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Sunday, July 31, 2011

काव्य गोष्ठी की कुर्सी से .........

इस वक्त सोमैया कालेज द्वारा आयोजित प्रेमचंद के 131 वें जन्मोत्सव की
एक काव्य गोष्ठी में बैठा हूँ। नक्श लायलपुरी जी अगोर रहे हैं अपने
काव्यपाठ के लिये लेकिन दीप प्रज्वलन, पुष्प गुच्छ वितरण के बाद अब
संभाषण चल रहा है। हर कोई कह रहा है कि मैं ज्यादा समय नहीं लूंगा, लेकिन
फिर भी लिये जा रहा है :)

नक्श लायलपुरी जी थोड़ा और अगोरें :) तब तक मैं नोकिया सी 3 से टिपिर
टिपिर टाप लूं :)

- सतीश पंचम

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- Satish Pancham

Saturday, July 30, 2011

'गटारी' सेलिब्रेशन

     कहा जाता है कि शराब ऐसी चीज है जिसे लेकर शायर लोग तनिक ज्यादा ही भावुक होते हैं, कोई शराब को खराब बताये तो अगिया बैताल हो जाते हैं।  ताना मारते हुए कह भी देंगे कि तुम क्या जानों शराब क्या चीज है।  आये तो हो बड़े शुचितावादी बनकर, लेकिन जिस सड़क पर खड़े हो उसमें आबकारी टैक्स से मिले पैसों का भी हिस्सा है। न जाने देश के कितने बांध, कितनी सड़के शराबियों के टैक्स देने के बल पर बने हैं और अब भी बने जा रहे हैं। 

  इतना ही नहीं, कुछ अति संवेदनशील कवि तो तमाम मौजूदा चीजों से तुलना कर साबित करने लगेंगे कि शराब बहुत बढ़िया चीज है, इसे वो न समझो,  फलां न जानो। ऐसा ही किसी शायर ने कभी कहा था कि -  अरे यह मय है मय, मग़स ( मधुमक्खी) की कै तो नहीं।

   बहरहाल इस वक्त जब मैं यह लेख लिख रहा हूं तब यहां मुंबई तमाम शराब की दुकानें, बार, पब गुलज़ार हैं। मौका है विशेष शराब सेवन का जिसे कि स्थानीय भाषा में 'गटारी' कहा जाता है। यह गटारी अक्सर श्रावण महीने से जोड़कर देखा जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि श्रावण महीने में  मांस-मदिरा आदि का सेवन नहीं करना चाहिये।  दाढ़ी और बाल काटने से भी बचने की कोशिश होती है। इसलिये जो पियक्कड़ होते हैं वह श्रावण आने के पहले ही जुट लेते हैं क्योंकि अगले एक महीने तक सुखाड़ रहेगा। यह अलग बात है कि कुछ लोग 'गटारी' वाले दिन को एक्सट्रा लेने के बाद पूरे श्रावण महिने में भी डोज लेते रहने से नहीं चूकते। उनका डोज मिस नहीं होना चाहिये। कई शराबी तो यह कहते पाये जाते हैं कि न पिउं तो हाथ पैर कांपने लगते हैं। कोई काम नहीं होता :)  

   दूसरी ओर 'गटारी' शब्द को लेकर भी बड़ी मौजूं बात सुनने में आई है जिसके अनुसार शराबी इसे गटारी अमावस्या इसलिये कहते हैं क्योंकि इस दिन ढेर सारी शराब गटक कर  गटर में गिरने का दिन होता है। यह अलग बात है कि मुंबई के गटर अब कंक्रीट के जंगलों से ढंक चुके हैं।  इस गटारी अमावस्या के बारे में यहां तक प्रचलित है कि कुछ कम्पनियों में वर्करों को इस दिन के लिये विशेष भत्ता दिया जाता है। उस भत्ते को 'खरची' का नाम दिया जाता है। कहीं भी गटारी शब्द का उल्लेख नहीं होता। बाद में मिली हुई इस 'खरची' को वर्कर की तनख्वाह में से एडजस्ट कर लिया जाता है। यह सिलसिला काफी पहले से चला आ रहा है।

  इस गटारी के कुछ साइड इफेक्ट भी दिखते हैं जैसे कि थर्ड शिफ्ट में काम करने वालों की संख्या में उस दिन भारी कमी आती है। लोग एब्सेंट ज्यादा होते हैं। प्रॉडक्शन घटता है। निर्माण क्षेत्र से जुड़े कार्यों पर भी असर पड़ता है। दूसरी ओर पुलिस को भी काफी मुस्तैदी रखनी पड़ती है। बार आदि अलग से टेबल लगवाते हैं या कुछ इंतजाम करते हैं। कुल मिलाकर वह सारा कुछ होता है जो शराब के धंधे, उससे जुड़े फायदों नफा नुकसान आदि से जुड़ा होता है।

     एक चलन यह भी देखा गया है कि पहले जहां गटारी केवल एक शाम की होती थी अब उसमें तीन चार शामें होने लगी हैं। पीने वालों की संख्या बदस्तूर बढ़ती जा रही है। बस मौका होना चाहिये। वैसे भी माना जाता है कि पीने वालों को पीने का बहाना चाहिये :) 

      चलते चलते कुछ शराब से जुड़ी पंक्तियां ।  जहां तक मैं समझता हूँ शराब अच्छी चीज है या बुरी यह अलग बात है लेकिन शराब को लेकर जो शेर बने हैं वो काफी दिलकश हैं। मसलन,  

देखा किये वो मस्त निगाहों से बार बार
जब तक शराब आये, कई दौर हो गये

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मेरी तबाही का इल्जाम अब शराब पे है
मैं करता भी क्या तुम पे आ रही थी बात
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रह गई जाम में अंगड़ाइयां लेके शराब
हमसे मांगी न गई उनसे पिलाई न गई

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जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर
या वो जगह बता जहां पर खुदा ना हो

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   फिलहाल प्यासा फिल्म देख रहा हूँ।  गजब की पंक्तियां हैं इस फिल्म में।

आज सजन मोहे अंग लगा लो जनम सफल हो जाय......ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है.....हम आपकी आँखों में इस दिल को बसा दें तो......वाह साहिर लुधियानवी.....वाह !

- सतीश पंचम 

फिल्मी बतकूचन

       अभी उस दिन गिरिजेश जी से चैट के दौरान चर्चा चली कि डेल्ही बेली में जिस तरह गालियों की भरमार है कहीं वह फिल्मजगत की 'काशी का अस्सी' न बन जाय। बता दूं कि काशी का अस्सी में भी गालियां खूब हैं लेकिन अपने सहज सरल अंदाज में। भोसड़ी के, गंडउगदर....ऐसे तमाम शब्द हैं जो कॉमन लेवल पर खुलकर लिखे गये हैं।  इस पर गिरिजेश का कहना था कि मंटो पढ़ने में और कर्नल रंजीत पढ़ने में फर्क है। बात में काफी दम लगा। मंटो को पढ़ते हुए एक किस्म की चकित और आसन्न उघढ़पने का अंदशा रहता है कि जाने कब मंटो अपने लेखन में अंग विशेष को ले सामाजिक तानेबाने को उधेड़ देंगे। दूसरी ओर कर्नल रंजीत पढ़ते हुए लगता है कि बंदा नाभि केन्द्रित लेखन की ओर लुढ़का  है, जान बूझकर जगह अजगह घेर घेरकर चफनउवल दर्शाया गया है। 

     खैर, अभी हाल ही में मुझे भी डेल्ही बेली देखने का मौका मिला। अरविंद जी ने तो चेता दिया था कि खराब है, गलीज किस्म की फिल्म है लेकिन जब मूड बना कि देखा जाय तो देख लिया। देखने पर यही लगा कि फिल्म अकेले या यार दोस्तों के साथ तो देखी जा सकती है लेकिन परिवार के साथ नहीं। गालियां जो हैं सो आम स्टाईल वाली ही हैं लेकिन देखा गया है कि जो बंदे इतने बेबाक होकर एक दूसरे से मेलजोल रखते हैं, कपड़े शेयर करते हैं,  उनके बीच गालियों का एक पैटर्न होता है जोकि यहां नहीं दिख रहा। लगा कि जहां गाली दे सकते थे वहां न देकर किसी और जगह पर जबर्दस्ती गाली ठूंसी गई है। फिल्म की एक और खामी लगी कि कुछ फालतू के टॉयलेट सीन घुसेड़े गये हैं जिनकी कि जरूरत नहीं थी। हास्य के नाम पर फूहड़पन को ज्यादा तवज्जो दी गई। 

    शुरूवात में नेमिंग के आसपास वाले दृश्य काफी अच्छे से रखे गये जिनमें नल से टपकते पानी और बैकग्राउण्ड में के.एल.सहगल की स्टाइल में किसी का गाना रोचक रहा। पूरी फिल्म देखने के बाद लगा कि अमेरिकन पाई का कमजोर इंडियन वर्शन है।  जिस तरह से कहानी थी उस हिसाब से अश्लीलता कम करके भी फिल्म के कुछ दृश्य बेहद रोचक बनाये जा सकते थे लेकिन उद्देश्य जब फूहड़ता और अश्लीलता दिखाने का ही हो तो दृश्य और तकनीक गई तेल लेने, उन्हें जो दिखाना था वह दिखाया उन्होंने, जिसे देखना होगा देखेगा, न देखना होगा तो नहीं देखेगा। सीधा सा फंडा है। 

       बाकि, मुझे तो इस फिल्म का एक फायदा यह जरूर दिख रहा है कि इसके आने से चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी द्वारा 'काशी का अस्सी' पर बन रही फिल्म को  सेंसर बोर्ड से पास कराना आसान हो जायगा और होना भी चाहिये।  कहा जा सकता है कि जब डेल्ही बेल्ही अपनी फट्टू गालीयों के साथ पास हो सकती है तो सहज अंदाज में लिखी गई 'काशी का अस्सी' वाली गालियां क्यों नहीं। एक तरह से डेल्ही बेल्ही ने सेंसर के दरवाजे तक एक गालीयों भरी  पगडंडी तैयार की है जिसपर आगे आने वाली ढेरों फिल्मों के लिये रास्ते आसान हो गये है।  देखते हैं, यह पगडंडी आगे किन किन तरह की फिल्मों के लिये  रास्ते का काम करती है।  

 फिलहाल तो चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी के काशी के अस्सी का बेसब्री से इंतजार है।
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  चलते चलते -

 मेरे फोटो ब्लॉग Thoughts Of a Lens से पेश है एक छायाचित्र जिसे मैंने एक सुबह गाँव में खेंचा था 




- सतीश पंचम

Thursday, July 28, 2011

जुल्फों की जुल्फई

      वो आईं,  थोड़ा मुस्काईं, जुल्फ लहराईं  और लोग थम से गये।  रूककर देखने लगे - बला की खूबसूरत है यह पाकिस्तानी विदेशमंत्री तो। कितना पढ़ी है ?  क्या पढ़ी है ?  इसकी शादी हो गई ?  हसबैण्ड कौन है ?  क्या करता है ? ऐसे ढेरों सवाल लोगों के मन में कौंधने लगे। इंटरनेट पर सर्च शुरू हुई, लोगों ने की-बोर्ड खटखटाये। तमाम खटखटाहटों के बीच कुछ और सवाल उट्ठे - पाकिस्तान तो कट्टर है न। उसके यहां ऐसे खुले में महिलायें बिना बुरके के होती हैं क्या ?  होती होंगी। बेनजीर भी तो बिना बुरके के चलती थी। लोग उसे भी जिताते ही थे। लेकिन यार ये तो बला की खपसूरत है ....... हमारे बॉलीवुड में आये तो कैटरीना, दीपिका, प्रियंका सबकी छुट्टी कर दे।


       कुछ ऐसे भी सवाल उभरे  - क्या ये पॉलिटिक्स संभाल पाती होगी, वो भी पाकिस्तानी  पॉलिटिक्स, जहां बात बात में कबीले अपनी कबीलापंती दिखाने लगते हैं, एक दूसरे को चिचोरने के लिये उठ खड़े होते हैं। तालिबानी गुर्गे क्या पाकिस्तान में अब नहीं हैं या सब हलाल हो गये। फिर क्या सोचकर इसे पाकिस्तानी विदेशमंत्री बनाया गया होगा ? जितनी लोग, उतने सवाल। और सवाल उठना लाजिमी है, आखिर ठेठिहर बूढ़ों को देख देख हमें आदत जो पड़ गई है। हमारे यहां जहां देखो वहीं पैंसठ- सत्तर के बूढ़े पॉलिटिशियन दिखते हैं । कोई काँख रहा हैं, कोई छड़ी के सहारे ईंगुरी ठेंगते चल रहा है, कोई  व्हील चेयर पर बरसों से डटा है लेकिन कुर्सी नहीं छोड़ी जाती । जहां कोई जवान दिखता भी है तो उसे युवा, झुझारू और न जाने किन तमगों से नवाज दिया जाता है।

      खैर, बात हो रही थी हिना रब्बानी की उम्र, उनकी शख्सियत की। मोहतरमा जब दिल्ली के हवाई अड्डे पर उतरीं तो इनकी जुल्फें लहराने का कोई मौका नहीं चूक रही थीं। कभी दांये कभी बायें, कभी सामने। उन लहराती जुल्फों को संभालने में ही मोहतरमा का एक हाथ हमेशा हवा में उठा रहा। बहुत संभव है हमारे मंत्री महोदय, तमाम अफसर-अफसरान उनकी जुल्फों की लहरावट देख कुछ तरावट भी महसूस किये हों कि चलो कोई तो आया जिसे देख खुश्क हो चुके पड़ोसी रिश्तों में तरावट आएगी। लेकिन जो खबरें आ रही हैं उसके अनुसार मोहतरमा कश्मीरी अलगाववादियों से भी मिलीं, उनके साथ दुक्खम सुक्खम बांटे-बटोरे...... ऐसे अलगाववादी जिनको खुद पता नहीं कि वो आखिर चाहते क्या हैं और किसके लिये ?  कम्बख्त हिना रब्बानी को देख मजरूह की तरह  वो कहीं कह न  बैठें -  हसीं आजकल के खुदा हो गये हैं.......खता करके भी बेखता हो गये हैं  :) 

     बहरहाल हिना रब्बानी को भारत आना था, यहां के मंत्रीयों वंत्रीयो से मिलना था, फोटो शोटो खिंचानी थी, जाहिर है कुछ उन्हें अपने देश के आकाओं की ओर से स्पेशल इंस्ट्रक्शन भी मिले होंगे कि किसके सामने हंसना हैं, किसके सामने बोलना है, कहां जुल्फ लहराना है, कहां ऐनक चढ़ानी है।  मोहतरमा वही सब तो कर रहीं थीं। अलगाववादियों से मिलीं, आडवाणी से मिलीं, सुषमा से मिलीं, और अभी मेल मिलाप का कारक्रम आगे चल ही रहा है, ऐसे में हिना रब्बानी का उद्देश्य क्या है इसपर नज़र बनाये रखना बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार इस तरह के मेल मिलाप अपने आप में गूढ़ अर्थ वाले होते हैं और कहीं न कहीं टार्गेटेड पब्लिक के बीच एक खास संदेशे देते हैं। ऐसे में इन मुलाकातों को महज मेल मिलाप और बातचीत के नाम पर यूं ही इग्नोर नहीं किया जा सकता।

    रही बात हिना रब्बानी के केश सज्जा और लाली पौडर की तो इसपर लोग अभी आगे बहुत चुटकीयां लेंगे, बहुत तंज कसेंगे क्योंकि अर्से बाद कहीं किसी हसीन शख्सियत को ऐसे पद पर और इस रूप में देखा गया है। जब राजीव गाँधी के कार्यकाल के दौरान बेनजीर आईं थी तब भी चुटकुलेदारों को चुटकुले बनाने में कोई विशेष मेहनत नहीं करनी पड़ी थी। खूब चुटकुले बनाये गये थे। बाद में नरसिंहराव के कार्यकाल में भी यह चुटकुला चलन जारी रहा। अभी देखते हैं हिना रब्बानी को लेकर आगे कैसे कैसे चुटुर-पुटुर गढ़े जाते हैं :)

     फिलहाल तो जिस तरह से अफगानिस्तान में अमरीकी सेना के हटने की खबरों के बाद वहां राजनीतिक हत्यायें बढ़ी हैं, लादेन प्रकरण के बाद अमरीकी-पाकिस्तानी रिश्तों में जिस तरह खटास बढ़ी है और चीनीयों से दोस्ती बढ़ी है, तो इन सब बातों को देखते हुए विदेश मंत्री हिना रब्बानी को बहुत सचेत होकर अपनी विदेश नीति चलानी होगी वरना इस अमरीकी दुराव और चीनी लगाव के बहूत ही भयंकर परिणाम होंगे। ये अपने जुल्फ ही संवारती रह जाएंगी, उधर तालिबान अपने गुल खिलाने शुरू कर देगा। बहुत संभव है कहीं बेनजीर के जमाने जैसा फतवा न जारी हो कि किसी औरत का गैरमरदों के साथ बिना बुरके के बतियाना, हंसना, तालिब कानून अल्ले गल्ले फल्लां-फल्लां की नाफरमानी है, मजहब के खिलाफ है।

    फिलहाल तो मज़ाज की शायरी इस वक्त बहुत माकूल लग रही है जिसमें मज़ाज कहते हैं -


बहुत मुश्किल है दुनियाँ का संवरना

तेरी जुल्फों का 'पेच-ओ-खम' नहीं है।

   
- सतीश पंचम

Monday, July 25, 2011

लाखों की बात

     अक्सर समाचारों में पढ़ने मिलता है कि फर्जी मेडिकल बिल के जरिये लोगों ने इंश्योरेंस कंपनियों को चूना लगाया याकि किसी ने जान बूझकर कम्पेन्सेशन लेने के लिये चोट लगने या अंग भंग होने का बहाना बनाया। ऐसे लोग  इंश्योर्ड अमाउंट वसूलने के लिये बीमार और असहाय बनने से लेकर वो सारी तिकड़में अपनाते हैं जो कि इंश्योरेंस कंपनी से मोटी रकम दिला सके ।  यह अलग बात है कि कुछ ऐसे भी हैं जो कि इस तरह के हथकंडे इसलिये नहीं अपनाते क्योंकि उनका मानना है कि झूठ-मूठ की बीमारी के जरिये लाभार्जन करने पर कल को कहीं सचमुच ही कोई बीमारी न गले पड़ जाय। इस तरह की मानसिकता वाले लोगों की संख्या अच्छी खासी है जो कि ईश्वरीय दंड के अंदेशों के चलते ऐसे हथकण्डों से दूर रहते है। लेकिन उनका क्या जिनका खर्चा पानी ही इस तरह के कम्पेन्सेशन दावों के चलते निकल रहा होता है ? ऐसे लोग यह नहीं देखते कि क्या सही है क्या गलत, बस उन्हें मतलब है कम्पेन्सेशन के पैसों से चाहे असल चोट हो या बनावटी। कुछ इसी सब्जेक्ट को लेकर बनी थी फिल्म 'लाखों की बात' जिसमें कि संजीव कुमार और फारूख़ शेख के जरिये बासु चटर्जी ने इस मसले को बड़े ही मनोरंजक अंदाज में पेश किया था। अभी जब इस फिल्म को दुबारा डीवीडी पर देखा तो लगा कि इस फिल्म की चर्चा करनी चाहिये क्योंकि कमलेश्वर द्वारा लिखी यह फिल्म बेहद अलग सब्जेक्ट पर बनी है।

     फिल्म की कहानी में आलोक ( फारूख़ शेख) एक प्रेस फोटोग्राफर है जो कि एक अखबार में स्पोर्टस सेक्शन के लिये तस्वीरें कवर करता है। आलोक का जीजा प्रेम ( संजीव कुमार) एक वकील है जिसकी कि वकालत कम चलती है इसलिये  खर्च निकालने के लिये अक्सर ऐसे लोगों का केस लेता है जोकि किसी चोट के चलते किसी से हर्जाना आदि वसूल करना चाहते हों। यहां तक कि केले के छिलके से फिसल कर गिरे एक शख्स को भी हर्जाना दिलाने के लिये तैयार हो जाता है क्योंकि वह केले का छिलका एक दुकान के बाहर था और यह उस दुकान वाले  की गलती थी कि उसने अपनी दुकान के सामने से केले का छिलका नहीं हटाया था। यहां भी वकील प्रेम की चिंता यह थी कि थोड़ा आगे वाली नामी फर्म के सामने पड़े केले के छिलके से फिसलकर ये शख्स  गिरा होता तो फर्म से ज्यादा पैसे ऐंठे जा सकते थे।

  खैर, एक दिन आलोक महिला हाकी का मैच कवर करने जाता है और हाकी की गेंद सीधे आलोक के सिर पर आ लगती है। आलोक थोड़ी देर के लिये बेहोश हो जाता है। उसे अस्पताल ले जाया जाता है। आलोक के जीजा प्रेम को जब पता चलता है तो वह इस मामूली चोट के बदले अखबार वालों से हर्जाने के तौर पर रूपये ऐंठने का प्लान बनाता है। आलोक की मां से पता चलता है कि बचपन में आलोक को स्पाइनल कॉर्ड में चोट लगी थी। आलोक की मेडिकल हिस्ट्री जानने के बाद वकील प्रेम अपने साले आलोक के अखबार से बीस लाख के हर्जाने का दावा करता है क्योंकि उसी के कवरेज करते समय नौकरी करते समय आलोक को चोट लगी और उसके स्पाइनल कॉर्ड पर चोट लगी। 

रुंगटा सेठ ( Pinchoo Kapur)
   इधर आलोक होश में आ जाता है और अस्पताल से घर जाना चाहता है। प्रेम उसे समझाता है कि थोड़ा चोट लगने की एक्टिंग करो ताकि तुम्हारे अखबार  से कुछ रूपये मिल सकें ताकि तुम्हारा भी काम बने मेरा भी। लेकिन आलोक तैयार नहीं होता। इसी बीच आलोक की तलाकशुदा पत्नी शोभा ( अनीता राज) को पता चलता है कि आलोक को चोट लगी है, वह उसे अस्पताल में देखने आती है। आलोक हांलाकि शोभा को तलाक दे चुका है लेकिन अब भी उसके मन में शोभा के लिये प्यार है और वो चाहता है कि वह फिर से वापस आये। आलोक का जीजा प्रेम इस सॉफ्ट कॉर्नर को समझ जाता है और साले को समझाता है कि तुम यदि इसी तरह चोटिल बने रहो तो शोभा तुम्हें यूं ही मिलने आया करेगी और तुम फिर से उसे पा सकोगे। अखबार से पैसे मिलेंगे सो अलग। आलोक किसी तरह तैयार होता है। 

  इसके आगे शुरू होती है अखबार के मालिक रूंगटा सेठ और वकील प्रेम के बीच रस्साकशी। रूंगटा सेठ पीसा (  हां पैसे को पीसा ही बोलते हैं अभिनेता पिंछू कपूर :)  देने से इन्कार करता है। प्रेम यह खबर रूंगटा सेठ के प्रतिद्वंदी अखबार के पास दे देता है कि रूंगटा अपने चोटिल कर्मचारी को हर्जाने के पैसे नहीं दे रहा। रूंगटा सेठ इससे नर्म पड़ जाता है क्योंकि प्रतिद्वंदी अखबार में यह खबर चल गई थी। अब वकील प्रेम से रूंगटा सेठ मोलभाव शुरू करता है लेकिन अपने एक जासूस मगन  (उत्पल दत्त ) को आलोक के पीछे लगा देता है कि पता करो कहीं आलोक की चोट फर्जी न हो। आलोक की चोट के बारे में और ज्यादा तस्दीक करने के लिये रूंगटा सेठ अपने डॉक्टरों का पैनल भेजता है। डॉक्टरों की जांच से बचने के लिये चालाक वकील प्रेम को अंगुली सुन्न करने वाला इंजेक्शन तिल वाली जगह पर लगवाता है ताकि जांच करने वाले डॉक्टरों को पता न चले कि कहीं  इंजेक्शन लगा है। डॉक्टर आलोक के बारे में तय नहीं कर पाते कि इसे चोट वाकई लगी है या नहीं। रूंगटा सेठ पर दोहरी मार तब पड़ती है जब जांच करने वाले डॉक्टर भारी भरकम फीस का बिल भेजते हैं। 

   दूसरी ओर जिस महिला हाकी खिलाड़ी की गेंद से आलोक को चोट लगी थी वह भी अस्पताल में आलोक का हाल चाल जानने के लिये बेचैन रहती है, आलोक को मिलना चाहती है लेकिन वकील प्रेम उन दोनों को ज्यादा देर तक मिलने नहीं देना चाहता क्योंकि आलोक की नकली चोट की पोल खुल सकती है। इसी बीच आलोक की पूर्वपत्नी शोभा ( अनीता राज) उससे बराबर मिलने आती है। वकील प्रेम भांप लेता है कि शोभा का  इन दिनों आलोक को मिलने आना केवल उस हर्जाने से मिलने वाले पैसों के लिये है जो कि रूंगटा सेठ से मिलने वाला है। उधर आलोक इस नकली चोट के नाटक से दूर रहना चाहता है, उसे यह अच्छा नहीं लगता कि कोई इस तरह का गलत रास्ता अपना कर पैसे बनाये जायें।  लेकिन शोभा को आलोक खोना भी नहीं चाहता, वह अब भी इस  मुगालते में है कि उसकी पूर्वपत्नी उससे अब भी लगाव रखे है और उसकी चोट की वजह से ही विह्वल हो मिलने आती है। 

    उधर  वकील प्रेम यह नाटक अभी कुछ दिन और कम्पेन्सेशन के चेक मिलने तक जारी रखना चाहता है और इसीलिये शोभा को बता देता है कि चोट नकली है और यदि कुछ हिस्सा तुम भी चाहती हो तो आलोक से मिलने आया करो ।  इधर महिला हाकी खिलाड़ी नीला जिसकी गेंद से आलोक चोटिल हुआ था खुद को आलोक की चोट के लिये जिम्मेदार मानती है और पछतावे के फलस्वरूप चाहती है कि वह आलोक की कुछ तीमारदारी करे ताकि कुछ उसकी मानसिक पीड़ा कम हो।

    इस बीच आलोक अस्पताल से घर लाया जाता है व्हीलचेयर पर और हाकी खिलाड़ी नीला उसकी देखभाल करने के लिये बीच बीच में आती रहती है। एक दिन आलोक की पूर्वपत्नी शोभा हाकी खिलाड़ी नीला को आलोक के घर का काम करती देख लेती है और गुस्से में हर्जाने के पैसे मिलने की बात बोल जाती है जिससे आलोक  को एहसास होता है कि उसकी पूर्वपत्नी का लगाव हर्जाने के पैसों से है न कि उसके चोट और दुख तकलीफ से। 

  उधर प्रेम अखबार के मालिक रूंगटा को अंतत: बीस लाख की बजाय दस लाख के चेक देने पर मना लेता है और चेक लेकर आलोक के पास आता है । सामने वाले बिल्डिंग की खिड़की से जासूस मगनभाई अपने कैमरे से आलोक की हरकतें कैद कर रहा होता है कहीं आलोक नाटक तो नहीं कर रहा। आलोक को भी पता होता है कि सामने की खिड़की में कैमरा लगा है जो उसकी एक एक हरकत को कैद कर रहा है रूंगटा सेठ के लिये। अपनी पूर्व-पत्नी के लालच और बेवफाई से व्यथित आलोक शोभा को मजा चखाना चाहता है और व्हील चेयर से खड़ा हो जाता है। लगता है कूद फांद करने। कभी टेबल उठाता है कभी कुर्सी। सामने कैमरा उसकी इस हरकत को लगातार कैद कर रहा होता है जिसके जरिये बताया जाने वाला था कि आलोक को स्पाईन में कोई चोट नहीं लगी और न ही कोई गंभीर हादसा हुआ है।  दस लाख का चेक लिये प्रेम खड़े रह जाता है।

        जासूस मगनभाई ( उत्पल दत्त) जब इस बात को कैमरे में कैद कर रहा होता है तो प्रेम ( संजीव कुमार ) उसी कैमरे को संबोधित करते हुए दस लाख का चेक फाड़ते हुए कहते हैं - चूंकि इस प्रकरण में कहीं कोई रूपयों का लेनदेन नहीं हुआ है इसलिये ये मामला यहीं समाप्त होता है और आलोक या प्रेम पर किसी किस्म के धांधली का कानूनी केस नहीं बनता। लेकिन एक केस जरूर बनता है जासूस मगनभाई पर क्योंकि वो किसी के कमरे में कैमरा लगा कर झांक रहे थे। यह इंडियन पैनल कोड.....फलां फलां के तहत कानूनन....जुर्म दफा फलां फलां के तहक निहायत ही घटिया हरकत है.......। 
 
  
     पूरी फिल्म एक तरह से सटायर है उस व्यवस्था के प्रति जिसमें कि चोट को लेकर बहस, मुबाहिसा, तमाम तिकड़में अपनाई जाती हैं। यहां एक चीज जिसने मेरा ध्यान आकर्षित किया वह थी फारूख शेख द्वारा बोली गई एक तारीख। दरअसल फारूख शेख जब अस्पताल में होते हैं तब अपनी पूर्व-पत्नी को याद करते समय अपने जीजा प्रेम ( संजीव कुमार) से  जिक्र करते हैं कि -  याद है उस दिन 26 जुलाई की तेज बारिश में कैसे भीगते हुए मैं और शोभा मिले थे। फारूख शेख के इसी संवाद पर ध्यान अटकता है क्योंकि बासु चटर्जी ने जब फिल्म बनाई थी तो 1984 में बनाई थी और यहां मुंबई में जिस 26 जुलाई की बारिश ने सैकड़ों की जान ले ली वह 2005 में हुई थी।

       अब भी मुंबई वासी 26 जुलाई का नाम सुनते ही उस बारिश को याद करते हैं जिसने हर किसी सिहरा दिया था। लोग तीन तीन दिन तक अपने जगहों पर फंसे रहे, जिन्होंने हिम्मत की उनमें से ढेर सारे लोग या तो चोटिल हुए या जान से हाथ धो बैठे। बहुत संभव है कि फिल्म लाखों की बात में 26 जुलाई का जिक्र आना और वह भी तेज बारिश के साथ महज़ एक संयोग ही हो सकता है बाकि कुछ नहीं।

       कमलेश्वर द्वारा लिखी गई इस फिल्म को एक अलग ही टेस्ट, अलग किस्म के सब्जेक्ट को  मनोरंजक तरीके से देखा जा सकता है।  मारवाड़ी अंदाज में रूंगटा सेठ बने पिंछू कपूर का संवाद बेहद सशक्त है। इस रूंगटा सेठ के जरिये ही बासु चटर्जी ने अखबारों की वो हकीकत भी बयां की है जिसके तहत अखबार का मालिक अपने संपादकों को कुछ नहीं समझता और उनकी स्वतंत्र लेखनी, बड़ी बड़ी ठसक जैसी बातों को अपने जूतों की नोक पर रखता है। उसे ....'रे भरूचा' वाली 'रेरी' वाली जुबान से बुलाता है। एक बेहद संतुलित और सशक्त अदाकारों से सजी है फिल्म 'लाखों की बात'।   


- सतीश पंचम     

Sunday, July 17, 2011

राजनीति के 'क़ोतल' घोड़े

        लगता है ‘क़ोतल’ घोड़ों का जमाना फिर लौट आया है। वह भी पूरे जोशो-ख़रोश से। बता दूं कि ‘क़ोतल’ उन जुलूसी घोड़ों को कहा जाता है जिन्हें सजा-धजा कर राजा अपने साथ लेकर चलता है ताकि जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल कर सके। ऐसे सजे-धजे घोड़ों पर कोई सवार नहीं होता। अब चूंकि राजशाही रही नहीं, और न ही घोड़ों पर कहीं आने-जाने का चलन ही रहा, सो ‘क़ोतल’ घोड़े रखने का प्रचलन भी लुप्त हो गया था।


         किंतु देख रहा हूं कि वे ‘क़ोतल घोड़े’ फिर लौट रहे हैं। झक्क सफ़ेद कपड़ों में सजे-धजे ये घोड़े जब राजनीति के एक्सप्रेस-वे पर निकलते हैं तो इनकी शोभा देखते ही बनती है। लोग-बाग इन सजे-धजे घोड़ों के करतब देख दंग होते हैं। उनका हिनहिनाना सुन अचरज से ताकते हैं, कि न उन घोड़ों पर कोई सवार है, न कोई भारी बोझ ही लदा है। तिस पर रंग-बिरंगे फुदकों, रेशमी पाजेबों से ढंके संवरे घोड़े आखिर इतना हिनहिनाते क्यों हैं। लेकिन लोगों को क्या पता कि यह घोड़े राजनीतिक घोड़े हैं। इनकी बयानबाजियाँ, इनकी टिल्लो मारती मुस्कानें अपने आप में कई-कई मायने रखते हैं, जिन्हें कि आम-जन की जुबानों में ‘शिगूफ़ा’ कहा जाता है। मजे की बात यह कि ऐसे ‘क़ोतल घोड़े’ हर पार्टी में हैं और समय समय पर अपने मुखारविंद से ऐसे शिगूफ़े छोड़ने में माहिर होते जा रहे हैं। पार्टी-हाईकमान भी इन क़ोतलों को अपने साथ रखने से परहेज़ नहीं करते क्योंकि उनकी अपनी उपयोगिता है, अपना आकर्षण है। उनकी बयानबाजियाँ, उनके शिगूफ़े वह सब बड़ी आसानी से लोगों के बीच पहुँच जाते हैं जिन्हें पार्टी हाईकमान अपनी पोजिशन के चलते खुले तौर पर नहीं कह सकते।

        अभी हाल ही में राहुल गाँधी से दिग्विजय सिंह के दिये बयानों के बारे में सफाई मांगी गई तो उन्होंने बड़ी ही मासूमियत से कहा कि वो दिग्विजय सिंह के अपने विचार हैं, मेरे अपने विचार हैं। मैं उनके बयानों के बारे में कैसे कहूँ। बहरहाल यही दिग्विजय सिंह हैं जो कि भट्टा पारसौल में राहुल गाँधी के साथ साथ चलते दिखे। पुलिस कप्तान से बहसबाजी करते दिखे। अपने तमाम बयानबाजियों से लोगों को हैरान परेशान करते दिखे लेकिन जब राहुल से पूछा जाय तो कहते हैं कि वो जानें उनके विचार जानें। क्या एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता के तौर पर राहुल गाँधी को इतनी भी समझ नहीं कि उनके साथ रहने वालों के बयानों से कुछ अलहदा किस्म के सन्देश भी जाते हैं जिनका कि प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष असर जरूर पड़ता है।

        राजनीति के इस ‘क़ोतलपंती’ में भाजपा भी कम नहीं है। उसके पास भी ऐसे कई ‘क़ोतल घोड़े’ हैं जो समय असमय अपने बयानों से लोगों के बीच गाहे-बगाहे अपने सन्देश देते रहते हैं। पार्टी आलाकमान से जब उन ‘क़ोतलों’ द्वारा दिये बयानों के बारे में स्पष्टीकरण मांगा जाता है तो बड़ी ही मासूमियत से कहा जाता है कि वो उनके अपने विचार हैं और प्रजातांत्रिक देश में हर किसी को अपनी राय रखने का हक है।

      जाने यह ‘राजनीतिक क़ोतलपंती’ कब तक चलती रहेगी और लोगों को लाशों की राजनीति करते क़ोतलबाजों से कब छुटकारा मिलेगा।  फिलहाल इस कोतल गाथा को यहीं विराम देता हूँ।  वैसे भी सुना है - इतिहास खुद को  समय-असमय दुहराता रहता है। कोतलों की वापसी संभवत:  इसी दुहराव की परिणति है।  

- सतीश पंचम


चित्र : नेट से साभार

Saturday, July 16, 2011

फ़लक तक चल साथ मेरे.....

        अक्सर कहा जाता है कि हाल फिलहाल के फिल्मी गानों मे Melody कम होते जा रही है, याकि लिरिक्स के नाम पर कुछ भी लिख दिया जाता है। संगीत पर ज्यादा जोर देकर गीत तैयार किया जाता है। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। कुछ गीत बेहद रोमांटिक और कर्णप्रिय होते हैं। दबंग का 'ताकते रहते तुझको सांझ सवेरे' गीत  भी Melodeous गीतों की श्रेणी में आता है।  वहीं गुलज़ार के गीत तो खैर हैं ही ज्यादातर कर्णप्रिय....भले कभी कभार बीड़ी जलाने और पड़ोसी से आग लेने लगते हैं :)

    खैर, मैं बात करूंगा एक ऐसे गीत की जिसे कई बार सुना और सोचता था कि गीतकार कौन है...किसने लिखा होगा। सुनने में बहुत अच्छा लगता था।  वह गीत था 'टशन' फिल्म  का 'फ़लक तक चल साथ मेरे' गीत।  सुनते वक्त तो यह जिज्ञासा जरूर आती थी कि किसने लिखा होगा इन खूबसूरत पंक्तियों को, कौन होगा वो नग़मा-निग़ार जिसने कि अपने खूबसूरत बिंबों से इस गाने को सजाया है।  जिज्ञासा होती थी और कुछ समय में गुम भी हो जाती थी।  वरना तो केवल नेट पर सर्च करने की देर है, सारा कुछ सामने आ जाता है कि कौन गीतकार है, कौन संगीतकार कौन क्या। आज सुबह यह गीत फिर  सुना तो रहा नहीं गया और नेट पर सर्च करना शुरू किया।

        सर्च करते ही गीतकार के रूप में किन्ही 'कौसर मुनीर' का नाम दिखा। पहली बार यह नाम सुना। जिज्ञासा हुई कि भई ये कौन गीतकार है, जिसके बारे में कहीं अखबारों में या किसी टीवी आदि पर नहीं पढ़ा कभी। थोड़ा और सर्च किया तो एक फेसबुक प्रोफाइल मिला, लेकिन उसमें भी कुछ खास जानकारी न थी। बाद में एक जगह जानकारी मिली कि कौसर मुनीर का विवाह स्वर्गीय निर्मल पाण्डे के साथ 1997 में हुआ था लेकिन बाद में दोनों  अलग हो गये। इससे ज्यादा कुछ उनकी लेखकीय पृष्ठभूमि आदि के बारे में ज्यादा कुछ पता न चल सका।  हां, इतना जरूर पता चला कि हालिया रिलिज़ फिल्म 'अन्जाना अन्जानी' में भी कौसर मुनीर ने गीत लिखे हैं। उस फिल्म के गीत मुझे तो पसंद न आये लेकिन टशन फिल्म का यह गीत जरूर पसंद आया।        


फ़लक तक चल साथ मेरे
फ़लक तक चल साथ चल
ये बादल की चादर
ये तारों के आँचल
में छुप जायें हम.....पल दो पल
फ़लक तक चल साथ चल


चल वो चौबारे ढूँढें
जिन में चाहत की बूंदे
सच कर दें सपनों को सभीsss

आँखों को मींचे मींचे मैं तेरे पीछे पीछे
चल दूं जो कह दे तू.... अभीsss
बहारों की छत हो....दुवाओं के खत हो,
पढ़ते रहें ये ग़ज़ल,

फ़लक तक चल साथ मेरे
फ़लक तक चल साथ चल

सूरज को हुई है राहत
रातों को करे शरारत
बैठा है खिड़की पर तेरीsss

हाँ...इस बात पर चांद भी बिगड़ा
कतरा कतरा वो पिघला
भर आया वो आँखों में मेरीss
तो सूरज बुझा दूं
तूझे मैं सजा दूं
सवेरा हो तुझसे ही कल

फ़लक तक चल साथ मेरे

फ़लक तक चल साथ चल

    अक्षय कुमार और करीना पर फिल्माया गया वह बेहद खूबसूरत गीत यह रहा।



  

Thursday, July 14, 2011

चल यार....ये तो रोज का है.

     कल शाम यहाँ मुम्बई में बम फटे, आज सुबह सब कुछ वैसे का वैसा। बच्चे स्कूल जा रहे हैं, लोग ऑफिसों में, कारखानों में अपने काम पर जा रहे हैं, बसें,कारें,मोटरसाइकिलें सब कुछ जैसे कल चल रहे थे वैसे ही आज भी चल रहे हैं। अब तो इस मुम्बई ने इतना ज्यादा दर्द झेल लिया है कि बम फटने जैसी घटनाओं से उसने तिलमिलाना लगभग छोड़ दिया है। कहीं कुछ ऐसा होता भी है तो यूँ बिहेव करती है मुम्बई जैसे कुछ हुआ ही नहीं। बस कुछ समय के लिये ठहरती है मुम्बई और फिर कहती है - चल यार ये तो रोज का है।

      कुछ लोग मुम्बई के इस अलहदा व्यवहार को मुम्बई वालों के जज्बे से जोड़ने लगते हैं तो कुछ लोग इसे उनकी मजबूरी कहते हैं कि आखिर करें क्या, कमाना तो पड़ेगा ही। बात काफी हद तक सच है। लोगों को झख मारकर ऑफिस जाना पड़ता है, न न करते हुए भी आज की बजाय कल को लेकर चलना पड़ता है। अब इसे कोई मुम्बई वालों का जज्बा कहे, स्पिरिट कहे तो यह उनका मुगालता है, लेकिन सच्चाई यही है कि लोग कुछ मजबूरी और कुछ पनप उठी बेपरवाह फितरत के चलते रोजमर्रा के ढर्रे में ढल गये हैं और ऐसे हादसों के बावजूद चलते चले जाते हैं। मुम्बई स्पिरिट और ब्ला ब्ला उन  लोगों के लिये है जिनके पास बहुत समय है यह सब बोलने बतियाने के लिये। असली मुम्बईकर तो फोन पर लगा होगा - हां, आ रहा हूँ ....इधर रेल्वे ट्रैक में पानी भरा है यार.....थोड़ा टाइम लगेगा......आ रहा हूं। 

    वैसे इन तमाम बातों से मुम्बई भले ही मुसीबतें झेलने के लिये अभिशप्त दिखे, लेकिन इन्हीं बार बार होने वाली मुसीबतों ने मुम्बई की रगों में ऐसी प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर दी है कि वह इन हादसों को अब 'पार्ट ऑफ लाइफ' की तरह ट्रीट करने लगी है।

        वैसे, तमाम मीडिया, राजनीतिज्ञ, सिम्पोजियम आदि सुरक्षा को लेकर सवाल जरूर उठायेंगे, उठा भी रहे हैं लेकिन लोग अब जान चुके हैं कि बाकी चीजों की तरह ये भी एक रोजमर्रा की होने वाली कांय कांय है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। लोग भुनभुनाएंगे, झल्लाएंगे, मोमबत्तीयां जलायेंगे, और बाकी सारी रस्में निभायेंगे....वैसे ही जैसे अब तक करते आये हैं इस तरह के हादसों के बाद।

       ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह कब तक चलता रहेगा, कब तक लोग यूं ही जान गंवाते रहेंगे, कब तक शोशेबाजीयां झेलते रहेंगे, तो मित्रो, इसका जवाब किसी के पास नहीं है, न कल था, न आज है न आगे कभी होने की संभावना लगती है। किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि 'आखिर कब तक' ?

       फिलहाल आज सुबह खिंचे गये इन चित्रों को  देखिये कि कैसे कल शाम के बम विस्फोट के बाद आज सुबह लोग चल पड़े हैं, कैसे भारी बारिश के बीच बम विस्फोट के सबूत मिट जाने वाले अंदेशों के बीच लोग छाता ताने चले जा रहे हैं, और एक शख्स ऐसा भी दिखा जिसकी टी-शर्ट के पीछे लिखा था - Being human.


    संभवत: इस 'आखिर कब तक' जैसे सवालों का यही जवाब भी हो.


- सतीश पंचम

Sunday, July 10, 2011

मित्रायन

     हाल ही में अपने एक सहपाठी के भवन निर्माण से संबंधित भूमिपूजन कार्यक्रम में शामिल हुआ। एक अलग ही अनुभव रहा इस भूमिपूजन में शामिल होना। दरअसल पिछले काफी समय से मेरा यह मित्र निर्माण क्षेत्र में हाथ आजमाना चाहता था। कई बार हम लोग साथ-साथ प्लॉट देखने गये, कहीं जमीन का रेट जेब से बाहर था तो कहीं जमीन का टाईटल ही क्लियर नहीं था। कभी सब कुछ ठीक होने पर स्टेशन से दूरी आड़े आती तो कभी कुछ और झंझट दिखाई देता। न जाने कितनी बार हम लोग किराया भाड़ा खर्च कर यूं ही हाथ झुलाते घर आए। इस बीच कई साल बीत गये। मित्र की चाहत के चलते रह-रहकर एकाध बार हम लोग यूं ही टहलते हुए कोई साइट देख आते।

       काफी जद्दोजहद के बाद आखिर में मित्र ने मुंबई से कुछ दूर पनवेल इलाके में सिडको से प्लॉट खरीद लिया। सौ स्कवेयर मीटर का प्लॉट करीबन इकतालीस लाख का पड़ा। उसी प्लॉट के भूमिपूजन के सिलसिले में कॉलेज के मित्रगण जुटे थे। यहां कॉलेज के मित्रगण से तात्पर्य हम तीन सहपाठीयों से है जो पिछले सतरह अठारह सालों से अब तक एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, आपस में कुशल-क्षेम पूछते है, किसी काम पड़ जाने पर आपस में सलाह मशविरा करते हैं, एक दूसरे की राय लेते हैं। इस घनिष्ठता की वजह संभवत: हम सभी मित्रों का एक ही पृष्ठभूमि का होना, एक ही मु्म्बईया परिवेश में लगातार सालों तक बने रहना भी हो। सतरह अठारह साल पहले कोई फेसबुक-ट्वीटर तो था नहीं, बस फोन फान के जरिये आपसी कुशल क्षेम होती, धौल-धप्पा चलता रहता था।

         खैर, इधर साथ-साथ हम लोग जब प्लॉट पर पहुँचे तो देखा पिछले काफी दिनों से हुई बारिश के चलते प्लॉट के गड्ढों में पानी जमा हो गया है। पूजा करने के लिये थोड़ी सी सूखी जमीन दिखी। वहीं पर हम लोगों ने पूजा पाठ के सारे सामानों को रखना शुरू किया। साथ में आये पंडितजी बताते जा रहे थे कि कहां क्या रखा जाय.... रोली-अच्छत-दुर्वा-हल्दी सब कुछ बाकायदा पैकेट खोल कर साथ लाये थाल में रखा जाने लगा। चार-पाँच इंटे जोड़कर हवन हेतु प्लेटफॉर्म का भी निर्माण किया गया। जरूरत पड़ी आम के पत्तो की। पूजा सामग्री में वह न आया था। गाँव एरिया था, नजदीक ही किसी आम का पेड़ होने की संभावना थी। थोड़ा सा नजर उठाकर देखते ही पास ही एक आम का पेड़ दिख गया। आम्र पल्लवों की प्रॉब्लम सॉल्व। झट से चंद पत्ते डंठल सहित हाजिर। कलश तैयार।

          इधर आसमान में बादल भी घिरने लगे थे। चूंकि इष्ट मित्र और परिवार के लोग ही जुटे थे सो ज्यादा तामझाम भी नहीं किया गया था। जो थे सो हमीं लोग तो थे। रह- रहकर चिंता भी हो रही थी कि यार कहीं बादल बरसने न लगें। इस बीच पंडित जी ने पूजा शुरू की। मित्र के पिताजी पूजा हेतु पंडित जी के बगल में बैठे। हम लोग पास खड़े होकर कभी पूजा देखते, कभी बादल तो कभी फोन कॉल्स अटेंड करते। इस बीच अगरबत्ती की भीनी भीनी सुगन्ध खुले वातावरण में फैलने लगी, और अच्छा लगने लगा। रह रहकर शंख की ध्वनि होती, जयकारा लगता। और तभी बादल भी जैसे इस पूजा में शामिल होने के लिये एक दूसरे को ढकेलते-मेल्हते आ गये। बिजली की गड़गड़ाहट के साथ वो झमक के बारिश हुई कि क्या बताउं। अगरबत्तीयां बुझ गई, हल्दी-अच्छत सब भीग उठे, पूजा सामग्री, मिठाई आदि सब तर बतर। हम लोगों के पास छाते थे लेकिन वे इस तेज बारिश में बेकार साबित हो रहे थे। वैसे भी छतरी केवल मामूली बारिश में ही साथ दे सकती है। हवा के साथ तेज बारिश हो तो भीगना तय है। पूजास्थल पर वही हो रहा था। तेज हवा के साथ तेज बारिश ने सबको भिगोना शुरू किया। पंडित जी और मित्र के पिताजी को एक एक छाता दे दिया गया कि आप लोग बैठे रहिये छाता पकड़े, हम लोग छाता खोले तेज बारिश का आनंद लेते हैं। करीब दस मिनट तक झमाझम बारिश हुई। थोड़ी देर बाद बादल छंटे तो फिर आगे का कार्यक्रम शुरू किया गया। घी, गुड़ आदि के मिश्रण से बने हवन सामग्री को प्रज्वलित किया गया। मन्त्रोच्चार हुआ, पाठ चला, आरती ली गई और होते होते आधे अगले घंटे में पूजा पाठ सम्पन्न हो गया।

       लौटानी में मित्र ने बताया कि सिडको के ये प्लॉट किसी किसान से लिये गये हैं। वहां से हमें सिडको के जरिये खरीदना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में शेतकरी संघटना, किसान, सिडको आदि से काफी कुछ कानूनी प्रक्रियाओं के पूरा करने के बाद, सारी क्लियरेंस मिलने के बाद करीबन 41 लाख में यह सौ स्कवेयर मीटर का प्लॉट पड़ा। इसमें FSI आदि जोड़-जाड़कर कुल आठ फ्लैट बनाने की इजाजत मिली है। मैं मित्र की इस सफलता पर मन ही मन मुग्ध हो रहा था क्योंकि मित्र की इच्छा के चलते हम सहपाठियों ने साथ-साथ काफी प्लॉट्स देखे थे और इतने वर्षों बाद उसके सपनों को साकार रूप लेते देखना अच्छा लग रहा था। रास्ते में मित्र ने एक और प्लॉट की ओर इशारा करते बताया कि इसके बारे में भी कागजी कार्यवाही चल रही है। जल्द ही ये भी अपनी मुट्ठी में होगा।

     मैंने उस प्लॉट्स के आसपास देखा तो जितने घर थे सबके आगे गाड़ियां खड़ी दिखीं। कहीं इनोवा कहीं स्कॉर्पियो तो कहीं पजेरो। सब एक से एक। गाँवखेड़ा होकर ऐसी गाड़ियां घरों के आगे खड़ी देखना थोडा सा कौतुहल जगा गया। साथ ही कुछ घरों की खिड़कियों में एयर कंडीशन भी दिखे। अमूमन गाँवों में एयर कंडीशन नहीं दिखते, लेकिन यहां थे। मित्र से पूछ पछोर करने पर पता चला कि सिडको की ओर से किसानों की जमीनें ली जाती हैं और उसके बदले में मोटी रकम दी जाती है। जिससे सारे गाँव वाले अब करोड़पति बन उठे हैं। उन्हें मोटी रकम के अलावा पुनर्वास के लिये भी सरकारी उपाय किये गये हैं। कुछ यही सब दिल्ली के आसपास के गाँवों से संबंधित एक रिपोर्ट में भी देखा था जिसमें कि कुछ किसानों की नवधनाढ्यता को दर्शाया गया था कि कैसे हर घर के बाहर गाड़ियां खड़ी दिखती हैं, कैसे वहां के लोग अचानक अमीर हो गये हैं और उन तमाम सुविधाओं को भोग रहे हैं जो अब तक केवल शहरी मानी जाती थीं।


      पनवेल के किसानों की इन गाड़ियों को देख जहां तक मैं समझता हूं इन्हें किसी कंपनी में कांट्रेक्ट पर उठा दिया जाता होगा और बदले में किसान महीने में कुछ आमदनी भी कर लेते होंगे। यहां एक दो कारों के पीछे वह चेतावनी वाली प्रति भी दिखी – If You find rush driving by driver, kindly contact ……. इससे पता चलता है कि यहां की गाड़ियां क्रांट्रेक्ट पर दी जाती हैं। अच्छा है, एक तरह से अचानक मिली मोटी रकम का सदुपयोग ही कर रहे हैं किसान परिवार।


         उधर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि – किसानों के लिये उनकी जमीन क्या होती है यह किसान लोग ही जानते हैं। सुप्रीम कोर्ट की बात अपनी जगह सही है। लेकिन अब खेती किसानी पहले जैसी नहीं रही। जो लोग फिलहाल खेती से जुड़े हैं वह भी अपने बच्चों को शिक्षित कर कहीं नौकरी में देखना चाहते हैं, यह एक तल्ख सच्चाई है। छोटे और मझोले किसान बहुधा अपने बच्चों को खेती से जुड़े रहने की सलाह नहीं देंते क्योंकि यहां आमद के नाम पर एक किस्म की प्रच्छन्न बेरोजगारी सी चलती है। प्रच्छन्न बेरोजगारी से तात्पर्य जब परिवार के ढेर सारे सदस्य और कोई काम न होने पर खेती में जुटे रहते हैं तो वहां एक तरह की छुपी बेरोजगारी होती है। ज्यादातर छोटे किसानों की खेती-बाड़ी इसी प्रच्छन्न बेरोजगारी के आलोक में घिसट घिसट कर चल रही है। लोग खेती के काम में तो जुटे हैं लेकिन उनकी आमदनी नहीं हो रही। हां, जो बड़े किसान हैं वो जरूर अपने बच्चों को इस किसानी क्षेत्र से जोड़े रखना चाहेंगे क्योंकि उनकी आमद लाखों-करोड़ों के टर्नओवरों में होती है।

        उधर देख रहा हूं कि नोयडा में विकास के नाम पर तमाम जगह जमीने कब्जाई जा रही हैं। तमाम तरह के अधिग्रहण चल रहे हैं। किसानों को मुआवजे के जरिये जमीन की कीमत अदा की जा रही है। जो नहीं शामिल हो रहे उनसे जोर जबरजस्ती का रूख भी अख्तियार किया जा रहा है। ऐसे में भकुआया सा किसान समझ नहीं पा रहा था कि क्या किया जाय, कहां जाय, किससे कहे। सो उसने नियति के आगे हार मानते मुआवजा लेना शुरू कर दिया, जमीनों से हटना शुरू कर दिया। जिसकी परिणति दिखी तमाम किसानों के यहां आई नवधनाढ्यता के रूप में। किसानों ने भी चाहा कि वह क्यों भला अपनी सारी जिन्दगी होम करते रहें। उनके बच्चे भी अच्छी शिक्षा ग्रहण करें, अच्छे से अच्छे कपड़े पहनें, उनके पास भी वो तमाम सुख सुविधायें हों जो औरों के पास हैं। उधर बिल्डरों ने इसे अपने लिये मौका बनाया और औने पौने दामों में जमीनों का मुआवजा देकर जान छुड़ाना शुरू किया और यहीं बात फंस गई।

        सरकारें शांति व्यवस्था के नाम पर बल प्रयोग करता दिखें तो बिल्डर इस शांति व्यवस्था के ताम झाम को अपने लिये सुविधा छत्र के रूप में देखें। नतीजा, दोनों पक्षों में टकराहट, और ऐसे में राहुल गांधी अपनी राजनीतिक जमीन तलाशें न तो क्या करें। पब्लिक भी है, मुद्दा भी है और चुनाव भी। सो कुल मिलाकर बात उचित मुआवजे की रकम को लेकर टिकी है। बिल्डर अपने सपनों को पूरा करना चाहते हैं, किसान अपने सपनों को और शहर अपने सपनों को। शहर यदि गाँवों को लील रहे हैं तो गाँव खुद भी शहर की इस लिलाहट में कहीं न कहीं स्वेच्छा से भागीदार बन रहे हैं, हां कहीं खुशी से तो कहीं जोर जबरजस्ती से। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट अपनी जगह सही है, किसान अपनी जगह और बिल्डर अपनी जगह। गलत है तो केवल ‘नीयत’ जिसके तहत विकास के नाम पर किसानों को कम से कम मुआवजा देकर टरकाया जाता है और बदले में अच्छा खासा मुनाफा कमाया जाता है।

      कामना करता हूँ कि विकास की इस वैतरणी में सभी किसानों को उचित मुआवजा मिले, सभी को अपने सपनों को साकार करने का मौका मिले, सभी लोग खुशहाल रहें। लेकिन वह कामना कैसी जो पूरी हो जाय :)

      फिलहाल तो मेरे मित्र की बरसों की इच्छा पूरी हो रही है। भूमिपूजन से पहले ही तीन फ्लोर बुक हो चुके थे, आगे भी ऐसे ही होने की उम्मीद है। आज अमरनाथ यात्रा के लिये वह मित्र प्रस्थान भी कर रहा है। इच्छा तो मेरी भी थी जाने की लेकिन वक्त पर मैंने रजिस्ट्रेशन आदि नहीं करवाया था, सो अपन फिर कभी जायेंगे......कभी मतलब....फिर कभी  :)


-  सतीश पंचम

Thursday, July 7, 2011

आमंत्रण वाली सामाजिकता

   बुद्धि की मंदता बहुधा सामाजिक अनुदारता के रूप में प्रकट होती है – मुंशी प्रेमचन्द


             यदि प्रेमचन्द जी के उपर्युक्त कथन को वर्तमान फेसबुकीया, ऑरकुट, ट्वीटरीया परिप्रेक्ष्य में जस का तस पढ़ा जाय तो इसमें कुछ विसंगतियां नज़र आनी स्वाभाविक हैं। पहले सामाजिकता का आधार प्रत्यक्ष सम्पर्क में आने वाले लोगों तक सीमित था, उनसे बात व्यवहार के दौरान बाकी सारी लोक-व्यवहार, सांसारिक प्रथा-कुप्रथा सरीखी बातें सामने आती थीं । लोग उन बातों के आलोक में ही अपने निर्णय, अपने सम्बन्धों को निर्धारित-पल्लवित करते थे। समय के साथ उस तरह की सामाजिकता में थोड़ा बहुत बदलना-बिछलना होता रहता था।

            किंतु, वर्तमान फेसबुकिया माहौल, आभासी सामाजिकता के दौर में पहले के मानिंद सामाजिकता को निर्धारित-पोषित नहीं किया जा सकता। यहां मित्र बनाने का बाकायदा आमंत्रण आता है, फॉलोअर बनने न बनने की कवायद निपटानी पड़ती है। यदि आपको इस प्रकार की मित्रता में कोई परेशानी होती दिखे तो उस ग्रुप या सर्कल को आप छोड़ने हेतु स्वतंत्रता भी मिलती हैं। यहां देखने में यह आता है कि अन्जाने, अनचीन्हें लोगों से भी मित्रता का आमन्त्रण आता है। यह आमन्त्रण बहुधा किसी डेटाबेस से उठाकर पूर्व में किये गये किसी कमेंट या थ्रेडिंग से जुड़कर मशीनी ढंग से रैन्डम सजेशन के जरिये मिलता है। जाहिर है, इस तरह के आमन्त्रण आभासी सामाजिकता के दृश्यपटल पर हमें असमंजस में डालने के लिये पर्याप्त हैं। हम या तो ऐसे आमन्त्रणों को अस्वीकार कर सकते हैं या कसमसाहट के बीच स्वीकार कर लेते हैं कि आगे देखा जायगा, जुड़ जाते हैं, क्या फ़र्क पड़ता है।

             लेकिन बात इतनी आसान भी नहीं है। आप अपने ब्लॉग पर लिखते हैं, उसे बाकी साइटों पर सबस्क्रिप्शन के जरिये 'फीडहरी' पहुँचाते हैं, कोई पढ़ता है, कोई नहीं पढ़ता, किसी को अच्छा लगता है तो किसी को खराब भी लगता है। ऐसे में किसी बंदे के लिखे को पढ़ते रहा जाय और इस बीच कहीं से उसी शख्स द्वारा आमंत्रण भेजा जाय कि फलां साइट से जुड़ें तो मन में यह सवाल आना स्वाभाविक है कि यार ये और किससे जुड़ने के लिये कहा जा रहा है ? वैसे ही इतने सारे साइटों से जुड़े हैं, तमाम अकाउंट्स - पासवर्ड पहले ही हमें भंवर में डाले हैं तिस पर और एक अकाउंट....और एक लॉगिन....। इस मैक्सिकन घुड़दौड़ का कोई अंत भी होगा या ऐसे ही अंतहीन जुड़ना-उखड़ना चलता रहेगा। कहीं तो कोई लिमिट होगी कि बस्......इससे ज्यादा साइटों से हम नहीं जुड़ सकते.....इससे ज्यादा अकाउंट और पासवर्ड हम नहीं मैनेज कर सकते। सोशलीकरण जाये तेल लेने।

फिर,

   प्रेमचन्द जी की उस उक्ति का क्या.....जिसमें कि उन्होंने बुद्धि की मंदता को सामाजिकता से जोड़कर दर्शाया है ? तब तो हर आमन्त्रण, हर फॉलोअप का अ-स्वीकृतिकरण असामाजिकता के दायरे में आ जायगा, बुद्धि की मंदता से जोड़कर देखा जायगा ।

      खैर, अपनी बात कहूँ तो बहुत अनमने होकर मैं उन तमाम सोशल साइटों जैसे फेसबुक, ट्वीटर आदि से जुड़ तो जाता हूँ , लेकिन इन सोशल साइटों के सामाजिकता हेतु जिस गर्मजोशी, जिस समर्पण की जरूरत होती है वह मैं अपनी ओर से नहीं दे पाता। एक अर्थ में आलस्य भाव प्रबल रहता है या कदाचित अनिच्छा कहना ज्यादा ठीक होगा। वैसे भी किसी सर्कल से जुड़ने के कारणों में जब केवल जिज्ञासा या एक तरह की देखादेखी वाला भाव प्रबल हो तो वहां अनिच्छा और आलस्य आना स्वाभाविक है। फिर समर्पण तो बहूत दूर की बात है। फेसबुक पर महीने में कभी कभार ही जा पाता हूँ, ट्वीटर पर केवल अकाउंट खोला है, पासवर्ड क्या है याद नहीं, जानने की इच्छा भी नहीं। ऑरकुट पर लॉगिन हुए ढाई-तीन साल हो गये। लिकंडिन से भी कुछ ऐसा ही नाता है। तमाम बाकी साइटों के आमन्त्रण आते रहते हैं लेकिन इच्छा ही नहीं होती जुड़ने की।

         सोचता हूँ प्रेमचन्द जी के समय यदि ट्वीटर, फेसबुक, ब्लॉग आदि होता तो वे जरूर अपनी उस उक्ति को मोडिफाय करते। तब शायद गोदान का गोबर अपने ट्वीट में लिखता - आज होली पर घर जाने का मन है, मालिक छुट्टी नहीं दे रहा। बहुत अनसोशल है :)

   'पूस की रात' में खेत की रखवाली करता अलाव के आगे बैठा हलकू ट्वीट करता - आज बहुत ठंड है, ये पछुआ रांड़ जीने नहीं दे रही।

     उधर फेसबुक प्रोफाइल पर घीसू और माधव आलू भूंज कर खाने के साथ-साथ कैंपेन में कफ़न के बहाने अपनी शराब के लिये जुगाड़ भी कर रहे होते :)

   और तब मजबूरन प्रेमचन्द जी अपनी उक्ति में  बदलाव के साथ संभवत: कहते  - बुद्धि की मंदता बहुधा 'सामाजिक अति-उदारिता' के रूप में प्रकट होती है  :)


 - सतीश पंचम

Tuesday, July 5, 2011

दुपहरीया बतकूचन

- टीम अन्ना.........टीम बाबा.........टीम मनमोहन.....टीम विपक्ष.........सब कोई लोकपाल खा रहे हैं......लोकपाल पी रहे हैं.......लोकपाल ओढ़ रहे हैं......लोकपाल बिछा रहे हैं.........ससुर लोकपाल न हुआ , दसौना-बिछौना हो गया है।

- वइसे ई सिब्बलवा बहुत कलाकार आदमी है.......देखा नहीं कइसे बबवा को थुन्हियाया है।

- अरे त बबवौ बहुत आग मूत रहा था ........ठनढा कर दिया रात भर में.......लेकिन यार.......हुआ तो बहुते गलत...सरकार ससुर मनमानी पर आ गई है..........जिसे देखो........उसी को खदेड़ लेती है।

- अरे त खदेड़े न त का करे.......ससुर जब एस तरफ जाइयेगा तो अनसन औ ओस तरफ जाईयेगा तो फैसन........बताईये सरकार पिछवाड़े लतियायेगा नहीं तो का पूजा करेगा।

- तुम यार सरकार की भाखा बोल रहे हो.........जनता की ओर से बोलने में इतना डरते क्यों हो।

- अरे तो कितने सारे लोग बोल तो रहे हैं जनता की ओर से .........बिपच्छ बोल रहा है.....अन्नौ बोल रहे हैं......लोकपाल वाला केजरीबलवा बोल रहा है........और तो और सोनिया-राहुलौ जनता की ओर से ही बोल रहे हैं.......एक हम नहीं बोलेंगे तो क्या जनता मुरझा जायेगी।

- अब मुरझाये चाहे हरियराये......लेकिन ई सब चक्कर में एक बात जरूर पता चला कि.....लात खाना जनता की कुण्डली में लिखा है....जब रामराज था तब भी परजा को रवनवा लतियाया, किसनकाल में कंसवा परेसान किया था, जो कमी बेसी था उसे इन्नर देउवा पूरा किया कहिके कि गोबरधन मत पूजो इन्नरदेव को पूजो न बारिस कर देंगे हो कर देंगे हा कर देंगे........औ परेसान किया भी.....आगे जाकर मौरकाल में असोकवा ने मार-काट किया , गुप्तकाल में समुद-दर गुप्तवा उधम मचाया..... पबलिकिया क फसल ओसल बरबाद किया.....बिना लिखा पढ़ी के इफरात में जमीन कब्जा किया ...औ उपर से समुद-दर गुप्त प्रसस्तिओ गुदवा कर टांग दिया कि देखो यही है जो तमाम जगै जमीन कबजियाया था........आगे जाकर कभी वर्मन बन्स तो कभी मुगल बन्स तो कभी रानी भिक्टोरिया......सब कोई जनतै का खलरा छोड़ाया है।

- तो का कहते हो कि यथार्थवादी बन कर चुप रह के सब देखते रहा जाय।

- तो अब तक कौन सा आस्तीन मोड़े अंदोलन में सामिल थे।

- नहीं, मेरा कहने का मतलब है कि लेख ओख तो लिख ही सकते हैं......अखबार में.........कालम-कोटर में लिखने का असर पड़ता है भई। सरकार दबाव में आती है।

- अच्छा, ठीक है लिखो, औ तनिक जल्दी लिखो न सरकार कहीं ये न कहने लगें कि तुमने पहले क्यों नहीं लिखा.......लोकपाल का ड्राफ्ट आप ही की वजह से अटका हुआ है...... वो देखो, कपिल सिब्बल आप ही को ढूँढ रहे हैं :)

- सतीश पंचम

Monday, July 4, 2011

नेचर कॉलिंग.......


           हालिया गर्मियों की छुट्टियों में, अप्रैल की इक सुहानी सुबह जब हाथ में कैमरा लिये मैं अपने घर के आस पास की प्राकृतिक छटा को कैद कर रहा था कि, तभी एक मोर खेतों में विचरते दिखा....अभी उसे अपने कैमरे की जद में ले ही रहा था कि दूसरा भी आ गया.....फिर तीसरा...चौथा....देखते देखते मोरों का पूरा कुनबा वहां जुट गया।

        मोरों के इस कुनबे को पिछले साल भी छुट्टियों में देखा था, तब मुर्गीयों की मानिंद ये छोटे छोटे बच्चे जैसों थे। प्रकृति के इस नज़ारे को फिर से देखना मेरे लिये अलग ही अनुभव रहा।

 पेश है वही तस्वीरें......

























       

Friday, July 1, 2011

खेल खिलाड़ी

     यहां पर जो तस्वीरें हैं वो मेरे गाँव के पोखर की है।





















       पांच साल पहले कभी इस पोखर में मछली पाली जाती थी। बच्चे इस पोखर में खूब उछल कूद करते थे। भरी दुपहरीया नहाते, खेलते, एक दूसरे पर पानी उछालते थे।


      समय बदला और सरकारी योजना आई - नरेगा। जिसके तहत इस पोखर को तालाब बनाने का उपक्रम हुआ। तालाब बना भी। बड़ा वाला तालाब। लेकिन बनाने वालों की इंजिनियरी में दोष था या भाग्य का....कि उस तालाब में फिर कभी पानी न जमा हो सका।

         लेकिन बच्चे ? वे अब भी वहां वैसे ही खेलते हैं। फर्क यही है कि पहले उसमें तरी लेते हुए तैरते थे, बुडुक्की मारते थे, अब वहां क्रिकेट खेलते हैं। उन्हें खेलने से मतलब, चाहे नरेगा हो या फरेगा...उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि योजना में किसने कितने रूपये बनाये, किसने कितना अंदर किया। उनका काम है खेलना और खेलते जाना । कुछ कुछ उस उपर वाले की तरह जिसके बारे में कहा जाता है कि वह भी तरह तरह के खेल खेलता है, उसे खेलने में आनंद आता है। उसे बाकी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कहां क्या हुआ...... उसे खेलने से मतलब।

  बच्चों को भी उपर वाले की तरह ही खेल से मतलब हैं, तब भी खेलते थे जब इसमें तरी थी और अब भी खेलते हैं जब उसमें सूखा है।


शायद किसी ने सच ही कहा है - बच्चे, ईश्वर का रूप होते हैं :)

- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

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