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Monday, June 27, 2011

ई माजरा का है 'बे' ?

      पिछले दिनों ऑफिस जाते समय रास्ते में एक जगह नज़र टिक गई। दीवार पर ब.स.पा. का ईश्तहार हाथी के चित्र के साथ नीले रंग में लिखा था -


वोट की ईज्जत कैसी हो
बहू-बेटियों जैसी हो

      पढ़ते ही नारा कुछ अलग सा लगा। अमूमन इस तरह के नारे मुंबई की राजनीतिक फ़िजा में नहीं दिखते। चूँकि मायावती की रैली होनी थी सो राजनीतिक प्रचार आदि के चक्कर में यह सब लिखा गया होगा। लेकिन नारे का अर्थ बड़ा रोचक है कि जिसका यदि विश्लेषण किया जाय तो बड़ा मौजूं पहलू सामने आता है। मसलन, जिस तरह नारे में लिखा है कि अपने वोट को अपनी बहू-बेटी की तरह अपनी ही जाति बिरादरी में देना चाहिये, किसी और जाति में नहीं, तो इसका एक ही अर्थ निकलता है कि जिस तरह अपनी जात बिरादरी वालों के यहां ही बेटी ब्याही जाती हैं, और सजातीय बहू ही लाई जाती है, उसी तरह अपनी जात बिरादरी वालों को ही अपना वोट दें, किसी और को नहीं।

        अब चूँकि मायावती अपनी जातिवादी राजनीति को खुलकर अभिव्यक्त करती हैं, छुपाती नहीं तो जाहिर है उनके नारे भी उसी अंदाज में ओपन होंगे। उसी तरह अपने वोट बैंक को झलकाते दिखेंगे। लेकिन यहां देखने वाली जो बात है वह यही कि किस खास अंदाज में चुनाव जैसी चीज को सामाजिक रीत-रिवाज जैसे चलन से जोड़ कर उसे प्रस्तुत किया गया है, वरना तो अब तक केवल बहिन जी और भाई साहब लोग हाथ जोड़कर ही वोट मांगते नजर आते थे। इस तरह वोट को बहू-बेटी मानकर उसे अपने जात बिरादरी में ही देने जैसी जातिवादी अपील, चुनाव आयोग को ठेंगे पर रखने का एक जरिया भी हो सकता है।

       बहरहाल वो मायावती हैं, बहिनजी हैं। जो भाई साहब लोग थे उन्होंने भी कहाँ कुछ कमी की है। मुलायम, कल्याण, अमर आदि भाई साहबों ने भी जाति को लेकर काफी खेला-खाया हैं। कल्याण सिंह लोध राजनीति को लेकर खुलकर खेले, तो अमर सिंह क्षत्रिय राजनीति को लेकर तो मुलायम अपनी यादव और मुस्लिम के जोर पर प्रधानमंत्री तक बनने का सपना बुन चुके हैं। ये अलग बात है कि महाशय फिलहाल हाशिये पर चल रहे हैं।

         खैर, जातिवादी राजनीति, कब-कहाँ क्या गुल खिलाये कौन जानता है। उधर जगह-जगह मायावती मूर्तियाँ लगवा रही हैं लेकिन गाँव गाँव में लगी आँबेडकर की मूर्तियों की ओर उनका कोई ध्यान नहीं जा रहा। पिछली बार जब गाँव गया था तो एक तस्वीर लेते समय एक रेती-ईंट ढोने वाले ट्रेक्टर का ड्राईवर पास आ गया। मेरे हाथ में कैमरा देख पूछने लगा कि - क्या मैं पत्रकार हूँ ?

      ‘नहीं’ - कहने पर, उसने एक कश बीड़ी का लगाया और बोला – ई गोंसईंया काटिन मूरतीयन त जिउ रोग कई नाये हइन।

( इन मूर्तियों ने तो जी रोग कर दिया है, ‘गोसईंया काटिन’ का अर्थ मुझे भी नहीं पता)

       पूछने पर कि आखिर बात क्या है, तो कहने लगा गाँव में जहां-जहां मूर्ति लगाये हैं सब सड़क के ऐसे ऐसे मोड़ पर लगे हैं कि वहां गाड़ी बैक करने में बहुत सोचना पड़ता है। जरा सा कुछ धक्का धुक्की लग गया तो हुआ बवाल। आस पास के लौन्डे-लपाड़ी जमा हो जाते हैं और लगेंगे परेसान करने मूरती ‘डय-मिज’ के नाम पर। किसी मजबूत घर बालू-इंटा जा रहा होता है तो छोड़ देते हैं न बेमतलब टाईम पास करते हैं। उसके इस तरह से ‘डय-मिज’ कहने पर मुस्कान थिर गई लेकिन साथ ही इस ड्राईवर की मुश्किल देख कुछ अजीब भी लगा।

          कहां, तो एसी कमरों में बैठकर पत्रकार महोदय लोग पॉलिटीकल स्ट्रैटजी बनाते हैं, किसी चौक आदि पर माया की मूर्ति लग जाने पर बवाल काटती रिपोर्टें फड़फड़ाते हैं लेकिन गाँव गाँव में लगी मूर्तियों के चलते होने वाली छोटी-छोटी मुश्किलों पर कोई ध्यान नहीं देते। एक तरह से अच्छा ही है कि वो इन मूर्तियों को लेकर कोई रपट नहीं बनाते न पता चले कि कहीं मूर्ति को कुछ गाड़ी बैक करते धक्का वगैरह लग गया और पत्रकार लोग न्यूज फ्लैश कर दें कि अरे वो हो गया जो अब तक न हुआ। फिर झेलो रेल रोको और सड़क जाम।

             इधर एक और चीज देख रहा हूँ आजकल कि यू.पी. से रिलेटेड खबरें कुछ ज्यादा ही टीवी पर दिख रही हैं। तमाम बलात्कार आदि से संबंधित खबरें कुछ यों फ्लैश हो रही हैं कि जैसे पत्रकार लोग कैमरा लेकर वहीं खड़े हैं, इधर बलात्कार हुआ नहीं कि खबर फ्लैश – यू.पी. में एक और बलात्कार। सारे बलात्कारी क्या यू.पी. में ही पहुँच गये हैं ? पता नहीं क्यों मुझे इस तरह से खबरें लगातार यू.पी. से ही फ्लैश करने को लेकर कहीं से कुछ आशंका सी हो रही है कि क्या पता ये किसी सोची समझी रणनीति का हिस्सा न हो। पता नहीं ये अपराध अब बढ़े हैं या पहले से होते रहे हैं। लेकिन दिखाये अब जा रहे हैं। असल बात क्या है ये तो वो महाशय लोग ही जानें लेकिन जिस अंदाज में यू. पी. की खबरें बाढ़ की तरह फ्लैश हो रही हैं वो दूसरे राज्यों में जा बसे उसके बाशिंदों के प्रति कोई अच्छी छवि नहीं बना रहे। वैसे ही हिंदी-पट्टी के पत्रकारों की बहुलता की वजह से हिंदी-पट्टी की अच्छी खासी बदनाम इमेज है। कुछ ऐसी कि मानों बाकी राज्य शांत हैं, सब जगह राम-राज्य है, केवल हिंदी-पट्टी में ही सब गड़बड़ी होती है। इसमें मायावती के बदनाम प्रशासनिक तंत्र, धनलोलुप इमेज कोढ़ में और भी खाज उत्पन्न करता है। इसी बदनाम इमेज के चलते चिदंबरम जैसे लोगों के मुँह खुलते हैं कि नॉर्थन बेल्ट यदि न होता तो साउथ बहुत ज्यादा विकसित होता।

             खैर, मायावती और काँग्रेस के बीच आगामी चुनावों को लेकर भले ही आपसी घमासान मचा हो, डेली बेसिस पर हो रही घटनाओं को लेकर  पॉलिटिकल माइलेज लेने की होड़ लगी हो, लेकिन फिलहाल उसके साइड इफेक्ट कुछ अच्छे नहीं लग रहे हैं। पत्रकार लोग पत्रकार-पत्रकार खेल रहे हैं, नेता लोग नेता-नेती खेल रहे हैं, बाबा लोग बाबा-बाबी खेल रहे हैं और जनता खड़े खड़ान सोच रही है -
 ई सब का होय रहा है 'बे' ?

- सतीश पंचम

Saturday, June 25, 2011

ठाड़े रहियो 'पाकीज़ा'........

      अक्सर कहीं आते जाते सफर में मैं गानें सुनता हूँ। कभी FM वाले तो कभी अपने मोबाइल की मेमरी कार्ड वाले कुछ सुमधुर गीतों का आनंद लेता हूँ । मेमरी कार्ड वाले गानों को तभी सुनता हूं जब FM चैनलों पर RJ के चपड़ चपड़ से जी उब जाता है। कम्बख्त क्या कहते हैं खुद उन्हें भी न पता लगता होगा, कभी कभी इतना ज्यादा पका देते हैं कि सिर दर्द होने लगता है।

      खैर, अभी हाल ही में नौशाद द्वारा संगीतबद्ध गानों की सीडी लिया और उन गीतों को मेमरी कार्ड में ट्रांसफर भी कर दिया। जब मैं इन गानों को सुन रहा था कि तभी पाकीज़ा के गाने कुछ अलग सुनाई पड़े। ध्यान देने पर पता चला कि इस सीडी में कुछ ऐसे गानें हैं जिन्हें गुलाम मुहम्मद और नौशाद द्वारा शास्त्रीय संगीत का इस्तेमाल करते हुए संगीतबद्ध किया गया था और ये गाने पूरी फिल्म में बैकग्राउण्ड में चलाये गये थे। उन्हें फुल फ्लेज्ड अलग से पाकीज़ा फिल्म में नहीं दिखाया गया या दिखाया भी गया तो बहुत थोड़े से समय के लिये। बहुत संभव है फिल्म में विभिन्न रागों पर आधारित शास्त्रीय गीतों को केवल माहौल रचने के उद्देश्य से रखा गया हों। बहरहाल ऑडियो सीडी में ये गाने पूरी तरह से अपनी मूल समयावधि के साथ सुने जा सकते हैं।

ऐसा ही एक गीत था मज़रूह सुल्तानपुरी का लिखा, परवीन सुल्ताना का स्वरबद्ध किया,  जिसे संगीतबद्ध किया था नौशाद ने .....

कौन गैयली गयो श्याम
बता री सखी....
मोहे राम हो...
कौन गैयली गयो श्याम

     इस गीत के छंद बेहद छोटे हैं लेकिन सुनने में अच्छे लगते हैं। एक और गीत जिसे मज़रूह ने लिखा है और बैकग्राउण्ड में चल रहा था,  बोल थे –

नज़र का वार था...दिल की तड़पन जा लगी
चली थी बर्छ किसी पर...किसी को आन लगी

नज़रीया की मारी....मरी मोरी गुईयाँ
कोई जरा जाके बइद बोला दो
आके धरे मोरे नारी.....
हाय राम
नजरीया की मारी मरी मोरी गुईयाँ


     इन गीतों में जो खास बात लगी वह थी अवधी-भोजपुरी के शब्दों गुइयाँ, बइद आदि का बेहतरीन इस्तेमाल।

कुछ और गीत थे जैसे कि यह गीत जिसे गाया था वाणी जयराम ने....

मोरा साजन सौतन घर जाये
अब मैं कैसे कहूँ
जब मैं पूछूँ....कछुओ न बोले
झूठी कसमें खाये
अब मैं कैसे कहूँ

मोरा साजन......

    ये सारे गीत थोड़े थोड़े अंश में फिल्म में सुनाई पड़ रहे थे। लेकिन बहुत अच्छे लग रहे थे। इसके अलावा जो गीत अपने पूरे रूप में छायांकित किये गये थे वह तो बेजोड़ हैं ही। एक गीत जिसकी शुरूवात मृदंग की थाप से शुरू होती है बहुत अलग सा लगा। जहाँ तक मुझे लगता है कि मृदंग का हिन्दी फिल्मों में ज्यादातर इस्तेमाल ऐसे वक्त पर किया गया है जब किन्हीं के बीच मुकाबले जैसी स्थिति हो। मसलन, चित्रलेखा फिल्म में भी जब चित्रलेखा और एक अन्य नर्तकी के बीच मुकाबला शुरू हुआ तो सीधे मृदंग की थाप से शुरूवात की गई। यहाँ भी वही बात थी। मीना कुमारी को अपने प्रेमी की भावनाओं के साथ साथ अपने भीतर उमड़ते विचारों से संघर्ष करना था, जिसे कि नौशाद ने बखूबी मृदंग की थाप के साथ पेश किया। इस गीत के बोल लिखे थे कैफ़ भोपाली ने और स्वर प्रदान किया था लता मंगेशकर ने -

आज हम अपनी दुवाओं का असर देखेंगे
तीरे नज़र देखेंगे, जख्मे जिगर देखेंगे

प्यार करना दिल-ए-बेताब बुरा होता है
सुनते आये हैं कि ये ख्वाब बुरा होता है
आज इस ख्वाब की ताबीर मगर देखेंगे
तीरे नज़र देखेंगे, जख्मे जिगर देखेंगे


    इस फिल्म के अन्य गीतों के साथ मज़रूह सुल्तानपुरी का लिखा एक और गीत था – ठाड़े रहियो बाँके यार......जिसे गाया था लता मंगेशकर ने,  बोल  थे -

ठाड़े रहियो ओ बाँके यार रे
मैं तो कर आऊँ सोला सिंगार रे
जागे न कोई....नैना हैं छौंड़ी
बोले छमाछम पायल निगोड़ी

निगोड़ी
अजी धीरे से खोलूँगी द्वार रे
सइयाँ धीरे से
हाँ हाँ चुपके से
अजी हौले से....
खोलूंगी द्वार रे


सइयां धीरे से खोलूंगी द्वार रे
ठाड़े रहियो ओ बाँके यार रे

     इस गीत की खूबी यह लगी कि जिस अंदाज में शब्दों को पिरोते समय थोड़ा थोड़ा अंतरा दिया गया वह गीत को बहुत खूबसूरत बना गया। विशेषत जब गाने के बजते बजते ‘निगोड़ी’ शब्द पर जब गीत रूक गया और उसके तुरंत बाद लता के स्वर में कहा गया – अजी धीरे से खोलूंगी द्वार रे......

     फिल्म का अगला गीत बहुप्रचलित है जिसे आप सब ने कई बार सुना होगा। जी हाँ, वही दुपट्टा गीत जिसे बचपन से लेकर अब तक न जाने कितनी बार राह चलते, टीवी पर, नाई की दुकान पर सुन चुका हूँ जिसके बोल लिखे हैं मज़रूह सुल्तानपुरी ने।

 लिखते  हैं –

इन्हीं लोगों ने ले लिन्हा दुपट्टा मेरा


हमरी न मानो बजजवा से पूछो
जिसने अशरफ़ी गज दिन्हा दुपट्टा मेरा
इन्हीं लोगों ने ले लिन्हा दुपट्टा मेरा

   आगे और लोगों से भी गीत में पूछ पछोर हुई जिसमें कि एक रंगरेज को शामिल करते हुए कहा गया -

हमरी न मानों रंगरेजवा से पूछो
जिसने गुलाबी रंग दीन्हा दुपट्टा मेरा

और जब रंगरेज की भी गवाही काम न आई तो अंत में कहा गया .....
हमरी न मानो सिपहिया से पूछो
जिसने बजरीया में छीना दुपट्टा मेरा

     बता दूँ कि यह वही बोल थे जिनकी आड़ में मैंने पिछले दिनों यू.पी.पुलिस द्वारा बढ़ती आपराधिक घटनाओं को लेकर अपनी एक पोस्ट में तंज कसा था कि जिसका जो काम था, सब ने किया....बजाजे को कपड़ा बेचना था तो उसने अशर्फी गज़ कपड़ा दिया, रंगरेज को कपड़ा रंगना था तो उसने गुलाबी रंग कपड़ा रंगा लेकिन सिपाही का ये कौन सा काम था कि बीच बाजार दुपट्टा खेंच लिया।

      खैर, आगे बढ़ते हैं.....एक अन्य लोकप्रिय गीत चलते चलते की ओर जिसके शब्द  कैफ़ी आज़मी ने दिये हैं और अपने आप में तबले की थाप और  घुँघरूओं की खनक के जरिये बखूबी उभर कर चलते-चलते  कहते हैं -

शबे इन्तजार भी आखिर
कभी होगी मुख्तसर भी
ये चिराग़ बुझ रहे हैं
मेरे साथ जलते जलते


यूँ ही कोई मिल गया था
सरे राह चलते चलते

      मेरी राय है कि यदि फिल्म न भी देखी जाय तो कोई बात नहीं, लेकिन पाकीज़ा के गानों की सीडी जरूर सुननी चाहिये जिनके गीतों को लिखा है मज़रूह सुल्तानपुरी, कैफ़ी आज़मी जैसे गीतकारों ने और संगीत से नवाज़ा है नौशाद और गुलाम मुहम्मद जैसे आला दर्जे के संगीतकारों ने। इसके संगीत का ही असर है कि 1971 में जब प्राण को फिल्मफेयर अवार्ड दिया गया तो उन्होंने यह कर कर उसे लेने से इन्कार कर दिया कि इस पर पाकीज़ा के गुलाम मुहम्मद का हक है।

      फिल्म का छायांकन बहुत खूबसूरत है  विशेषत: - मौसम है आशिकाना....गाने के समय बेहद खूबसूरत दृश्य कैमरे में कैद किये गये हैं।

        एक दूसरी बात जो नज़र आई थी फिल्म में वो ये कि मीना कुमारी अपनी बीमारी की चलते ज्यादातर बिस्तर पर ही लेटे लेटे नज़र आई हैं और उसी हिसाब से फिल्म शूट भी की गई है। बहुत संभव है फिल्म की सुस्त रफ्तार में कमाल अमरोही और मीना कुमारी के बीच हुई अनबन का भी असर रहा हो क्योंकि कई जगह मीना कुमारी का चेहरा बहुत फीका सा लगा तो कहीं तरो ताजा भी रहा। उल्लेखनीय है कि लगभग चौदह साल में बनी इस फिल्म के रिलिज़ होने के हफ्ते भर बाद मीना कुमारी की मृत्यु हो गई थी लेकिन जाते जाते उन्होंने एक यादगार फिल्म दे दी।

- सतीश पंचम


Update :-

Friday, June 24, 2011

फ्रायडे फ़ीवर v / s छुट्टी की उलझन

अक्सर देखा गया है कि विकेंड के समय ऑफ़िस से छुट्टी लेने में काफी जद्दोजहद का सामना करना पड़ता है। यह जद्दोजहद तकनीकी कम और मानसिक ज्यादा होती है। उन कंपनियों में जहां पर कि वर्किंग डेज् के बाद हफ्ते में दो दिन की शनिवार-रविवार वाली छुट्टी होती है, अक्सर शुक्रवार के दिन छुट्टी लेना असमंजस खड़ा करता है और जहाँ केवल रविवार वाली छुट्टी होती है वहां शनिवार या सोमवार के दिन छुट्टी लेने में असमंजस का भाव बना रहता है।

इस असमंजस की वजह भी है। छुट्टियों के साथ वाले दिन किसी काम से छुट्टी लेने पर आशंका लगी रहती है कि बॉस क्या सोचेगा.......कलीग्स क्या सोचेंगे ? भले ही आप को वाकई कोई काम पड़ जाय या आप सचमुच ही बीमार पड़ जांय लेकिन एक बार यह भाव आता ही है कि कहीं लोग यूं ही छुट्टी मारना न समझ लें कि महाशय ऑफिशियल छुट्टी के साथ साथ एक अतिरिक्त छुट्टी का आनंद लेना चाहते हैं।

इस सोच के पीछे जहां कुछ पूर्व में हुए अनुभव होते हैं तो कहीं सिनियर की किसी सोच औ नजरिये की भी भूमिका रहती है। एक तरह का मानसिक 'टग ऑफ वार' चलता है कि छुट्टी के साथ छुट्टी लूँ या नहीं :)

वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जब चाहे बेधड़क छुट्टी लेते हैं। उन्हें यदि बीमार पड़ने के नाम पर छुट्टी लेनी हो तो एक दिन पहले से सूरत मुर्दही हो जाती है, रह रह कर खाँसी उठने लगती है। कुछ के बारे में तो यह आशंका ही लगी रहती है कि बंदे ने फोन पर खांसा मतलब कल वो छुट्टी करेगा :)

खैर, लोगों की अपनी अपनी सोच। लेकिन इस चक्कर में मारे जाते हैं असल जरूरतमंद। इधर पिछले कुछ दिनों से अपन की भागदौड़ कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। देर रात तक कस्टमर आदि से रूबरू होना, कभी फलाना जगह तो कभी ढेकाना और कुछ नहीं भी हो तो पीपल का पेड़ तो है ही जिसके नीचे बूँदा-बाँदी झेलते रात दस दस बजे तक बैठकी जमाना :) नतीजतन बीमार पड़ना ही था। और बीमार पड़ा भी कब, आज ठीक शुक्रवार के दिन जिस दिन छुट्टी लेने का मतलब है खुद ही आशंकाओं को न्यौतना :)

सुबह तबीयत कुछ नासाज़ दिखी तो श्रीमती जी ने कहा - जी अच्छा न हो तो रह जाईये..... छुट्टी कर दिजिये। मन ने कहा पहले ......डाक्टर के पास हो आऊँ , क्या पता उसकी दवा गोली ज्यादा अच्छी निकले और वहीं से सीधे ऑफिस निकल लूँ, और छुट्टी की जरूरत ही न पड़े। लेकिन फिर शंका हुई कि क्या पता ऑफिस जाने पर जबर काम पड़ जाय क्लाईंट्स के साथ फील्ड में जान पड़ जाय, तो और मुसीबत। बॉस को sms कर छुट्टी मारने का मतलब है कि एक नई सोच को जन्म देना,,,,,,,और सब बातों के लिये जुबान खुलती है लेकिन इतना बीमार हूँ कि फोन पर बोलने की बजाय उंगलियों से टीप भर पा रहा हूँ......अशक्तता जो न कराये :)

नतीजा - sms के जरिये अपने ऑफिस में इत्तला दे दिया कि साहब नहीं आ रहे हैं........किसी पीपल के पेड़ के नीचे रात दस बजे नम हवा में बैठे थे......जूड़ी धै लिया है।
:)

बाकी आप जानिये कि जो बंदा बीमार है वो इतना सारा मोबाईल पर लिख कैसे पा रहा है :)


- सतीश पंचम


स्थान - मेरे फेमिली डॉक्टर का क्लिनिक।

समय - डॉक्टर के केबिन में अपना नंबर आने जैसा :(

Note: डाक्टर साहब के यहां अपनी बारी का इंतजार करते करते लाईव पोस्ट........

Wednesday, June 22, 2011

ये अमीरही महिलायें

इस समय रात के करीब दस सवा दस बजे हैं। मुंबई के एक पॉश इलाके के क्लब
हाउस के पास ऑफिस के काम से आया हूँ। कुछ सॉफ्टवेयर आदि का झंझटी काम चल
रहा है। फिलहाल डाउनलोड आने में समय लग रहा है। समय बिताने के लिये बाहर
पीपल के पेड़ के नीचे बैठा हूँ। हवा के साथ कुछ बरसाती बुंदा बांदी भी हो
रही है।

उधर क्लब हाउस से ढेर सारी मोटी मोटी महिलायें कसरत करके निकल रही
हैं। ज्यादातर विवाहित ही लग रही हैं। दस बजे शायद क्लब हाउस बंद हो जाता
है। एक एक कर सभी जाकर अपनी महंगी गाड़ियों में बैठ फुर्र से निकलती जा
रही हैं।

कुछ एक दो बतियाये जा रही हैं.......दैट वन बर्न्स मोर देन हंड्रेड
कैलरी.....दैट्स नाईस वन......एस्कलेटर......डम्बल्स.....टां......फा....फूँ.......या.....पता नहीं क्या क्या जिम वाली मशीनों का नाम लिये जा रही हैं। मैं केवल सुन भर पा रहा हूँ, समझ तो आने से रहा।
सोच रहा हूँ कि ये लोग जो रात के दस बजे तक वर्कआउट करके जा रही हैं तो जरूर इनके घर पर नौकरानी वगैरह होगी तभी इतना फुरसत में यहां कसरत कर रही
हैं। पता नहीं अपने बच्चों को कब वक्त देती होंगी, पति को कितना वक्त देती होंगी, घर में इनके सास, ससुर कोई न होगा जिसकी देखभाल आदि की इन्हें चिंता हो।
तभी तो ज्यादातर शाम से दस तक यहीं क्लब हाउस में समय बिताय रही हैं ये मुटल्लियाँ।

सोच रहा हूँ कि यदि यही वर्कआउट, यही कसरत का समय कुछ कम कर घर में
खाना आदि बनातीं तो हो सकता है कुछ न कुछ काया खुद ब खुद कंट्रोल में आ
जाती :) क्लब हाउस मेम्बरी के लाखो रूपये बचते, पति बच्चों को समय देतीं
सो अलग।

एक वो जा रही है.......मर्सिडीज् में बैठकर.....और मैं इधर पीपल के पेड़
तले बने चबूतरे पर अंदर हो रहे डाउनलोड को अगोर रहा हूँ.......गुलज़ार कुछ सुनाओ यार.......यहां तो गिलहरी नहीं है..... न चाँद ही है......हाँ कुछ बादल हैं...... रह रह कर टपकने लगते हैं......कुछ खुद से.....कुछ पीपल के पत्तों से.....।

- सतीश पंचम
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Sunday, June 19, 2011

जलेबी बाई........नत्था.....मीना कुमारी.......ऐ दिग्गिया........... द कोलाज़

( कोलाज में कुछ शब्द अश्लील हैं......वयस्कों के लिये है......और अश्लीलता भी कौन सी....आजकल तो यही शब्द लेकर फिल्मी गाने बन रहे हैं... अन्धे बहरे सेंसर बोर्ड की कुरसियां ऐसे ही नहीं टूटान पर हैं......खैर, उम्मीद है पोस्ट झेल लेंगे : )


रफ़्ता रफ़्ता आँख जिससे लड़ी है......आँख जिससे लड़ी है वो तो बाप से भी बड़ी है......धुत् रे......महबूबा को बाप से बड़ा बता रहा है........बड़ा अहमक इंसान है........फादर्स डे पर इसको ग्रीटिंग कार्ड भेजना चाहिये........वैसे ये नया गाना भी खूब चला है........बाप को गाने में लाकर इसपेसल अंदाज में कहता है साबुन की शकल में बेटा दिखलाया.....बताया......झाग...फाग.... औ अंत में कहता है भाग भोसड़ी के......भई नैका जमाना है.......बाप बेटा जब साथ बइठ के रम औ बीयर ढार सकते हैं तो बाकी सब अंट घंट भी बोल सकते हैं......इसमें काहे का अचरज........बाकि महमूद अपने जमाना में बोल ही चुके हैं बाप बड़ा न भईया......सबसे बड़ा रूपईय्या.........अब तो ससुरा डालरौ चल गया है......

ऐ संगीतज्ञ भोसड़ी जी........आप संगीत बना रहे हैं कि संगीत की माई बहिन
एक कर रहे हैं..........उहौ फादर डे के मउके पर......अए तनिक धीरे धीरे
सपतक आने दिजिए फिर अदबदा के बजाईये........मन करे तो ओ आला बजाईये
जिसमें वहीदा रहमान गाई है पान खाये सईंया हमार........लेकिन तुमसे काहे
बजेगा तुम ठहरे भोसड़ीया घराने के वस्ताद .....


ए सिपाही जी............वो मीनाकुमारी का आप काहे दुपट्टा खिंचे थे पाकीजा फिलिम
में..........गा रही थी इन्ही लोगों ने ले लिन्हा दुपट्टा मेरा......हमरी न मानो सिपहीया से पूछो जिसने बजरीया में छीना दुपट्टा
मेरा.......बताओ......ये कोई अच्छी बात है.........वहीं बजजवा भी था जिसने अशरफी गज के रेट से मीना कुमारी को दुपट्टा दिया था.......औ वहीं रंगरेज था जिसने दुपट्टा रंग दिया.......माने जो कोई था सब अपना अपना काम किये लेकिन तुम पुलिस सिपाही लोगों को काम मिला तो वही दुपट्टा खींचने का ......धुत् .......तभी यहां यू पी में पुलिस बदनाम है....लाईसेंसी भच्छक ......

ए दिगबिजै.......सुनिये तो.......दिगबिजय जी......ताक नहीं रहे......अरे हमरौ सुनिये दिगबिजै जी.......अबहियो नहीं ताक रहे......अच्छा रहो.......ए दिगिया भोसड़ी के.........देखो लक्क से ताकने लगे ......इज्जत देने से लोग धियाने नहीं देते.....तनिक टैट हो जाओ तो लखने लगेंगे.........मुदा हम कहे आज फादर डे है......कुछ कच्छ मच्छ बनेगा कि वइसे ही झूरे झार फादर डे मनाईयेगा........नहीं तो हम आपके फादर के नाम पर थोड़ौ मोरगा खस्सी काटने कह रहे हैं........हम तो उस गाडफादर की बात कर रहे हैं जिसके दम पर तुम छींक पोंक रहे हो........अरे एक दिन ओही के नाम पर सिन्नी बांटो.........लाई चना बांट दो तो भी पुन्न मिलेगा.........क्या कहा भारतीय संसकरीत में बिसवास करने वाले हो......ई सब फादर डे उदर डे नहीं मनाते.........अच्छा तो भोसड़ी के मैं पूछता हूँ
वो जो गाना आजकल चल रहा है भाग भाग भोसड़ी के तो वह भारतीय संसकीरत का हिस्सा है या ऐसे ही जोगीरा गा रहा है.......हांय नहीं मालूम......तब तुमको क्या मालूम यार.......जाओ हम तुमसे नहीं बोलते।

ऐ बे .......चार गो देग औ दू गो कंडाल करीना टेन्ट हाउस से मंगवा लेना......कब किसका अन्डोलन सुरू हो जाय कुछ पता नहीं........ अरे हम अन्डोलन नहीं करेंगे बै.....बाबा ओबा लोग अन्डोलन करेंगे........देखा नहीं जो असल बाबा थे वो पीपली लाईव के होरी के तरह गुमनाम रहे औ अंत में प्राण छोड़ दिये जबकि पूरा मिडिया नत्था टाईप के कैरेक्टर को घेरे
रहा.......नत्था क्या कर रहा है.....सो रहा है....जाग रहा है..... खांस रहा है.....खंखार रहा है सब पीपली लाईव जईसन साच्छात परसारण था .......आखिर होता भी काहे नहीं....घोसणा जो किया था नत्था ने .......लेकिन असल जवान तो है अन्ना हजारे.........जवान कहते है कि जो
पारिवारिक लोग हैं वो सीधे हमारे से नहीं जुड़ेंगे.......उन पर बच्चों की......परिवार की जिम्मेदारी है.....अईसे लोग केवल हमारा समर्थन करें वही बहुत है.......उतने में ही सरकार दबाव में आ जायेगी.....लेकिन वो तो परिवार वाले जिम्मेदारी वाले लोग हैं........अन्ना कहते हैं....बवजूद इसके ये साठ सत्तर वाले बूढ़े लोग तो हमारे साथ मंच पर लड़ सकते हैं.....खाना जेल में भी दो टाईम मिलता है.......घर में खाने से अच्छा उधर खाओ.........

बाकि कौन बेटा चाहेगा कि बाप जेल जाय..... फादर डे .........चाचा डे.......फूफा......मउसा......ताया डे......सब मोहमाया वाले डे हैं रे बांगड़ु.........अरे वो फिर सहदेव का लड़का गाना लगा दिया डेली बेली वाला.......कहो उससे बंद करे.....बहू बेटियों का घर है.........अरे क्या
हुआ.............अरे उससे कहो बहुत अच्छा लगता है भोसड़ी के जइसन गीत तो
एक ठो पुराना वाला के साथ नया जलेबी बाई गाना जोड़ लो जिसमें मुन्नी सीला
के अंत में ठेकवन लगाते हुए कहियो......भाग भोसड़ी- आँधी आई ........सेसंर वाले अन्धे पूछें तो कह देना अमरीकन आन्ही पानी से इन्सपायर्ड गीत है .........जलेबी बाई के सम्मान में......तुम्हारा गाना पास हो जायेगा औ जो
न पास हो तो एक ठो पी आई एल दायर करना जैसा डेली बेली वाले हिरो ने किया
.......... अदालत सेंसर बोर्ड औ फिलान्थरापी.......इन सब को अपने हिसाब
से कैसे हैंडल किया जाता है वह सब फिल्लम वालन से पूछो........ परचार
सिंह ढिढोरचा की पब्लिसिटी एजेंसी झुल्ल मारे.........बाकिर तो जलेबी बाई
जी गुड आफटर नून.........आप लगे रहिये.........पूरा देस आपके साथ है.....मुन्नी सीला तो हईये हैं.........इहां बैठिये...... ए बे टेबल साफ कर.......पानी ला......अच्छे से साफ कर नहीं तो तेरे बाप के पास वापस भेज दूंगा........पइसा कटेगा सो अलग.......वइसे भी आज फादर्स डे है........


- सतीश पंचम

(जाने कौन सी रीत है जो प्राकृतिक, भावनात्मक जुड़ाव जैसी बातों पर भी एक डे मनवाती है)

Saturday, June 18, 2011

तीन ठरकी बूढ़े.....उनकी रंगीनमिजाजी.......यानि कि...... शौकीन (1982)

     बासु चटर्जी की कुछ फिल्में बड़ा अलहदा विषय लेकर बनी हैं जिनके बारे में अक्सर समीक्षकों और फिल्म प्रशंसकों के बीच चर्चा रही है। ऐसी ही एक फिल्म थी 1982 में बनी 'शौकीन' जिसके मुख्य किरदार थे अशोक कुमार, उत्पल दत्त, ए.के.हंगल। इन तीनों ने इस फिल्म में तीन 'ठरकी' बूढ़ों की भूमिका निभाई है जो कि थोड़े रंगीन मिजाज के हैं। आज सुबह यही फिल्म डीवीडी पर देख रहा था।


      समरेश बसु के द्वारा लिखी कहानी पर बनी इस फिल्म का कथानक कुछ यूं है कि तीनों मित्रों में से साठ वर्षीय ओम प्रकाश चौधरी ( अशोक कुमार) कांट्रेक्टर का काम करते हैं और अपनी इस साठ साल की उम्र में खिड़की पर खड़े होकर आती जाती महिलाओं को चश्मा बदल बदल कर निहारा करते हैं। एक दूर का चश्मा, एक नजदीक का। इत्र फुलेल का शौक तो खैर है ही। डॉ. भास्कर के अनुसार उन्हें सिगरेट और शराब से दूर रहना चाहिये। लेकिन अपनी पत्नी और डॉक्टर के समझाने के बावजूद वह यदा कदा अपने सिगरेट और शराब के शौक को अपने दोस्तों जगदीश (उत्पल दत्त) और इंद्रसेन (ए के हंगल) के साथ पूरे करते रहते हैं।


      उनके दोस्त भी कम नहीं हैं। जगदीश और इंद्रसेन दोनों ही की पत्नियों का निधन हो चुका है। जगदीश जिनके कई घर किराये पर चलते हैं अक्सर अनुराधा नाम की एक नि:संतान विधवा की ओर लपलपाये दिखाई देते हैं। एक तारीख के आने के पहले ही खुद को खूब सजाने संवारने में जुट जाते हैं, हिम्मत बंधाते हैं लेकिन जैसे ही एक तारीख आती है वह हर महीने की तरह इस महीने भी अनुराधा के यहां जाने पर एक कप चाय पीते हैं, रूपये लेते हैं और रसीद थमा देते हैं। हां, इतनी कोशिस जरूर करते हैं कि रूपये लेते समय और रसीद देते समय उंगलियां अनुराधा के हाथों को स्पर्श कर जांय। उनकी यह कोशिश भी कभी कभी नाकाम हो जाती है जब अनुराधा रसीद लेते वक्त चुटकी से रसीद यूं पकड़ती है जैसे उसके हाथ गीले हों, कहीं छू न जाय। ऐसे में जगदीश महाशय कट कर रह जाते हैं।

     दूसरी ओर उनके दूसरे मित्र इंद्रसेन जो कि खुद को एंडरसन कहलाना पसंद करते हैं और उसी तरह अंग्रेजी वेशभूषा में रहते हैं अक्सर अपनी सेक्रेटरी से फ्लर्ट करने की कोशिश में नजर आते हैं। फिल्म देखने जाने पर सेक्रेटरी के हाथों को कुर्सी के हत्थे के जरिये छूने की कोशिश करते हैं लेकिन ज्यादा कुछ सफल नहीं हो पाते।

          ऐसे में ही एक दिन ओमप्रकाश चौधरी (अशोक कुमार) की पत्नी तीर्थ यात्रा पर जाती है। दस बारह दिन के लिये चौधरी को मुक्ति मिल जाती है। ऐसे में एक शाम तीनों ही दोस्त शराब पी रहे होते हैं और एक दूसरे को अनुराधा और सेक्रेटरी लाली की बात उभार कर छेड़ रहे होते हैं कि तभी अशोक कुमार अपने एक अनुभव को शेयर करते हुए कहते हैं कि जब वह एक बार नासिक के डाक बंगले में ठहरे थे तो चौकीदार को किसी मालिश आदि का इंतजाम करने को कहा क्योंकि बिना मालिश के उन्हें नींद नहीं आ रही थी। चौकीदार ने कुछ गलत समझा और एक स्थानीय युवती को भेज दिया। अब अशोक कुमार असमंजस में पड़ गये। कभी इस तरह का कोई अनैतिक काम किये नहीं, आगे हिम्मत हो नहीं रही सो किसी तरह उस युवती को पैसे आदि देकर टरकाया।

   जब अशोक कुमार यह बात बता रहे थे तो दोनों मित्र बड़े ध्यान से सुन रहे थे। इसी बीच जगदीश की अकुलाहट देखते बन रही थी। फिर क्या हुआ फिर क्या हुआ वाला भाव था उत्पल दत्त के चेहरे पर। उदर ए के हंगल भी कुछ उसी मूड में आ गये और तीनों ने तय किया कि शहर से बाहर चल कर कुछ दिन ऐश किया जाय। अशोक कुमार ने भी हामी भरी। लेकिन जगदीश (उत्पल दत्त ) की जिद थी कि उसी नासिक वाले डाक बंगले में चलो, अनुराधा न सही....कुछ तो मिलेगा। लेकिन अशोक कुमार के यह कहने पर कि काफी पुरानी बात है ये अब वह लड़की वहां होगी भी या नहीं, कहीं और चला जाय। इस बीच गाड़ी के लिये ड्राईवर की जरूरत होती है, ऐसा ड्राईवर जो इन तीनों ठरकी लोगों की पोल न खोले। इसलिये नया ड्राईवर रखा जाता है जिसकी कि भूमिका मिथुन चक्रवर्ती ने निभाई है।

        मिथुन का कथानक कुछ ऐसा है कि उसकी गर्लफ्रेण्ड गोवा में एक होटल में गाना गाती है और वह खुद बेरोजगार होकर बंबई में पड़ा है। पंदरह दिन बाद उसका इंटरव्यू है और तब तक उसे कोई काम नहीं होता। ऐसे में कुछ दिनों के लिये मिथुन चक्रवर्ती ड्राईवर बनने के लिये तैयार हो जाते हैं। इधर तीनों ही दोस्तों में तय नहीं होता कि कहां के लिये आउटिंग की जाय। कोई अजंता एलोरा कहता है तो कोई माउंट आबू। उत्पल दत्त भड़क जाते हैं कि हम क्या विदेशी हैं जो इस तरह के जगहों पर जांय। चलना है तो उसी नासिक वाली जगह पर चलो। तभी मिथुन चक्रवर्ती (ड्राईवर सखाराम) चालाकी से सलाह देता हैं कि क्यों न आप लोग गोवा घूम लें। और सभी लोग उसकी बात मान गोवा चलने को तैयार हो जाते हैं। सखाराम भी खुश कि इसी बहाने अपनी गर्ल फ्रेण्ड से मुलाकात भी हो जायगी। आठ दस दिन साथ रहेगा सो अलग।

        लेकिन यहां कहानी ट्वीस्ट हो जाती है। सखाराम अपनी गर्लफ्रेण्ड अनीता (रति अग्निहोत्री) से इन तीनों को मिलवाता है, रहने का ठिकाना सखाराम अपनी गर्लफ्रेण्ड अनीता के पास वाले बंगले में ठीक करता है लेकिन ये तीनों बूढ़े उस अनीता पर ही नजरें गड़ा देते हैं। अनीता से तीनों नजदीकी बढ़ाते हैं। उधर अनीता इन नजदीकियों के चलते अपने प्रेमी सखाराम से मिलने का बहाना सोच इन बूढ़ो को थोड़ा सा फ्रैण्डली लुक देती है लेकिन ये बूढ़े उसे कुछ और समझ अपनी प्यास मिटाने का साधन मानने लगते हैं। रसोई का काम अनीता के जिम्मे होता है। इसलिये तय होता है एक दिन दोपहर में अशोक कुमार रूकें और बाकी दोस्त बाहर सखाराम को लेकर घूमते रहें। इस बीच अशोक कुमार मौका तलाशें और अपना उद्देश्य पूरा करें।

       इस उद्देश्य से एक दिन उत्पल दत्त और ए के हंगल सखाराम को ले बाहर जाते हैं और अनीता के साथ घर में केवल अशोक कुमार रहते है। पांच छह घंटों के इस सानिध्य के दौरान अशोक कुमार विभिन्न प्रकार के विचारों से दो चार होते हैं। कभी अपनी पत्नी का भय तो कभी बदनामी का डर तो कभी कुछ। इस बीच अनिता के साथ थोड़ी वाईन आदि पीकर पियानो बजाकर पांच छह घंटे गुजार देते हैं। उधर सखाराम के साथ लौट कर आये उत्पल दत्त और ए के हंगल बार बार पूछते हैं कि क्या क्या हुआ...कैसे हुआ। अशोक कुमार शेखी मारते हुए हंसते हुए अपनी सफलता की बात कहते हैं और दोनों मित्र अशोक कुमार के अनुभव सुनाने के बाद अनीता के साथ अपने भावी आनंदमय क्षणों के बारे में सोच -सोच रोमांचित होते हैं। अगले दिन उत्पल दत्त घर पर रूकते हैं और ए के हंगल और अशोक कुमार बाहर सखाराम के साथ जाते हैं। सखाराम को बुरा लगता है कि ये क्या बेहूदगी है। लेकिन क्या करे, नौकरी तो बजानी थी। सो दोनों को बाहर ले जाता है।

      इधर घर में उत्पल दत्त बीड़ी न जलाकर सिगरेट जलाते हुए प्रभाव जमाना चाहते हैं, अनीता के निकट जाना चाहते हैं लेकिन अनीता नींद का बहाना कर अपने कमरे में सोने चली जाती है। उत्पल दत्त उसके कमरे में जाकर असमंजस में हैं कि अब क्या करे। सीगरेट बुझने पर बीड़ी जला लेते हैं, थोड़ी चहलकदमी करते हैं और ऐसे ही पांच छह घंटे बीत जाते हैं। दोनो मित्रों के वापस आने पर शेखी मारते हैं कि वह जो चाहते हैं सब मिला। आनंद आया वगैरह वगैरह।

          अगले दिन ए के हंगल की बारी होती है। वह भी कुछ इसी तरह के दौर से गुजरते हैं। पांच छह घंटे शराब पीने में गुजार देते हैं। दोनों मित्रों के वापस आने पर जब पूछा जाता है कि क्या कैसे तो ए के हंगल सच बोल देते हैं कि कहीं कुछ नहीं हुआ। पांच छह घंटे शराब पीते और सोते हुए बीता है। ए के हंगल की सच्चाई के बाद अशोक कुमार भी अपनी सच्चाई बताते हैं कि वह भी उस दिन कुछ नहीं किये थे केवल शराब पीने में और बातों बातों में ही समय बिताया था। उत्पल दत्त ने भी सच उगल दिया। लेकिन उन तीनों को शक होता है कि सखाराम कहीं हम लोगों को जान बूझकर तो नहीं ले आया यहां और अनीता के साथ फोटो खिंचकर ब्लैकमेल करने का इरादा तो नहीं। आशंका घर कर जाती है और बातचीत में ही पोल खुलती है कि सखाराम दरअसल रवि है और उसकी गर्लफ्रेण्ड अनीता के साथ नजदीक रहने के लिये उसने गोवा का प्लान बनाया था। ब्लैकमेल करने का उसका कोई इरादा नहीं था।

          सच्चाई जान तीनों बूढ़े अपने गलती का एहसास करते हैं। अशोक कुमार के जरिये फिल्म में यह संदेश भी कहलवाया गया है कि जवानी सिर्फ जवानों के लिये होती है और उसे बूढ़ों को अपनी फैंटसी के लिये इस्तेमाल नहीं करना चाहिये। हर उम्र की अपनी गरिमा होती है। फिल्म का अंत सुखांत है।

         फिल्म के कुछ दृश्य वयस्कों के लिये ही उपयुक्त हैं, साहित्यकार 'शानी' द्वारा लिखे संवाद भी कमोबेश कुछ असहजता उत्पन्न करते हैं, विषय ही ऐसा है। एक दृश्य ऐसा है जिसमें अशोक कुमार लुन्गी पहने हुए समुद्र के किनारे हैं और अनीता जिद करती है कि लुंगी उतारकर पानी में उतरिये लेकिन अशोक कुमार मना कर देते हैं क्योंकि उन्होंने लुंगी के भीतर कुछ नहीं पहना है। ऐसे में एक दिन अनीता अशोक कुमार के लिये चड्ढी लेकर आती है और उनसे जिद करती है कि इसे पहनो। उधर उत्पल दत्त धोती पहने हुए समुद्र के पानी में उछल कूद मचाये रहते हैं।

          इस फिल्म को बच्चों के सामने देखने पर थोड़ी असहजता होना लाजिमी है, इसलिये हो सके तो उनके सामने देखने से बचें। वैसे इस फिल्म का वो गीत काफी कर्णप्रिय है जो कि पूरी फिल्म में कई बार अशोक कुमार के लिये बजा है जब वह चश्मा बदल बदल कर युवतियों को निहारते हैं.... बोल हैं -


जब भी कोई कंगना बोले,
पायल छनक जाये
सोयी सोयी दिल की धड़कन
सुलग सुलग जाये
जब भी कोई कंगना बोले,


चंदा को चकोर निहारे
इसी में सुख पाये रे पाये
इसी में सुख पाये
जीवन से ये रस का बंधन
तोड़ा नहीं जाये
जब भी कोई कंगना बोले

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- सतीश पंचम

Thursday, June 16, 2011

कटहल गाथा

    पिछले कुछ दिनों से मुंबई में झमाझम बारिश हो रही है और साथ ही जगह जगह पके कटहलों के ढेर भी लगे दिख रहे हैं। यूँ भी पके कटहल ज्यादातर बरसात के दौरान ही बाजार में आते हैं। रोज ही इन कटहलों को देखता, उनकी ओर आकर्षित होता लेकिन फिर न जाने क्या बात होती कि बिना लिये ही कतरा कर निकल जाता।

      लेकिन आज शाम कुछ यूँ हुआ कि बारीश के बीच जब ऑफिस से घर आ रहा था तब
यूँ ही श्रीमती जी को फोन किया तो पता चला वह भी मार्केट में ही सब्जी लेने आई हैं। सीधे मार्केट पहुँचा। खरीददारी के दौरान पके कटहलों पर नज़र पड़ी, मन ललचा और खरीद लिया। अब समस्या आई कि उसे घर कैसे ले जाया जाय। बारिश के वक्त जहां एक हाथ में छाता, दूसरे में सब्जी की थैली और पीठ पर एक अढ़ईया का लैपटाप था ऐसे में कटहल कैसे ले जाया जाय। उधर श्रीमती जी के भी एक हाथ में सब्जी की थैली और दूजे हाथ में छाता था।

    तय किया कि घर पहुँचकर लैपटॉप को पहले सुरक्षित रख दूँ उसके बाद ही लौटकर कटहल ले जाउँ। मन ही मन झुँझलाया कि नाहक मुसीबत मोल ली, लेकिन अब ले लिया तो ले लिया।
घर पहुँच कर नाश्ता करते टीवी देख रहा था कि तभी श्रीमती जी ने कहा - कटहल खरीदना तो महंगा पड़ गया।

क्यो ? क्या हुआ ?

मेरे एक पैर की पायल कहीं रास्ते में ही गिर गई है।

    ये तो वाकई कटहल खरीदना महंगा पड़ गया। चांदी की एक पायल मतलब हजार रूपये  भी पकड़ो तो नब्बे रूपये का कटहल जोड़-जाड़कर तकरीबन ग्यारह सौ रूपये का पड़ा। अब वापस मिलने से रहा। वैसे ग्यारह सौ का कटहल मजईत रकम है। किसी पूजा-पाठ या दान दक्षिणा के न्योछावर-नेग की तरह का।

    उधर श्रीमती जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं इधर मुझे हंसी आ रही थी। यह देख श्रीमती जी झुंझलाते हुए बोलीं - एक तो संझा के समय लछमी जी के आने के टाईम धन का नुकसान हो गया और आपको हंसी आ रही है। लछमी जी के आने का टाईम ? रोचक टाईमिंग है। खैर, लछमी जी को आना होगा तो फिर आ जायेंगी, अभी तो चलूँ , वहां गियारह सौ वाला कटहल अगोर रहा है।
भुनभुनाते हुए श्रीमती जी किचन में गईं, जरूर मन ही मन सोच रही होंगी कि काहे आज बाजार गईं। वैसे भी महिलायें गहनों से कुछ अधिक लगाव रखती हैं।

  मन में था कि इस बारिश में कौन जाय, कल ले आउं कटहल, भागा थोड़े जा रहा है, किंतु कुछ पायल की व्यग्रता, कुछ अहमक मन,  थोड़ी देर में चाय वाय पीकर फिर छाता उठाये चल पड़ा। साथ में एक प्लास्टिक की छोटी बोरी भी ले लिया कि उसी में लपेटकर लाउंगा वरना कटहल का दूध कपड़े खराब कर देगा। जाते जाते श्रीमती जी ने याद दिलाया कि रास्ते में देखते जाईयेगा क्या पता किसी की नजर न पड़ी हो।
 
   मैं मन ही मन श्रीमती जी के इस घनघोर आशावाद पर मुस्करा पड़ा, छेड़ते हुए कहा - हाँ, दुनिया के सारे चोर चाईं आज हड़ताल पर जो हैं, पायल वैसे ही  पड़ी होगी। श्रीमती जी को मैंने जाते-जाते टहोका तो जरूर लेकिन मन ही मन इस फेर में भी रहा कि क्या पता सचमुच ही पायल पर किसी की नजर न पड़ी हो और वह मिल जाय।

   हांलाकि यह उम्मीद एक पर्सेंट से ज्यादा की नहीं थी लेकिन उम्मीद तो उम्मीद होती है। किसी बात की थोड़ी सी भी उम्मीद इंसान के व्यवहार में कुछ न कुछ चौकन्नापन और तनिक सा व्यवहार में बदलाव जरूर लाता है । वही मेरे साथ रास्ते भर हो रहा था। जा तो रहा था कटहल लेने लेकिन ध्यान पायल पर था। रह रहकर सड़क पर नीचे की ओर ताकते चल रहा था। छतरी के वजह से सड़क पर नीचे देखने में सहायता भी मिल रही थी वरना कोई परिचित देखता तो जरूर
पूछता कि इतना सिर झुकाये काहे चल रहे हो।

   इधर कटहल की दुकान नजदीक आते जा रही थी और पायल मिलने की उम्मीद क्षीण होती जा रही थी। होते होते वह कटहल की दुकान भी आ गई लेकिन पायल नहीं मिली। अब क्या हो। कटहल लो और लौटो। वही किया, लेकिन कटहल मुझे उम्मीद से कुछ ज्यादा ही भारी लगा। उसे हाथ में लटका कर लाना संभव न था। हाथ बदल बदल कर लाने के बावजूद थोड़ी ही देर में कटहल जमीन छूते हुए लेथराने लगता। उपर से दूजे हाथ में छतरी भी पकड़नी थी। थक कर मैंने छोटे वाले प्लास्टिक की बोरी में लिपटे कटहल को मुगदर की तरह कंधे पर रख लिया और कटहल का डंठल पकड़ने के काम आया। कुछ यूँ लग रहा था जैसे हनुमान जी की तरह गदा लेकर चल रहा हूँ। कंधे पर कटहल रख लेने से हाथों को काफी राहत मिली, लेकिन इस तरह कंधे पर कटहल लेकर चलना मुझे अजीब लग रहा था। यहां एक बात मैंने नोटिस की है कि पढ़े लिखे लोगों के द्वारा सामान आदि उठाने के तरीके में और कम पढ़े लिखे लोगों द्वारा सामान उठाने के तरीके में अंतर होता है। जो तनिक पढ़े लिखे होते हैं वह कभी भी सामान उठाकर अपने कंधों पर या सिर पर नहीं रखते, संभवत इसके पीछे हल्की सी शर्म और मजदूरों सरीखा न दिखने की मानसिकता काम कर रही हो, जबकि मजदूर वर्ग इस तरह की बाध्यता में नहीं जीता। वह अपने सामान को उठाकर उसे अपने शरीर पर सुविधानुसार रख कर ढोता है, उसे किसी किस्म की हिचक नहीं होती, शर्म नहीं लगती।

   खैर, मैंने छतरी की आड़ का लाभ उठाया और हनुमान जी के गदा की तरह कंधे पर कटहल ले वापस लौटने लगा। अबकी फिर पायल की बात जेहन में आई और रह रह कर सड़क के रास्तों पर नजर मार लेता। अपने इस अजब रूप पर मुझे मन ही मन जहां एक ओर हंसी आ ही रही थी तो साथ ही कुछ गाने भी याद आ रहे थे जिनमें कोई प्रेमिका अपने प्रेमी से बाला ढूँढवा रही होती है तो कहीं बरेली-गाजीपुर में झुमका-कंगना गिरा रही है। संभव है कईयों ने ढूँढा भी हों, लेकिन मुझे नहीं लगता कभी किसी हीरो ने भारी बारीश में कटहल ढोते हुए झुमका, बाला औ कंगन-पायल ढूँढा हो :)

   खैर, पायल न मिलना न मिला। गुम तो गुम। किंतु कालीदास यदि मेरी यह दशा देखते तो जरूर एक और मेघदूतम् की रचना करते जिसमें काले मेघों की गर्जन तर्जन के बीच बंदा कांधे पर कटहल रख नायिका के पायल ढूँढता है। कितना सुंदर और विलक्षण दृश्य होता। लोग कालीदास की मेधा का लोहा मानते सो अलग। किंतु हाय रे टाईमिंग।

    कालीदास जी, You, ve missed the classic opportunity :) Please come  to Mumbai. You may find some more stuffs like ग्यारह सौ रूपये का कटहल OR  मुंबईया ढुँढ-ढाँढ :)
- सतीश पंचम

Sunday, June 12, 2011

एनडीटीवी के रवीश कुमार की रिपोर्टिंग v / s मदिर-मीडिया फैसले

कभी मैंने कबीर जी की साखी पढ़ी थी जिसमें वह कहते हैं कि

सांचै कोइ न पतीयई, झूठे जग पतिपाय।
गली-गली गो रस फिरे, मदिरा बैठ बिकाय।।

जिसका भावार्थ है कि लोग सच के महत्व को नहीं मानते, अब ध्यान नहीं देते, उन्हें झूठ पर ही पूरा भरोसा है, इतना कि, लोग तो झूठ बैठे बैठे खरीदने को तैयार हैं। यह कुछ वैसा ही है जैसे कि गो रस यानि दूध और दही को बिकने के लिये गली गली घूमना पड़ता है लेकिन मदिरा बैठ-बैठे बिक जाती है, उसे बेचने के लिये गली गली नहीं घूमना पड़ता।

मुझे कबीर की कही यह साखी आज फिर याद आई जब सुना कि एनडीटीवी ने अपने
गली गली घूमने वाले पत्रकार रवीश कुमार की रिपोर्ट को बंद करने का फैसला
किया है, वही जमीनी रिपोर्टें जिनमें कि आम आदमी के जीवन से जुड़ी ऐसी
सच्चाईयां झलकती थीं जिन्हें अंगरेजी का पत्रकार दिखाने में अपनी तौहीनी समझता है। नरेगा के नाम पर दबंगों की नामावली वाला रजिस्टर हो या गरीबी रेखा से नीचे नाम प्रविष्टी की पेचिदगी, या फिर किसी सीवर में धंसते शहर की सच्चाई, हर एंगल रवीश की रिपोर्ट से बखूबी दिख रहा था, उघेड़कर दिखलाया जा रहा था कि देखो कैसे दो रूपये में बिस्कुट से रिक्शावाला पेट भरता है,
कैसे एक ही थाली में दो जिलों के मजदूर पेट बंटाते हैं, (हाथ तो खैर
बंटा ही रहे हैं)।

न जाने क्या वजह रही एनडीटीवी द्वारा रवीश की रिपोर्टें बंद करने की
जबकि इसी के सहयोगी चैनल एनडीटीवी गुड टाईम्स से अब भी ठाट से मदिरायन
वाले, महंगे महंगे होटलों में शैपेन, स्कॉच का आनंद लेते महंगे कपड़ों से
सजे धजे सांघवी के शो, थापर के शो दिखाये जाने में कोई मुश्किल नहीं
होती। वही शो, जिनमें एलीट क्लास के बनावटी हाव भाव को जमकर परोसा जाता है। हर बात में बनावटी शिष्टाचार को कीमती क्रॉकरी सेटों और रंगीन परदों
की ओट में दिखाया जाता है कि देखो अमीर तबके ऐसे रहते हैं, ऐसे खाते पीते
हैं। शायद रवीश से यह गलती हो गई कि उन्होने क्रॉकरी सेट और रंगीन परदे,
रंगीन सज धज दिखाने की बजाय उन कपड़ों को बनाने वालों पर अपना फोकस कर दिया। दिखा दिया कि देखो जो कपड़े आप इन अमीरों को पहने हुए देख रहे हैं,
जो परदे लहरा रहे हैं, उनको बनाने वाले कैसी तंगहाली में जीते हैं, कैसे अपने फेफड़ों में जहरीले रसायनों के बेल बूटे सजाते जा रहे हैं, और कैसे इन कपड़ों को रंगीन करने में अपनी ही ज़िंदगी से बदरंग होते जा रहे हैं।

खैर, यह व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा का दौर है, टी आर पी की मार काट का
दौर है, डिप्लोमेटिक फैसलों का दौर है। ऐसे में रवीश की रिपोर्ट किस
डिप्लोमेटिक आंच की भेंट चढ़ गई ये तो एनडीटीवी के लोग ही बेहतर जानते
होंगे, लेकिन इतना जरूर है कि रवीश की रिपोर्ट बंद करने के फैसले से
एनडीटीवी ने अपनी बची खुची विश्वसनीयता को और भी गहरे धकेल दिया है। और भी गहरे इसलिये, क्योंकि पहले ही नीरा राडिया से कनेक्शन का साया उसे अविश्वसनीयता के गर्त में धकेल चुका है। ऐसे में जमीनी सच्चाई से रूबरू
कराते रवीश की रिपोर्ट को खोने का मतलब है कि एनडीटीवी की उल्टी गिनती और भी तेजी से गिनी जा रही है,
रवीश जैसे जमीनी हकीकत को बंया करते शख्स के कार्यक्रम को बंद करने
के फैसले के प्रति मेरी कड़ी आपत्ति है ।

- सतीश पंचम

स्थान - मुंबई

समय - रात के ग्यारह - दस्स।

(Nokia c- 3 से लिखने के कारण शब्द गद्य की पटरी छोड़ कहीं कहीं पद्य की पगडंडी पकड़ते दिख रहे हैं। उम्मीद है आप लोग पगडंडी झेल लेंगे :)

Sunday, June 5, 2011

रामदेव प्रकरण.........यानि कि ..... 'ट्रेजेडी ऑफ एरर्स'

       एक आम इंसान के तौर पर मुझे रामदेव के गिरफ्तार होने, उनके आंदोलन के सरकारी तंत्र द्वारा कुचल दिये जाने का थोड़ा बहुत दुख जरूर हो रहा है लेकिन इतना नहीं जितना कि चारों ओर बताया जा रहा है कि यह देश के साथ धोखा है, ये आम जनता के साथ, आम इंसान के साथ किया गया विश्वासघात है...bla bla bla. फिलहाल जो कुछ रामदेव प्रकरण को लेकर हुआ, जो कुछ अभी हो रहा है वह सब यदि भीड़ तंत्र से अलग रहकर देखा जाय, सोचा जाय तो यह और कुछ नहीं, बल्कि किसी की निजी महत्वाकांक्षा, किसी का सरकारी दम्भ, किसी की मौका परस्ती, किसी के बदला लेने के नीयत आदि का मिला जुला एक कोलाज भर है जो कि लोकतंत्र के नाम पर इतिहास की कलुषित दीवारों पर पोस्टर के रूप में अब चिपक सा गया है।

        सबसे पहले यदि बाबा रामदेव को ही लें तो उनके बारे में जो कुछ अब तक जाना है, समझा है वह यही कि एक योग साधक हैं जिन्हें कि अपने योग क्षेत्र को बढ़ाने, फैलाने, उसे सबके बीच ले जाने की बड़ी इच्छा है। उनकी इस इच्छा में कोई बुराई भी नहीं है, होना भी चाहिये, सब को योग का लाभ मिले, सब लोग आयुर्वेद की ओर बढ़ें इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। लेकिन मुश्किल तब खड़ी होती है जब यही योग कार्पोरेट स्टाईल से लोगों के बीच परोसा जाता है। कार्पोरेट स्टाईल से सारा कुछ मैनेज किया जाता है। एक बार यदि यह मान भी लूं कि कार्पोरेट स्टाईल आज की मजबूरी है, एक तरह का साधन मात्र है तो भी यह तो कहीं से उचित नहीं लगता कि जन-जन के बीच योग ले जाने का दम भरते-भरते उसे उसी जन से दूर कर दिया जाय यह कहते हुए कि योग शिविर में आगे की रो में बैठोगे तो इतनी फीस देनी होगी, थोड़ा पीछे बैठोगे तो कम फीस देनी होगी, और पीछे बैठे तो और कम।

     यानि, यदि आपके पास पैसे हैं तो, दे दो पांच हजार रूपये हमारे नज़दीक बैठने के, ले लो पहली रो का टिकट । यदि नहीं हैं तो थोड़ा दूर बैठो, काहे को यहां जमघट लगा रहे हो। अब ये तो कोई भी समझ सकता है कि जो आम इंसान अपनी हाड़ तोड़ मेहनत करके, पाई पाई जोड़ कर महीने के दस-पन्दरह हजार कमाता है, वह किसी भी हालत में सिर्फ इसलिये पांच हजार तो खर्च नहीं करेगा कि आगे बैठने को मिले। यह तो वही लोग कर पाएंगे जिनके पास महीने की आठ- दस लाख की इन्कम होगी। और जहां तक मैं समझता हूँ ये महीने के चार-पांच लाख कमाने वाले लोग जन-जन की श्रेणी में कत्तई नहीं माने जाएंगे, क्योंकि जन-जन की कैपेसिटी कुछ अलग है। भला सोचिये कि जिस 'जन-जन' की बात की जाती है वह जब गैस के रेट बढ़ने के साथ हलकान हो जाता है, प्याज के रेट तेज होने पर प्याज खाना छोड़ देता है, वह भला क्या सोचकर योग शिविर के आगे के रो में बैठने के लिये पैसे देगा।

     खैर, बाबा रामदेव का उद्देश्य अच्छा जरूर है लेकिन उसके 'साईड-फाल्स' कुछ जम नहीं रहे। यदा-कदा उनका बड़बोलापन झलक ही जाता है। संभवत: मीडिया भी उनके इसी बड़बोलेपन का लाभ उठाकर मुरब्बा-अचार की तरह बतौर ऐडीशनल न्यूज परोसने की आदी हो चुकी है।

     अब सवाल यह उठता है कि इस पूरे मामले में तब सरकार की भूमिका क्या है ? क्या सरकार ने जो किया वह ठीक किया ?

      नहीं, सरकार के इस हरकत को ठीक तो किसी भी तरह से नहीं मानूंगा लेकिन इस सब कुटिलता को अपनाने के अलावा सरकार के पास रास्ता भी तो कुछ नहीं बचा था। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि बाबा रामदेव का आंदोलन प्रत्यक्ष रूप से भले ही भ्रष्टाचार और काले धन को लेकर किया गया आंदोलन था लेकिन कहीं न कहीं छुपे तौर पर इस आंदोलन के लिये सरकार विरोधी राजनीतिक दलों का समर्थन अवश्य था जो कि इस रामलीला मैदान पर हुए प्रकरण के बाद अब धीरे धीरे सामने आ रहे हैं। ऐसा लगता है कि सरकार को इसकी भनक थी और वह अपने राजनीतिक विरोधियों को पटखनी देना चाहती थी, उन्हें इस तरह के आंदोलनों के जरिये लाभान्वित होते नहीं देखना चाहती थी। ऐसे में सरकार को जो कुछ भी राजनीतिक कुटिलताएं अपनानी पड़ीं उसने अपनाया। कपिल सिब्बल, प्रणव मुखर्जी , सुबोधकांत सहाय आदि के जरिये पहले जाल बिछाया, मान मनौवल किया, एक लिखित पत्र भी हासिल कर लिया जिसे कि बाद में ट्रम्प कार्ड के रूप में इस्तेमाल किया जाय और किया भी। पत्र का भेद खोलते ही एकाएक बाबा रामदेव कटघरे में आ गये। फिर जब लगा कि फिलहाल मौका अच्छा है, मामला लंबा खिंचने से कल को कहीं परिस्थितियां फिर पहले जैसी न हो जांय, कहीं अन्ना हजारे भी न आ जांय , यह सोच कर ही साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाते हुए रात में ही पूरे आंदोलन को मटियामेट कर दिया गया।

     और अब देखिये कि कैसे सबको मौका मिल गया। एक एक कर राजनीतिक दल सामने भी आने लगे। भाजपाईयों को देखा कि वे गाँधी जी के नाम पर सत्याग्रह की रट लगा रहे हैं, चौबीस घंटों का आलाप ले रहे हैं। उधर मायावती को भी मौका मिल गया। कह दिया कि जो कुछ हुआ वो बर्बर था, भयानक था। यह कहते हुए शायद वह भट्टा पारसौल का बदला मूल-सूद सहित वापस भी कर रहीं थीं । उधर हाशिये पर चले गये कुछ नेता भी कैमरों पर दिखने लगे हैं। मुलायम सिंह को देख रहा था कि बमक रहे थे, मानों ये ही हैं जो सबसे ज्यादा व्यथित हैं। लालू यादव को देखा वो अलग तान छेड़े हुए थे। जबकि काले धन को लेकर यदि कल को कुछ 'कानून-ओनून' बन जाय, कुछ हल्की फुल्की कार्यवाही भी हो उठे तो यही नेता सबसे पहले अंदर होंगे जो कि अभी बढ़ चढ़ कर बोल रहे हैं। तब यही नेता मुँह छिपाते फिरेंगे। अभी तो इन्हें पता है। मौका मिला है तो चौका मारो....क्या पता कल को सेलेक्शन हो ही जाय किसी चुनावी बयार में। फिर जो नेता अपने चेले चपाटों के जन्मदिन पर, उनके मरनी करनी पर, अक्सर फ्लैक्स वाले बैनरों पर हार्दिक शुभेच्छा देने का मौका नहीं चूकते वह भला इस मौके को कैसे जाने देंते। फिर तो कैमरा भी है, मौका भी है, दस्तूर भी।

        दिग्विजय सिंह जो कि लादेन के लिये 'लादेन जी' कह कर संबोधित करते हैं वही बाबा रामदेव के लिये 'ठग' शब्द का इस्तेमाल करते हैं। कपिल सिब्बल, जो कि वकील भी हैं अपनी पूरी वकालत एक पत्र के जरिये झोंकते मिले। उनके बारे में तो बाबा रामदेव का यह कहना है कि - कपिल सिब्बल बहुत कुटिल हैं, शातिर हैं...अब उनसे वे बात नहीं करेंगे। लेकिन शायद बाबा रामदेव जाने अनजाने में ही कपिल सिब्बल के लिये खूबियों का तमगा दे बैठे। अरे बाबाजी, यही तो वो खूबियां हैं जो आज के जमाने में, राजनीति की पैंतरेबाजियों में बेहद जरूरी हैं। इसी के दम पर तो राजनीति चलती है। सरकार चलती है। कुटिल होना, शातिर होना यदि अवगुण हैं तो यह आपका नज़रिया होगा, किंतु जिस जमाने में डिप्लोमैटिक होना, कुछ न कुछ नकारात्मक अवगुण लिये होना एक तरह की उपलब्धि मानी जाय, उसे बयां कर आपने अनजाने में ही कपिल सिब्बल का कद आम शातिरों से कुछ उपर उठा दिया है। यकीं मानिये, आपके इन उदगारों से कपिल सिब्बल खुश ही हुए होंगे, चिंतित बिल्कुल नहीं। क्योंकि चिंतित होना राजनीति के 'क्लासिकल युग' में चलता था, आज-कल के 'कारपोरेट युग' में नहीं। हो सकता है आपके इन्हीं बताये गुणों को सर्टिफिकेट मान सरकार कपिल सिब्बल को और भी ज्यादा संवेदनशील जिम्मेदारियां देने की ओर अग्रसर हो जाय।

      खैर, अभी इस प्रकरण पर बहुत कुछ लिखा जाना है, कई लेख लिखे जाएंगे, कई तरह के मत-मतांतर व्यक्त किये जायेंगे, किंतु जो ये बार बार कहा जा रहा है कि लोकतंत्र पर धब्बा, लोकतंत्र कलुषित तो मेरा मानना है कि क्या आज ही यह लोकतंत्र कलुषित हुआ है ? क्या आज ही यह लोकतंत्र इतना ज्यादा आहत हुआ है ? नरसिम्हा राव का संसद प्रकरण, अजित-जोगी, दिलीप सिंह जूदेव के रिश्वती टेप, करगिल के दौरान खरीदे गये महंगे ताबूत, बोफोर्स कांड, यू.पी. विधानसभा में हुई जूतमपैजार क्या इन सबके दौरान लोकतंत्र कलुषित नहीं हुआ था ? या आज ही 'स्पेशली कलुषित' हुआ है ?


       दरअसल लोकतंत्र के कलुषित होने की बजाय यह दिन लोकतंत्र के बनते बिगड़ते अनेक 'मौकों' में से ये भी एक 'मौका' है जिसे हर कोई अपने-अपने हिसाब से भुना रहा है। सरकार इसे अपने विरोधियों को दी गई पटखनी के तौर पर देख रही है तो विपक्ष इसे सरकार को घेरे में लेने का अच्छा मौका जान रहा है। जो कोई हाशिये पर पड़ा है वह इसे लाइमलाईट में आने का अच्छा अवसर जान रहा है। ऐसे में बाबा रामदेव का योग इन सभी को सहयोग ही तो दे रहा है। लेकिन इस प्रकरण को यदि एक शब्द में अभिव्यक्त किया जाय तो शेक्सपियर के नाटक कॉमेडी ऑफ एरर्स की तर्ज पर मैं ट्रेजेडी ऑफ एरर्स कहना पसंद करूंगा जिसमें हर ओर से लोकतंत्र के नाम 'पॉलिटिकल एरर मैटेरियल'  ट्रैजेडी दर  ट्रैजेडी पेश किये जा रहे हैं।


     - सतीश पंचम


Saturday, June 4, 2011

कबूतरायन v / s पड़ोसन की 'चिक-चिक'

      इस वक्त बाहर बड़ी जोर की बारिश हो रही है। इतनी, कि बौछार से बचने के लिये गैलरी की खिड़कियां बन्द रखनी पड़ रही हैं। उसी बन्द खिड़की के पास गलियारे में कबूतरों के कुछ जोड़े भी रह रहे हैं, कुछ ने अंडे भी दिये हैं। श्रीमती जी अक्सर इन बेचारे कबूतरों को कोसती हैं कि यहां रहने से कबूतर गंदगी करते हैं, इन्हें यहां से हटा देना चाहिये। कभी कभी तो इनकी उधम इतनी ज्यादा हो जाती है कि सूखने के लिये डाले गये कपड़े तक नीचे गिरा देते हैं। पिछले दिनों रस्सी पर डाले गये श्रीमती जी की साड़ी गिरा दिये। पांच मंजिल नीचे भेजकर बच्चों से मंगवाना पड़ा। तंग आकर श्रीमती जी ने कबूतरों के गैलरी में छिपने वाले ठिकानों को ढंक दिया, तोप-ताप दिया ताकि उनके टिकने का ठिकाना ही न रहे। लेकिन न जाने कबूतरों को मेरी गैलरी से क्या मोहब्बत है वहीं आकर बैठते हैं।


        इधर मेरी दक्षिण भारतीय पड़ोसन अक्सर शिकायत करतीं हैं कि आपकी गैलरी में ढेर सारे कबूतर आते हैं, उनके वजह से गंदगी होती है। एक दिन एक कबूतर का बच्चा न जाने कैसे मेरी गैलरी से पड़ोसन की गैलरी में चला गया। उस बच्चे के माता पिता उपर बैठे टुकुर टुकुर ताक रहे थे। उधर कबूतर के बच्चे को देख पड़ोसन ने शिकायत की कि अब देखिये आप लोगों के यहां से कबूतर मेरे यहां शिफ्ट हो रहे हैं। इन्हें हटा दिजिए। पड़ोसिन की बात सुनकर श्रीमती जी तुनक गईं। एक तो इन कबूतरों से हम पहले ही परेशान हैं उपर से पड़ोसिन के नखरे। साँझ के समय श्रीमती जी उलाहना देते मुझसे कहने लगीं कि पड़ोसन तो यूँ कह रही है जैसे कि कबूतर न हुए, हमारे पाले गुंडे हों। इन्हें हमने पाला है क्या ....... और फिर कबूतर ही तो हैं, कोई चील-गिद्ध तो नहीं। उस वक्त तो श्रीमती जी ने पड़ोसन से कुछ न कहा।

      अभी उस घटना को हुए कुछ दिन बीते होंगे कि एक दिन देखा पड़ोसिन कबूतरों को दाना खिला रही है। अपनी गैलरी में उन्हें परचा रही है। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। कहां तो यह पड़ोसन कबूतरों से बिदक रही थी और कहाँ अब उन्हें चुग्गा डाल रही है। मैंने श्रीमती जी से पूछा – यह क्या मामला है। थोड़ी देर तो श्रीमती जी मन्द मन्द मुस्काती रहीं और फिर धीरे से भेद खोला कि पड़ोसन एक बार फिर से पूछ रही थी कि आप लोग कबूतर क्यों नहीं हटा देते।

- तो ? ........ तुमने क्या कहा ?

-  कहती क्या  ? …..मैंने उसे बातों ही बातों में बताया  कि – 'हमारे यहाँ तो ऐसा' बोलते हैं कि जिसके यहां कबूतर खुद ब खुद आकर अपना परिवार बसाते हैं, अंडे देते हैं, उसके यहां पैसे ज्यादा आते हैं, नौकरी व्यापार में बरक्कत होती है। इसलिये देखा नहीं, जितने मारवाड़ी हैं सब के इलाके में एक न एक कबूतरखाना दिखता है जहां कि कबूतरों को दाना डाला जाता है। इसलिये कबूतरों का घर कभी उजाड़ना नहीं चाहिये।  पाप लगता है। पैसे का रास्ता बंद हो जाता है। ऐसा 'हमारे यहाँ' बोलते हैं।

- फिर ?

- फिर क्या.....उस वक्त तो वह सुनकर रह गई। अगले दिन मैंने वही देखा जो आप ने आज देखा। वैसे भी कबूतर हमारे हटाने से रहे, उन्हें कितना चाहा कि यहां से हटा दूं लेकिन हटते नहीं। तिस पर पड़ोसन की बातें सुनने से तो अच्छा है कि उसे भी कबूतरों की ज़हमत उठाने दिया जाय। कुछ वह भी पुण्य कमाये, कुछ उसका भी बैंक बैलेंस बढ़े।

       पूरी बात जानते ही मैं ठठाकर हंस पड़ा। कबूतरों की वज़ह से धन दौलत आती है, बरक्कत होती है.....हद है। फिलहाल मेरे पास कितनी धन दौलत आ रही है ये तो मैं ही जानता हूँ लेकिन श्रीमती जी ने जिस अंदाज में बहाना गढ़ते हुए पड़ोसन से होने वाली चिख-चिख से जान छुड़ाई वह मुझे थोड़ा रोचक लगा । अब कबूतर लोग रहे चाहे जांय, कम से कम टंटा तो न होगा। लेकिन इस पूरे मामले में जो एक और चीज जो मुझे दिलचस्प लगी वह थी 'हमारे यहाँ तो ऐसा'-  नामक जुमला। यह 'हमारे यहाँ तो ऐसा' नामक जुमला न जाने कब से चला आ रहा है लेकिन है बड़ा मौजूं।  देखा गया है कि जब कभी दो विभिन्न प्रांतों के लोग आपस में किसी विषय पर भिन्नता पाते हैं तो अक्सर उनमें से एक जब भी कुछ जस्टिफाई करना चाहेगा तो बातों बातों में 'हमारे यहाँ तो ऐसा' होता है कहकर अपनी बात रखेगा तिस पर सुनने वाला यह मानकर चलेगा कि जब फलां प्रांत वाला बंदा ऐसा कह रहा है तो जरूर उनके यहां ऐसा होता होगा। इसके आगे बात ही 'खलास'

   खैर,  पाप और पुण्य जब मिलेगा तब मिलेगा.... मेरी धर्मभीरू पड़ोसन का बैंक बैलेंस जब बढ़ेगा तब बढ़ेगा...... अभी तो अपना बैंक बैलेंस चेक कर लूँ....क्या पता....कहीं बढ़ न गया हो।


- सतीश पंचम

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 चलते चलते

 मेरे ब्लॉग Thoughts of a Lens से यह रही ताजा तस्वीर




अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के वक्त जगह जगह ढेर सारे बैनर बड़ी हसरतों से लगाये गये थे.....India Against Corruption, Second Freedom struggle, India Awakened....bla bla bla.


   दिन बीते और उन बैनरों पर फिर से लद गये वही पुराने कोफ्त बढ़ाते हार्दिक शुभकामना वाले संदेसे।

      बाबा रामदेव को लेकर दिग्विजय सिंह ऐसे ही हवा में नहीं बोल रहे हैं फूँ...फाँ....। उस शख्स को पता है कि चाहे बाबा रामदेव हों या अन्ना हजारे...... दो चार महीनों में ही सभी की परिणति इस India Against corruption वाले 'हसरती बैनर' सरीखी होनी है..... नेता जमात पहले की तरह ही पुराने वाले अन्ना हजारे की तस्वीरों के उपर ही अपने को स्थापित करेंगे...... 'हार्दिक शुभ-कामनाएँ' निर्बाध रूप से बांटते रहेंगे और जनता ऐंवे ही करप्शन मिटने की 'शुभ-फ़हमी' पाले रहेगी।

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