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Saturday, April 30, 2011

रूबाबी पावर

आज हफ्ते भर की छुट्टी गाँव में बिता कर वापस मुंबई लौट रहा हूँ। सुबह
सुबह के माहौल के बीच बनारस से गाड़ी पकड़ने के लिये सरकारी रोडवेज बस से
जाने की बजाय प्राईवेट बस से सफर कर रहा हूँ। पीछे कन्डक्टर किसी से बहस
में उलझा था। रह रहकर बाकियों से टिकट पूछ रहा था, पैसे ले दे रहा था।
हरहुआ के पास बस रूकी और कोई यात्री उतरा। उसके उतरते ही कन्डक्टर ने कोई
गंदी सी गाली दी। पास बैठे एक यात्री ने यूं ही पूछा - का भईल हो ?
कंडक्टर ने उसी रौ में बड़बड़ाते कहा- अरे वही पुलिसवा यार......ससुर लोग
पराईबेट जानके जब देखिए तब कपार पे सवार रहते हैं.....कमाएंगे कंडालन
रूपईय्या औ किराया मांगो तो गां* खोल देंगे। एतना पे भी रूबाब हाईए
रहेगा।
- अरे त का करब......सरकारी मनई अईसे होता है......तिस पर पुलिस त अउरो ।
- अरे त किरायौ त देना चाहिये कि कुल बहादुरी उतना सा किराया बचा लेने
में ही है। साले लोग पराईबेट जान के हरदम परेसान करता है कभी ये कागज
दिखाओ.....कभी वो दिखाओ.....कागज बराबर रहेगा तो भी सौ पचास उपर से
दो......चाह पानी खातिर.......एनकरी बहिन क भो** मारौं ए लोग के घर में
चाह पानी नहीं मिलता है न तभी पराईबेट वालन से बटोरता है। बाकि हम तो इहे
कहेंगे कि मरिहौ त पराईवेटै वाला गाड़ी फूंकने के लिये ले जायगा घाट
पर......सरकारी नहीं।
- अरे त का करोगे.......
- का करोगे वाला सवाल नहीं है......क्या हमारे बच्चे नहीं हैं ......उनकी
फीस पानी नहीं लगती है कि सेंत में ही बड़े हो जाते हैं.......अरे हम
मेहनत करते हैं तो चार पईसा मिलता है ....ये लोग के तरह नहीं कि लाठी
ठकठका के पईसा कमाओ। अरे मैं तो कहता हूँ कि ई पुलिसिया साला जो अभी उतरा
है ई जब मरीहे त हम आम के लकड़ी न देब फूंके खातिर.......बबूरे (बबूल)
वाली लकड़ी देब। जेतना अनेत करते हैं ये लोग सब भगवानै जानते हैं। अबहीं
पिछलै हफ्ता रात के समय उहै फाटका के पास सबका गठरी मोठरी खोल के एक रात
को चेक कर रहा था, उसमें क्या है इसमें क्या है.....थोड़ा निकालो.....ससुर
वहीं पैरवा फंस गया औ छींटा गया जगहीये पर। बाद में जी आर पी वाले चेक
किहिन तो चउवन हज्जार रूपिया जेबै में मिला साले ।

कंडक्टर की बातें सुनकर लगा कि वह पुलिस वालों की अवैध वसूली और बिना
टिकट रोज आने जाने वाली आदत से बेहद त्रस्त है, तभी उसके मन में पुलिस
वालों के प्रति इतनी घृणा ने जड़ जमा लिया है। इन्हीं सब बातों से दो चार
होता हुआ बनारस आ पहुंचा।

अभी गाड़ी आने में समय था इसलिये मुसाफिर खाना में अखबार बेच रहे एक
नौजवान से अखबार खरीदा। हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी अभियान प्रमुखता से
छापा गया था। ब्रिटेन की शाही शादी को भी बहुत हाईलाईट किया गया था।
उधर गाड़ीयों की आवाजाही को लेकर अनाउंसमेंट चल ही रहा था कि कहीं से
पुलिस के सात आठ जवान आ पहुंचे। उनके आगे आगे सादी वर्दी में कोई
पुलिसिया अधिकारी चल रहा था। अखबार वाले छोकरे को देखते ही उस अधिकारी ने
अपने पास स्थित एक छड़ी से जोरदार वार किया। अखबार वाला छोकरा जैसे इसके
लिये तैयार बैठा था, तुरंत अपने अखबार को बीच में लाते हुए पुलिसिया वार
झेल गया। तुरत फुरत अखबार समेटते हुए हट गया। लेकिन थोड़ी देर बाद फिर उसी
जगह पर आ खड़ा हुआ जहां से भगाया गया था। अबकी उसने अखबारों को जमीन पर न
बिछा हाथों में लेकर खड़े खड़ बेचना शुरू किया। चार पांच मिनट बाद दो तीन
और किशोरवय बच्चे हाथों में अखबार लिये आ गये और उससे सहानुभूति-पूर्वक
कुछ पूछने लगे संभवत: जानना चाहते थे कि जोर से तो नहीं लगा।

इन दोनों केसेस को देखकर अजीब अनिश्चय की मन:स्थिति बनती है कि आखिर
पुलिस का कौन सा चेहरा उसके कर्तव्यनिष्ठा से मेल खाता है ? प्राईवेट बस
आपरेटरों को जहां तक मैं समझता हूँ उनकी मनमानी से सभी परिचित होंगे ही,
लेकिन एसे मे जान बूझकर वर्दी का धौंस दिखाते हुए उन्हें परेशान करना
कहीं न कहीं अनुचित जान पड़ता है। इसके उलट जब बनारस स्टेशन पर अनधिकृत
अखबार वाले को मारते हुए परिसर से भगाता है तो वह कर्तव्य के रूप में भले
सही लगे लेकिन तौर तरीके से अनुचित जान पड़ता है।

एक ओर जीविका के लिये लोग जहां तक हो सके अपने से हाथ पैर मार रहे
हैं, अपनी गरीबी को झटक फेंकने के लिये जी तोड़ कोशिश करते हैं लेकिन
वर्दी वाला यह प्रशासनिक अमला है कि जी-तोड़ कोशिश की विसंगतियों पर चोट
करता दिखाई दे जाता है। कुल मिलाकर जनता के बीच ही असमान विकास की बड़ी
गड्डम गड्ड सी एक तस्वीर उभरती है।
संभवत: इस तस्वीर को समझने का एक तरीका ये हो सकता है कि हमें पता रहना
चाहिए कि हम विकासी टेबल के किस ओर बैठे हैं....... ऐसा विकासी टेबल
जिसके दूसरी ओर विकसित-सुविधाभोगी वर्ग दिखाई दे रहा है तो दूसरी ओर
कमजोर, लड़खड़ाता विकासशील भारत जो अपनी गरीबी और फटेहाली को ड्राईवर,
खलासी, परचून, दूध वाला आदि के जरिये ढंकने की कोशिश करता दिखाई पड़ रहा
है। वही तबका जो कल तक टेबल के इस ओर था, अपने हमपेशे से कुछ सहानुभूत
वाला व्यवहार रखता था.... अलग ढंग से पेश आता था, वही तबका टेबल के दूसरी
ओर जाते ही अलग व्यवहार करने लगा। माने सब कुछ ये जो हम सिस्टम को लेकर
हलकान रहते हैं वो एक विकासी टेबल के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है.....उसी के
हिसाब से हमारा नजरिया बनता है, बिगड़ता है और कभी कभी दिग्भ्रमित भी हो
जाता है।

- सतीश पंचम

स्थान - बनारस- दादर स्पेशल डिब्बे का लोअर बर्थ।

समय - यही कोई तीन-ऊन बजे होंगे।

Tuesday, April 26, 2011

पुरूवा कि पछुआ

यूं तो फिल्मों में और तमाम रूमानियत भरे गीतों में पूरवा हवा का बड़ा
मनमोहक वर्णन किया गया होता है, बड़ा बखान होता है...मेरे देश में पवन चले
पुरवाई....मेरे देश में.....या फिर चले चले रे.... चले पवन पुरवईया....
....ब्ला ब्ला। लेकिन जो लोग खेती किसानी में हैं वो जानते हैं कि इस
पुरवईया पवन से गेहूं की दंवाई, ओसाई के वक्त कितनी मुश्किल उठानी पड़ती
है। अभी जब मुंबई में था तब घर फोन करने पर पता चला कि रात में बारिश आ
जाने से खेतों में कट कर रखे गेहूं के बोझ भीग गये हैं। सुनते ही मन
खराब हो गया । दैव को भी अभी ही बरसना था क्या....फिर ये बरखा बुन्नी के
दिन भी तो नहीं हैं कि बरसा जाय। दिन भर मन व्यथित रहा कि इतनी मेहनत से
गेहूँ की तैयार फसल पर दैव की टेढी निगाह पड़ गई.....मन ही मन द्वंद्व
चलता रहा कि मैं यहां क्या कर रहा हूं। खेती किसानी वाला ये अर्ध-शहरी
मन दिन भर इन्हीं सब बातों से गुणा भाग करता रहा और शाम तक निश्चय कर
लिया कि हफ्ते भर के लिये ही सही गांव हो आउं, अपने अम्मा बाबू से मिल ही
आउं।
इधर निश्चय हुआ और मेरे समस्त क्रिया-कलाप मेरी इस संभावित यात्रा
की ओर केन्द्रित होते चले गये। इसी बीच छुट्टी वगैरह और तमाम आफिस के काम
निपटाते उपटाते दो दिन निकल गये। रेल्वे की हनुमान्यॉटिक ततकाल सेवा की
वजह से अपना डेरा-डम्मर उठाये गांव पहुँच गया।
यहां आकर देख रहा हूं कि अब भी उन गेहूँ के गीले बोझों को खोल-खालकर
सुखाया जा रहा है, धूप में कड़ा किया जा रहा है। लेकिन सारी मेहनत निष्फल
किये दे रही है यह पुरवा हवा जिसकी खासियत होती है कि यह फसलों के डंठल
को नर्म कर देती है और उससे फसलों की दंवाई करने में अच्छी खासी
मुश्किलों से रूबरू होना पड़ता है।
मसलन, जब पुरूआ हवा की वजह से गेहूँ के डंठल नर्म पड़ जाते हैं तो
थ्रेशिंग के वक्त बार बार थ्रेशर के ब्लेडों से लपेट उठते हैं और मशीन
बंद कर उन ब्लेडों को साफ करना पड़ता है। जो कुछ दंवाया जाता भी है तो
उसमें ढाठा ज्यादा निकलता है, भूसा कम जिससे पशुओं के चारे में दिक्कत
आती है। जबकि यही डंठल कड़े होते तो थ्रेशर के ब्लेडों से टकराकर गेहूँ और
भूसे के रूप में पूरे पौधे को बारीक हिस्सों में तोड़ देते और पंखे की
सहायता से ओसाई के जरिये गेहूँ और भूसा अलग अलग फेंक देते हैं।
वहीं यह भी देखने में आया कि पूरवा हवा की नर्माहट लिये गेहूँ के डंठल
जब ज्यादा तेजी से घूमने वाले थ्रेशिंग ब्लेड से टूटने की बजाय लपेट उठते
हैं तब बहुत तीव्र घर्षण होता है और थ्रेशर से भूसे के साथ साथ चिंगारी
निकलने लगती है और एअर पैनल के जरिये ओसाये गये भूसों के ढेर में जा
गिरती है। फिर तो जरा सी हवा चलने की देर है, आग और भूसा तैयार है ही।
अभी पिछले दिनों इसी तरह के वाकये के कारण पास के गाँव में कई जगह भूसे
अचानक सुलग उठे और कई घर चपेट में आ गये। इन सब के कारणों पर विचार किया
गया तो यही माना गया कि शुरूवात में ही पछुआ हवा यदि चली होती तो गेहूँ
के बोझों में नर्माहट न आती और हादसा न होता।

फिलहाल ये मौसम है कि रात में फिर बारिश हुई, गेहूँ के बोझ फिर भीग गये
हैं। अब तो उन्हें अलट पलट कर सुखवाने का भी मन नहीं करता कि जब धूप होगी
तब देखा जायगा अभी से क्यूं जान देना। लेकिन वह किसान ही क्या जो थक हार
जाय, अभी फिर रह रह कर उलटने पलटने का काम शुरू कर दिया जायगा। मेहनत
अपनी ओर जीवट तत्व खींच ही लेती है।

- सतीश पंचम

Sunday, April 24, 2011

ह्यूमिलियेशन

यात्रा के दौरान गरीब रथ से जबलपुर उतरकर तीन घंटे बाद वाली रांची एक्सप्रेस का इंतजार कर रहा हूं। प्लेटफार्म पर मेरे बगल में कोई महिला अपने बारह तेरह साल के दो बच्चों के साथ बैठी है। बच्चे हंस बोल रहे हैं अपनी मम्मी से। सामने ही जबलपुर रीवा पैसेंजर आकर लगी है। पब्लिक धड़धड़ा कर जा चढी है। सारी सीटें भर उठी हैं। एक बच्चा उबकर अंगड़ाता कह रहा है, मम्मी पापा कब आएंगे। मां भी कुछ व्यग्र भाव से कहती है आते ही होगे। इतने में एक पैंतीस चालीस का शख्स हांफते हुए आया और जोर से डांटते हुए बोला - मैं उधर टिकट ले रहा था तो तू बच्चों को ले गाड़ी में नहीं बैठ सकती थी....कुत्ती ....गांव जा रही है.....मिस काल तो देती कि तुझे बैठने को तो कहता ...अब जा खड़ खड़े। सुनते ही महिला चुपचाप सिर नीचे किये सामान समेट गाड़ी की ओर बढ गई, बच्चे जो अब तक हंस बोल रहे थे सकपका कर सुराही, झोला उठाकर वह भी बढ चले अपनी मम्मी के पीछे पीछे। लोग इन लोगों की ओर ताकते रहे।

शायद जिस पापा को अगोरा जा रहा श्रा वो यही थे।

- सतीश पंचम

स्थान - सोशल ह्यूमिलियेशन की झलक दिखलाता जबलपुर प्लेटफार्म
नंबर दो।

समय - सुबह के सात सत्तावन।

Saturday, April 23, 2011

लक्जरियॉटिक गरीबी

गरीबी को अब तक मैं दुख और तमाम अभावों से आच्छादित एक परिस्थिती के रूप
में ही जानता आया था लेकिन आज देख रहा हूं कि गरीबी लक्जरीयॉटिक भी होती
है, इतनी कि गरीब एअर कंडीशन की हवा लेते आराम से अंगरेजी में हंसता
बतियाता है, अपने अमेरिकन टूरिस्टर जैसे महंगे लगेज बैगेजेस के बीच से
हारमोनिया की तरह का लैपटॉप निकालता है और बज पर बजबजाता है।
फिलहाल कुछ उसी तरह का लक्जरियॉटिक गरीब बना भारतीय रेल के गरीब रथ
से सफर करते हुए अपने नोकिया सी 3 से यह पोस्ट लिख रहा हूं। न जाने
किस ने सुझाया होगा कि इस रेल का नाम गरीब रथ रखो, लेकिन जिसने भी
सुझाया होगा वह जरूर महाभारत सीरियल बहुत मन लगाकर देखता होगा,
जिसमें कि रथों पर सवार हस्तिनापुर के गरीब आपस में लड़ते भिड़ते समय
भी अपनी गुड मार्निंग तात श्री, गुड मार्निंग ग्रैंडपा वगैरह करना
नहीं भूलता था। ठीक उसी तरह के महंगे गरीबों को यहां साक्षात देख
रहा हूं। कोई अपने फोन पर गुड ऑफ्टरनून करने के बाद सीधे ही पुराने
कोटेशन से मुकरने पर इट्स रेडिक्यूलस कहते झाड़ पिला रहा है तो कोई
महिला अपने बच्चे को डांटते हुए कह रही है वाय आर यू कमिंग डाउन, इस
देअर एनी मिनिंग टू कम डाउन.....और बच्ची सकपका कर उपरी बर्थ पर
चिपकी रह जाती है क्योंकि अपनी बर्थ नीचे उतरना कोई मायने नहीं
रखता.......बर्थ से उपर होना ही मिनिंगफूल है ।
वैसे यह नीचे उतरने न उतरने वाला फलसफा है बड़ा मौजू , हम लोग जब कभी अपने
से नीचे होने लगते हैं तो दूसरे टोक देते हैं, अमां क्या करते हो, जब
ज्यादा उपर जाने लगते हैं तो अमां संभलकर, ज्यादा मत उड़ियो....और जब अपनी
पोजिशन बरकरार रखते हैं तो - ब्रिंग अ चेंज यार, कब तक यूं ही पुरानेपन
पर अटके रहोगे।

बहरहाल वह महिला जो अपने बच्चे को अंगरेजी में डांट रही थी अब हिंदी
में कह रही है - बहुत मारूंगी, शायद अंगरेजी में पिटाई करने का असर ना
होता हो :)

- सतीश पंचम

स्थान - संपूर्ण एअर कंडीशंड गरीब रथ का एक गरीब बर्थ ।

समय - वही, जब फिल्म में गरीबी दिखाने हेतु डायरेक्टर कहे - हिरोनी को थोड़ा लिपस्टिक जास्ती लगाना...... नईं तो पब्लिक बोलेगी - खरचा बचाया।

Thursday, April 21, 2011

इति मुम्बईया 'वारता-लाप'......इन शॉर्ट :)

  -  वीस रूपया....वीस रूपया.....ए बोल्ले -बोल्ले.....वीस रूपया....ए चल्ले....रास्ते का माल सस्ते में....लाटै......लाटै...लाटै

- कितने का ?

- वीस रूपया जास्ती नई.

- वो अमर बिम्मर वाला है क्या ?

- वो नई आया अबी तक.

- क्या....कबी लाएन्गा ?

- अबी कोरट-बीरट का कुछ चक्कर है भाय....इतना लवकर नईं आने का.

- अरे तुम लोग कबी से कोरट -बीरट से डरने लगा.....ईधर पिच्चर रिलीझ....उधर तुम लोग का ठेले पर सीडी रिलीझ ......ये अम्मर बिम्मर का कायेको नईं

- अरे नईं बोला तो नईं....साला अंदर कुछ है नईं है.....पब्लिक को खाली नाम सुन के सीडी मांगता.....अम्मर का दो..... बिम्मर का दो.... अक्खे धंधे की वाट लगेली है. 

- अरे तो उसमें प्राबलेम क्या है.....तुम लोग इतना डरता है क्या पालि-टिशियन से ?

- अरे डरता बिरता नईं रे....इसकी मां की.....चार आने की मुरगी...बाराने का मसाला .....सीडी वाला बिग बास लोग बोलता -  पालटि-शियन का सीडी नईं बनाने का....साला लोग खुद तो मजा मारेगा लेकिन लफड़े में अपुन लोग फसेगा....नक्को रे बाबा.

- अरे तो तुम लोग डिस्क्लेमर लगाने का....ये सीडी काल्पनिक है....इसका किसी भी जियेला या मरेला से कोई 'सम्बन्ध-बिम्बन्ध' नहीं है.

- अरे तुम को नई मालूम.....इधर साला हम एक लाईन लिखता है कि - ये सीडी काल्पनिक है....उधर वो पब्लिक लिख के जाता है....ये तुम्हारा लिखेला लाईन ही काल्पनिक है....लेकिन सीडी असली है .....बोलो.

- आईला तुम लोग का तो बोत वांदा है.

- फिर....अईसेच नई धूप में सड़ रेला हूं साब......अक्खा धंधा बोले तो ये अम्मर बिम्मर का चक्कर में.....जाओ साब सीडी लेने का तो लेओ नईं तो आगे बढ़ो. 

- अच्छा वो भूषण बीषण का है क्या ?


- ऐ तुमको क्या राडा-रूडा वाला पब्लिक का ही सीडी पसंद है क्या....इधर देखो....इतना मस्त मस्त दीपिका बिपिका का सीडी है......बिपाशा...प्रियंका.....मुन्नी-शीला....ये सब तुम को कुछ पसंद नईं क्या.....कायेके बुड्ढा लोग का सीडी के पिच्छू पड़ेला है ?

- अरे तू नई जानेगा....ये बुड्ढा लोग का पिच्छू खाली अपून नईं...अक्खा मीडिया लगेला है .....

- अरे छोड़ो साब ....एक वो लोग को कुछ काम नईं एक तुमकू कोई काम नईं.....हम साला अईसाच धूप में गधे के माफिक सिक रेला है. 

- अबी तुम दीपिका-बिपाशा.... मुन्नी शीला के साथ रहेगा तो ऐसे ही सिकेगा  ना........बोले तो पैसे का ठंडक मांगता है तो अम्मर-बिम्मर का सीडी बेचो.

- अरे नईं....इतना रिक्स नईं लेने का बाप.....मरने दो वो लोग को..........वो जाने वो लोग का चन्टू-बन्टू लोग जाने .....अपन को तो बस दो रोटी मिलना मांगता .... अपुन इतने में खुश्श....चल ए.... लाटै....लाटै....लाटै...लाटै.....अरे.....वो कौन सीडी का  दुकान बाजू में लगा रेला है...... 

आईला....अम्मर   :-)  

  -  सतीश पंचम

स्थान - वहीं, जहां अक्सर राह चलते ऐसी बतकहियां सुनाई देती हैं।

समय - वही, जब फारेंसिक लैब का टेक्निशियन अपनी पत्नी से कहे - आज इंतजार मत करना..... अभी दो चार सीडी और आने वाली है असली- नकली सीडी चेकिंग के लिये।
  
 और तभी पत्नी कहे  - पति की बातों की चेकिंग वाली फारेंसिक लैब कहां है - बता सकते हो :-)

( चित्र - गूगल बाबा से साभार ) 

Friday, April 15, 2011

प्रकृति के बीच दुपहरीया छपास बजरिए 'रॉयल्टी ऑफ ब्लॉगिग'

पुलिहर दर्पण
         पिछले दिनों मुंबई के भायखला इलाके में स्थित एक 'जू' में जाना हुआ। हुआ यूं  कि भायखला स्टेशन पर एक मित्र का   इंतजार कर रहा था कि पता चला महाशय अभी किसी काम में अचानक फंस गये हैं, आने में डेढ़ दो घंटे लगेंगे। सो, अब न घर वापस जा सकता था न कहीं और, सो सीधे पास ही स्थित प्राणी-संग्रहालय चला गया। मन में आया कि बच्चों को भी ले आता तो ठीक था, लेकिन परिस्थिति ऐसी बनी कि अकेले ही समय बिताने के लिये जाना पड़ा। संयोग से उस वक्त मेरा कैमरा मेरे साथ था। 


     सो, चिड़ियाघर में जाते ही चारों ओर पेड़ पौधों की  हरियाली देख कई चित्र खेंचे, कुछ जानवरों के भी चित्र खेंचा लेकिन उतना मजा नहीं आया, दरअसल दुपहर का समय था, उसलिये कुछ तो जानवर अपनी अपनी कोठरीयों में जाकर सुस्ता रहे थे, तो कुछ इस अंदाज में आंखों में आँखे डाल देख रहे थे मानों कहना चाहते हों  - हमारी खेंची गई तस्वीरों की रॉयल्टी भिजवा देना....... वैसे भी तुम ब्लॉगर लोग अपनी 'थकी-थुकी पोस्टों' के अखबार वालों द्वारा छाप लेने भर से बिदक जाते हो....... (भले ही अपनी छपास की भूख मिटने से अंदर ही अंदर खुश क्यों न हों) नाराजगी दर्शाते हुए अपनी उन पोस्टों के लिये पैसों की उम्मीद तक बांध लेते हो ( जबकि ब्लॉगर प्लेटफार्म किसी दूसरे के पिताश्री का है  ). कुछ ब्लॉगर तो अपनी उन्हीं पोस्टों की किताब तक छपाकर यहां वहां चिटकाते नजर आते हैं.....ऐसे में पैसे का मसला जाने कहां बिला जाता है....लेकिन जैसे ही कोई अखबार उठाकर छाप देगा तो लगोगे चिचियाने....अरे अइसा हो गया....वइसा हो गया।  
 रॉयल्टी नहीं आई अब तक......

        ऐसे में आप लोगों के दिखावटी नाराजगी को देख हम जानवरों का भी तो कॉपीराइट- फापीराइट जैसा कुछ हक तो  बनता ही है जिनकी कि आप लोग नंगी-पुन्गी तस्वीरें खेंच लेते हो और अपने ब्लॉग पर चिपका कर बच्चों जैसे पहेलियां बुझवाते हो...टाइम पास करते हो.... बताओ ये कौन सा जानवर है ......इसे देखो....इसे पहचानो..... वो तो हमारी भलमनसाहत है कि हम जानवर लोग अपनी नग्न तस्वीरों के खेंचने पर तुम ब्लॉगरों पर पोर्नोग्राफी का केस नहीं करते वरना अब तक आप लोग जेल में नाव चला रहे होते.....नाव....... नहीं....नाव नहीं कुछ और चलाया जाता है वहां.....अब हम जानवर लोग तो कभी जेल गये नहीं तो कैसे बताएं कि जेल में क्या चलाया जाता है, क्या कूटा-पीसा जाता है, जेल तो मनुष्य ही जाता है.......क्या कभी किसी जानवर को देखा है जेल में बंद ?  

      सो भई अपन तो जहां तक हो सका जानवरों की तस्वीरें लेने से बचते बचाते ही रहे कि क्या पता कल को कहीं मानहानि का दावा ही न कर बैठे कि हमारी नंगी पुन्गी तस्वीरें खेंच कर ले गया है एक ब्लॉगर...अब तक उसने रॉयल्टी नहीं भेजी.... अत: पोर्नोग्राफी एक्ट के तहत उसे अविलम्ब गिरफ्तार किया जाय :) 

बस रॉयल्टी आ जाय तो खिलूं.....वरना .......
     खैर,  यही सब देखते-विचरते जा पहुंचा प्राणी संग्रहालय  के बोटानिकल गार्डन के पास स्थित एक खूबसूरत 'निसर्ग उद्यान' में। वहां जाकर मुंह से बरबस ही निकल गया..... ओह....कितना तो सुन्दर है यह जगह।

      एक ओर छोटा सा तालाब, उसमें तैरती छोटी छोटी मछलियां......कुछ डूबती...कुछ उतराती ..... वहीं कमल की पंखुड़ियां भी जैसे बस खिलने को हैं।
वहीं तालाब के किनारे शीतल बांस के झुरमुटों की छांव....करीने से सजी हरी घास..... तालाब के उपर ही एक लकड़ी का बना छोटा पुल..... जिसके नीचे के थिर पानी को देखने का आनंद ही अलग था। मन कुछ यूं मस्त  हुआ कि लगा  एक कविता रची जाय।  


        वैसे भी मेरा तो यही मानना है कि संसार में जिस किसी ने भी पहली कविता रची होगी जरूर वह इसी तरह के प्राकृतिक माहौल में रहा होगा.......सिवाय जंगल-झाड़ियों के, कोई उसकी कविता सुनने वाला वहां न होगा, ऐसे में प्रकृति से प्रेरित जो भी कविता उसने रची होगी.....वह जरूर उसके हृदय से खुद ब खुद उमड़ी होगी। 
रास्ता.....तालाब......तालाब....रास्ता.......
मन इत्थे ही रमिया सी यारा

          अभी इसी प्राकृतिक छटा का आनंद ले रहा था  कि तभी कोई पक्षी अचानक उड़ते हुए आया और तुरंत ही पानी में डुबकी मार बैठा। मैं थोड़ा उत्सुक हुआ कि जाने कौन सा पक्षी है .....इस तरह अपनी आँखों के सामने किसी पक्षी को पानी में डुबकी मारते कई साल  बाद देखा।  एक सेकंड बीता, दो सेकंड बीता, पांच, दस....लेकिन वह पक्षी था कि पानी में जाने के बाद निकल ही नहीं रहा था। मैंने सोचा शायद यह पानी के भीतर ही भीतर कहीं दूर निकल गया होगा और वहां पुल के उस पार से निकल उड़ गया होगा...लेकिन तकरीबन मिनट भर बीते होंगे कि अचानक ही वह पक्षी पानी में से बाहर निकला और सामने के पेड़ पर जा बैठा। मैंने कैमरा चालू कर उसकी तस्वीरें लेना शुरू किया...नाम पता नहीं....शायद पनडुब्बी....या क्या कुछ जो भी हो। थोड़ा अचरज, थोड़ी उत्सुकता, थोड़ा बचपना....कुल मिलाकर अच्छा लग रहा था। करीबन एक घंटा वहां ठहरा और कुछ तस्वीरें-उस्वीरें उतारी।

 पेश है उन्हीं में से कुछ की झलकी  - 

इस प्रकृति का कापीराइट किसके पास है वत्स....

धूप और हरियर पौध   

उंघती दुपहरी .....



सर्पिल लतायें....

बांस के झुरमुट और ठंडी रेलिंग


खामखां एक मिनट पानी के अंदर रहा......कुछ मिला ही नहीं....सारी मछलियां जाने कहां चरने चली गईं  



हम सब बस खिलने को  हैं .....सभापति भौरे जी नहीं आए अब तक :)
 मुंबईया खिलान......... 

  - सतीश  पंचम

स्थान - वही, जहां धुँए-धक्कड़, शहरी चिल्ल-पों के बीच प्राकृतिक छटा अब तक बची हुई है। 

समय - वही, जब मैं अपने कैमरे से तस्वीर ले रहा था और तभी एक गिलहरी मुझसे थोड़ी दूरी बना ताक रही थी......मानों कहना चाहती हो - मेरे लिये कुछ खाने लाये हो या खाली हाथ झुलाते चले आये  :)  

Sunday, April 10, 2011

अब न दुलराइये सजन....कि पब्लिक 'निहार' रही है


         मैं यह मानकर चल रहा हूँ कि हम सभी के जीवन में कहीं न कहीं भ्रष्टाचार का अंश जरूर है और मैं ही नहीं आप में से लगभग सभी की शायद यही राय होगी। हम चाहे-अनचाहे उससे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभान्वित भी हो रहे हैं, संभवत: आगे भी होते रहेंगे। किंतु विडम्बना यह है कि तरह तरह से लाभान्वित करने वाली वह भ्रष्टाचारी रेखा इतनी महीन है कि हमें समझ ही नहीं आता कि हम कब भ्रष्टाचार की जद में हैं और कब शुचित व्यवहार की जद में। 

       मसलन, अभी हाल ही में अख़बार में देखा कि एक टैक्स कंसल्टेंट से एक बंदा सवाल कर रहा था कि वह अपनी पत्नी को मकान का किराया देता है, बताया जाय कि किराया चेक से दिया जाय या कैश से। अब इस सवाल को पढ़ते ही समझ आ जाता है कि बंदे ने टैक्स बचाने के चक्कर में ही यह अनूठा रास्ता अख्तियार किया है। वरना ऐसा कैसे हो सकता है कि इंसान अपनी पत्नी के साथ साथ उसी मकान में रहे, अपनी दैनंदिन सामाजिक, व्यवहारिक, शारीरिक आदि जो भी जरूरतें लगे सभी को पूरा करे, तिस पर अपनी उसी पत्नी को मकान का किराया भी दे।

        बहरहाल, ये और इस तरह के बैक-डोर रस्ते ऐंवे ही नहीं अख्तियार किये जाते, इसे अख्तियार करने के लिये मजबूर किया जाता है, छोटे छोटे लूप होल्स के जरिए, बड़े बड़े फर्मों के जरिए कानूनी जामा पहनाया जाता है जिसे अपनाते हुए पति अपनी पत्नी को हाउस रेंट देता नजर आता है तो कहीं बेटा अपने पिता को किराया देने का सबूत देते हुए अपने ऑफिस में किराये की रसीद नत्थी करता है। इस तरह के तमाम बैक-डोर टैक्स सेविंग्स हम सभी जानते हैं....कहीं न कहीं इस्तेमाल भी करते हैं, लेकिन तब उसे टैक्स सेविंग्स की टैक्निकेलिटीस कहकर टाल दिया जाता है कि भई ये तो करना ही पड़ता है वरना तो इतनी महंगाई में खांये क्या कमायें क्या। 

          खैर, ये सब तो पहले से ही चला आ रहा है आगे भी चलेगा ही, लेकिन इस तरह के हिडन करप्शन से दो चार होते रहने वाले लोग जब अन्ना हजारे के आंदोलन में खोखले नारे लगाते हैं तो वह कहीं न कहीं चुभता है....कहीं न कहीं खटकता है। यहां मुंबई में देख रहा था कि अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर नारे लगा रहीं थीं जन-लोकपाल बिल लाओ..... भ्रष्टाचार हटाओ....भ्रष्टाचार हटाओ। लेकिन मुझे समझ नहीं आता कि ऐसे लुप्त हो चुके सेलिब्रेटी ऐसे वक्त पर अचानक कहां से लाइमलाइट में आ जाते हैं जबकि पिछले कुछ दिनों से उनका कुछ अता पता ही न हो। कैमरा ऐसे लोगों को कैसे ढूंढ लेता है।  

          मुझे इस आंदोलन के दौरान मन ही मन शंका थी कि कहीं ये पीपली लाइव का नत्था सरीखा प्लॉट न हो जाय क्योंकि जिस तरह से मीडिया ने पूरी कवरेज की थी, लोगों के नाचते गाते चेहरों को उनके विचारों को टेलिकास्ट किया था वह हूबहू पीपली लाइव स्टाइल में चल रहा था। बताइये आपको कैसा लग रहा है.......आपके हिसाब से क्या होना चाहिये.....ये देखिये लोगों ने अपने बालों को किस विशेष अंदाज में कटवाकर अपना रूख  जन-लोकपाल बिल के पक्ष में जताया है......पीपली के रिपोर्टर की तर्ज पर देख रहा था पुण्य प्रसून वाजपेयी भी कह रहे थे....लोगों के मूड को देख अब अण्णा वही राह चुनेंगे...वही करेंगे जिस राह को जनता चाहेगी....लोगों का रूख देखिये लोग कैसे गा रहे हैं....और तो और  कपिल सिब्बल जिस अंदाज में हाइकमान से बातचीत करने और आदेश जारी करने न करने के बारे में प्रेस से मुखातिब हो रहे थे वो कहीं न कहीं पीपली लाइव के उस दृश्य की याद दिलाता था जिसमें सरकारी अधिकारी कहता है कि - We are waiting for the High Court orders.....लेकिन गनीमत है कि इस पीपली लाइव में नत्था न होकर सामाजिक सरोकार से जुड़े अण्णा हजारे थे....जिनके समर्थन में जो हुजूम उमड़ा उससे सरकार को आखिरकार नर्म रूख अपना कर पूरे मामले को सुलझाना पड़ा।

          अब जबकि ये आंदोलन तात्कालिक रूप से सरकारी फैसलों में जनता की हिस्सेदारी जैसे मसले पर सफल जरूर रहा है और जैसी कि संभावना जताई गई है कि अभी आगे और भी बड़े बड़े फैसलों में जनता की ज्यादा हिस्सेदारी को लेकर  इसी तरह के आंदोलन होंगे, तो मुझे लगने लगा है कि 'सेफ्टी वॉल्व' वाला इतिहास अब फिर दुहराया जाने वाला है। उल्लेखनीय है कि जब आजादी की लड़ाई चल रही थी, जनता में अंग्रेज हुकूमत को लेकर एक जनाक्रोश व्याप्त  था और जिसकी परिणति किसी भी समय हिंसक हो सकती थी ऐसे में ए ओ ह्यूम ने प्रस्ताव रखा कि सरकारी फैसलों को लेते समय जनता को थोड़ी सी हिस्सेदारी दी जाय....एक जन- प्रतिनिधियों का समूह बनाया जाय जो कि समय समय पर सरकार को अपनी मांगों, अपने प्रस्तावों से अवगत कराये ताकि उनकी मांगो पर समुचित ध्यान देते हुए जहां तक हो सके परिस्थिति को हिंसक होने से बचाया जाय। 


     A.O. Hume द्वारा ऐसा प्रस्ताव रखने के पीछे इतिहासकारों का मत है कि भारत में बिताये अपने लंबे समय के कार्यकाल के दौरान ह्यूम को अंदेशा हो गया था कि एक बड़ी हलचल होने वाली है...भीतर ही भीतर सुगबुगाहट चल रही है और उससे बचने के लिये ही उनके प्रस्ताव को लॉर्ड डफरिन ने सेफ्टी वॉल्व के हिडन एजेंडे के तौर पर सहमति दे दी।  जिसकी परिणति रही  - इंडियन नेशनल कांग्रेस। 

         अब  ठीक वही परिस्थिती यहां भी बनी है। अण्णा हजारे ने सरकारी नुमाइंदों के साथ साथ अपने जनता के प्रतिनिधियों के रूप में जनभागीदारी की मांग की और काफी जद्दोजहद के बाद आखिरकार वह मान ली गई। अण्णा हजारे के आंदोलन को  पहली नज़र में देखने पर यह भी एक तरह से जनता के मन में उमड़ घुमड़ रहे विचारों के लिये सेफ्टी वॉल्व की तरह का ही लग रहा है। फर्क इतना है कि ए ओ ह्यूम ने जनआक्रोश को भांपते हुए अंग्रेजी सरकार के लाभ ( ? ) के लिये यह व्यूह रचा था और अण्णा हजारे ने अपनी जनता के हितों के लिये। 

          बहरहाल मुझे A.O Hume की लिखी एक कविता अच्छी तो लग रही है किंतु भारतीय राजनीति के सेफ्टी वॉल्व वाले इतिहास को पढ़ने के बाद थोड़ा सा अजीब भी लगता है कि ऐसा कैसे हो सकता है कि एक शख्स अंग्रेजों की सुविधा के लिये सेफ्टी वॉल्व तैयार कर रहा हो और दूसरी ओर इतनी शानदार कवित्त रचे। ह्यूम लिखते हैं कि -    



Sons of Ind, why sit ye idle,
Wait ye for some Deva's aid?
Buckle to, be up and doing!
Nations by themselves are made!
Yours the land, lives, all, at stake, tho'
Not by you the cards are played;
Are ye dumb? Speak up and claim them!
By themselves are nations made!
What avail your wealth, your learning,
Empty titles, sordid trade?
True self-rule were worth them all!
Nations by themselves are made!
Whispered murmurs darkly creeping,
Hidden worms beneath the glade,
Not by such shall wrong be righted!
Nations by themselves are made!
Are ye Serfs or are ye Freemen,
Ye that grovel in the shade?
In your own hands rest the issues!
By themselves are nations made!
Sons of Ind, be up and doing,
Let your course by none be stayed;
Lo! the Dawn is in the East;
By themselves are nations made!
                                                  - A. O. Hume

      सोचता हूं कि जब ह्यूम इस कविता को लिख रहे होंगे न जाने उनके मन में क्या चल रहा होगा। क्यो सोच रहे होंगे वो। एक ओर उनके साथी अंग्रेज अफसर, पूरा ब्रितानी समाज तो दूसरी ओर भारत के चिकट तेल से सने पगड़ी वाले इंडियन नेटिव्स। 

न जाने किसकी ओर थे ह्यूम।

   लेकिन इतना तो तय है कि भ्रष्टाचार को लेकर जो भी समितियां आदि बनेंगी, उसमें जो भी लोग शामिल होंगे उन्हें काफी  सावधान रहना होगा, अपनी शुचिता को बरकरार रखते हुए सदस्य बनाने होंगे..... फैसले लेने होंगे क्योंकि जो भी पक्ष इससे प्रभावित होगा वह अपनी ओर से पूरी कोशिश करेगा कि पैनल के लोगों पर ही कीचड़ उछाल दे, उनकी वैधता पर ही सवाल उठाये ताकि इसी बहाने उसकी कुछ साख बचे, वह कुछ हद तक लाभान्वित हो सके। जहां तक अभी देख रहा हूं यह कीचड़ उछालू प्रक्रिया शुरू भी हो गई है शांतिभूषण और प्रशांत भूषण के मसले को लेकर कि जन-लोकपाल बिल को लेकर बने पैनल में पिता-पुत्र दोनों को ही एक साथ कैसे शामिल किया गया है। ऐसे लांछनों आदि के लिये पैनल के सदस्यों को पहले से ही मानसिक रूप से तैयारी रखनी होगी, पहले से ही इसका तोड़ निकाल कर चलना होगा वरना पूरा मामला भंडुल होते देर न लगेगी।  जहां तक मैं समझता हूं निकट भविष्य में सैकड़ों की संख्या में  ए. राजा तो जरूर मिल जाएंगे, किंतु एक और अण्णा हजारे आने की संभावनाएं कम ही दिखती है।
   
- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसे अंग्रेजों ने दहेज में दे दिया था।

समय -  वही, जब ऑफिस जाते वक्त स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया ( SAIL)  की होर्डिंग दिखे जिस पर लिखा हो -   
     There's a little bit of SAIL in everybody's life.

मानों कहना चाहता हो -  
     There's a little bit of Corruption in everybody's life.

(चित्र : गूगल बाबा से साभार )

Thursday, April 7, 2011

कोलाज ऑफ कैटरीना बबुनी बजरिए.... आमसूत्र

       आमसूत्र कहता है कि लालच को जितना पकने दो.........मिलन उतना ही मीठा होता है....सब्र करो...सब्र करो ....गहरे सुनहरे पे रंग ठहरने दो........क्योंकि सब्र का फल मीठा होता है.......

   हां कैटरीना बबुनी ...सच कह रही हो.........एकदम सही कह रही हो... ..... सचमुच आमसूत्र के हिसाब से ही अब तक लालच को पकने दिया गया है ......पिछले साठ-बासठ बरिस से वह लालच पके जा रहा है.....पके जा रहा है...... पकते हुए गहरा सुनहरा  रंग...... देखो कैसे निखर आया है......कैटरीना बबुनी यह सब उसी आमसूत्र का कमाल हय  .....बकिया तो  बासठ साल से आम लोग सबर ही तो कर रहे हंय.......और करें भी क्यों नहीं......बड़े बड़े ज्ञानी-गुनी....संत महतमा लोग कहि गये हैं कि सबर करने का फल मीठा होता है.... लेकिन ये कोई नहीं बताये कि जियादे सबर करने पर कभी कभी फल सड़ भी जाता है।

  और वही हुआ है....... देश के लोगों ने इतना लंबा सबर किया कि पकने की कौन कहे.... पूरा  देशवै सड़ने लगा है.....सड़ कर बजबजाने लगा है......देस के नेता लोग गन्हाने लगे हैं........जहां जाते हैं दूर से ही दुतकारे जाते हैं.....खजुअहे कुक्कुर की तरह.......लेकिन अपनी खजु-अहट को वो भला क्यों माने.....चढ़ जाते हैं अन्ना हजारे जैसे साधू मनई के कपार पर.....चाहते हैं कि एक बार अन्ना के मंच पर साथ साथ दिख जांय तो जिनगी भर की खजु-अहट से छुटकारा मिल जाय...... लोग उनको भी साफ सुथरा मानै लगें...... लेकिन जनतौ चलाक हो गई है.....दौड़ा लेती है ऐसे खजुअहे कुक्कुरों को.....क्योंकि अब और सड़न नहीं चाहती जनता .....

      आम जनता ने बहुत सबर से ई आमसूत्र  को सहा है.... भोगा है.....अब समय आ गया है कि वही आमसूत्र को दामसूत्र में बदल दिया जाय....जो कोई घपला करे......तुरंतै दाम वसूलो...... निकालो बाहर........जितने का घपल्ली किया सबका दाम देओ ।


      बाकि यह सब की चिंता तुम काहे करोगी कटरीना बबुनी.....तुमको कौन चिंता है .....तुम खाली आम खाओ....पेड़ सलमान गिनेंगे  :) 


 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर कटरीना बबुनी अक्सर पेड़ के आसपास घुमते-घामते सूटिन्ग करती हैं।

समय - वही, जब अन्ना हजारे के मंच पर जाने के लिये एक नेता लालायित हो और तभी उसका पीए कहे -   न जाने वहां कितना देर बैठना पड़ जाये,   भोजन-ओजन किए हैं कि नहीं। 

(चित्र: साभार यहां से  )

Wednesday, April 6, 2011

'C3' पर 'C3' से.......

       अमूमन देखा गया है कि अपनी भाषा को लेकर लोग बड़ा भावुक हो जाते हैं, बड़े सेंटी सेंटी विचार व्यक्त करते हैं, कि हमारे भाषा के लिए फलां होना चाहिए, ढेकां होना चाहिए, भाषाई तौर पर तकनीकों को इजाद किया जाना चाहिए ब्ला.... ब्ला.... लेकिन जब उनकी मांग पूरी करते हुए वही तकनीक लाकर दे दो उनकी सारी भाषाई सेवा न जाने किस ओर चरने चली जाती है।


      कुछ ऐसी ही बातों से मैं दो-चार हुआ जब नोकिया के हिंदी कीपैड वाले सी-3 को खरीदने का मन बनाया। हुआ यूं कि मेरा पुराना फोन गड़बड़ाने लगा और नये फोन की जरूरत महसूस हुई। इतने में प्रवीण जी पोस्ट आ गई जिसमें कि नोकिया के सी-3 में हिंदी की-पैड उपलब्ध होने की खूबी बताई गई थी, इससे ब्लॉग लेखन आदि में सुविधा की बात बताई गई थी।   पढ़ते ही मेरा मन इस फोन पर लहक गया। फिर क्या था, प्रवीण जी से निजी तौर पर मेल करके इस फोन के बारे में और जानकारी लिया और चल पड़ा नोकिया गैलरी की ओर। मुझे लगा कि करना क्या है, सारे फीचर तो पता ही हैं, नेट पर जो ढूंढना था सो तो सब ढूँढ ही लिया है, केवल पैसे देने हैं और मोबाइल हाथ में, लेकिन वह सोच ही क्या जो बिन परेशानी के सोचाये।

      पहली परेशानी तो यही हुई कि मेरे द्वारा हिंदी की-पैड वाला नोकिया सी-3 कहने के बावजूद जब नोकिया गैलरी में बॉक्स खोला गया तो वह इंग्लिश की-पैड निकला, वहां के असिस्टेंट ने तब जानकारी दी कि वो वाला पीस आना बंद हो गया है, अब केवल इंग्लिश वाला फोन आता है। मुझे लगा कि ये बंदा फोन न होने के कारण बहका रहा है। उसे छोड़ दूसरी दुकान में गया, वहां भी वही जवाब मिला कि हिंदी की-पैड वाला फोन आना बंद हो गया है। अब मैं थोड़ा अचकचाया कि ये क्या बात है यार,  अभी बैंगलोर में प्रवीण जी ने यही फोन लिया है और अब यहां कहा जा रहा है कि वह फोन बंद हो गया है। थोड़ा डिटेल में पूछने पर एक ने बताया कि उसके की-पैड पर हिंदी होने से लोगों को परेशानी होती थी, अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी अक्षर होने से कीपैड पर अक्षर छोटे हो जाते थे, इसलिए नोकिया ने वह हिंदी वाला अक्षर देना बंद किया और सिर्फ इंग्लिश की-पैड देना शुरू किया है।

         मैंने मन ही मन सोचा कहीं ये C3  भाषाई तकधिनवा की वजह से प्रांतवाद की भेंट तो नहीं चढ़ गया । फिर उससे पूछा कि कहीं से मंगवा सकते हो क्या, एकाध फोन किसी मुंबई के डीलर के पास तो होगा ही। लेकिन बंदे ने असमर्थता जाहिर की और मैंने भी ज्यादा जोर नहीं दिया।
 
    उसके बाद तो मैंने कुछ और नोकिया प्रायोरिटी डिलर छान मारे कि कहीं तो एकाध फोन पड़ा होगा किसी के पास लेकिन सब के जवाब नकारात्मक मिले।


      इसी दौरान मन हुआ कि एक बार दादर चल कर देखा जाय, वहां शायद मिल जाय। वहां जाने पर सेल्समैन का जवाब था - अब वो वाला फोन नोकिया ने बंद कर दिया है क्योंकि लोगों को उसके की-पैड पर मराठी होने से परेशानी होती थी।

         अब सेल्समैन का मराठी कीपैड वाला जवाब सुनकर मेरा माथा ठनका। दरअसल हिंदी और मराठी दोनो ही देवनागरी लिपीयां हैं। उसी वर्ण को हिंदी भाषी अपने हिसाब से हिंदी मानकर चलता है मराठी भाषी अपने हिसाब से मराठी मानकर चलता है। चूंकि मैं मराठी बहुल इलाके दादर में था इसलिए वहां के सेल्समैन को वहां के कस्टमरों द्वारा की-पैड पर मराठी होने से असुविधा होने जैसा फीडबैक मिला दूजी ओर हिन्दी वालोँ से हिन्दी के चलते असुविधा का फीडबैक मिला, नतीजतन नोकिया ने वह फोन ही मार्केट में उतारना बंद कर दिया।

      इस पूरे मामले में एक बात जो देखने में आई वह ये कि हर एक को अपनी ही भाषा से असुविधा दिखी, चाहे वह मराठी बंदा हो या हिन्दी.....फिर ये राजनेता किस बूते भाषाई प्रेम जताते हुए 'नारा-नूरी' लगवाते हैं !
 
---------------------
 
 खैर, यह फोन मुझे बड़ी बड़ी दुकानों में न मिलकर एक छोटे दुकान से अंतत: मिल गया।        फोन बढ़िया है, लकदक हिंदी से सुसज्जित। पोस्ट लिखते समय थोड़ी परेशानी नोटपैड से कॉपी पेस्ट करने में जरूर होती है,  क्योंकि तब यह 3000 शब्द सीमा को कॉपी करने में असमर्थता जताने लगता है। नतीजतन मुझे टुकड़ों टुकड़ों में कॉपी पेस्ट करते हुए यह पोस्ट लिखना पड़ा। शायद कुछ ट्रायल एरर अभी और चले :)
 
 
- सतीश पंचम
 
स्थान - वही, जहां के भाषायी कॉस्मोपोलिटन लैब में नोकिया का C3 फोन  'टैं' बोल गया।
 
समय -  वही, जब राजनेता कहे - हमें स्थानीय लोगों के हितों में  विदेशीयों का बहिष्कार करना चाहिए,  विदेशीयों की वजह से हमारे स्थानीय हितों पर असर पड़ता है  और तभी उसका फोन बजने लगे यह गाते हुए ...........  
 
बलेती पी गये हैं.... देसी अभी बाकी है......
चार बज गये हैं....पारी अभी.....  :)
  
( Nokia C3 का चित्र - प्रवीण जी के पोस्ट से )

Tuesday, April 5, 2011

डेमोक्रेसी ऑफ 'बाजारू किंगडम'

       आज सुबह टीवी में खबर देखा कि PAC के सामने घोटालों से संबंधित पूछताछ हेतु जब नीरा राडिया पेश हुई तो उन्होंने एहसान जताने वाले लहज़े में कहा - कहिए, आप लोग क्या कहना चाहते हैं, मैं आप लोगों के 'रिक्वेस्ट' पर उपस्थित हुई हूं।

      सुनते ही मुरली मनोहर जोशी का पारा चढ़ गया कि ये क्या कह रही हैं मोहतरमा .....और नीरा राडिया को चेताया कि - माईंड योर लैंग्वेज, हम 'रिक्वेस्ट' नहीं करते 'आदेश' देते हैं।

        यह पूरा प्रकरण मुझे कुछ-कुछ उस राजा के तरह का लग रहा है जिसके ज्यादातर दरबारी धनलोलुपता के चलते पाला बदल कर विरोधी खेमे में जा चुके हैं और राजा को पता ही नहीं कि उसके पीछे क्या घट चुका है। राजा को अब भी लगता है कि वह अधिकार संपन्न है, आदेश देने की हैसियत रखता है।

        दूसरी ओर विरोधी खेमे द्वारा धनबल के जरिये ज्यादातर दरबारीयों को अपनी ओर कर चुकने के बाद उसमें इतना 'कुटिल-आत्मविश्वास' आ गया है कि उसे लगता है कि यह राजा मेरी दया पर ही अपनी कुर्सी पर टिका है....चाहूं तो चुटकी में अपने उन दरबारीयों के दम पर राजा को हटा दूं ..... और यह 'कुटिल-आत्मविश्वास' उसके बोल-चाल, रहन-सहन, बात-व्यवहार सभी में बखूबी झलक भी रहा है तभी तो उसे लग रहा है कि राजा केवल अनुरोध कर सकता है....आदेश नहीं दे सकता ।

      खैर, यह तो अच्छा हुआ कि समय रहते बात पकड़ ली गई और राडिया को चेताया गया कि अपनी औकात में रह कर बात करे....लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि राडिया ने उस चेतावनी को वास्तविक तौर पर समझा भी होगा या केवल silly topic कहकर ऐंवे ही टाल दिया होगा। क्योंकि अब तक देखा गया है कि यह तबका अपने धनबल और नेटवर्किंग के जरिए समूची व्यवस्था को ही अपने पैरों तले समझता है ( जो कि काफी हद तक सच भी है ), ऐसे में कत्तई नहीं लगता कि राडिया को ज़रा भी एहसास हुआ होगा कि उसके लहजे में क्या खामी थी।

           लेकिन यह परिस्थिति वाकई शोचनीय है कि एक ओर तो धनिक तबका पूरे देश को अपनी जागीर समझे, उसी हिसाब से बात-व्यवहार करे और दूसरी ओर जनता के चुने हुए प्रतिनिधि अपने आप को लाचार महसूस करे....और ऐसा हो भी क्यों नहीं....आखिर यही तो वह तबका है जिससे कि राजनीतिक चंदा मिलता है....इन्हीं के जरिए तो अपनी चुनावी नैया पार लगाई जाती है.....ऐसे में राडिया जैसा 'अनुरोध प्रकरण' न हो तो क्या हो जिनकी कि डिक्शनरी से ही 'आदेश' शब्द को निकाल फेंका गया है।


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां के तमाम कारपोरेट घरानों के सीवर अरब महासागर में खुलते हैं।

समय -  वही, जब राजा भरे दरबार में राज-नर्तकी को चेताये कि - वह अपनी औकात में रहे और तभी राज-नर्तकी कहे -  मैं अपनी औकात के बारे में तो नहीं जानती महाराज, लेकिन मैं इतना जरूर जानती हूं कि आपकी औकात एक अंगूठे से ज्यादा की नहीं है.....क्योंकि हर पांच साल बाद वह अंगूठा ही है जिससे कि आपकी औकात नापी जाती है.........बटन दबाकर।

  ये अलग बात है कि उस बटन को दब-वाने का 'नज़राना' हम देते  है  :)

Saturday, April 2, 2011

एन इवनिंग ऑफ रामअवतार बाबू

           देखो गरी-छोहाड़ा सब उधरै रख दो....औ  वो दूध के लिये कहलवा देना कि जियादे चाहिये.......खीर बनना है.... वो हरी सौंफ है संभाल कर रख दो......हांय.....अरे तो पकौड़ों के लिये 'पियाज-ऊआज' कह देना था न लेते आता.....अब कहां से मिलेगा.....न हो तो छोटे को भेजो....नरैना की दुकान अभी बंद नहीं हुई होगी.......ले आये दो चार किलो जो लाना है.....अरे लाने कह रहा हूं तो लगी हो तिखारने  पइसा पेड़ पर उगता है .... सेंत में....हेंत में  मिलता है..........

........ए बच्ची उधर नहीं ......अरे उसमें कुछ नहीं है...........अरे बोतल है.......दवाई वाली बोतल है ....उसे मत छूओ....देखा.....मुंह बनाया न.......इसलिये कह रहा था .....दवाई है.....बदबू आती है......मत छूओ..... अच्छा अब  जाओ खेलो बाहर......अजी सुनती हो.....जरा नेबू ओबू काट कर ये थोड़ा नमकीन है..... एक कटोरी में करके उपर छत पर पहुंचवा दो........न हो तो तुम खुदै लिये आओ.....लड़के देखेंगे तो दिक करेंगे........अरे उसमें कुछ नहीं दवाई है......तुम नाहक सक करती हो.......  उपर कोई है क्या छत पर......आंय.....बहू .......हवा ले रही है.......औ कौन........रतना बिटिया भी है.... ....कब आई ससुराल से......तभी बाजार में नन्हे मिले थे तो कह रहे थे कि बिटिया की गाड़ी अभी घर की ओर ही गई है......... .कैसे हैं उसके यहां सब........अच्छा सुनो....वो नेबू औ नमकीन तनिक इधर ही लेती आना......नहीं अभी नहीं खाउंगा....थोड़ा देर बाद........ओ हो....तुम तो जिद पर आ गई....अरे कह तो रहा हूं  कि खाउंगा......बाद में खाउंगा....मेरे लिये अलग से एक थाली में निकाल कर रख दो......आंय रतना इधर ही आ रही है..........सुनो  ये थैली जरा उधर रख दो......अरे कु्च्छ नहीं है उसमें तुम........अ  हां .....जीती रहो बिटिया......और कैसी हो.....मुन्ना  कैसा है......आंय.....अरे तो दवा ओवा अच्छे से करवा दिया करो.....क्यों कंजूसी करते हो तुम लोग ........  सभाजीत से कहो कि  पइसा-कउड़ी के साथ साथ लइका बच्चा लोग का खान-पान भी देखें.............पिछली बार गया था तो मुन्ना एकदम सूख सा गया था....... अच्छा ....हां.....तब ठीक है......वो छत से कौन उतर रहा है.....बहू है....अच्छा ....अच्छा....हम्.....अच्छा.... तो अब मुन्ने की तबियत ठीक है न.....चलो अच्छा है भगवान सब भला करेंगे.....अच्छा जाओ आराम कर लो.....बहू को देखो कोई काम ओम हो तो हाथ बटा दो.......

  अजी सुनती हो...वो थैली कहां रखी.....अरे कहां है.....वहीं है वहीं है कहे जा रही हो...... नहीं मिल रही.........अरे तो आकर दे दोगी तो कौन  सा पहाड़ टूट पड़ेगा .......एक थैली संभाल कर रखने नहीं होता है......अरे तो पहले बताना था न ....मुझे क्या पता यहीं चादर के पीछे रखी है.....अच्छा तो वो नमकीन औ नेबू निचो..

      ले आईं.......अच्छा उधरै रख दो..... मैं जा रहा हूं छत पर ...... और हां थोड़ा सा पानी भी लेती आना..........अरे उसे कहां टटोल रही हो.....उसमें कुछ नहीं रखा है.....दवाई है....ओ हो तुम समझती ही नहीं........जेब फट जाएगी.....क्या करती हो......अरे तो खुले पैसे तो छोड़ दो.....कल फिर बस में कंडक्टर से खुले के लिये झिकझिक करनी पड़ेगी....भगवान जाने ये औरतें कब पतियों की जेब साफ करना छोड़ेंगी........अरे तो .....सुनो तो :-)



( ऐसे रामअवतार बाबू लोग अक्सर हर गली कूचे, कस्बे में पाये जाते हैं.....अपनी ही दुनिया में कुछ हद तक 'रमे-रमे से'........... कुछ कुछ बावर्ची फिल्म के ए.के. हंगल टाइप ...........जिनका युवराज सिंह के Re-vital विज्ञापन की तर्ज पर 'मूल-मंत्र' होता है ......ये भाग-दौड़ भरी लाईफ........थकना मना है   :- ) 


  कल इन्हीं तरह के एक शख़्स से मिलना हुआ, जिसकी परिणति है  यह पोस्ट ।


- सतीश पंचम



स्थान - वही, जहां पर कि हवादार छतों के केवल ताले ही हवा लेते हैं।

समय - वही, जब रामअवतार बाबू चुप्पे से अपने थैले में हाथ डालने को हों और तभी बेटा आकर कहे - बाबूजी, आज फिरिज में बरफ नहीं जमा, अम्मा कह रही हैं कोका कोला मिला लिजिए :)

(चित्र  - बावर्ची फिल्म से )

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