सफेद घर में आपका स्वागत है।

Saturday, May 28, 2011

द स्टोरी ऑफ 'कुल्हड़ यूटिलाइजेशन'

        जाने क्या बात होती है मिट्टी के बने बर्तनों में कि मैं अक्सर ही उनकी ओर आकर्षित हो उठता हूँ। मिट्टी के बने मटके, सुराहीयाँ, कुल्हड़, सकोरे सभी मुझे बचपन से ही बहुत प्रिय रहे हैं। अब भी जहाँ कहीं मौका मिलता है मिट्टी के बनी सुराही, कुल्हड़ आदि अदबदाकर खरीदता हूँ। यात्रा के दौरान मिट्टी की सुराही खरीदना तो मेरा एक तरह का शग़ल ही है।  मेरी श्रीमती जी मेरी इस सनक पर मौज लेने से नहीं चूकतीं। कहती हैं - अब तक न जाने कितने साल गुज़ार दिये हो इसी 'बम्मई' में (मुंबई में ), लेकिन अब भी 'गँवरपन' झलकता है। मैं मुस्कराकर रह जाता हूँ। बच्चे भी मेरी इस 'गँवईं' फ़ितरत से बखूबी परिचित हैं। यदा कदा टोक भी देते हैं - क्या पापा ..... सुराही आप ही ढोना....वहां हमसे नहीं होगा हाथ में सुराही लेकर चलना।  लेकिन मैं अपने इस गँवईपने में भी आनंद पाता हूँ। मिट्टी के बर्तनों में मिलने वाला सोंधापन, उनकी छुअन एकदम अलग ही अहसास देते हैं।

       यहाँ तक कि जब कभी गाँव जाता हूँ तो शाम की चाय पीने के लिये ज्यादातर बाज़ार की ओर रूख़ कर लेता हूँ क्योंकि वहां की कुछ गुमटीयों में कुल्हड़ में चाय मिलती है और उस चाय में जो सौंधापन मिलता है वैसा सौंधापन मेरे हिसाब से महंगे से महंगे बर्तनों में भी नहीं मिल सकता। उस सोंधेपन की बात ही अलग होती है, अपने आप में एक तरह की देशज महक। शुरू-शुरू में मैं गाँव में जिन गुमटीयों पर जाता था, वहां के दुकानदार मेरे पारिवारिक पृष्ठभूमि को, पिताजी, चच्चा, ताऊ सभी से परिचित होने के कारण  'काँच के गिलास' में चाय उड़ेलकर देने लगते थे। उन्हें लगता था कि बम्बई वाले भला मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पियेंगे ?  मुझे चाय उड़ेलते समय रोकना पड़ता था, कि चाय कुल्हड़ में दिजिए, काँच वाले ग्लास में नहीं। साथ में आये चचेरे भाई तब मजे लेते हुए कहते - ऐन्हंय कुल्हड़ै में चहीया दिह.........ई नवा सउखीन मनई हएन ( इन्हें कुल्हड़ ही में चाय दो.......ये नये शौकीन आदमी हैं ).

     दरअसल देखा गया है कि अब गाँवों में भी, हाट-बाजार आदि में ज्यादातर चायवाले काँच के गिलास का इस्तेमाल करने लगे हैं। कुल्हड़ में चाय देना थोड़ा सा महंगा पड़ता है। काँच का ग्लास धोने पर फिर से दुबारा इस्तेमाल किया जाता है, जबकि कुल्हड़ तो एक ही बार इस्तेमाल होता है और फिर फेंक दिया जाता है। लेकिन गाँवों में भी कुछ 'भगत टाईप' के लोग होते हैं, उनके लिये बाजारू चाय यदि पीना भी पड़े तो कुल्हड़ में पियो, काँच का ग्लास 'फरचा' नहीं होता। ऐसी मान्यता है कि धोने के बावजूद काँच का ग्लास सिर्फ दिखावटी तौर पर साफ होता है, ओसकन से मांजा नहीं जाता इसलिये उसे फर्चा कहना गलत है। कुल्हड़ ही ठीक है, पियो और फेंक दो। ऐसे में दुकानदार 'भगतिहा लोगों' का ख्याल रखते हुए दोनों रखते हैं। काँच का ग्लास भी और कुल्हड़ भी। जिसे जैसी जरूरत, वैसी सर्विस।

     खैर, भगत लोगों की भगत लोग जानें, अपन तो सौंधेपने पर लट्टू हैं और जिसकी परिणति होती है कि मुंबई वापस लौटते वक्त अक्सर पच्चीस तीस कुल्हड़ खरीद कर अपने बैग में डाल लेता हूँ। चचेरे भाई मौज लेते हैं लेकिन मेरी पसंद को वो भी जानते हैं। इसलिये मोल भाव करके कुल्हड़ खरीद लिया जाता है। और अब देखिये कि, वही कुल्हड़ जिसकी गाँव में कदर नहीं होती, यहां मुम्बई लाते ही उसकी कीमत बढ़ जाती है। संभाल संभाल कर इस्तेमाल करता हूँ कि जल्दी चुक न जाय। वैसे भी कुल्हड़ में चाय केवल मैं ही पीता हूँ, वो भी ज्यादातर छुट्टी वाले दिन, वरना मुंबई की इस भागादौड़ी में कहां जगह है इस तरह के शौकों के लिये । उधर श्रीमती जी ने भी कुछ कुल्हड़ वाली चाय का आनंद लिया ( जानता हूँ कि अच्छा तो उन्हें भी लगता है :)


     अब मेरे साथ होता यह है कि कुल्हड़ के छोटे आकार को देखते हुए पहले एक छोटे स्टील के ग्लास में चाय छान कर आ जाती है और फिर मैं उसे अपने कुल्हड़ में उड़ेल उड़ेल कर पीता जाता हूँ, खिड़की से बाहर ताकते हुए। पहले तो होता यह था कि कुल्हड़ से एक बार पीने के बाद आदतन उसे फेंक देता था। लेकिन बाद में ख्याल आया कि यार जब मुझे ही पीना है अपने उसी कुल्हड़ में तो क्यों न धो-धाकर दुबारा उसी कुल्हड़ का इस्तेमाल करूँ। इसलिये अब यह करता हूँ कि, कुल्हड़ में चाय पीने के बाद उसे तुरंत ही धो देता हूँ ..... ( हाँ भई, कुछ शौक ऐसे भी पूरे किये जाते हैं :)

    इससे होता यह है कि कुल्हड़ तुरंत ही धो देने से वह फिर नये सरीखे हो जाते हैं, पंखे ही हवा खाकर फिर सूख भी जाते हैं। इस तरह पहले जो कुल्हड़ एक बार ही पीने के इस्तेमाल होता था अब सात आठ बार तक इस्तेमाल होने लगा है। अभी भी कुछ कुल्हड़ बचे हैं, जब कुछ महीने बाद खत्म होंगे तो हो सकता है फिर एक बार गाँव का चक्कर लग जाय। तब की तब देखी जायगी। अभी तो अदरक वाली चाय बन रही है.....चलूँ.....आज एक नये कुल्हड़ का उदघाटन जो करना है :)


- सतीश पंचम
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चलते चलते -

मेरे फोटो ब्लॉग Thoughts of a Lens की तस्वीर और साथ ही है -  रहिमन चिंतन


रहिमन निज संपत्ति बिना, कोउ न बिपति सहाय ।
बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सकै बचाय ।।
 Blog URL - http://lensthinker.blogspot.com/

Tuesday, May 24, 2011

गोपनीय श्रद्धा .......गोपनीय ईश्वर

        आज लिफ्ट बंद होने से सुबह जब ऑफिस जाते समय अपनी बिल्डिंग की सिढ़ियों से नीचे उतर रहा था तब अचानक ही सामने की दीवार पर नज़र पड़ी। दीवार पर नया नया रंग रोगन किया गया था। सिढ़ियों के पास का कोना जहां कि अक्सर ‘पान के थुक्कारे’ , दंतनिपोरों के चिर-परिचित दागी निशान दिख ही जाते थे, वह जगह भी साफ सुथरी लग रही थी। यह सब देख कर अच्छा लगा कि चलो कुछ तो चेतना आई लोगों में। वरना तो लोगों को कहते रह जाओ कि भई पान की पिचकारी कोने अतरे मत छिटकाया करो, थूका-थाकी मत करो लेकिन मजाल है जो ‘बन्धु-भगिनी’ लोग मान जांय।


         अभी मेरा यह नव-चेतन दीवारों का अवलोकन कर ही रहा था कि तभी नज़रें सामने की दीवार पर पड़ी। वहाँ विराजमान थे देवी देवता लोग। तुरंत ही सीढ़ियों के पास वाली इस साफ-सफाई का कारण पता चल गया। लोगों ने ‘पान-चबेरों’ और ‘दन्त-निपोरों’ से परेशान होकर दीवार को अच्छे से रंग रोगन करवा कर वहां देवी देवताओं की तस्वीरों को सटा दिया। अब जो कोई थूकना चाहेगा भी तो सामने ईश्वर को देख खुद ही ठिठक जायेगा। नतीजा, दीवार साफ की साफ और ‘पान-चबेरे’ कहीं और जाकर पिचकारी मारते होंगे।

       वैसे, ईश्वर को इस तरह दीवारों पर सटा कर उनसे ‘वाचमेनी करवाने’ की तरकीबें काफी समय से उपयोग में लाई जा रही हैं। अक्सर देखा गया है कि सड़क के किनारे जहां दीवारें Standing Ovasion के चलते धारापुरी बनी रहतीं थी, वह देवताओं के चित्रों के आते ही साफ सुथरी नज़र आने लगती हैं। मनुष्य की धर्म-भिरूता का क्रियेटिव इस्तेमाल होते देखना अच्छा लगा।

       उधर देख रहा हूं कि स्टीफन हॉकिंग ने ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हुए कहा है कि ईश्वर जैसी चीज कुछ नहीं हैं। न सिर्फ ईश्वर, बल्कि मृत्यु के बाद स्वर्ग और नरक का भी कोई अस्तित्व नहीं है। जो कुछ है इसी जीवन में है, इसी दम है। उनकी बातों को पढ़ने पर मुझे भगवतीचरण वर्मा के लिखे उपन्यास चित्रलेखा की वह पंक्तियां याद आ गई जिनमें वह ईश्वर जैसे गूढ़ विषय के बारे में बिल्कुल सरल ढंग से कहते हैं - ईश्वर मनुष्य की सर्वोत्कृष्ट कल्पना है। और वाकई उनकी इस बात में काफी दम है कि जिसे किसी ने देखा नहीं, न किसी ने जाना है, न किसी ने छूआ है.....उसने केवल अपने श्रद्धाभाव के बलबूते एक ऐसे रचेता की कल्पना कर ली है जिससे कि वह आज भी उतना ही डरता है जितना कि युगों पहले डरता था, आज भी उसके प्रति श्रद्धा भाव रखता है जैसा कि पहले रखता था। हां, कालक्रम में कभी भक्ति कम तो कभी ज्यादा जरूर होती दिखती है, लेकिन वह अलग मुद्दा है।

        आज यदि ईश्वर के अस्तित्व को लेकर बहस छिड़ी है तो यह कोई नई नहीं है। और न ही स्टीफन हॉकिंग के विचार ही नये हैं। उनसे पहले भी कईयों द्वारा ईश्वर के अस्तित्व पर इसी तरह की बातें कही गई हैं और आगे भी कही जाती रहेंगी। किंतु मेरे हिसाब से ईश्वर हैं या नहीं हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है श्रद्धाभाव, महत्वपूर्ण है वह विश्वास जो कि मुश्किल परिस्थितियों में फंसे इंसान को एक किस्म की मानसिक शांति प्रदान कर सके, एक तरह का संबल प्रदान कर सके, क्योंकि देखा गया है कि जहां मित्र-सम्बन्धी, पुरखे-पुरनियों के आशीर्वाद तक काम नहीं करते वहां यही कल्पनाजन्य ईश्वर है जो कि आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।


 - सतीश पंचम

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 चलते चलते -
 
 मेरे फोटो ब्लॉग Thoughts of a Lens से पेश है 'लहबर'
 

'लहबर' उठाये हुए एक फ़कीर

Saturday, May 21, 2011

हेमा मालिनी और बराक ओबामा

          आज सुबह जब मुंबई के माटुंगा इलाके में सैर के लिये निकला था तब अचानक ही स्ट्रीट लाइट के खंभों पर नज़र पड़ी। हाथों में एक कलम थामे हुए अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा थे । ध्यान देने पर पता चला कि वह किसी पेन बनाने वाली कंपनी EMonte का विज्ञापन है। हाथों में एक कलम थामे ओबामा की तस्वीर के नीचे लिखा था - G8 Summit Official Pen. पढ़ते ही मुस्कान आनी स्वाभाविक थी।


       एक ये लोग हैं कि आधिकारिक तौर पर कलम, दवात सब कुछ राजनेता की तस्वीर के साथ बेचना जायज मानते हैं, जबकि हमारी हेमामालिनी बेचारी ने एक वाटर प्यूरीफायर के बारे में सवाल क्या पूछ लिया, पूरी संसद हलकान हो उठी । गौरतलब है कि हेमा मालिनी ने सांसद रहते हुए एक वाटर प्यूरीफायर का विज्ञापन किया और उन्हीं दिनों संसद में प्रश्नकाल के दौरान सवाल पूछा था कि वाटर प्यूरीफायर वाले उत्पादों को Excise से छूट क्यों नहीं दी जाती, उन्हें छूट देना चाहिये। इधर उन्होंने सवाल पूछा उधर राजनेताओं के दिल में नैतिकता की नसें फड़कने लगी, उनके सवाल पर शक किया गया कि - हेमा मालिनी एक वाटर प्यूरीफायर के विज्ञापन से जुड़ी हैं, लिहाजा इस तरह के प्रश्न उन्हें नहीं उठाने चाहिये जिससे कि चाहे अनचाहे उस विज्ञापन दाता कंपनी को लाभ पहुँचाये। खैर, मामला धीरे धीरे शांत हुआ और समय के साथ सुन्न पड़ गया।

         ऐसा ही एक और मामला याद आता है जिसमें कि राजनीतिज्ञों पर अंकुश लगाने के लिये विख्यात पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एन.शेषन को जब घेरा गया था। हुआ यूं कि, श्री टी.एन.शेषन ने 'सफल' ब्राण्ड के फ्रोजन वेजिटेबल्स के लिये एक विज्ञापन किया था जिसमें वह कहते पाये गये कि 'मैं नाश्ते के तौर पर राजनीतिज्ञों को तो कच्चा खाता हूँ लेकिन दिल से वेजिटेरियन हूँ'। उनके विज्ञापन की इन्हीं लाइनों पर राजनीतिज्ञों की भौहें चढ़ गई और नतीजतन वह विज्ञापन टीवी से लुप्त हो गया। सार्वजनिक जीवन में रहने वाली हिच एन फिच :)

          अब इधर देख रहा हूँ कि मुम्बई में ओबामा कलम बेच रहे हैं। अब पता नहीं कि जाने वो कौन सा लाभ होगा एक कलम को G8 Summit का ऑफिशियल पेन घोषित करने से। उन कलम दवातों से कितना फंड उधर-इधर होगा लेकिन इतना तय है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों के प्रति जिस अंदाज में हम लोग व्यवहार करते हैं, उस से अलग किस्म का विदेशों में चलन है। वहां हर एक चीज को व्यापारिक नजरिये से देखा जाता है। कलम, टाई, रूमाल सब कुछ ऑफिशियली दाम देकर बाकायदा रसीद के साथ बेचा जाता है। इतने का टैक्स, इतने का प्रमोशनल चार्ज ..... इतने की ब्राण्ड अम्बैसडरी.....यानि सब कुछ क्लियर कट।

          जबकि भारत में सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोग यह सब खुलेआम नहीं बेच सकते। संभवत पानी, सब्जी, कलम-दवात ये सब छोटी चीजें हैं जिन्हें बेचने से साख पर असर पड़ता है। साख बनाने के लिये जमीनी अम्बेसडरी करनी पड़ती है, उसके बाद चाहे जमीन हो या जमघट, सब बेचा जा सकता है। कभी किसानों के नाम पर जमघट लगवाइये, कभी प्लांट विरोध नाम पर तो कभी पिछड़ों के नाम पर । एक बार आप ने जमघट लगवा लिया तो आप की राजनीतिक जमीन खुद ब खुद तैयार हो जायगी, फिर आप अपनी इस जमीन को बेचें या होल्ड करके रखें, यह आप पर निर्भर है.....मगर खबरदार, कभी पानी और सब्जी जैसी टुच्ची चीज बेचने की कोशिश की तो!

     आखिर 'Public life' में रहने का भी तो अपना एक स्टैण्डर्ड होता है ....... भले 'वर्चुअल' ही क्यों न हो   :)


- सतीश पंचम

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  चलते चलते -

    मेरे दूसरे ब्लॉग - Thoughts of a Lens जो कि एक फोटो ब्लॉग है, से पेश है ये छायाचित्र जिसका शीर्षक है - 'द्रौपदी'


'द्रौपदी'
      दरअसल इस 'गुलाब और पत्थर' छायाचित्र को देखते ही मुझे वह महाभारत का प्रसंग याद आ गया जिसमें कि एक ओर जुए के दौरान हारी हुई, अपमानित द्रौपदी है और दूजी ओर उसके पांचो पति राजसभा में मौजूद हैं। उनके पास द्रौपदी के अपमानित होते देखते रहने के सिवा कोई चारा नहीं, यानि कि जड़-पत्थर की मानिंद पांचो  बैठे रहे।

Wednesday, May 18, 2011

एक साहित्यकार, एक शिश्नजीवी पुत्र, एक कथा कोलाज और ढेर सारे जीवनानुभव

       कुछ साहित्यिक रचनायें इस तरह की होती हैं कि दिल पर अपनी अमिट छाप छोड़ देती हैं। उन्हें पढ़ने के बाद भी काफी समय तक उपन्यास की बातें जेहन में घूमती रहती हैं। ऐसी ही एक कृति है अमृतलाल नागर जी की जिसे कि साहित्य जगत में 'अमृत और विष' के नाम से जाना जाता है और साहित्य अकादमी से पुरस्कृत भी है।          

       मैं इस उपन्यास के बारे में काफी कुछ लिखना चाहता था लेकिन संशय था कि मैं अपनी बातों से सही सही न्याय कर पाउंगा या नहीं। इसलिये पुस्तक के कुछ अंशों को ही यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ। पाठक खुद इस कृति के बारे में अंदाजा लगायें कि कितनी सशक्त रचना है - 'अमृत और विष'।

   उपन्यास के मूल में हैं साहित्यकार श्री अरविन्द शंकर , जिनके कि उम्र के साठवां पड़ाव छूने पर साहित्य प्रेमियों द्वारा षष्टि-पूर्ति का आयोजन किया जाता है। इसी षष्टि-पूर्ति के दौरान जब लोग लेखक की खूब बड़ाई करते हैं, मान सम्मान करते हैं तो साहित्यकार अपने भीतर ही भीतर कुछ अजब भाव महसूस करता है। अजब इसलिये कि उसके जीवन में कई ऐसे स्याह पन्ने हैं जो उसे असम्मान के लायक बनाते हैं। उसे याद आता है कि उसका एक बेटा शिश्नजीवी है। शिश्नजीवी इसलिये कि अपनी प्रेमिका से ब्याह कर पढाई छोड़कर कैरियर चौपट कर चुका है और जब समय बीतते प्रेम कम हो गया तो उसे छोड़ बैठा। जीविका न मिल पाने पर यहा वहां की भटकन उसे एक धनी महिला के चक्कर में ले उड़ी और अब उसी बेटे भवानी के बारे में सोच सोच साहित्यकार परेशान है। लोग पढ़ाई करके धन कमाने वाले बुद्धिजीवी होते हैं, लेकिन भवानी ऐसा निकला कि जीविका हेतु शिश्नजीवी बन गया अर्थात एक दूसरी अमीर महिला के पैसों पर जीवन यापन करने लगा।   

  पुस्तक के अंश से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस मन:स्थति में लेखक गुजर रहा है - साहित्यकार लिखते हैं ..... 

      मैं डर रहा था कि अभी हाल के किसी कोने से मेरे पुत्र भवानी का ससुर चिल्लाकर कहने ही वाले होंगे - यह व्यक्ति पूजा पाने योग्य नहीं है। इसके लम्पट बेटे ने मेरी सुन्दर सुशीला और साध्वी बेटी को पहले अपने प्रेमपाश में फंसाया, मुझे उसके अंतर्जातीय विवाह के लिये सजातीय कलंक सहना पड़ा और अब उसे तथा अपनी दो सन्तानों को निराधार छोड़कर उसने एक कुल्टा प्राध्यापिका को अपना तन-मन अर्पित कर रक्खा है। और ये, महान लेखक, उदार और न्यायवान कहलाने वाला नीच अरविन्द मेरे बार बार लिखने पर भी अपनी पुत्र-वधू और पोतों को अपने पास बुलाकर नहीं रखता। मेरे पत्रों का उत्तर नहीं देता। मेरे जैसे दीन-हीन बूढ़े क्लर्क की गृहस्थी पर खर्च का एक अतिरिक्त बोझ डाले हुए इसे शर्म नहीं आती।


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        मुझे लग रहा है कि स्वंयम् मेरा ही अन्तर सत्य अभी अभी इस हाल में गूँज उठेगा। " तू मानवता और इमानदारी के झण्डे उठाता है, तूने अपनी पत्नी और लड़कों के दबाव में आकर केवल अपनी लड़की का सुख ही सामने रखकर, कल उसे देखने के लिए आये हुए प्रस्तावित वर और उसके पिता को यह नहीं बतलाया कि इस लड़की को पहले क्षय रोग हो चुका है। तू युधिष्ठिर के समान नरो वा कुन्जरो वा कहकर ही झूठ-सच बोल देता। कहता, हांलाकि इस समय यह पूर्ण स्वस्थ है, पर इस रोग को लेकर कभी कुछ कहा नहीं जा सकता। तू स्वार्थी है, कायर है, श्रीहीन है। तुझे अपनी षष्टि-पूर्ति पर समाज से यह सम्मान पाने का अधिकार नहीं है।


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      इस बीच समय बीतता है, लोग काफी मान सम्मान देते हैं..... लेखक का  दूसरा बेटा आई ए एस बन जाता है।  लेकिन अभी शिश्नजीवी भवानी की चिंता लगी है। ढेरों कुछ भुगतना बाकी है। लेखक आगे लिखते हैं ----
       मैंने अभी हाल ही में हुए दो प्रेम-विवाहों की असफलता को भी देखा है। ये प्रेमिक पति-पत्नी प्रेम का नशा उतरते ही एक दूसरे को अपनी जाति जतलाने लगते हैं। आर्यसमाजी और सिविल मैरेज कानून से किए गये विवाह-कर्म का बन्धन उनके मन में बच्चों के खेल के समान ही फुसफुसा और बेबुनियाद हो जाता है। हाँ, जो युवक या युवतियाँ छोटे शहरों में बँगले वाले समाज से या बड़े शहरों में फ्लैटों वाले समाज से जुड़े हुए हैं, उनमें यह जातिगत भावना किसी भी स्तर पर नहीं सताती। महल्लों के संस्कारों से घिरा हुआ मेरा भवानी जब अपना कैरियर चौपट हो जाने के बाद प्रेम से अघा गया, तो अपनी पत्नी के ब्राह्मण्त्व को बात-बात में तुच्छ बताने लगा। मैंने एक दिन उसे समझाने की कोशिश की, कहा कि पश्चाताप करना या दुखी होना अच्छी बात नहीं। तुम किसी भी समय अपने को फिर से सफलतापूर्वक खड़ा कर सकते हो। मैने उससे यहां तक कहा कि कमाने की चिंता छोड़ दो, तुम पढ़ो और अपना इच्छित कैरियर पाओ। मैं खुशी से तुम्हारा सारा खर्च उठाउंगा।


भवानी भावावेश में आकर रोने लगा - बोला, मुझे एम ए करने से पहले अपने आपको शादी से बचाना चाहिए था।, गलती तो तभी हो गई। मैं एक गलत चीज के प्रेम में फंस गया।


    मैंने कहा - छुटकू अगर तुम्हारा प्रेम सच्चा था तो तुम्हें पछतावा न होना चाहिए।


- पछतावा मुझे इस बात का है कि मेरा सच्चा प्रेम इसके झूठे प्रेम के धोखे में आ गया।


- इसके प्रेम में झूठ क्या था भाई ?


- आप माडर्न माइण्ड को नहीं समझ सकते पिताजी। ये मेरे जैसे कल्चर्ड और रीफाइण्ड टेम्परामेन्ट के आदमी को सूट ही नहीं करती।


- अब तुम ज्यादती कर रहे हो छुटकू, उस समय जब मैं तुम्हें समझाता था, तब तुम्हें उषा में सारे गुण ही गुण दिखाई देते थे।


- वह इन्फ्लक्चुएशन था।
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     ऐसा नहीं कि लेखक केवल अपने पुत्र के बारे में ही सोच सोच हलकान है। पारिवारिक चिंता के  साथ साथ साहित्यकार अरविंद शंकर अपने लेखकीय अनुभव भी लिखते जा रहे हैं मसलन -

        दोपहर। उहुँ...। आलस है। लिखने, सोचने, कुछ भी करने को जी नहीं चाहता। बस सो जाउं, यानी थोड़ी देर के लिए मर जाउँ। आज कढ़ी बनी और स्वादिष्ट इतनी थी कि भात अधिक खा गया। अफरन के कारण लिखने की इच्छा नहीं। वैसे भी चालीस की आयु के बाद मनुष्य को भोजनोपरान्त 'वाम-कुक्षि' नींद लेनी चाहिए, आयुर्वेद का प्रमाण है - मैं तो इकसठ का हूँ।- धत् ..बेकार ही अपने इकसठ की आड़ ले रहा है। कल, परसों, नरसों इकसठ का नहीं था ? नहीं लिखता तो न सही, बहाने क्यों बनाता है।

  आगे साहित्यकार फिर अपने परिवार की ओर रूख करते हुए लिखते हैं कि -

       भवानी के बच्चे आ गये। आज सुबह से बहाने-बे बहाने से मैं कई बार घर के अंदर हो आया हूँ। ददिहाल अभी बच्चों के लिये एकदम नई है। उनकी जिद और चीख पुकार से मेरा घर गुंज रहा है। उषा को मैंने ध्यान से देखा, यहाँ आ जाने से उसके चेहरे पर निश्चय ही संतोष की कुछ रौनक सी आ गई है। इन औरतों का मन भी अजब होता है। विवाह होते ही स्वयम् उनके मनों में भी अपने पीहर के लिए परायेपन का भाव आ जाता है। लेकिन ऐसा मानस परिवर्तन शायद सब स्त्रियों में नहीं हो पाता। बहुत सी औरतें मैंने ऐसी भी देखी हैं, जो जन्म भर अपने मैके के महात्म्य को नहीं भूल पातीं। मेरा ख्याल है कि धानाधीशों और सत्ताधारीयों की लड़ैती बेटियाँ ही अधिकतर इस मनोवृत्ति की होती हैं। जो हो, बहुओं की दृष्टि से मैं अब तक सौभाग्यशाली हूँ।
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        इस तरह के तमाम लेखन और अपने जीवन को अभिव्यक्त करते हुए अमृत और विष की कथा आगे बढ़ती चली जाती है। यहां बता दूं कि अपने उपन्यास में लेखक अरविंद शंकर,  अपने पात्रों - रमेश, लच्छू और रानी के जरिये अपने जीवन अनुभव और तमाम बातों को सुरूचिकर ढंग से आगे बढ़ाते हैं। इनकी कहांनिया लिखते समय हो रहे अनुभवों के बारे में साहित्यकार लिखते हैं -

   बहुत चाहने पर भी इधर अपने उपन्यास को मैं तनिक भी आगे न बढ़ा सका। प्रकट रूप में इसका कोई भी कारण मुझे नहीं सूझ रहा। यों मेरा मन इन दिनों प्रतिकूल परिस्थितियों की शिकायत भी नहीं कर सकता। यह भी नहीं कह सकता कि मैं इन दिनों आलस्य में पड़ा रहा। मैं प्राय: आलसी नहीं हूँ, पर अपने जीवन भर के पिछले अनुभवों के आधार पर अवश्य ही कहने को जी चाहता है कि कभी-कभी अकारण ही मेरी कल्पना-शक्ति जमकर काम करने से इन्कार कर देती है। इस शक्ति के विकेन्द्रित होते ही मेरा मन एक असीम आकाश में उड़ने वाले पक्षी की तरह लगातार मँडराता ही रहता है। न छाँह, न विश्राम और न थकन न ऊब ही। चेतना होश दिलाती है कि मनपंछी, अब शून्य या आकाश से उतरो। कार्य-संलग्नता में विश्राम पाओ। विचारों के घनाच्छादित वृक्ष की छांव में , अपनी लगन के नीड़ में स्वस्थ होकर विराजो। लेकिन ये आत्मसंबोधन चिकने घड़े पर पानी की तरह फिसल जाते हैं। न जाने इसके पीछे क्या कारण है। ऐसा लगता है कि मनुष्य की कल्पना शक्ति भी चन्द्रमा की तरह घटती बढ़ती रहती है। और उसके लिए अमावस्या भी कभी न कभी इसी क्रम में आ ही जाती है।.......इस अमावस्या की बात से सहसा ध्यान आया कि चन्द्रमा तो सदा यथावत् ही रहता है, चन्द्र और पृथ्वी के परिक्रमणों से हमें उसके घटने-बढ़ने का भ्रम -मात्र होता रहता है। मेरे जीवन का यथार्थ और कल्पनाशील व्यक्तित्व शायद इसी क्रम में मेरे काम के लिए पूनम और अमावस आते ही रहते हैं।

  कुल मिलाकर मेरी नज़र में एक उत्कृष्ट कृति है। साहित्य रसिकों के लिये यह उपयुक्त तो है ही, और भी बातों जैसे जीवन के अनुभवों, मूल्यों, आस्था, नैराष्य, आलस्य,  आदि तमाम बातों को समझने, जानने के लिये एक श्रेष्ठ कृति है 'अमृत और विष'।

- सतीश पंचम


पुस्तक अंश - अमृत और विष
लेखक-  अमृतलाल नागर
लोकभारती प्रकाशन
मूल्य - 195 /- (पेपरबैक संस्करण)

Sunday, May 15, 2011

शासक की 'मंशा' और शासित की 'दशा'......अजबै घात-प्रतिघात

        इधर पांच राज्यों में चुनाव हुए नहीं कि तड़ से पेट्रोल के दाम बढ़ा दिये गये, कुछ इस अंदाज में कि जैसे सरकार बस इन्हीं चुनावों का इंतजार कर रही हो कि एक बार चुनाव निपटे तो दाम बढ़ाये जांय। खैर, दाम पहले भी बढ़ते रहे हैं, अब फिर बढ़े हैं और आगे भी बढ़ते रहेंगे। इसमें कोई नई बात नहीं है। लेकिन जिस तरह से चुनावों को ध्यान में रखकर अब तक दामों को बढ़ने से रोका गया और चुनाव निपटते ही दाम तेज कर दिये गये वह सरकार की नीयत और उसके शुचिता पर अनेक सवाल खड़े करता है।


       सवाल इसलिये, क्योंकि कोई भी सरकार अपनी जनता को धोखे में रखकर वोट बटोर लेने के बाद, जब तुरंत ही अपने किये गये वादों के विपरीत दाम बढ़ाकर अपनी तिजोरी संजोने में लग जाय तो यह राजनीतिक दृष्टिकोण से भले ही पॉलिटीकल करेक्टनेस कहलाये, किंतु नैतिक दृष्टि से उचित नहीं कहलाएगा। देखा जाय तो चुनाव होते ही, तुरंत दाम बढ़ाना एक तरह से घात लगाकर जनता को ठगने सरीखी बात है। लोगों ने विश्वास करके अपने वोट दिये थे, कि और बोझ न भी पड़े, कम से कम यथास्थिति तो बनी रहे, लेकिन यहां यथास्थिति की कौन कहे, चुनाव होते ही व्यथास्थिति ही दिखाई दे रही है। जाहिर है, जब सरकार की मंशा ही सही नहीं है तो क्या यथास्थिति और क्या व्यथास्थिति....सब बराबर। अब पेट्रोल के बढ़े दामों की वजह से महंगाई बढ़े तो बढ़े, सरकार को क्या फर्क पड़ता है। अब तो चुनाव हो गये। आगे जो होने वाले भी हैं तो अभी साल- डेढ़ साल का बखत बाकी है। तब तक तो सरकार सांस ले-ले तो क्या हर्ज है।

        उधर अदालत की ओर से अनाज सड़ने पर चिंता जताई गई है और निर्देश जारी किया गया है कि इस बार फसल अच्छी हुई है, देश में भुखमरी न होने पाये, राज्य अपने अपने कोटे का अनाज उठा लें।

     अब इस निर्देश का कितनी कड़ाई से पालन किया जाता है, पालन होता भी है या नहीं, ये तो वक्त बतायेगा, लेकिन इसमें शंका नहीं कि यदि इन छोटे-छोटे कदमों को ही यदि ध्यान में रखकर कार्यक्रम तय किये जांय और उनका सख्ती से अनुपालन हो तो बार बार महंगाई का रोना न रोना पड़े। तेलों के दाम यदि अंतरर्राष्ट्रीय बाजार के दबावों के चलते बढ़ें भी तो खाद्यानों की प्रचुर उपलब्धता से दाम तो काबू में रहें ही। यह तो कोई बात नहीं हुई कि हमारी सरकारें तेल के दाम बढ़ाने को लेकर अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार का नाम ले अपनी लाचारी जतायें लेकिन देश के भीतर ही उन कदमों को उठाने से परहेजी करें जिनसे कि खाद्यानों की सर्व-सुलभता सुनिश्चित हो रही हो।

        फिलहाल, उम्मीद तो यही की जा रही है कि कैबिनेट में स्थित तमाम महान आत्माएं अबकी खाद्यानों को सड़ने न देंगे और तेल के बढ़े दामों के बावजूद महंगाई को नियंत्रित कर पाएंगे। वैसे, अब तक प्राप्त अनुभवों से कम से कम उम्मीद तो रख ही सकते हैं, इतना तो हक बनता है......वास्तविक रूप से इन अदालती निर्देशों का क्रियान्वयन होना न होना अलग बात है :)


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां का शेयर मार्केट तेल के बढ़े दामों के आलोक में सोमवार के दिन 'झुल्लन-टुल्लन' होने को बेताब है ।


शासक की 'मंशा' और शासित की 'दशा' - अजबै घात-प्रतिघात  

समय - वही, जब रोमन शासक को जनता की ओर से फसल अच्छी होने के उपलक्ष्य में भेंट प्रस्तुत की जा रही हो और पीछे खड़ी उसकी रानी कहे - फसल अच्छी होने का मतलब है कि लोगों का पूरा ध्यान अपनी खेती पर रहा है। तब तो जरूर पिरामिड, क्रीडागार, और वो तमाम पत्थरों से होने वाले मूर्ति निर्माण स्थल आदि जनता द्वारा  दुर्लक्षित हुए होंगे।

   और तभी रोमन राजा अपनी प्रिय रानी से रोश प्रकट करते हुए कहे - हे रानी, होश में आओ...... यह रोम है..... कोई उत्तर प्रदेश नहीं।


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चलते चलते -

 मेरे दूसरे ब्लॉग Thoughts of a Lens की ताजा तस्वीर

Thoughts of a Lens  (http://lensthinker.blogspot.com) - Satish Pancham

Sunday, May 8, 2011

मेरा नया ब्लॉग.....Thoughts of a Lens.......सतीश पंचम

      कहते हैं कि हर इंसान में कभी न कभी, किसी न किसी बात का शौक चर्राता है, और जब चर्राता है तो नज़र भी आता है। मसलन, किसी को पढ़ने का शौक चर्राता है, किसी को लिखने का, किसी को खेल का तो किसी के पास फिल्मी चर्राहट होती है। मजे की बात यह कि शौकों का चर्राना ज्यादातर इंसानों में ही नज़र आता है, जानवरों में नहीं। यदा कदा जानवरों में दिखे भी तो उसका चर्राना या तो नज़र नहीं आता या फिर लोग उनके शौके-चर्राहट को नज़रअंदाज कर बैठते हैं। मसलन, किसी बैल को जुगाली करते करते अचानक सिंगों की खुजास मिटाने हेतु लड़-भिड़ जाने का शौक चर्राने लगता है, तो किसी भैस को दूध देते समय ग्वाले को लतियाने का शौक चर्राने लगता है, कहने का मतलब ये कि किसी के शौक कब चर्रा उठें कुछ कहा नहीं जा सकता :-)


     अब आउं असल बात पर। दरअसल मुझे फोटोग्राफी का शौक कुछ साल पहले तब चर्राया था, जब मैनें  एक डिजीटल कैमरा खरीदा था। तब मोबाइल में कैमरा आम नहीं हुआ था, बल्कि केसर - कस्तूरी जैसे ही कुछ हालत थी। किसी महंगे मोबाइल में दिख जाय तो दिख जाय, वरना आम मोबाइल कुछ यूं होते कि बात हो रही है, एहसान मानों....फोटू खेंच कर क्यों अपना टैम और मेरी बैटरी खोटी कर रहे हो म्यां। तो भई उस दौरान मैंने अपने डीजी कैम से कई फोटूएं खेंची थीं। रोल शोल का झंझट तो था नहीं कि ले जाकर स्टूडियो धुलाना पड़े या फिर नेगेटिव खराब हो जायेंगे। जितने मन आए उत्ते फोटो खेंचो। तो भई उसी खेंचा खेंची में मेरा शौक-ए-फोटोग्राफी पुरजोर चर्राया। कहीं कुकुर-बिलार दिखता तो खेंच लेता, गांव का कोई पेड़-पौधा या फुनगी-डाली न बची थी जो छूट गई हो खिंचने से। उस समय जाना कि किसी शौक का चर्राना, साधनों की सुलभता पर निर्भर है, न कि आनुवंशिकता पर, जैसा कि डार्विन-वादी वैज्ञानिकों का मंतव्य रहा है कि, आनुवंशिक गुण ट्रेल करते हैं अपने आगे की पीढ़ियों में। कम से कम फोटोग्राफी जैसे मामले में तो आनुवांशिकी आंशिक रूप से फेल होती दिखती है ( अब ये मत कहियो कि गुहा मानवों के बनाये भित्ति चित्र डार्विनवाद की पुष्टि करते हैं :)  भित्ति चित्र एक तरह से चित्रकारी की आदिम तकनीक थी जिसके वाहक एम एफ हुसैन जैसे जीव जंतु बने......राजा रवि वर्मा जैसे लोग बने, जबकि फोटोग्राफी उसी से जुड़ी कुछ चीज जैसी तो है, पर चित्रकारी नहीं। इसलिये मैं कह रहा हूँ कि डार्विनवाद फोटोग्राफी के मामले में आंशिक रूप से काम नहीं करता। फोटोग्राफी पूर्णतया नया चर्राना है, चित्रकारी आदिम चर्राहट :) 


  खैर, अपने इस फोटोग्राफी वाले शौक की चर्राहट कहूं या ब्लॉगर प्लेटफार्म जैसे साधन की सुलभता कि अपने उस शौक को मैंने एक अलग ब्लॉग के रूप में पेश कर दिया है, एक अलग ब्लॉग बना लिया है। मतलब कि अब सफ़ेद घर के साथ साथ मेरा दूसरा ब्लॉग Thoughts of a Lens भी होगा जिस पर मैं अपने फोटोग्राफी के शौक को पेश करता रहूंगा।  यूं तो पहले भी सफ़ेद घर पर कई बार अपने द्वारा खेंची तस्वीरों को पेश करता रहा हूँ, लेकिन यह उचित जाना कि फोटोग्राफी के लिये अलग ब्लॉग रहे तो अच्छा रहेगा। गिरिजेश जैसे मित्र हैं कि इस शौक-ए-चर्राहट में घी का काम करते हैं और चर्राहट...जोर मारने लगती है :) 


  पेश है मेरे कुछ चित्र जो पहले भी सफ़ेद घर में छपे हैं, अब Thoughts of a Lens पर अपने नये नवेले चित्रों के साथ नज़र आएंगे। 


  तो लिजिए, नोश फरमाइये......Thoughts of a Lens


पहले मेरे कुछ सफ़ेद घर के चित्रों पर नज़र डाल लें, तत्पश्चात नये ब्लॉग पर तफ़रीह :)


शुरूवात....ललछहूँ मट्ठे से :)






































 उम्मीद है जैसा स्नेह अब तक आप लोगों का सफ़ेद घर को मिलता रहा है, वैसा ही स्नेह Thoughts of a Lens को भी मिलता रहेगा जिसका कि URL है - http://lensthinker.blogspot.com




- सतीश पंचम


स्थान - मुंबई


समय - सात पैंतालीस

Saturday, May 7, 2011

'तबकेबाज भारत' की 'तबक्की जनता'

 सुविधाभोगी जूतों की आरामखोरी v/s मेहनतकश चप्पलें 
      कभी कभी मुझे लगता है कि भारत और इंडिया दो अलग देश हैं, जिनकी जमीन की रजिस्ट्री एक ही आफिस में, एक ही टेबल पर साथ-साथ हुई, लेकिन उस रजिस्ट्री के बाद भारत अपने उन कागज पत्तरों संभालने में लगा रहा जबकि इंडिया उन्हीं दस्तावेजी कागजों के राकेट बना हवा में उड़ाता रहा। 

     देख रहा हूँ कि इंडिया जो कि अपने दस्तावेजों के राकेट बना बना कर उड़ा रहा था, अब सचमुच हवा में उड़ने लगा है....सीधे आसमान की ओर.....रूपयों की पतंग और सुविधाओं की डोर थामें-थामें तो उधर भारत आज भी अपने उन्हीं कागज पत्तरों को संभालने में लगा है।  दरअसल मौका था यूनिक आईडेंटिफिकेशन कार्ड बनवाने का जिसके बारे में पूछताछ करने मैं अचानक ही मुंबई के एक सेन्टर में जा पहुंचा। अचानक इसलिये कि आज शनिवार के दिन बिजली का बिल भरने जब जा रहा था तब रास्ते में पड़ने वाले स्कूल के बाहर जुटी भीड़ से पता चला कि यहां यूनिक आइडेंटिफिकेशन कार्ड बनाया जा रहा है और ये भीड़ उसी के लिये एकत्रित है। मैंने थोड़ा रूककर और जानकारी लेना ठीक समझा क्योंकि देर सबेर मुझे भी यह कार्ड परिवार सहित बनवाना तो ही है।

      मैंने ध्यान दिया तो जो भीड़ थी वो पूरी की पूरी आस पास की झुग्गियों के लोगों की थी, उनमें ज्यादातर सब्जीवाले, दूधवाले, आटोवाले, टैक्सीवाले, छोटे दुकानदार जैसे लोग ही थे, कोई नौकरीपेशा या कह लें कि सुविधाभोगी वर्ग का शख्स न दिखाई पड़ा। वैसे भी सब्जी, दूध वाले इसी तबके को मैंने देखा है कि इलेक्शन के दौरान यही अभावग्रस्त  तबका जमकर हिस्सा लेता है, जबकि अपने लिये सुविधाओं की मांग करता, चें...चें...पें पें करता  सुविधाभोगी वर्ग उस दिन सिविक सेंस छोड़ अचानक 'सिनिक' हो उठता है...."हमारे एक वोट से देश में कोई बदलाव न होगा" सोचते हुए छुट्टी मनाता अपने घर पर पड़ा रहता है।
  
   एक जन से जब मैंने पूछा कि क्या करना होगा, कौन कौन से डाक्यूमेंट लगेंगे तो दो जन पास आते हुए साथ साथ बोले - पैन कार्ड, राशन कार्ड का 'झिराक्स' लगा दो, इलेक्सन कार्ड का भी।

- उसके बाद ? 

- उसके बाद फार्म जमा करने का....एक दिन कागद-बीगद चेक करेगा..... बाद में ओ लोग बोलेगा कि कबी आके फोटो बिटो 'पाड़ने' का....ओ दिन फेमिली का सब लोग को लाके फोटो खिचाने का।

- कितना तारीख तक चलेगा ? 

- साल से उपर चलेगा अभी तो ।

- साल से उपर ?

- हां, फिर क्या ? इतना जल्दी नईं होने का.....कितना पब्लिक है....सबका बनाते बनाते साल तो निकलना मांगता - दूसरा हंसते बोला।

      मै भी मुस्कराते हुए आस पास का मुआयना करता रहा। मन ही मन सोच रहा था कि, मैंने पूछा तो एक ही शख्स से था लेकिन बताने के लिये दो चार जन बता रहे थे।  कहीं मैं शक्ल से लल्लू तो नहीं लग रहा हूँ :-)
    
     जहां तक मैं जानता हूँ.....आपको यदि किसी कागजी काम में जानकारी नहीं है तो जिस किसी को भी उसके बारे में जानकारी होगी तो वह जरूर आगे बढ़कर मदद करता है, जबकि तथाकथित             सुविधाभोगी वर्ग ऐसे समय या तो अपने मोबाइल में नजरें गड़ाये गिटिर पिटिर करेगा या थोड़ा बहुत बता कर टरका देगा।  

  अभी मैं ये सब पूछ ही रहा था कि एक महिला लाईन में झगड़ने लगी....लोग कहते कि लाईन से आओ तो वह अपनी तेरह चौदह साल की बेटी की ओर इशारा करते कहती - इसको इस्कूल को जाने का है.....खाड़ा हो जाएगा.....कल भी आया था ....पेपर बरोबर नईं बोल के वापस भेजा। 

 मुझे अचरज हुआ कि स्कूलों में तो छुट्टी चल रही है गर्मियों की....फिर ये बच्ची किसी भी एंगल से ऐसे 'बजर-बोर्ड' की नहीं प्रतीत हो रही थी जोकि गर्मियों में स्कूल चलाते हों। खैर, थोड़ी बहुत झिकझिक के बाद वह महिला अपनी बेटी समेत लाईन में लग गई। मैं दो चार मिनट और वहां खड़ा रहा फिर अगले किसी दिन आने की सोच चल पड़ा। 

          अब जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूँ तो सोच रहा हूं कि ये वही भारत है जो अक्सर इलेक्शन कार्ड बनवाने, राशन कार्ड बनवाने की लाइनों में ज्यादातर दिखाई देता है, जबकि अखबारों में कालम लिखने वाला तथाकथित चिंता जताने वाला इंडिया ऐसे किसी लाइन में नदारद नज़र आता है और यदा कदा दिखाई भी देता है तो मीडिया के कैमरे के सामने अपनी उंगली पर लगे काले निशान को दिखाता हुआ.....मानों एहसास दिला रहा हो कि देखो......अपनी छुट्टी तुम लोगों पर कुर्बान किया हूँ.....एहसान तो मानों  यारो :-)
  
    
- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर मेरा 'यूनिक आइडेंटिफिकेशन कार्ड' कॉन्सेप्टायन स्टेज पर है।
 
समय - एक पच्चास..... 

( रिक्शे में सफर करते टंगड़ियों को अबकी गाँव जाने पर खुद ही खेंचा था.....जबकि बाकी के चित्र गूगल बाबा से साभार अधिभार सहित  :)

Monday, May 2, 2011

पैठ बनाने की हसरतें v /s इस्तेमाल होते ब्लॉगर

        अक्सर देखा गया है कि लोगों की फितरत होती है किसी के लिये भी चाहे-अनचाहे जी हजूरी करने की या कहें कि हीही फीफी करते समय बिताने की । यह फितरत कई बार इतना ज्यादा उनके व्यवहार में घुल मिल जाती है कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि वह कोई ऐसी वैसी हरकत कर रहे हैं जिसे अमूमन जी-हजूरी की संज्ञा दी जाती है। मुसीबत ये कि लोगों की इसी फितरत को पहचान जुगाडु प्रवृत्ति के लोग अपनी सामाजिक पैठ बनाने में उनका इस्तेमाल करना चाहते हैं और बखूबी इस्तेमाल करते भी हैं।

      अभी हाल ही में दिल्ली वाले कार्यक्रम को लेकर जिस तरह की हाय तौबा मची है उसी को देखा जाय तो यह स्पष्ट हो जायगा कि कैसे कुछ लोगों द्वारा अपना रूतबा बढ़ाने, प्रभाव जमाने जैसी अभिलाषा के चलते ब्लॉगरों का इस्तेमाल किया गया,  कैसे लोगों की निजी महत्वाकांक्षा की खुराक बनने हेतु ब्लॉगर यूटिलाइज किये गये, कैसे चाटुकारिता के आभा मंडल के चलते खुशदीप जैसे ब्लॉगर को आहत हो गुड बाय पोस्ट लिखने की नौबत आन पड़ी। खैर, ये 'टंकी-युग' चलता आया है, चलता रहेगा। कईयों को आहत (? ) हो टंकी पर चढ़ते देखा है और कइयों को उतरते। वह अलग विषय है, फिर कभी।

   फिलहाल तो यहां मेरा मानना है कि क्या जरूरी है कि हम किसी के प्रभामण्डल में शामिल हो उसी के हिसाब से अपनी गतिविधियां संचालित करें, उसी के घेरे चक्रव्यूह में चाहे अनचाहे ब्लाइण्ड फॉलोअर बनते रहें ?  क्या यह हमारी गुलाम मानसिकता का प्रतीक नहीं है कि हम ब्लॉगर जैसे स्वतंत्र प्लेटफार्म मिलने के बावजूद अपनी मानसिकता एक किस्म की जी-हजूरी की ओर झुकाये रखते हैं। अरे कभी तो अपने आप को स्वतंत्र रहकर सोचो यार , कि जरूरी है 'गुलाम तासीर' को खुराक पहुंचाई ही जाय।

    जब भूसे की तरह पुरस्कार घोषित किये जा रहे थे तभी लोगों को शक हुआ था कि ये पुरस्कार है या घेटो क्रियेशन।  और लोग थे कि गदगद ..... कि हमें पुरस्कार मिला.....।  भूल गये कि इसकी तह में एक सड़ांध है जो गाहे-बगाहे किन्हीं बंदों की सामाजिक पैठ बनाने हेतु दिमागी खुराक है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।  ऐसे बंदे जानते हैं कि लोगों का कैसे इस्तेमाल करना चाहिये, मजमा कैसे जुटाना चाहिये और उस जुटे मजमे को कैसे अपने हिसाब से इस्तेमाल करते हुए पैठ बनाना चाहिये।  दिल्ली प्रकरण उसी की एक मिसाल है।

  यहां सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों लोग अपने आपको किसी के लिये इस्तेमाल होने देते हैं, क्यों अपने आप को एक स्वतंत्र इकाई मानने से बचते हैं। माना कि लोग समूह में रहते हैं, समूह में सोचते हैं, एक तरह से सोशल एनिमल हैं, बावजूद क्या जरूरी है कि अपने सोशल स्टेटस को ही ताक पर रख दें। वही सोचें जो हमें दूसरे सोचने को कहें, वही करें जो हमें दूसरे करने को उकसायें....ये कहां की बुद्धिमानी है। पुरस्कार आदि बांट कर जो लोग ब्लॉगरों के धड़े को अपना मान खुश हो रहे थे तो यह उनकी बहादुरी नहीं, यह ब्लॉगरों की कमजोरी थी जो कि बिना किसी विचार-मनन के भूसे की तरह बंटते पुरस्कारों पर इतराते रहे, आत्ममुग्ध रहे। शायद यह आत्ममुग्धता उनकी नियति थी, है  और आगे भी रहेगी........ और तब तक रहेगी जब लोग अपने आपको गुलाम मानसिकता से ढंके रहेंगे, स्वतंत्र सोचने विचारने के प्लेटफार्म पर भी समूहन को न्योतेंगे।

      वैसे, इस पुरस्कार वितरण-ग्रहण आदि के बारे में कुछ लोग चाहे जितना भ्रम पालें कि जब कोई पुरस्कार 'कह कर' दे रहा हो तो कोई कैसे इन्कार करे, आखिर कुछ सोच कर ही तो दे पुरस्कार दे रहा था, लेकिन लोग अंदर से जानते हैं कि इस तरह के भूसैले पुरस्कारों की क्या अहमियत है। वह यह भी खूब समझते हैं कि इन सब में उसकी वाकई कोई सार्थक भूमिका है या महज किसी की महत्वाकांक्षा पूर्ति हेतु खुराक बना हुआ है।

 और अंत में,

          कहा जा रहा है कि लोग अपनी विनम्रता के चलते इस कार्यक्रम में उपस्थित हुए, भ्रष्टाचार के आरोपी से पुरस्कृत हुए, हंसे-मुस्कराये...ब्ला...ब्ला किये....। लेकिन इसी विनम्रता को लेकर मेरा मानना है कि आप भले ही सौ में से निन्यानबे प्रतिशत विनम्र बने रहिये, अपने बात व्यवहार में विनम्रता का पैमाना निन्यानबे प्रतिशत बनाये रखिये, लेकिन अपने आप में एक पर्सेंट का दम्भ जरूर रखिये क्योंकि यह एक पर्सेंट का दम्भ ही है जो आपके उस निन्यानबे प्रतिशत की दशा और दिशा निर्धारित करता है। कल को यह नहीं हो कि कोई भी ऐरा-गैरा आकर आपको अपने बात से प्रभावित कर अपना काम निकाल ले, सिर्फ इसलिये कि आप विनम्र स्वभाव के हैं....नहीं.....ऐसे समय उस एक पर्सेंट के दम्भ को आगे करिये और झटक दिजिए ऐसे तत्वों को जो आप का इस्तेमाल अपने लाभ के लिये, अपने जमावड़े के लिये करना चाहते हों।

 खैर, ब्लॉगिंग-फ्लॉगिंग को लेकर अभी न जाने कितने की-बोर्ड खटखटाये जायेंगे, किड़बिड़ाये जायेंगे.....लेकिन  जरूरत यही है कि इस स्वतंत्र प्लेटफार्म पर अपना स्वाभिमान बनाये रखा जाय, किसी के लिये खुद को इस्तेमाल न होने दिया जाय। जिन्हें इस तरह का शौक हो कि अपने आगे पीछे दो-चार 'चन्टू-बन्टू' लिये हुए विचरण करने का, तो उन्हें विचरने दिया जाय....शायद यही उनकी नियति है....ब्लॉगर क्यूं विचरे।   

   
- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां इस वक्त की-बोर्ड खटखटा रहा हूं।

समय -  सात-पांच 

Sunday, May 1, 2011

यात्रा भोज

अपनी मुंबई वापसी की इस लंबी दूरी वाली यात्रा के दौरान देख रहा हूँ कि
बगल के बर्थ वाले यात्रियों के पास घर से बनाकर लाये भोजन में ज्यादातर
भरवां करेले की सब्जी और पूड़ी है।

खुद मैं भी घर से आते समय करेले की सब्जी और पूड़ी लेकर निकला हूँ।

शायद करेला हम भारतीयों की लंबी दूरी की यात्रा के दौरान ऑलटाईम हिट
आलू और रेल के पैंतालीस-पचास की थाली पर अब भी भारी है।

-सतीश पंचम

स्थान - नासिक से गुजरते हुए।

समय - गियारह दस्स।


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- Satish Pancham

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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