना.....तीन पन्ना....आगे आगे और देखते देखते अस्सी फर्रे पढ़ डाले। इतने बेहतरीन अंदाज में बिमल मित्र ने गुरूदत्त के जीवन, उनके पारिवारिक जिंदगी, फिल्मों के प्रति दीवानगी आदि के बारे में लिखा है कि मुझे वह किताब छोड़ते न बनी। बड़ी ही रोचकता से बिमल मित्र ने गुरूदत्त से अपनी किताब 'साहब, बीबी और गुलाम' को लेकर मुलाकात का जिक्र किया है कि कैसे वो पाली हिल के अपने बंगले पर लुंगी और कुर्ते में मिले, कैसे वो उसी लुंगी और कुर्ते में गाड़ी चलाते लोनावला तक ले गये। कैसे वहां पर स्क्रिप्ट लिखी गई, रात रात भर गुरूदत्त के जागते रहने, किसी को बिठाकर बोलते बतियाते रहने का शौक आदि पर विस्तार से चर्चा की गई है इस किताब में।
गीता दत्त

          एक जगह बिमल मित्र लिखते हैं कि गुरूदत्त अपनी पत्नी गीता दत्त से गाना बंद करके घर गृहस्थी संभालने के लिये कहते थे जबकि गीता दत्त चाहती थीं कि वह पहले की तरह गाना गाती रहें। गुरूदत्त का तर्क था कि अब जब इतना पैसा आ गया है, करोड़ों रूपये बन गये हैं, बंगला है तमाम एशो आराम है तो गीता क्यों गाना गाना चाहती है। कायदे से घर गृहस्थी क्यों नहीं संभालती। इन बातों को पढ़ मुझे याद आ रही है एक इंटरव्यू की जिसमें कि तबस्सुम से किसी ने कहा था - एक औरत या तो अच्छी बीवी हो सकती है या फिर अच्छी एक्ट्रेस लेकिन दोनों एक साथ नहीं हो सकती।

      बहरहाल गीता और गुरूदत्त में आपसी कलह बढ़ता गया। जिसका असर था कि गुरूदत्त अपनी नींद खो चुके थे। रात रात भर जागते रहते। किसी को बोलने के लिये ढूंढते रहते ताकि उससे बातचीत कर समय बीतायें। ऐसे में बिमल मित्र ने कई बार उनका बातचीत में साथ दिया था। उधर दोनों के बीच टकराव केवल इन्हीं बातों को लेकर नहीं बल्कि और भी बातों को लेकर होता। वहीदा रहमान भी उन्हीं झगड़ों का कारण बनतीं थी। गुरूदत्त कहते थे कि इस लड़की वहीदा को उन्होंने स्टार बनाया है वह भी तब जब सभी लोगों ने उसके चयन पर बहुत ताने कसे थे, उसे साधारण नाक-नक्श और काम वाली बाई के समकक्ष ठहराया था, तब उन्होंने जोखिम लेकर इस लड़की को काम दिया। उसे आगे बढ़ाया। लेकिन शको-शुबहा ने तमाम गृहस्थी को गृहण लगा दिया है। ऐसे में बिमल मित्र ने उनसे सहानुभूति पूर्वक बातें की, गीता और गुरूदत्त के बीच कुछ बीच का रास्ता निकालने की सोची लेकिन बात बिगड़ी चली जाय। गुरूदत्त ने बिमल मित्र से कहा भी कि मैं गीता को अपनी फिल्मों में पार्श्वगायन के लिये काम तो दे ही रहा हूं लेकिन वो पूरी तरह से गायन में रम जाना चाहती है जो कि गृहस्थी के लिये ठीक नहीं। यह देख अमिताभ और जया की अभिमान फिल्म याद आ रही है।


गुरूदत्त

       खैर, आगे बिमल मित्र ने बताया कि कैसे गुरूदत्त ने पाली हिल में एक लाख में बहुत बड़ा बंगला खरीदा था, कैसे उसे सजाया संवारा था और कैसे पारिवारिक कलह से उबकर, कलह के प्रतीक उस बंगले को मिस्त्रीयों द्वारा पूरी तरह तुड़वा दिया। इसी बीच एक बात का जिक्र है कि बंगाल में आउटडोर शूटिंग के दौरान गाँव की लड़की का रोल करने के लिये गीता दत्त को जब साधारण साडी दी गई और मेकअप कम करने के लिये कहा तो दोनों में इसी बात को लेकर कलह फिर हुई । गीता शूटिंग में देर कर रही थी और गुरूदत्त देर बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। आउटडोर के कारण बारिश हो सकती थी, बादल घिर सकते थे, लाइट में कमी हो सकती थी, ऐसे तमाम कारण हो सकते थे कि शूटिंग में सही अनुपात न बैठता। इसी बीच अपने मैले कुचैले कपड़ों के कास्टयूम को देख गीता ने ताना मारा कि तुम मुझे वहीदा से कम अच्छा दिखाना चाहते हो, बस गुरूदत्त को बात लग गई। व्हिस्की पर विहिस्की चढाये चले गये, लापरवाही शुरू कर दी। बिमल लिखते हैं कि गुरूदत्त यूं तो खाने में पान्ताभात ( बासी चावल और पानी), लप्सी, लइया खाने के शौकीन हैं, सबसे प्रेम से व्यवहार करते हैं, मिलते जुलते हैं लेकिन सेट पर पूरी तरह से प्रोफेशनल होकर काम करते हैं। उस समय वो पति नहीं होते, न मित्र होते हैं, वो सिर्फ एक डायरेक्टर होते हैं, लेखक, प्रोडयूसर होते हैं और अपने पेशे के काम में पूरी निर्दयता से पेश आते हैं। इन्हीं सब बातों का असर था कि गुरूदत्त कटे कटे से रहते। कुछ न कुछ सोचा करते। उधर बिमल मित्र गीता दत्त से बात कर उन्हें भी समझाते थे कि इस तरह कैसे काम चलेगा।

      ऐसी ही कई ढेर सी बातों, विवादों, शूटिंग के दौरान चुहलबाजीयों आदि का जीता जागता दस्तावेज है यह किताब। गुरूदत्त द्वारा आत्महत्या की खबर, उससे जुड़ी यादें आदि काफी अलग अंदाज में लिखी गई हैं इस किताब में।  इसी में बिमल मित्र ने जिक्र किया है कि कैसे मद्रास में बिमल मित्र के नाम से नकली किताब लिखकर किसी बंदे ने एक दुल्हन को किताब भेंट की थी। आप भी हो सके तो इस किताब को जरूर पढ़ें। किकी हों तो भी, अन-किकी हों तो भी। वाणी प्रकाशन द्वारा पब्लिश हुई इस किताब का दाम ज्यादा ज्यादा नहीं, मात्र सौ रूपये है।

बिमल मित्र

किताब का एक अंश देखिये -

बिमल मित्र परिवार की कलह पर बतियाते हुए गुरूदत्त से कहते हैं -

- मियां बीबी में तकरार कहां नहीं होती ? किनके बीच नहीं होती ? जरा टॉलस्टॉय की जिंदगी याद करें। अब्राहम लिंकन की जिंदगी देखे। सुकरात की जिंदगी के बारे में सोचें।


मैं बारी बारी से इन सभी लोगों की जिन्दगी दुहरा गया। गुरू भौंचक्का -सा सुनता रहा। उसके बाद, मैंने उसे आखरी चोट दी।


मैंने उसे अपने बारे में बताया - आपको यह सुनकर अचरज होगा। हम मियाँ-बीवी में भी बीच बीच में मल्लयुद्ध छिड़ता है! जबरदस्त मल्लयुद्ध !

गुरू एकबारगी अचकचा गया। उसे जैसे कहीं उम्मीद की किरण नजर आई।

आप दोनों के बीच भी झगड़ा होता है ? उसने सवाल किया ।

हाँ होता है ! दुनिया के सभी पति-पत्नी के बीच झगड़ा होता है।

गुरू कुछ देर सोच में डूब गया

थोड़ा ठहरकर उसने कहा - मेरा ख्याल है मैंने वर्किंग गर्ल से शादी की है इसलिये यह हाल है।

    नहीं ! दो इन्सान जिन्दगी भर एकमन-एकप्राण रहें, यह क्या आसान बात है ? झगड़े झमेले नहीं होंगे ? अरे, झगड़ा तो स्वस्थ प्रेम का लक्षण है। आपस में झगड़ा न हो, तो समझना चाहिये कि रिश्ते में कहीं कोई मिलावट है, बनावटीपन है, झूठ है।


 - सतीश पंचम

Saturday, August 13, 2011

शानदार रही बम्बईया - 'कथा'

सई परांजपे
             महिला निर्देशिका सई परांजपे द्वारा 1983 में निर्देशित एक फिल्म आई थी 'कथा'। बेहद साधारण कहानी, बेहद आम लोकेशन पर फिल्माई गई फिल्म थी कथा। नसीरूद्दीन शाह, फारूख शेख और दीप्ति नवल के इर्द गिर्द बुनी गई इस फिल्म को आज सुबह ही देखा। बहुत पहले इसे टीवी पर देखा था लेकिन ब्लैक एण्ड वाइट में। तब दूरदर्शन पर केवल शाम का प्रसारण आता था और उसी दौरान इस तरह की फिल्में प्रदर्शित होती थीं। तब हम बच्चे इस तरह की फिल्मों को देखते ही नाक-भौं सिकोड़ते थे। एक तो हफ्ते में एक ही हिन्दी फिल्म देते हैं और वह भी ऐसी जिसमें न अमिताभ बच्चन है न विनोद खन्ना। तब ऐसी फिल्मों का असल स्वाद न पता था। अब जाकर हम उन्हीं फिल्मों को देखते हैं तो पता चलता है कि कितनी शानदार फिल्में थीं।

            कथा फिल्म में  मुम्बई की एक चॉल में रहने वाला साधारण सा क्लर्क है राजाराम ( नसीरूद्दीन शाह). उसकी इच्छायें बहुत बड़ी बड़ी नहीं है, साधारण कपड़े पहनता है, साधारण सा रहता है। दूसरे लोगों की मदद करने में हमेशा आगे रहता है। ऑफिस से जाते आते सरकारी बस में धक्के खाता है लेकिन जैसे ही पता चलता है कि बॉम्बे हॉस्पिटल में किसी को ओ-नेगेटिव खून चाहिये, तुरन्त टैक्सी पकड़ कर बॉम्बे हॉस्पिटल भागता है कि उसका खून ओ-नेगेटिव है और यह बहुत कम लोगों के पास है। पास पड़ोस में जिसे भी जरूरत पड़ती है वह मदद ही करता रहता है। राजाराम की ही पड़ोसन है संध्या ( दीप्ति नवल) जिसे कि राजाराम बहुत चाहता है लेकिन कह नहीं पाता। संध्या के घर में कभी साबूदाने के वड़े या पकौड़ी आदि बनते हैं तो संध्या के पिता थोड़ा सा राजाराम के यहां भी भिजवाते रहते हैं, उनका मन होता है कि राजाराम को अपना दामाद बनाउं।

दीप्ति नवल
    उधर संध्या राजाराम से थोड़ा तेज है, चपल है। उसकी इच्छा है कि उसका दुल्हा स्मार्ट होना चाहिये, अच्छा दिखना चाहिये। अब साधारण सा क्लर्क राजाराम अपने में वो सब बातें कहां से लाये। सो मन ही मन अपनी बात को रखे रहता है। इधर संध्या को गुड़हल का फूल बहुत पसंद है। हमेशा अपने बालों मे एक गुड़हल का फूल लगाये रहती है। राजाराम ने तो चुप्पे से एक गुड़हल का फूल अपनी किताब में भी दबा लिया, भले ही वह सूखकर लाल से काला क्यों न हो गया लेकिन प्यार तो प्यार है।

फारूख़ शेख
             इसी तरह की जिंदगी चल रही होती है कि एक दिन राजाराम का बेहद चालू दोस्त बाशुदास ( फारूख शेख) आता है। अच्छे-अच्छे कपड़ों का शौकीन, फितरत से जुगाड़ू और चालाक किस्म का बाशुदास राजाराम के सीधेपन का लाभ उठाने की सोचता है। उसके यहां ही रहने लगता है। राजाराम भी मना नहीं करता। स्वभाव ही ऐसा है। इधर राजाराम काम पर गया नहीं कि बाशु अपने अच्छे कपड़ों, शातिराना लहजे में आस पड़ोस के लोगों से मेल-जोल बढ़ाना शुरू करता है। चाल में रहने वाले आस पास के लोग भी बाशु से प्रभावित होते हैं। इसलिये और कि राजाराम जैसे विश्वासी आदमी का मित्र है, अच्छे कपड़े पहनता है, मीठी बातचीत करता है तो इससे क्या परहेज। पड़ोसी उसे अपने घर ले जाते हैं, उसकी खातिर तवज्जो करते हैं। बाशु उन सबसे बड़ी बड़ी बातें करता है, अपने आप को किसी दिवान का बेटा बताता है और वो तमाम तिकड़में करता है जिससे कि खानदानी रइस लगे। लोग उसे अपने चॉल में पाकर खुश होते हैं कि इतने बड़े खानदान का लड़का हमारे झोपड़ों-चॉलों में रहने आया है।

         बाशु के बातचीत से, उसके कपड़ों आदि से संध्या प्रभावित हो जाती है। चूंकि राजाराम के घर में संध्या कभी कभार कटोरी लेने, चाय देने के लिये आती रहती है तो बाशु उसपर डोरे डालना शुरू करता है। दोनों में निकटता बढ़ती है। इधर राजाराम अपनी जिंदगी में रमा रहता है। वही ऑफिस, वही घर। लोगों की मदद भी रह रहकर करता ही रहता है। एक दिन बाशु से राजाराम कुछ नौकरी करने के लिये कहता है ताकि कुछ उसका भला हो। सुनकर बाशु जुगत में लग जाता है। यह जानकर कि राजाराम का बॉस गोल्फ में बहुत दिलचस्पी लेता है बाशु किताबों से गोल्फ के बारे में हल्की फुल्की जानकारी लेता है और जा पहुंचता है वहीं जहांपर कि राजाराम का बॉस गोल्फ खेला करता है। वहां जाकर जुगाड़ु बाशु बॉस को अपनी बातों में फांसता है और अपने आप को इंग्लैंड रिटर्न और न जाने क्या क्या बता कर इम्प्रेस करने में कामयाब होता है। राजाराम का बॉस उसे अपने घर इन्वाइट करता है। वहां पता चलता है कि बॉस की यह दूसरी बीवी है और पहले वाली से एक बेटी है। सौतेली मां बेटी में उम्र का ज्यादा फासला नहीं है। पहली नज़र में ही बाशु भांप जाता है कि बॉस की बीवी बॉस से खुश नहीं है और कुछ दिलफेंक है। सौतेली बेटी तेज जरूर है लेकिन उसे भी पटाया जा सकता है। उधर राजाराम का बॉस बाशु से प्रभावित हो उसे नौकरी पर रख लेता है। अब राजाराम और बाशु दोनों एक ही ऑफिस में काम करते हैं लेकिन बाशु ऑफिस में राजाराम से इस तरह व्यवहार करता है जैसे दोनों पहली बार मिले हों। राजाराम भांप तो जाता है कि यह आदमी तिकड़मी है लेकिन दोस्त की नौकरी का सवाल था इसलिये चुप रहता है।

       इधर बाशु का दूसरा सिलसिला शुरू होता है। चॉल में रहकर वह संध्या को पटाता है, बॉस के यहां जाकर उसकी बेटी को पटाता है। इतना ही नहीं बॉस की दिलफेंक बीवी की तरफ चारा फेंकता है और उसे भी अपने लपेटे में ले लेता है। यानि एक साथ तीन-तीन लोगों के साथ चक्कर शुरू होता है। उधर ऑफिस में बाशु के काम का हर्जा होने लगता है तो राजाराम बाशु का भी काम निपटा दिया करता है। अभी यही सब चल रहा होता है कि संध्या के माता पिता बाशु से उसकी शादी करना तय करते हैं। राजाराम दुखी हो जाता है। मित्र के वजह से पहले वह दुखी था लेकिन अब प्रेमिका भी दूसरे की होने जा रही है। उधर राजाराम के कपड़े, जूते आदि का इस्तेमाल करने वाला बाशु एक दिन के पैसे भी चुरा लेता है और पता चलने पर कहता है कि दोस्त का है समझ कर उठाया था। अगले महीने ले लेना। इन सब बातों को देख राजाराम अपनी प्रेमिका संध्या, मित्र बाशुदास, संध्या के माता-पिता, पड़ोसियों का विश्वास...इन सबके बीच वह अपने आप को 'फंस चुका' मान लेता है। इधर मित्र बाशु और संध्या के विवाह का दिन नजदीक आने लगता है।
            उधर बॉस की बेटी को पता चल जाता है कि बाशु का चक्कर उसकी सौतेली मां से है। दोनों की साथ-साथ तस्वीर खेंचकर वह तस्वीरें अपने पिता के पास पोस्ट से भेज देती है। नतीजतन बाशु की नौकरी चली जाती है। रास्ते में राजाराम उससे पूछता है कि अब तो नौकरी रही नहीं, संध्या के साथ शादी का क्या होगा। तब बाशु बड़ी लापरवाही से जवाब देता है जिससे राजाराम को गुस्सा आ जाता है। वह अब भी संध्या को पसंद करता है और उसका कुछ बिगाड़ हो यह नहीं चाहता। राजाराम जानता है कि इस लम्पट, झूठे इंसान के साथ संध्या का विवाह ठीक नहीं।

         इधर बाशु और संध्या के विवाह का दिन आ जाता है लेकिन बाशु का कहीं पता नहीं। अपने मित्र राजाराम के नाम चिट्ठी लिखकर जाता है कि संध्या अच्छी लड़की है लेकिन वह उससे विवाह नहीं कर सकता। जा रहा है। पत्र पढ़कर संध्या के घर में कुहराम मच जाता है। ऐसे में राजाराम संध्या से विवाह का प्रस्ताव रखता है और थोड़ी बहुत हील-हुज्जत के बाद दोनों विवाह करने के लिये राजी हो जाते है।

        फिल्म का खास आकर्षण रहे मुम्बईया चॉल के पुराने ढर्रे के दृश्य, सुबह पानी आने पर होने वाली सुर्ररर..सों.....दूध लेने के लिये खाली बोतलों का बदलना, बंद हो चुके शीतल पेय 'GOLD SPOT' की बोतल, फारूख शेख द्वारा चॉल के लोगों को अश्लील जोक सुनाकर मजमा जुटाते समय स्क्रीन पर आवाज रोककर 'CENSORED'  लिखकर आना। एक और खास चीज दिखी जब दोपहर के वक्त एक पड़ोसी फारूख शेख से कहता है - चलो तुम्हें अपने घर टीवी दिखाउं।

 तब फारूख अपनी घड़ी देख कर कहते हैं - इस वक्त ?
        वजह, 1983 में केवल शाम के तीन घंटे टीवी प्रसारण होता था, बाकि पूरा दिन टीवी पर झिलमिलाती बारिश होती थी :)

         खैर, यदि आपको मौका मिले तो कथा फिल्म जरूर देखियेगा। फिल्म के डॉयलॉग्स की एक बानगी देखिये कि जब राजाराम प्रमोशन होने पर अपने नाम की तख्ती देवनागरी में लिखकर दरवाजे पर लगाना चाहता है तो उसकी पड़ोसन संध्या और राजाराम के बीच  कुछ बातचीत होती है।

        संध्या तख्ती पर राजाराम का पूरा नाम पढ़ते हुए कहती है

- राजाराम पु. जोशी

-    राजाराम पु. जोशी नहीं, पूरा पढ़ो ...राजाराम पुरूषोत्तम जोशी। पूरा नाम अंट नहीं रहा था इसलिये ऐसा लिखाया।

-    अच्छा पढ़ती हूं - राजाराम पुरूषोत्तम जोशी। लेकिन नाम अंग्रेजी में क्यों नहीं लिखवाया ?


-    क्यों इसमें क्या खराबी है ?


-   अंग्रेजी में लिखवाने से रौब पड़ता है।


-    रौब जब मुझमें ही नहीं है तो तख्ती में कैसे आ सकता है ?


- सतीश पंचम

Wednesday, August 10, 2011

कतरन झूठ न बोले

      करीब तीन साल पहले  New York Times में एक लेख छपा था जिसमें भारतीयों के बढते वर्चस्व को लेकर एक महत्वपूर्ण बात कही गई, कि भारतीय बच्चे अमरीकीयों के लिये एक नये किस्म की चुनौती बनते जा रहे हैं।  उस लेख की एक कतरन E-Mail के जरिये मेरे पास आई थी। उस पर मैंने पोस्ट भी लिखा था।

कतरन में लिखा था -

"When we were young kids growing up in America, we were
Told to eat our vegetables at dinner and not leave them.
Mothers said, think of the starving children in India
And finish the dinner.'

And now I tell my children:
'Finish your homework. Think of the children in India

स्कूल जाते हुए  मेरे गाँव के बच्चे
Who would make you starve, if you don't.'?"

Thomas L Freidman















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सपनीली आँखे....

    अभी सुन रहा हूं कि अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा ने अमरीकी बच्चों को चेताया कि पढ़ो नहीं तो  भारतीय और चीनी बच्चों से आप लोग पिछड़ जाओगे। Thomas Freidman ने जब कहा था तब केवल भारत के बच्चों का उल्लेख किया था। 
तीन साल बाद ओबामा जब कह रहे हैं तो उसमें चीन भी जुड़ गया है। 


       न जाने इन  अमरीकियों को और किन किन का डर सताये जा रहा है। 


 - सतीश पंचम


Tuesday, August 9, 2011

थोड़ा सा फिल्मानी हो जाय.....

        हर दौर की तरह फिल्मों में भी कई दौर आते जाते रहते हैं। एक जमाना था कि पेड़ों की छांव में खड़े खड़े ही नायक गाना गाकर नायिका को लुभाता था और नायिका भी एक पांव पर खड़े खड़े कभी मटकी को कमर पर तो कभी सिर पर रख दो चार बोल कहके निभा लेती थी। आगे दौर बदला और गानों ने धीरे धीरे रफ्तार पकड़नी शुरू कर दी। नायक ने खत में फूल रखकर भेजना शुरू किया, यह कहकर कि फूल नहीं मेरा दिल है। उसे देख युवाटिक लोग भी खदबदाना शुरू किये और उन्होंने ने भी अपनी प्रेयसी को प्रियतम को खतों में कुछ रोमांस उड़ेलना शुरू किया। यही वही दौर था प्रेमियों ने खतों में रोमांस परोसते हुए लिखना शुरू किया

लिखती हूं खत खून से सियाही न समझना
मरती हूं तेरी याद में बेवफाई न समझना :)

बदले में नायक ने लिखना शुरू किया....

शीशी भरी गुलाब की पत्थर से तोड़ दूं...
अगर तू ना मिली मुझे तो सारी दुनिया छोड़ दूं

        ये वो दौर था जब गानों में शेरो-शायरी, पत्थर, खून, शीशी,आदि बहुत चलते थे। एकदम तोड़ फोड मचा देते थे। इन शायरीयों को पढ़ने पर आज भले हसीं आये लेकिन ये अपने जमाने में हिट्टम हिट की श्रेणी में आते थे। ...कुछ कुछ वैसे ही जैसे आजकल के सस्ताउ गाने आते हैं जिनके बोल होते हैं....पैसा पैसा क्या करती है....पैसे पर क्यू मरती है.....या फिर - चार बज गये हैं....पारी अभी बाकी है.....। न जाने कितने करोड़ कमा उठे हैं इन आज के गानों के चलते।

       खैर, आगे कई और दौर आये और - मैं करती हूं प्यार मिस्टर इंडिया से...जैसे गाने बनने लगे। हिरो का कुछ  पता नहीं, प्रत्यक्ष दिखता नहीं... कुछ नहीं लेकिन नायिका उससे प्रेम करती है। वर्चुअल प्रेम का ये संभवत: पहला उदाहरण होगा जब नायिका अपने नायक मिस्टर इंडिया को बिना देखे प्यार करना चाहती है। उस दौरान भी गाने बड़े इस्पेसल टाइप के बनते थे - शायद मेरी शादी का खयाल दिल में आया है इसलिये मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पे बुलाया है। अब आजकल की मम्मयों को तो दामाद खुद ही इन्वाइट करते हैं - आइये मम्मी जी, मैं विक्की....तुहाडी कुड़ी दा ब्वॉय फ्रैंण्ड....अस्सी ना फेसबुक ते मिले सी.....चैट नाल पत्ता लगिया कि ये तुआडी कुड़ी है....एस लई तुआडे कोल इसदा हथ्थ मंगण आइया वां. ........।   दौर है। यह भी चलता है। आजकल तो प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे को प्रपोस करने के लिये भी अलग स्टाइल से गाने गाते हैं।

        मसलन अभी कुछ साल पहले रिलीज हुई फिल्म लक्ष्य के गाने को ही देखिये जिसमें रितिक रोशन जब सीधे कहते हैं -

अगर मैं कहूं
मैं तुमसे मोहब्बत करता हूं
तो तुम क्या कहोगी

बदले मे प्रियंका चोपड़ा  प्रिति जिंटा कहती है -

इस बात को अगर तुम
जरा घुमा फिरा के कहते,
जरा और सजा के कहते
तो अच्छा होता।

     माने नायिका चाहती है कि ब्वॉय फ्रेण्ड थोड़ा रोमांटिक अंदाज में प्रपोस करे.....थोड़ा सा कविता टाइप में कहे तो अच्छा लगे। लेकिन ये उस दौर की बात थी जब नायिका ऐसा चाहती थी। आजकल की नायिका तो कुछ अलग ही कहती है। अब आरक्षण फिल्म के गाने को ही लिजिये। इसमें नायक कितनी खूबसूरती से घुमा फिराकर कविताओं के जरिये अपनी बात कह रहा है कि -


झटक कर जुल्फ जब तुम तौलिये से बारिशें आजाद करती हो
अच्छा लगता है
जरा सा मोड़कर गरदन जब अपनी ही अदा पर नाज़ करती हो
अच्छा लगता है


बदले में नायिका कहती है -

आँख में आँख डाल के कह दो, ख्वाबों में टहलाओ ना
हाथों को हाथ में लेके वो तीन शब्द टपकाओ ना
जरा शॉर्ट में बतलाओ ना
सीधे प्वाइंट पे आओ ना

     मतलब जो नायिका पहले लक्ष्य फिल्म में घुमा फिराकर प्रेमी की बातें सुनना पसंद करती थी वही अब आरक्षण फिल्म में सीधे शार्ट में प्वाइंट की बात करने कह रही है, वो तीन शब्द टपकाने की बात कर रही है जबकि नायक बेचारा अब भी नायिका के तौलिये और जुल्फों में उलझा हुआ है :)

     बहरहाल आप सब भी आरक्षण के खूबसूरत गाने को देखिये..... प्रसून जोशी द्वारा लफ्ज काफी सधे और मजे मजे में लिखे गये हैं।

- सतीश पंचम

Sunday, August 7, 2011

कृपया शांत रहें....सांसद सो रहे हैं....

-  ऐ जी सुबहिये सुबहिये कहाँ जा रहे हैं मुह उठा के - नेताईन ने नेताजी से पूछा ।


- अरे औऊर कहाँ, यहीं जरा संसद तक तनिक टहल आते हैं, दोस्तन से मिल आते हैं औऊर कुछ नहीं तो तनिक सो आते हैं।

- सोने काहें संसद मे जा रहे हैं, घरवा नहीं है का ।


- अरे तुम का जानों संसद मे सोने का मजा । जब चारों और ऐ बे तू बे लगा हो तब अपनी आँख बंद कर केवल सुनने भर से अध्यात्म लाभ मिल जाता है , लगता है जैसे पंडितजी कथा बांच रहे हैं और हम सुन रहे हैं , श्रोता लोग पंचामृत लेने के लिए मन मे नारायण का जाप कर रहे हैं और पंडितजी जल्दी जल्दी कथा बांच रहे हैं की जल्दी से सब ख़त्म करूँ और सीधा- पिसान जो मिले बाँध बूंध के चलूँ।

- लेकिन ऐसन माहोल होता है संसद मे की अध्यात्म मालुम पड़े।

- अरे अध्यात्म की बात कर रही हो वहां साक्षात् नारायण के दर्शन हो जाते हैं, भिन्न भिन्न रूप मे दर्शन होता है, कभी नगद नारायण के रूप मे, कभी कौनो निगम के चेरमन के रूप मे त कबहू मंत्री पद के रूप मे ।


        यह मेरी पोस्ट का वह अंश हैं जिसे कि मैंने 22 जुलाई 2008 के दिन अपनी एक पोस्ट में लिखा था। सुबह तकरीबन साढ़े छह बजे यह पोस्ट लिखा और थोड़ी देर बाद ऑफिस के लिये निकल गया। संजोग देखिये कि ठीक उसी शाम चार बजे सांसदों ने संसद में नगद नारायण लहरा दिया। नोटों की गड्डियां इस तरह हाथों में उठाकर लहराई जा रहीं थी मानों इंटे हों। उन नोटों को लहराते देख मुझे थोड़ी झुरझुरी सी हुई थी कि यार आज ही तो पोस्ट लिखा था जिसमें संसद में नगद नारायण दिखने का जिक्र था और संजोग से आज ही सचमुच संसद में यह वाकया घट भी गया। रात करीब पौने ग्यारह बजे राज भाटिया जी की टिप्पणी भी आई कि टीवी पर सचमुच नगद नारायण देखा।

   आज News 24 की रिपोर्ट में फिर से सांसदों को सोते देखा तो लगा कि जरूर कुछ न कुछ सपना देख रहे होंगे। इधर प्रणव मुखर्जी महंगाई पर कुछ चर्चा कर रहे थे उनके ठीक पीछे बैठे वीरप्पा मोइली लगातार सोये जा रहे थे। जब प्रणव मुखर्जी की किसी बात पर संसद में टेबल बजाने का टाईम आता तो आँख खोल वीरप्पा मोइली टेबल थपथपाने लगते। उनके इस नजरबचाऊ टेबल थपथपाई को देख आनंद आ रहा था।

        वहीं संसद में कई और सांसद दिखे जो मस्त नींद के मजे ले रहे थे। एक बार आँख खोलते फिर आसपास देखते कि सब वैसे ही है, फिर सो जाते । जाने ऐसी कौन सी रतियाही करते हैं, कौन सा काम करते हैं कि संसद में जमकर रात वाली नींद पूरी करते हैं :)

      खैर, अब तो इन लोगों के बारे में लिखते हुए भी सोचना पड़ता है कि कहीं सचमुच ही वह न हो जाय जो लिखा जाय। पता चला कि सांसद जी सपने में देख रहे हैं कि कोई ट्रैक्टर चला रहे हैं औऱ अगले दिन संसद में कोई ट्रैक्टर लिये ही न आ जाय कि धरना यहीं देंगे  :) 

    वैसे, अब तो कुछ भी असम्भव नहीं लगता। सब कुछ संभव लगता है। महंगाई हो, भ्रष्टाचार हो, बेरोजगारी आदि सब आउटडेटेड टॉपिक हो चले हैं। इन पर बात करना भी पिछड़ेपन की निशानी ही माना जायगा।

   वीरप्पा मोइली  जैसे वीरो, और सोओ, जितना सोना है सो लो। वैसे भी वहां बैठे रहकर कौन सा तीर मार ले रहे हो। जिन्हें जो कुछ कहना करना है वो तो आपसी इशारेबाजी, समझ समझौवल कर ले रहे हैं। आप वहां बैठ कर भी क्या करेंगे। कैमरे लगे हों तो लगा करें, आप लोगों को कवर करें सोते हुए तो किया करें, आप को क्या.....  लोकसभा हो या राज्यसभा.....क्या फर्क पड़ता है  आप को कौन सी शर्मो हया के पैसे मिलते हैं, :) 

 वैसे भी मिर्ज़ा ग़ालिब फरमा गये हैं -

उस बज़्म* में मुझे नहीं बनती हया किये
बैठा  रहा  अगरचे  इशारे  हुआ   किये  :)

 * बज़्म -  सभा,  महफ़िल


  - सतीश पंचम

Saturday, August 6, 2011

रिस्से-सन.....रिस्से-सन

      बम्बई........तमाम शिकवों शिकायतों की बम्बई......सोते जागते सपने दिखाती बम्बई.......पचास से पांच लाख बनाती बम्बई....... करोड़ से हजार पर लाने वाली बम्बई...... यहां कौन कब कहां पहुँच जाय कोई नहीं जानता ......हर एक की अपनी मंज़िल...... कोई जल्दी पहुंचता है.....कोई देर से.....कोई पहुंच ही नहीं पाता......सारी उम्र  जांगर ठेठाते बीतती है......फुटपाथ पर सोते बीतती है.... लेकिन एक कफ़न तक के लिये तरसा देती है बम्बई......हां, अब तो मुम्बई हो गई है.......वही मुम्बई जहां गाते हुए नचनिया कहती है ....... डारलिन्ग आँखों से आँखे चार करने दो.....रोक्को ना रोक्को ना.......बुलबुलों को अभी इन्तजार करने दो...........

    हटाओ यार इस नैन-मिलौनी को ......किस तरह अँखिया चार करें.....ससुर अमेरिकौ का क्रेडिट रेटिंगवा गिर गया है.....ओही अमरिकवा जिसका कान्हे पर बइठ अटइची गाते मन नहीं थकता था......चचा सैम अब गाढ़े परे हैं.......रिस के मारे रिस्से-सन आ रहा है ....डपल डिप रिसेसन.....रिस्से-सन न हुआ डिप डिपी चाय होय गई बिलाने....


      औ देखो बम्बई के किनारे एक अउर जहाज डिप होने जा रहा है.......ससुरे जहाजों को भी यहीं डिप होने का मन करता है....संगम है क्या जो पबित्र होने आ जाते हैं......लेकिन एक बात है गुरू ......इन डूबते जहाजन पर कोई दांव लगाये तो मज्जा आय जाय.......माने.....जब कोई जहाज डूब रहा हो तो खरीद उठे और लायेबिलिटी खरीदन वाले पर डियू........जहाज बचा तो खरीदने वाले का और डूबा तो जहाजमालिक का रूतबा त दे ही देगा खरीदनहार को....औ कभी जो जहाज की परदरसनी के तउर पर रखने का मउका आ गया तो टाईटेनिक फेल .......कमा कर रख देखा डूबता जहाज.......

        ए बे.....उहां कहां सेयर मारकेट में ले जा रहे हो पइसा धरने .........देख नहीं रहे रिसेसन आवा है......मेहरारू से कहो गहना गुरिया रूपिया पइसा जो कुछ हो कहीं खन के गाड़ दे नहीं तो जो कुछ होई सरकारे क भरे में चल जायगा.....अरे है गहना ....तुम पहिले अपनी मेहरारू से पूछो तो....महिलायें गहना खरीदने में और उसे छिपाकर रखने में प्रियम्बदा होती हैं.....देखे नहीं रोज दुपहरीया को सर्राफे बाजार में कहीं चानी का पायल खरीदा जा रहा है तो कहीं सोने क करधन......ई सब चोरउथा का पइसा होता है.......रिस्सेसन आये चाहे फिस्से-सन..... महिलाएं अपना गहना गुरिया से घर थाम्ह लेन्गी.... बाकि तो पूंजिवाद में झुलनीया हिलोर मारे का बखत है.......औ हम तो कान में अंगुरी रख गायेंगे कि ........ पीछे कमर पर लतियाये गये बलमू....पूछले पर कबहूं न बताये मोहे बलमूं

       बाकि यही देखा है कि पतिदेव यदि पूंजिवादी अमेरिका का प्रतीक है तो सिरीमती इन्डिया औ भारत की मिसरित अर्थ-व्यवस्था.....कभी सोने चानी खरीदने के लिये अमीर उल उमरा बन जायेंगी तो कभी बचत करने के लिये सब्जी वाले से भी झिकझिक करती नजर आयेंगी ........कतर ब्योंत कर बचत करना कोई महिलाओं से सीखे.......आखिर रिस्से-सन में अमेरिकी चोला वाले पतिदेव जब डिपियायेंगे तो यही मिसरित अर्थ-व्यवस्था वाली उन्हें संभाल ले जायेंगी..... वरना तो कहा है साहिर लुधियानवी ने ........

 पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे
 कि मैं तन मन की सुध बुध गँवा बैठी
  हर आहट पे समझी वो आय गयो रे
  झट घूँघट में मुखड़ा छुपा बैठी.

 पूँजीवादी पिया को मन से निकालना मुसकिल है बबुनी.......मैकडोनल्ल....पिज्जा.....बरगर से लइके......पट्टा दुपट्टा तक निहाल होय गया है अर्थव्यवस्था के मुक्तांगन  में........कृषिजन्य उत्पादन, किलोज अर्थब्यवस्था औ परम्परावादी पिहर का कुछ सत् बचा ले जाय तो बचा ले जाय :)

Update :  अभी देख रहा हूं कि समुद्र में डूबे जहाज से हो रहे तेल रिसाव से कई समुद्री जीव मारे गये हैं। किनारे पर आ आकर दम तोड़ रहे हैं। तस्वीरें देख मन व्यथित हो उठा है :(

- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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