सफेद घर में आपका स्वागत है।

Saturday, March 26, 2011

ब्लॉगिंग में शुचितावाद की चिल्ल-पों और स्टोरी-ब्वॉय टाइप लेखन


    लेखन में शुचितावादिता कितनी होनी चाहिए.....इस मुद्दे को लेकर काफी लंबे समय से बहस चली आ रही है और संभवत: आगे भी चलती रहेगी। लेकिन इधर देखा जा रहा है कि शुचितावादिता के नाम पर कुछ ज्यादा ही नाक भौं सिकोड़ी जा रही है। कुछ ज्यादा ही चिंतित होने का भ्रम पाला जा रहा है.... न सिर्फ पाला बल्कि दूसरों से भी पलवाया जा रहा है कि देखो कहीं आप चिंतित होने से नहीं छूट जाओ वरना कहोगे कि बताया नहीं :-)

     खैर, अभी कुछ समय पहले ही प्रिंट में चर्चा थी कि ब्लॉगिंग में गाली वगैरह बहुत होती है, स्तर ठीक नहीं है, फलां है ढेकां है । उसके बाद कई ऑफ्टरशॉक पोस्टें आईं और आते चली गईं। अब इधर देख रहा हूं कि फिर से चिंतित होने का मौसम शुरू हो गया है......आपका लेखन कैसा होना चाहिए....सामाजिक सरोकार होना चाहिए......शुचितावादी होना चाहिए..... bla   bla  bla  ....।

     इस तरह की चिंताओं को देख मुझे लगता है कि यदि कोई नया नया ब्लॉगर इन चिंताओं को देख ले तो उसे ब्लॉगिंग से कन्नी काटते देर नहीं लगेगी। पोस्ट लिखते हुए डरा सहमा सा रहेगा कि कल को कहीं मुझे ऐसा लिखने पर टोक न दे, कुछ कह न दे।  एकाध संवेदनशील ब्लॉगर कहीं अपना रास्ता ही न नापने लग जांय कि - हटाओ यार, वर्तमान लेखकीय चिंताएं क्या कम हैं जो इस तरह की नई नई चिंताएं पाली जांय....ये लिखो....वो मत लिखो.....ऐसा लिखो....वैसा लिखो। पब्लिशर्स की इन्हीं  सारे नखरों से पार पाते हुए ब्लॉगिंग में आये और फिर वही बंदिशें 'तुगलकी ठर्रे' की शक्ल में यहां भी घेर लें तो इससे तो दूरी भली।

     मैं कभी कभी सोचता हूं कि यदि इसी तरह की चिंताओं को तवज्जो दिया जाता, या यही चिरकुट चिंतन काशीनाथ सिंह पर दबाव डालने में सफल हो जाता तो आज काशी का अस्सी जैसी उत्कृष्ट कृति सामने नहीं आ पाती।  यही चिरकुटई चिंतन रहता तो मंटो को कभी कोई नहीं पढ़ पाता। उस वक्त भी इसी तरह का चिरकुट चिंतन जारी था कि इतना खुलेपन से नहीं लिखना चाहिए.....ठीक नहीं है.....अच्छा नहीं है खुला लिखना। लेकिन न तो मंटो ने उन सबकी परवाह की और न काशीनाथ सिंह ने और आज उसी का प्रतिफल है लोग उनके लेखन का लोहा मानते हैं, उनके वैचारिक खुलेपन की तारीफ करते हैं। 

   आज देखता हूं कि गूगल बाबा के जरिए मुफ्त का एक ब्लॉगर प्लेटफार्म मिल गया तो लोग लगे चिंतन झाड़ने कि ऐसा लिखना चाहिए, वैसा लिखना चाहिए। कल को कहीं सचमुच इन चिंतकों को कोई नीलकमल प्लास्टिक कुर्सी पर बैठने वाला भी पद मिल जाय तो इनका पैर ही जमीन पर न पड़े। तब तो आकाश क्या चीज है...... ऐसे घनघोर चिंतक अंतरिक्ष में भी बांस लेकर पहुंच जाएंगे टेका लगाने के लिये कि हम ही हैं जो अब तक थामे हुए हैं :-)

    खैर, ऐसा नहीं कि मैं ब्लॉगिंग में एकदम से खुलेपन का समर्थक हूं.......लेकिन इतना भी बंद मानसिकता को लेकर ब्लॉगिंग नहीं करना चाहता कि बुरका पहनाकर तस्वीर खेंचूं और कहूं कि यही है 'सभ्य-सलोना शुचितावाद' ऐसी शुचितावादिता को दूर से ही प्रणाम करना पसंद करूंगा जो कि ढके छुपे तौर पर तो सब कुछ मान्य किये हो और पब्लिक प्लेटफॉर्म पर आते ही शुचितावाद की चादर ओढ़ ले। 

   रही बात कि ब्लॉगिंग में कैसा लिखना चाहिए....कैसा लिखते हुए दिखना चाहिए तो इसकी ज्यादा फिक्र वही लोग करते पाये जाते हैं जिनके पास लिखने को कुछ नहीं होता.....(जैसे कि अभी मैं लिख रहा हूँ :-)   हां भई, जब आप को कुछ न सूझे लिखने के लिये तो सीधे 'ब्लॉगरीय शैवाल', 'टिप्पणी कवक' या फिर 'ब्लॉगराना फंगस' आदि पर एकाध पोस्ट ठेल दिजिए। ब्लॉग, ब्लॉगरी, टिप्पणी, फिप्पणी ऐसे कुछ विषय हैं जिन पर कि ज्यादा मेहनत नहीं करनी होती सिर्फ ज्योतिषीय ढंग से गोल मोल कह दिजिए कि आज कल लोग ब्लॉगिंग में सार्थक नहीं लिख रहे, अच्छा स्तर नहीं है लेखन का, लोग गाली वगैरह लिखते हैं, कल को लोग पढ़ेंगे तो क्या कहेंगे bla bla…. फिर देखिए....टिप्पणी दर टिप्पणी लोग समझाने आएंगे कि नहीं भई ऐसा नहीं है....लोग अच्छा लिख रहे हैं....बहूत बढ़िया लिख रहे हैं.....सार्थक सृजन कर रहे हैं....लाइमलाईट में नहीं आ रहे सो अलग बात है...tit....tit....tit इतना सुनना होगा कि ब्लॉगर जिसने पोस्ट लिखी होगी फूल कर कुप्पा हो जायगा.....कुप्पा न हुआ तो कुप्पी तो जरूर होगा कि मेरी पोस्ट पर हुए विचार विमर्श का ही परिणाम था कि लोगों को पता चला कि सचमुच ब्लॉगिंग में सार्थक लिखा जा रहा है, वरना तो लोगों को पता ही नहीं था कि ब्लॉगिंग में क्या हो रहा है :-)

    बहरहाल ये और इस तरह की बातें न जाने कितनी बार ब्लॉगिंग में लिखी जा चुकी हैं कि अब तो पता चल जाता है कि बंदे ने बैठे ठाले यूं ही लिख मारा है। वरना तो यदि लिखने शुरू किया जाय कि ब्लॉगरी पर किन किन लोगों ने और कब कब चिंतन के नाम पर पोस्ट ठेली है तो कई खण्ड, पुनर्खण्ड, खण्डे-खण्ड बनते चले जांय :-)

  Anyway,   अब थोड़ा व्यंग्य को साईड में रखते हुए  अपनी ओर से भी कुछ कह लूं ( जैसे कि अभी तक कोई दूसरा ही कहे जा रहा था :-)

     ब्लॉगिंग में क्या लिखा जाना चाहिए, कैसे लिखा जाना चाहिए, किस तरह का मानदंड अपनाना चाहिए ये अब चिंता-चिन्तन का विषय नहीं रहा। लोग खुद-ब-खुद अपनी सीमाएं पहचानने लगे हैं। लोगों को समझ है कि क्या पढ़ना है क्या नहीं पढ़ना है। यदि इस मानसिकता से लिखा जाय कि -  कल को उनके लिखे को लोग पढ़ेंगे तो क्या कहेंगे, तो जो कुछ भी लिखा जायगा वह बनावटी होगा, एक तरह का छुपाव लिये होगा, जिसमें कि केवल गुडी गुडी बातें और कहानी टाइप कल्पनाएं होंगी। लोग जब भी लिखेंगे उसे गल्प और कल्पना की आड़ लेकर लिखेंगे ताकि उनकी वास्तविक मानसिकता को एक तरह की नकाबपोशी मिले।

    यदि यही सब गल्पायन और छद्म शुचितावादिता वाला 'स्टोरी-बॉय' लेखन होना चाहिए तो क्यों न बजाय ब्लॉग पढ़ने के, सीधे कहानियाँ ही पढ़ी जांय, कम से कम कहानी तो ढंग से पढ़ने मिलेगी।  
वैसे भी जहां तक ब्लॉग का मूल उद्देश्य है वह यही कि आप जो कुछ अभिव्यक्त करना चाहते हैं उसे खुले ढंग से अभिव्यक्त करें, उसे लोगों के सामने लायें। 

     लेखन आदि को लेकर तमाम शुचितावादी बंदिशें उपरी तौर पर ओढ़ने की बजाय असल जिंदगी में शुचितावादी हुआ जाय तो बात बने। इसे तो शुचितावादिता  कत्तई नहीं कहा जायगा कि घर से कबाड़ीवाला ढेर सारी मिजाज तर करने वाली 'वासन्ती बोतलें' बटोर कर ले जाय और अगले दिन ही नैतिकता पर एक पोस्ट ठेली जाय।

   मेरे हिसाब से इस तरह की बनावटी शुचिता केवल अपना गम गलत करने का ही जरिया है, एक तरह का Reality Substitution, कि जो कुछ वास्तविक जीवन में नहीं मिला उसे वर्चुअल स्पेस में पाने की चाह रखी जाय। और ऐसी ही चाहतों के तहत हर दो चार दिन पर पोस्ट दर पोस्ट लिखी जाय कि लोग ऐसा क्यों नहीं कर रहे, लोग समझ क्यों नहीं रहे, लोगों को ऐसा करना चाहिए.....वैसे लिखना चाहिए...... The height of Social  तकधिनवा :-)
  
  मेरा मानना है कि लोगों को लिखने दो, जैसा भी, जो भी लिखना चाहते हैं। जो लोग मिशनरी तौर पर लिखते हैं, अपने धर्म का प्रचार करने हेतु लिखते हैं उन्हें भी लिखने दो ताकि लोगों को पता तो चले कि अपने धर्म को महान बताने वाले ऐसे लोग अपने खुद के धर्म को किस हद तक जानते हैं, पहचानते हैं या फिर ऐंवे ही मजमा जुटाते रहते हैं। जिसे पढ़ना होगा वह पढ़ेगा जिसे नहीं पढ़ना होगा वो नहीं पढ़ेगा।  और जो लोग अपनी पोस्टों में खुलापन रखते हुए गली-कूचे की भाषा लिखते हैं, गलिहर बातें लिखते हैं उन्हें भी लिखने दो, क्योंकि यही वो लेखन है जो मंटो और काशीनाथ सिंह तैयार करता है। 

  और ऐसा भी नहीं है कि लोगों को समझ नहीं है..... लोगों के पास अपनी समझ है, वो जानते हैं कि क्या पढ़ना है क्या नहीं। किसे पढ़ने से समय नष्ट होगा, किसे पढ़ने से केवल मजमा जुटान होगा, और सौ बात की एक बात   लोग अब 'छद्म-शुचितावादी लेखन' की नसें जल्द पकड़ लेते हैं ....क्योंकि इसके लिये किसी स्पेशल डिग्री-फिग्री की जरूरत नहीं पड़ती........महज़ ऑब्जर्वेशन ही एनफ़ है  :-)  

 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर कि दो अप्रैल के दिन होने वाले फाइनल को लेकर तगड़ी सुरक्षा का इंतजाम किया जा रहा है । 

समय - वही, जब एक 'अमीबात्मक ब्लॉगर'  किसी दूसरे 'ब्लॉगरीय कवक' से कहे - यार तू हमेशा दुखी होकर हर दो चार दिन बाद 'सभ्य-सलोना कैसे बनें' जैसी बोझिल पोस्टें क्यों लिखता है ? 

  और तभी 'ब्लॉगरीय कवक' कहे - एक बोतल ढरकाने के बाद इससे ज्यादा की उम्मीद रखना असभ्यता है :-)

Sunday, March 20, 2011

इति होली गुझियम्........ बजरिए चऊचक दुपहरीया :)


     अब जबकि दुपहर तक आप लोग होली खेल चुके होंगे, और रगड़ रगड़ कर रंग छुड़ा रहे होंगे....कान के पास वाला, गर्दन के पास वाला, करिहांअ वाला....और न जाने कहां कहां वाला तो ऐसे में पेश है यह दुपहरिया पोस्ट जिसमें दो लोगों के आपसी संवाद के जरिए  राजनीतिक गुझिया पकाई गई है ....स्वाद बदलने हेतु थोडा सा होलियाना लंठई भी है....उम्मीद है झेल लेंगे 
:) 

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- मुलैमा को और कोई काम नही है क्या बे......जब देखो तब लग्गी लेकर ललकी टोपी पहिन आंदोलन पै आंदोलन किये जा रहा है।

- अरे तो मायावतीया भी कम थोड़े है......जहां देखो वहीं मूरती लगवाए जा रही है......अब मुलैमा तकधिनवा फानेगा तो मायावतीया भी अपना पावर दिखैबे करी।

- अरे तो कनगरेस कहां ढुका गई है,  .....इह सब में कुछ बोल क्यों नहीं रही।

- अरे बोलेगी तब नुं जब बोलने लैक रहेगी.....ससुर जब देखो तब छिनरपना फाने रहोगे तो जनता लन्डूरे चौधरी नहीं है कि चुपा जाय ।

- कनगरेस कौन छिनरपन कर रही है आर।

- ई ल्यौ....नहीं पता.....अरे सबसे बड़ी भुसुन्ड पार्टी है.......देखा नही बिकी-लीकवा क्या खोला है......हिलेरीया को परनब पसन्दै नहीं था.....उ तो चाहती थी कि लुन्गी वाला चिदम-बरवा बित्त मंत्री बने।

- ई हिलेरी किंटन उहै न है जिसका आदमी दूसरी औरतिया के चक्कर में पड़ गया था।

- हां यार वही, मोनिका लेभिन्सकी को लेके बहिनचो पूरा रासपति भवनै गुलज़ार किये रहता था । 

- अरे तो हिलेरीया को  का पड़ी थी बै..... बित्त मन्त्री हम चाहे जिसको बनाये.....या बिगाड़े ..भोसड़ीयावाले तुम कौन होते हो बोलने वाले।

- जही तो बात है रज्जा....बहुत गहिर राजनीत है.......अमरीका भोसड़ीयावाला जो भी फइसला करता है सो अपने लाभै के लिये करता है......परनब थोड़ा पुरान चोला है....अमरीकवा के खिलाफ बने रहने की आसंका थी औ यही सोच कर हिलेरीया की चुन्नी खड़ी हो गई थी ....लगी थी टहोका मारने कि परनब को नहीं बनाते तो अच्छा था।

- तो मान लो वो तहमद छाप चिदम-बरम को ही बित्त मन्त्री बनवाने में कामयाब होई जात त क्या होता ?

- अरे होता क्या....थोड़ा सा फेवर मिलता अमरीका वालन को......कल को कहीं भांटा-बैंगन, बीटी काटन,  केन टुकी चिकन फिकन जैसा मामला बझता तो उबार लेता.....बाकी तो बड़ी बड़ी डील के बारे में ओही लोग जाने।

- लेकिन आर एक बात है।

- क्या ?

- ई अमरीका वाले ससुरे हर जगह बल्लम-बाँस गाड़े रहते हैं....अभी लिबिऔ की चूतड़ उधेड़ने पहुंच रहे हैं हवाई जहाज से। 

- अरे तो उसमें उसका लाभ न है....आज उसे हर ओर अपना अंदरूनी बाजार को बिस्स के नकसा पर जमाना है, फइलाना है......अब उ सब में जोर न लगता है। 

- अरे तो कहां तक फइलायेगा ससुर कि सब बाजार कबजे में आ जाय ।

- अब ये तो समय ही बतायेगा ......वो देखो बम बारी सुरू भी कर दिया लिबिया पर।

- अरे कम से कम आज तो बमबारी रोक देना चाहिए था।

- काहें ?

- अरे आज होली है....आज के दिन भला कोई बमबारी करता है ।

- रह गये न लंणभक  के लंणभक....होली इंडिया में मनाई जाती है.....उ ससुर क्या जाने होली मनाना......हग के 
तो पानी छूते नहीं ....टिस्सू पेपर से काम चला लेते हैं... ..होली क्या खाक खेलेंगे. 

- अरे तो ये कहां लिखा है कि जो टिस्सू पेपर का यूज करता है वो होली नहीं खेलता.

- अरे मेरे कहने का मतलब ये है कि होली खेलने के बाद बहुत साफ सफाई लगता है.....उतना साफ सफाई वाला ये अगरेज लोग नहीं बुझाता हमें तो।

- अरे नहीं,  साफ सफाई के मामले में इनका कोई सानी नहीं है, देखा नहीं था इराक से लेकर अफगानिस्तान तक इन ससुरों ने पूरा इलाका ही साफ कर दिया था। ये अलग बात है कि इस चक्कर में इ लोग किसी लंठ से कम नहीं बुझा रहे, एसे लंठ जो कि इलाके का बड़भैया बनने के चक्कर में बझ गया हो और निकल न पा रहा हो।

- अरे तो हिलेरी जैसे उसकी बड़बहिनी लोग हैं न जो उसे बड़भैया बनाने में जोग छेम से जुटी हैं।

- लेकिन हमारे यहां की बड़बहिनी लोग के बारे में ऐसा कभी नहीं सुनने में आया कि फलावती जी किसी देश का अंदरूनी राजनीत में दखल दिये हों।

- अरे यहां के बड़बहिनी लोग को अपना मूर्ति लगाने से, रेल चलाने से फुरसत मिले तब तो दूसरे देश का अंदरूनी राजनीत में दखल दें। और जो कसर रह जाती है उसे यहां के बड़भैया नेता लोग पूरा कर देते हैं। 

- मतलब ?
- मतलब ये कि, जयललिता को करूणानिधि छेंके हुए है, मायावती को मुलैमा छेंके हुए है, ममता को बुद्दधदेब छेंके हुए है....अब ऐसे में ये लोग अपना लोकल घर संभालें कि बिदेसी दखलंदाजी।


- लेकिन सोनिया को कौन छेंके हुए है....वो तो दखल रख सकती अंतर-रास-टरीय असतर पर ।

    - सोनिया ? अरे उनका दखल तो अपने भतीजे की सादी तक में नहीं है.....वो क्या खाक दखल रखेगी।  देखा नहीं, वरूण की सादी तक में नहीं गई....भला ऐसा भी कोई मनमुटाव पालता है.....राजनीत अलग चीज है.....पारिवारिक अलग चीज है।  सादी - ब्याह के समय भी जो अपनी पुरानी टेक पर अड़ा रहे वो भला क्या दूसरे देस के अंदरूनी मामले में दखल रखेगा। 

- लेकिन जहां तक मुझे लगता है  सोनिया बरूण की सादी में इसलिये नहीं गई क्योंकि इससे राहुल के भविस्स पर असर पड़ सकता है......कल को कोई बरूण जैसे भाजपाई चोला को गान्ही जैसे सेकुलर से न जोड़ने लग जाय.....ससुर ये भी एक बिडम्बना ही है, क्या किया जाय। 

-  अब जो लोकल राजनीत में इतना बिज्जी हो वह भला बिदेसी राजनीत में कैसे दखल रख सकता है.....अरे वो कौन चला आ रहा है ? 

- अरे, ये तो राबड़ी देबी हैं....ये कहां जा रही हैं तरजनी अंगुली उठाये हुए ?

- ओह.....नितिश बाबू की कोठी पर रंग फेंकने जा रही हैं.......जाइये जाइये.....आपौ का याद रखेंगी..... वैसे, बिदेसी लोग सोनिया से ज्यादे राबड़ी को जानते हैं.....इसलिये नहीं कि ये लालू की पतनी है....बलकि इसलिए कि ये लालू को बिल क्लिंटन नहीं बनने देतीं......मजाल है जो एक भी मोनिका लेभिन्सकी जैसी कोई लालू की ओर ताक भर ले......तुरंत राबड़ी झोंटउवल न कर लें तो कहना। 

- सो तो है ...... और बिदेसी मामले में हिलेरी चाहे जितनी ताकतवर हो....इस मामले में राबडी से कमजोर ही ठहरेगी......लईका बच्चन के मामले में भी   ...... मोनिका जैसी की कुटाई छंटाई करने में भी  :)

- सतीश पंचम

स्थान -  वही, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां के सिल्वर स्क्रीन वाली  रातें होली के रंगों को भी मात देती हैं। 

समय - वही, जब मोनिका लेविंस्की होली के दिन रंग लेकर लालू से कहें - चच्चा, आज होली है.....चाची से कहिए हमें आपसे होली खेलने की इजाजत दे दें 

     और तभी राबड़ी रसोई से बाहर आते हुए कहें  -  पूरा बताओ...... लट्ठमार होली खेलोगी या गाल सहलाने वाली 'चमचट्ट होली'।  अगर चमचट्ट होली खेलना हो तो पहले वही खेल लो.....बाद में तो लट्ठमार होली मैं खुद खेलूंगी  :)

(सभी चित्र : गूगल बाबा से साभार)

Saturday, March 19, 2011

गिरिजेश राव - सतीश पंचम..... चैट लीक :)

   कल शाम जब गिरिजेश महराज का स्टेटस मैसेज देखा था तो लगा कि थोड़ा मनसायन हो जाय ....और फिर शुरू हुई हम लोगों की लंठात्मक बतकही :)


girijeshrao:  Status message : रोज लोग तुम्हारी याद दिलाने लगे हैं, क्या करूँ? ... कभी कहा था तुमने कि मेरा नाम भी अब न लेना। मैंने तो सब कुछ जाहिर कर दिया... इसीलिये तुम्हें खो बैठा? ... नहीं, ग़लत हूँ, तुम्हें कभी खो नहीं सकता...

satish: ये साहिर लुधियानवी की आत्मा किधर गिरिजेश नखलवी के भीतर घुस गई म्याँ
कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है
जिंदगी नर्म छांव हो....न न धूप हो
और कोई पीछे पड़ गई हो
मय सैंडल सहित
कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है :)

girijeshrao: अमाँ लोग उर्मि पर लिखने की फरमाइशें करने लगे हैं... क्या करूँ?

satish: लिख डालो....सोचो मत पार्थ लगे हाथ एक अध्याय पूरा करो

girijeshrao: वाह! जिय रजा लखन्दर

satish: या तो उर्मि या तो बाऊ
एकदम रपट लो
लेकिन कोई एक पूरा करो

girijeshrao: सही है।

अमाँ, वह पैरोडी पूरी कर पोस्ट कर दो।

satish: हाँ यार, सोच तो मैं भी रहा हूँ शाम तक करूंगा।
 लेकिन शाम तक घर जाते ही फिर वही सब्जी लाना है...भिण्डी लाना है

girijeshrao: अभी पूरा कर दो नहीं तो शाम तक तीन पांच में अधूरा रह जाएगा।
कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है...

satish: आगे...

girijeshrao: मैं भिण्डी काटता, तुम पालक काटती
सस्ती भिंडी महंगे पालक देख
मैं तुमको डांटता तुम मुझको डांटती
इस आपस की डांटा डांटी में
मेरे दिल में अक्सर खयाल आता है
विवाहित लंठ न जाने कितने दर्द के घूंट
पीता जाता है..... पीता जाता है
साला कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है

satish: :)

मजेदार बन सकता है
होली के फ्लेवर में चल जायगा
थोडा सा रूमानी टच देते हुए
जैसे,

कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है
मैं चाय पीता, तुम कपड़े धोती
फिर मैं कपड़े धोता , तुम चाय पीती
फिर हम दोनों कपड़े धोते
और बच्चे कहते...
पापा चाय जल गई है
चूल्हे पर पड़े पड़े
कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है


girijeshrao: चाय अम्मा बना रही है, पापा को क्यों पुकारेंगे ?
रह गये बकलोल ही

satish: हांय

चलो ठीक कर देता हूं
लोग कहेंगे महराज लोग भांग खाकर कवित्त पेल रहे हैं  :)

girijeshrao: हाँ,

कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है
तुम चैटिया रही होती अपने ब्वायफ्रेंड से
मैं अपनी गर्ल फ्रेंड से
और बच्चे कहते पापा!
ये आंटी और अंकल कहाँ से आ टपके?
कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है।

satish: तुम झगड रही होती दरवाजे पर दूधवाले से
कि दूध में पानी क्यों ज्यादा मिलाते हो ?

girijeshrao: हांय....

ज्यादा पानी मिलाते हो माने ?

मतलब पानी होना चाहिए
ससुरा  गजब खयाल आता है :)

satish: आगे सुनो यार

मैं अंदर पोस्ट लिख रहा होता
कि भैसें आजकल पानी ज्यादा पीती है
भैंस का रंग काला होता है
उसके पूंछ होती है
दो सींगे भी होती हैं

girijeshrao: फिर भी वह दूध देती है
पड़वे तो किसी काम के नहीं होते

हालाँकि उनके भी पूंछ होती है

satish: हांय

तो क्या वो पड़वा था ?
साला फिर भी दूध दे रहा था :)

हां .... कवि और ब्लॉगर चाहें तो क्या नहीं हो सकता

आगे
girijeshrao: कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है

तुम यूँ ही दतचियरपन कर रहे होते चैट पर
और बॉस बगल में आ खड़ा होता
तुम ये कहते तुम वो कहते
और आखिर में लिखते बाद में करता हूँ
अभी पीछे एक घोंचू खड़ा है
फिर उसके केबिन में डाँट खा रहे होते
कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है

satish: बड़ा भयंकर खयाल है ससुरा :)

girijeshrao: कभी कभी मेरे मन में खयाल आता है।
दिल में ?
कि दिमाग में ?
कहीं भी आये साला आता तो है :)

satish: :)

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         फिलहाल होलीयात्मक मूड़ में हुए चैट को ही छापा गया है ..........लंठात्मक मूड वाली चैटिंग जनहित में नहीं छापी जा रही है ....क्योंकि छटंकी ब्लॉगरीय हादसों को देखते हुए अंदाजा लगाया जा रहा है कि ब्लॉगिंग का न्यूक्लीयर रियेक्टर अभी कच्चा है ..... ब्लॉगजगत हम लोगों की उन भयंकर चैटिंग्स को सह नहीं पाएगा  और फिर गर्म हो चुके ब्लॉग रियेक्टर को ठंडा रखने के लिए ढेर सारे कोका कोला भी तो लगेंगे :)

कोका कोला ?

अरे मालूम नहीं क्या ?

 ठंडा मतलब ....... कोका कोला   :) 

Wednesday, March 16, 2011

अंतिम री-पोस्ट......मधुमास के आलोक में :-)

मित्रों,

        धीरे धीरे होली आ ही गई है और उसके आने के साथ ही  सफ़ेद घर के चुनिंदा पोस्टों की श्रृंखला अब यहीं समाप्त की जाती है।   इस होली की फगुनाहट में.....जहां मधुमास चारों ओर अपना असर दिखा रहा है,  हवा में एक किस्म की मस्ती सी छाती जा रही है , वहीं  अब से  सफ़ेद घर पर नई पोस्टों के आने का सिलसिला भी शुरू हो जाएगा ।

      अब तक आप लोगों ने जो मेरी पुरानी पोस्टों को झेला (हाँ, झेलना ही कहूंगा :) .....उसके लिये बहुत बहुत शुक्रिया :)  अभी और ढेर सारी रोचक पोस्टें हैं  जिन्हें कि री-पोस्ट किये जाने का विचार था लेकिन फिर सोचा कि री-ठेल सीज़न वन को यहीं  एक विराम दिया जाय...........री-ठेल सीज़न टू फिर कभी :) 

    फिलहाल पेश है बेस्ट ऑफ सफ़ेद घर श्रृंखला में  अंतिम री-पोस्ट ....... 'मनबोध मास्टर की डायरी'

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    कल ट्रेन में बैठे-बैठे एक अच्छी रचना पढने का मौका मिला। किताब थी विवेकी राय रचित 'मनबोध मास्टर की डायरी' । उसमें एक जगह बताया गया कि किस तरह लेखक एक बैंडबाजे वाले की खोज में चले और उन्हे पढे लिखे बैंडबाजे वालों के एक दल के बारे में जानकारी मिली। एक जन ने बताया कि -

  
स्कूल के मास्टर लोग शादी-विवाह में बैंड बजाने का काम करने लगे हैं। ..... ये लोग बजनिया नहीं हैं लेकिन पेट और परिस्थिति जो न करावे । इनमें बीएड, बीपीएड, विद्यालंकार, शास्त्री, आचार्य सभी शिक्षित लोग हैं। इनके एक रात का सट्टा भी ज्यादा नहीं है - बस पांच सौ रूपये रात समझिये।

सभी अध्यापक हैं ?

'पूरा स्टाफ समझिये । वह जो बडा सा ढोल होता है और जिसे ड्रम कहते हैं तथा जो इतने जोर से बजाया जाता है कि उसकी आवाज से घर की खपरैल तक खिसकने लगती है। उसे अंग्रेजी के लैक्चरर बजाते हैं। संस्कृत वाले पंडित जी तमूरी पिटपिटाया करते हैं। ......इतिहास के अध्यापक शक्सफोन और नागरिक शास्त्र के अध्यापक बल्टहार्न बजाया करते हैं। कमाल का काम है कारनट का। सो इसे गणित और विज्ञान के अध्यापक बजाते हैं। हिन्दी विभाग यहाँ भी उपेक्षित है। हिन्दी टीचर को झाँझ मिली है। बजती तो खूब झमाझम है पर अन्य सुरीली आवाजों के आगे उसकी क्या बिसात है ? अर्थशास्त्री वाले मसक बजाते हैं। एक बार हवा भर दी तो बस उंगलीयाँ भर हिलानी है। ......महत्व का काम पीटी टीचर का है।......यहाँ डांसर बिना बैण्ड अधूरा लग रहा था। बाहर से रखने पर अपनी मौलिकता जाती रहती। इसीलिये शारिरिक शिक्षक ने इसमें अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार यह दल तैयार हो गया।

......तो ये बाजा बजाना औऱ अध्यापन कैसे एक साथ कर लेते है ?

बाजा वे गर्मी की छुट्टियों में ही बजाते हैं। प्रायः हमारे यहाँ लग्न विवाह के दिन उसी लम्बी छुट्टी में पडते हैं। अध्यापकों के पास शिमला, नैनीताल मे तरावट लेने के लिये जाने भर तो पैसा होता नहीं। .....सो एक दो महीने का धन्धा उठा लेते हैं।......

.......इनको बारात में ले जाने से कई समस्यायें हल हो जायेंगी। बैठे बिठाये सफेदपोश बाराती मिल जायेंगे। ......बाजा बजाने के बाद जब कपडे बदल कर ये लोग महफिल में बैठते हैं तो महफिल उग जाती है। वह खादी की चमक, वह टोपी-चश्मा, वह भव्य व्यक्तित्व तथा मुख पर विद्या का वह प्रकाश। बारात में बैंड बाजे के साथ कोई बोलता आदमी भी होना चाहिये। यहाँ दर्जनों मिल जाते हैं। संस्कृताध्यापकों को तो बारात में शास्त्रार्थ का एक नशा जैसा है....।

......कर्मकांड की समस्या भी हल। द्वार पूजा से लेकर विवाह तक के सारे काम संस्कृताध्यक्ष से करवा लिजिये। अगर बाजा बजते में कोई मौका आ गया तो उन्हें छुडाया भी जा सकता है...तमूरी ही तो बजाते हैं।

लेखक ने इतना जानकर सोचा कि इन अध्यापकों वाले बैंड बाजे से किस तरह बात की जाये - पढे लिखे लोग हैं। सो लेखक ने कई मजमून बनाये -

- क्यों महानुभाव आपकी एक रात की सेवा का क्या पुरस्कार होता है ?

किन्तु यह बात जँची नहीं। दूसरा मजमून बनाया -

- आपके अनुरंजन कार्य की दैनिक दक्षिणा क्या होगी ?

नहीं यह भी नहीं जम रहा। अंत में लेखक ने मजमून कुछ इस तरह तैयार किया -

- हमारे यहाँ के माँगलिक कृत्य के सानन्द सम्पन्न होने में आपका जो अमूल्य सहयोग प्राप्त होगा उसकी मुद्रा रूप में कितनी न्योछावर आपकी सेवा में उपस्थित करना हम लोगों का कर्तव्य होगा ?

यह वाक्य कुछ जमा और विशिष्ट बजनियों के गौरव के अनपरूप जँचा। 


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      यह व्यंग्य मैं मनबोध मास्टर की डायरी से साभार पेश कर रहा हूँ। विवेकी राय जी से मैंने एक बार बनारस से ही फोन पर बात की थी, काफी अच्छा लगा था। खुद विवेकी राय जी शिक्षक रह चुके हैं। यह व्यंग्य उन्होंने तब लिखा था जब शिक्षकों की तनख्वाह रोक ली जाती, महीने के पचास साठ रूपये वोतन मिलते थे। आज भी कई शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों को परले दर्जे का कारकून ही समझा जाता है। यह व्यंग्य उसी की याद दिलाता है। विशेष रूप से बाजे का चुनाव शिक्षकों के विषय से मैच कर रहा है - झाँझ - हिंदी विभाग को - बजती तो झमाझम है पर बाकी बाजों के सामने उसकी क्या बिसात...और विशेषकर पीटी टीचर का डांसर बनना तो अहोभाग्य ठहरा :)



     अर्थशास्त्र का तालमेल जिस तरह मसक बाजा से करते हुए बताया गया उसे बहुत सराहा जा सकता है। आज के दौर में जब सभी अर्थशास्त्री एक मेज पर बैठ टिपिर टिपिर आंकडे कंम्प्यूटर पर टिपिकते है तो एसे में विवेकी राय जी का अर्थव्यवस्था के बारे मे यह कहना - मसक बाजा अर्थशास्त्र वाले टीचर बजाते हैं, एक बार हवा भर दो बाद में बस उंगलियां ही हिलानी हैं :D

    ( हमारी अर्थव्यवस्था भी मसक बाजे की तरह ही तो नहीं, एक बार हवा भरी..... बाद में उंगली कंम्प्यूटर पर चल पडी, हजारों अर्थशास्त्रज्ञों की तरह :) 

- सतीश पंचम



स्थान - वही, जहां के बाज़ारों में आम पहले आ जाते हैं...... बौर बाद में।


समय - वही, जब बारात में बजनिया मास्टर लोग चाय पीने के लिये जुटें और तभी प्रिंसिपल आकर कहें - चाय पीकर ताकत बटोर लो..... ढोल की रस्सी टैट करना है।

Tuesday, March 15, 2011

श्वेत प्रदर ऑफ देशज फुलऊरी

   होली नज़दीक है.....एकाध मन हिलोर झगड़े से रूबरू हो लिया जाय.... ताकि थोड़ा सा मनसायन हो :)  
     क्योंकि, अक्सर देखा गया है कि कई मन हिलोर बातें झगड़ों में भी यहां वहां से निकल ही आती हैं।  
     चुनिंदा पोस्टों की श्रृंखला में पेश है ऐसी ही एक देशज ठकठोरन जिसे कभी पोस्ट किया था  :)


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     अरे क्या तुम्हारा दीदा फूट गया था जो ई पूरे घर को नासपीटे बिज्ञापन से रंगा बैठे हो, चार दिन नैहर क्या गई ....घर को रसलील्ला अखाडा बना दिया - रमदेई ने सदरू भगत से कहा। 


      सदरू कहें तो क्या कहें, चार अच्छर पढ लिये होते तो आज ये दिन न देखना पडता, कम्बख्तों ने बिज्ञापन भी छापा है तो शर्तिया ईलाज वाला.....गुप्त रोग, नामर्दी, स्वप्नदोष, श्वेत प्रदर और न जाने क्या-क्या पढकर सुना रहा था बासदेव का लडका, कह रहा था कोई डॉक्टर खान का बिज्ञापन है जो रोग-ओग का ईलाज करते हैं। उन्हें तभी ईन्कार कर देना चाहिये था जब वो घर के दीवाल पर बिज्ञापन छापने वाले रंग रोगन लेकर आये थे, कह सकते थे कि हम अपने घर पर ईस तरह का बिज्ञापन नहीं लगने देगे, बहू-बेटियों का घर है, लेकिन हाय रे अपढ बुढापा, पूछने पर इतना बताया कि दवा वाला, डॉक्टर वाला विज्ञापन है, आप का घर सडक के पास ही है सो उस घर की दीवाल पर बिज्ञापन छापेंगे बदले में सौ-पचास दे भी देगे, बाहर से घर भी रंगा देंगे सो भी आपको सुभीता हो जायेगा, जब से घर बनवाये हो लगता है कभी चूना छोड कोई दूसरा रंग नहीं लगाया, अब हम लगा देंगे। 


      ले दे कर एक दिन मे रंग पुता गया, दूसरे दिन लिख उख कर काम खतम, सौ रूपये मिले सो अलग, लेकिन क्या जानते थे कि ये जी का बवाल बो रहे हैं, सोचे थे लाल तेल या काढा-ओढा का बिज्ञापन होगा, लेकिन ये तो शीघ्रपतन, स्वप्नदोष और नामर्दी वाला बिज्ञापन है । 


       ईधर रामदेई पूरे उफान पर थी, क्या बडी बहू और क्या छोटी बहू सबकी खबर ले रही थी, घर न हुआ चकचोन्हरों का अड्डा हो गया, जो आता है घर की ओर ताक कर हँसता है.....हँसेंगे नहीं जब हँसने लायक काम किये हैं तो......वो रामजस खटिक ऐक आदमी को रस्ता बता रहा था कि सीधे चले जाईये, वहीं बगल मे एक शीघ्रपतन वाला घर आयेगा, बस वहीं से मुड जाईयेगा......नासपीटा......बोली बोल रहा था.......खुद के घर की बहुरिया भले यहाँ वहाँ लपर-झपर करे लेकिन दूसरे के घर का नाम रखने मे ये आगे रहेंगे......हँसो और बोलो......ईस घर के लोग ही जब हँसाने के लिये जोर लगाये हों तो और हँसो। 


      तभी बडी बहू बाँस के झुरमुटों की आड से आती दिखी , साथ मे ननद रतना भी थी। कहाँ से आ रही हो दोनों जनीं - रमदेई ने उसी रौ मे पूछा। रमदेई की फुफकारती आवाज से दोनों समझ गयीं कि आज अम्मा उधान हुई है....कहीं कुछ बोली तो चढ बैठेंगी।


   रतना ने ही कहा - भौजी का पेट दुख रहा है.......दवाई लेने गई थी। 


      रमदेई कडकते बोली, अरे तो उसी नासपीटे डाकटर से ही ले लेती जिसका नाम घर पर चफना लाई हो....ये नहीं कि रोक-छेंक लगाती कि ऐसा बिज्ञापन नहीं लगने देंगे.....बस कोई आये चाहे घर ही लूटकर चला जाय लेकिन मजाल है जो इस घर के लोग चूँ तक बोले.....। 


      लोगों की भीड बढती जा रही थी, हर कोई किसी न किसी बहाने इसी ओर चला आ रहा था, सब को मानों ऐक ही साथ काम निकल आया......कोई दुकान जा रहा था तो कोई खेत देखने , किसी को तो अपनी भैंस ही नहीं मिल रही थी, जाने चरते-चरते कहाँ चली गई.........लेकिन खोजने वाला रमदेई के यहाँ जरूर देखता चला......देखो आज सब कोई देख लो कि ई शीघ्रपतनौआ घर कैसा होता है।


      कान खुजाते रमदू कोईरी बोले - मुदा हम तो समझे कोई टक्टर-ओक्टर का या बिस्कुट-उस्कुट का बिज्ञापन छापने आये हैं....ईसलिये मैं तो कुछ न बोला....दो दिन घर से फुरसत ही न पाया, आज देखा तो ये हाल है.....। 


      इधर सदरू भगत मन ही मन कह रहे थे - खूब हाँक लो बच्चा, तुम भी तो वहीं थे जब वो लोग कलाकारी कर रहे थे....अब कैसे गाय बन गये हो। लल्ली चौधरी बोले - अरे तो क्या हो गया जो ईतना बावेला मचाये हो.......घर को रंग-ओंग दिया, जितना कीडा-उडा होगा सब मर गया होगा, सौ रूपया मिला सो अलग, अब क्या डॉक्टर अपना घर ही उठा कर दे दे। 


     रमदेई लिहाज करती थी लल्ली चौधरी का - एक तो गाँव के बडमनई, दूसरे दूर के रिश्ते मे बहनोई.......धीमे-धीमे ही भुनुर-भुनुर करती बोली - ये और आये हैं आग लगाने - अरे ईतना ही चाव है कीडा मरन्नी का तो अपने घर ई बिज्ञापन रंगा लेते......घर के कीडा के साथ , दिमाग का कीडा भी मर जाता......आये हैं साफा बाँधकर । 


       रामराज ड्राईवर जो हरदम अपने साथ रेडियो लेकर चला करते थे वह भी आ गये थे बवाल सुनकर, रेडियो अब भी उनका बज ही रहा था........तुलबुल परियोजना पर भारत पाकिस्तान वार्ता शीघ्र शुरू होने की संभावना प्रधानमंत्री ने व्यक्त की है। कल एक जीप के खड्ड मे गिर जाने से राजमार्ग संख्या 10 पर हादसा हुआ......। ईधर रामदेई का भी समाचार जारी था.......आग लगे ई बुढौती में.....न चूल्हा न चक्की केकरे आगे बक्की......। 


    तभी रेडियो पर संदेश प्रसारित हुआ.....सुरक्षित यौन संबंधों हेतु कंडोम का ईस्तेमाल करें.....कंडोम है जहाँ, समझदारी है वहाँ। सुनकर सभी को जैसे लगा यह विज्ञापन रमदेई के लिये ही था.....सभी मुंह दबाकर हँस रहे थे उधर सदरू भगत सोच रहे थे क्या कहा जाय......ससुर मैं तो किसी ओर में नहीं हो रहा हूँ......ईधर ये बुढिया जान खा रही है, उधर ये सब लबाडी-सबाडी.....आज खुब तमासा लगा है दरवाजे पर....ये रमदेई जो न कराये सो कम है.....। 


    तब तक लल्ली चौधरी खंखार कर बोले - ऐसा है सदरू महराज कि आज जमाना बदल गया है, अब वो लाज लिहाज वाला जमाना रहा नहीं........सो तुम लोग कहाँ अपने प्राण बचाते फिरोगे.....एक काम करो.....जाकर चूना लो और पोत दो दीवाल पर पूरी दीवाल ही सफेद हो जाय , सौ रूपया मिल ही गया है.....जब वो रंग-रोगन वाले औ लिखने वाले डॉक्टर पूछें तो कह देना कि - क्या बतायें डॉक्टर साहब, हमारी दीवाल को लगता है श्वेत प्रदर हो गया है.......ईसलिये सफेद -सफेद लग रही है.....अब आप ही कुछ करें और जल्दी करें......वरना कोई दूसरा शर्तिया डॉक्टर आकर उसी सफेद हुई दीवार पर न लिख दे .....सफेद दागों का शर्तिया ईलाज :)

- सतीश पंचम




Monday, March 14, 2011

दूल्हों का वर्गीकरण......बायोबुढ़ापा पद्धति से :)

     दूल्हों के भी कई प्रकार होते हैं ये मैंने एक साहित्यिक कृति को पढ़ते हुए जाना था, अन्यथा अब तक तो यही समझा था कि दूल्हा आखिर दूल्हा होता है....उसमें कौन सा क्लासिफिकेशन ? लेकिन नहीं, दूल्हों में भी क्लासिफिकेशन होता है, वर्गीकरण होता है। उसी वर्गीकरण को लेकर लिखी गई पोस्ट को री-पोस्ट कर रहा हूं।  
  
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     साहित्यिक रचनायें पढते हुए कभी कभी कुछ रोचक जानकारीयां भी मिल जाती हैं। अभी शनिवार को ही अमरकांत जी की साहित्य अकादमी पुरस्कृत रचना ‘इन्हीं हथियारों से’ पढ रहा था। राजकमल द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास के एक प्रसंग के द्वारा दुल्हों के बारे में एक रोचक जानकारी मिली है। प्रसंगानुसार घर के बच्चे, घर की बूढी दादी जीरादेवी से दूल्हों के प्रकार के बारे में पूछते हैं। उन्हें दादी ने पहले भी ये बातें बताई हैं लेकिन बच्चे, दादी के पोपले मुँह से मजाकिया तौर पर फिर दुल्हों के प्रकार के बारे में जानना चाहते हैं ।

तब दादी जीरादेवी अपने पोपले मुंह से बताना शुरू करती हैं–

- “ तो ए बाबू सुनो । शादी –ब्याह की सबसे अच्छी उमिर होती है सोलह से बीस बरीस तक। इस उमिर के दुल्हा को ‘बर’ कहते हैं। ‘बर’ को देखकर सबका जी जुडा जाता है। दुल्हन का दिल भी उल्लास से भर जाता है।

    अब आगे बढो। बीस से पच्चीस बरिस के दुल्हा में वह बात नहीं, फिर भी कोई हरज नहीं। इस उमिर के दुल्हा को बर नहीं ‘बरूल्ली’ कहते हैं। अब पच्चीस से आगे बढो।

    पचीस से तीस बरीस तक के दुल्हे का चेहरा रूढ होने लगता है। मूँछ के बाल कडे हो जाते हैं। बोली भी रूखी और कडकीली हो जाती है। इस उमिर के दुल्हा को ‘बरनाठ’ कहते हैं।

     तीस से चालीस बरिस का दुल्हा को ‘जरनाठ कहते है। इस उमिर में देह, बोली – किसी में भी नरमाहट नहीं रहती। चमडी एकदम मोटी हो जाती है। इस उमिर का दुल्हा बडा चालाक हो जाता है, हमेशा अपने मतलब की बात सोचता है। रात-बिरात घुमक्कडी करने लगता है। कई चक्करों में रहता है, ए बिटिया। बीबी से हराठी-मुराठी की तरह ब्यौहार करता है। हमेशा जली-कटी सुनाता है।

     हाँ, ए बिटिया, चालीस से आगे के दुल्हा को ‘खुरनाठ’ कहते हैं। इस उमिर में शरीर और मुँह फैल जाता है।चेहरे पर एक दो गहरी लकीरें दिखाई देने लगती हैं जैसे कच्ची सडक पर बैलगाडी की लीक। अधपके, मूँछों के बाल झाडू के सींकों की तरह फरकने लगते हैं। वह बुढौती को छिपाने के लिये इतर-फुलेल , खिजाब लगाता है। उसके गले मे बलगम भर जाता है और वह हमेशा खुर-खुर किये रहता है। वह सबको गुस्से से घूर-घूर कर देखता है। सबसे टोका टोकी करता है। उसकी दुलहन उससे बहुत डरती है।

     अमरकांत जी ने जीरादेवी के मुँह से इतने विस्तार से ये विवरण दिये हैं कि आखिरकार मानना ही पडता है कि पुराने जमाने के बुजुर्गों की भी एक बौध्दिक सोच होती थी जो अपने आप में एक अलग ही गरिमा लिये रहती थी।

    बहरहाल, ये बातें पढते हुए अचानक ही मुझे समलैंगिक विवाह वाला मुद्दा भी याद आ गया। मैं अब सोच रहा हूँ कि समलैंगिक विवाह से जन्मे इस नये किस्म के दुल्हे का क्या नामकरण किया जा सकता है।
उम्र की सीमा का लोप कर दिया जाय तो जहाँ तक मेरा ख्याल है जीरा देवी के द्वारा बताये गये‘बरूल्ली’ दुल्हे की तर्ज पर समलैंगिकों के लिये नया नाम होमुल्ली' कैसा रहेगा ?



सतीश पंचम

स्थान - फुहार लूटती मुंबई


समय - वही, जिस दिन हाईकोर्ट का समलैंगिकों के पक्ष में फैसला आ जाये और उसी शाम पप्पू पास हो जाये :)

क्रिटिकल समय - पप्पू ने पास हो जाने के बावजूद मिठाई नहीं बांटी, ताकि लोगो में उसके बारे में कोई गलतफहमी न हो :)

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 बगल में है हंस पत्रिका का वही बहुचर्चित आवरणचित्र जिसमें दुल्हन पियरी पहने, अपना दांया पैर थोडा आगे की ओर निकाल कर खडी है और दूल्हा अपनी दुल्हन के पैर छू रहा है। अब तक जो कुछ देखा- सुना है, जो कुछ जाना समझा है ऐसे में परिपाटीयों को ढोते-ढोते छन्नी हो चुके समाज के मंडवे तले का ये दृश्य अचंभित ही करता है।



      इस पर भी पोस्ट लिखा था कभी। बाद में कहीं पढ़ा था कि ऐसा कई समाजों में विवाह के अवसर पर होता है लेकिन बहुत ज्यादा प्रचलित नहीं है यह प्रथा। 

Sunday, March 13, 2011

दुलरहा ननिहाल

   कजरारी आँखों के सपने
    ननिहाल कई लोगों को अच्छा लगता है, कई बार लोग अपना ज्यादातर बचपन ननिहाल में ही बिताते हैं......मामा लोगों का लाड़ प्यार, नानी का दुलार सब मिलकर अक्सर आकर्षित करते हैं। लेकिन इसी लाड़ प्यार के चलते बच्चे कभी कभी ऐसी हरकत कर बैठते हैं कि न हंसते बनता है न रोते। कुछ उसी तरह के वाकये को लेकर लिखी गई थी मेरी पोस्ट जिसे चुनिंदा पोस्टों की श्रृंखला के तहत पेश कर रहा हूं। 


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     इस बार गांव गया तो एक चार साल के बच्चे नितिन के निर्मल क्रोध को देखने का मौका मिला । 


      हुआ यूं कि एक बच्चा नितिन अपने ननिहाल, यानि के मेरे गाँव में रहता है। खूब लाड प्यार में पल रहा है। नितिन की माँ अपने ससुराल में ही है, चार साल के नितिन को जब उसके मामा ने एक पाँच सौ के आसपास की कीमत वाला शर्ट लाकर दिया तो उसे पहनने पर उसके नाना ने कहा कि - तुम्हारी तो तैयारी हो गई । अब यही कपडा पहना कर तुम्हे तुम्हारी मम्मी के पास छोड आउंगा। 

उस समय तो नितिन कुछ न बोला लेकिन थोडी ही देर बाद एक बच्चे की आवाज आई।

अरे नितिनवा ने देखिये क्या कर दिया है ? 

     सब लोग दौडे कि क्या हो गया । आशंका सबके मन में जाने कैसे कैसे रूप लेकर आ रही थी। घर के अंदर झांक कर लोगों ने देखा कि नितिन ने अपनी उस नई नवेली शर्ट को हँसुए सो काट-काट कर चिथडें कर डाला था। पहुँचने पर हँसुआ एक तरफ फेंक कर होने वाली पिटाई के लिये जैसे एक तरह से वह अपने को तैयार कर रहा था। 

     उसकी काजल लगी आँखे देखने पर जाने कैसा तो लग रहा था। विस्मय, डर, आशंका इन सबको मिलाने के बाद एक और चीज दिख रही थी उसकी आँखों मे और वह थी- जिद्द -  न रहेगा ये शर्ट और न जाना पडेगा उसे अपने घर। 

न चाहते हुए भी, लोगों के रोकते रोकवाते भी मामा लोगों ने उसकी धुनाई कर दी। पिट पिटाने के बाद रात को वही नितिन फिर नाना की थाली के पास आलथी पालथी मार कर बैठ गया और मुंह खोलकर कहा – आ……। 

     नाना ने भी एक कौर उसके मुंह में डाल दिया। रात को जब सभी बैठे तो इस बात पर लगभग सभी सहमत थे कि बच्चे ननिहाल में रहने से बिगड जाते है। शायद कुछ हद तक ये बात सच भी है। माँ-बाप के यहाँ रहने पर अनुशासन कुछ रहता है जो कि ननिहाल में रहने पर अनुशासन पर लाड-दुलार की परत चढ जाती है ( हो सकता है ये बात सच नहीं भी हो ) 

खैर जो भी हो, नितिन के चर्चे गाँव में भी खूब हुए – पट्ठे ने नई शर्ट फाड़ डाली। 

 दुलरहा क्रोध ऐसा ही होता है शायद......और ऐसा ही होता है प्यारा सा ननिहाल जो बच्चों को बिगाड़ता भी है  :) 

- सतीश पंचम


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इस पोस्ट पर आई कुछ टिप्पणियां 

डॉ. मनोज मिश्र said...
बहुत सुंदर मनःस्थिति का वर्णन किया है .... .नितिन नें साबित किया कि भौतिक चकाचौध उसके प्रेम की बाधा नहीं बन सकते .

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...
अरे भैया हमारी नानी वापस ले आओ तो सैंकड़ों शर्टें निवछावर कर दूं। सवेरे नानी लिट्टी गुड़ और कमोरी में गरम किया गाढ़ा ललछरहों रंग वाला डूंड़ी (एक सींग वाली मेरी प्रिय) भैंस का दूध पिलाती थीं।
वह समय कैसे वापस मिले!


रचना त्रिपाठी said...

मुझे याद नहीं है कि मै आज तक अपने ननिहाल में चौबीस घंटे भी रहीं हो,कभी जाना भी हुआ तो एक-दो घंटों में ही लौट आना हुआ। ननिहाल इतना पास जो है।
पापा का भी यही मानना था कि बच्चे ज्यादा समय वहाँ रहे तो बिगड़ जायेंगे। मेरे ६ मामाजी लोग हैं और मजे की बात ये कि मेरी किसी से नही बनती। आप सोच रहे होंगे ऐसा क्यों है? कभी फुरसत में अपने ब्लॉग पर बताउँगी।


( इस बच्चे का चित्र करीब पांच छह साल पहले मैंने बस में तब खेंचा था जब जौनपुर जा रहा था, बच्चा कहीं बाहर खिड़की की ओर देखते हुए किन्हीं खयालों में खोया था ....आज अपने कलेक्शन को सर्च करते हुए वही तस्वीर मिल गई तो मन में पहली बात जो आई वो यही कि अब तो वह बस वाला बच्चा काफी बड़ा हो गया होगा...संभवत: चौथी- पांचवी में राणा प्रताप और अकबर पढ़ रहा हो  :)

Saturday, March 12, 2011

बारह गुस्सैल...

         चुनिंदा पोस्टों की श्रृंखला में पेश है मेरी एक खास  पोस्ट - खास इसलिए कि  इस पोस्ट की खूबी है कि ये ब्लॉगिंग की  उस विधा (कु)  का सशक्त उदाहरण है कि कैसे किसी अच्छी पोस्ट पर बेहद कम टिप्पणी होती है जबकि फालतू से फालतू पोस्ट पर टिप्पणियों की भरमार होती है .....  ( मेरी कई बेकार पोस्टों पर भी  :)

       इस पोस्ट पर कुल मिलाकर चार टिप्पणियां आई थीं लेकिन जो भी आई थीं ज्यादातर विद्वतापूर्ण थीं। अपने अपने  अनुभवों से रची- पगी हुई टिप्पणियां।  इसलिए मेरा मानना है ( और भी लोग संभवत: मानते होंगे ) कि टिप्पणियों की संख्या न देख उनकी गुणवत्ता देखनी चाहिए .और कल अनूप जी की पोस्ट पर भी मैने कहा था कि टिप्पणियों से पता चल जाता है कि कौन सी टिप्पणी थोथी है ....कौन सी भोथरी है.....कौन सी टिप्पणी दिल से की गई है....... और टिप्पणियों से ना भी पता चले.....लेकिन लेखक को अंदर से पता होता है कि उसने वाकई अच्छा लिखा है या केवल मजमा जुटाया है  : )

  तो  लिजिए पेश है वही पोस्ट ......12  Angry Men 

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     मित्रों,

     आपने देखा होगा कि  कुछ फिल्मों का इस्तेमाल अक्सर किसी जटिल चीज को समझाने के लिये किया जाता है.......शैक्षणिक संदेश देने के लिए प्रदर्शित किया जाता है...... ऐसी फिल्में व्यावसायिक तौर पर असफल भले हों लेकिन उनके कन्टेन्ट कहीं न कहीं तगड़ा संदेश देते हैं।

    ऐसी ही  एक फिल्म बनी थी  12 Angry Men,  जिसे कि अक्सर Managerial technique of Decision Making पढाने हेतु इस्तेमाल किया जाता है।  


      कल्पना करें कि आप जिस टीम में काम करते हैं वहां कई तरह के लोग हैं....सबकी अपनी अपनी मानसिकता है....... किसी का कुछ बैकग्राउंड है तो किसी का कुछ। हर किसी के अपने निजी जीवन में कुछ घटनाएं घट चुकी हैं जो कि आजीवन उनके Decision making पर असर डालती हैं और वो पूर्वाग्रह या Prejudice के तहत अपना निर्णय लेते हैं। 

      वहीं इसी टीम में कुछ एसे लोग हैं जो कि हवा का रूख देख कर फैसला करते हैं। मुंह देखादेखी फैसला करते हैं, दूसरों को देखकर फैसला करते हैं कि सामने वाले को क्या पसंद है, क्या नहीं। कहीं वो नाराज तो नहीं हो जाएंगा मेरे निर्णय लेने से।



     कुछ ऐसे सदस्य भी होते हैं जिनका कि अपने पर कॉन्फिडेंस नही होता और हर डिसिजन लेने से पहले अपने सिनियर का मुंह ताकते हैं। इस टीम में ऐसे भी हैं जो कि केवल अपनी नौकरी करते रहने के लिये ही टीम में बने रहना चाहते हैं। उन्हें जो कहा जाता है वही करते हैं। अपने से इनिशियेटिव लेने की उनमें क्षमता ही नहीं होती।

       यह फिल्म 12 Angry Men इन्हीं सब परिस्थितियों को एक जगह एक कमरे में लाकर पेश करती है। इस 12 Angry Men का ही हिंदी Version है एक रूका हुआ फैसला। फिल्म की कहानी के अनुसार एक बच्चे पर अपने पिता की हत्या का आरोप होता है। कोर्ट आदेश देती है कि बच्चे ने हत्या की है या नहीं ये फैसला एक 12 सदस्यी जूरी पर छोडा जाय। कोर्ट के आदेश के तहत फैसला एकमत से होना चाहिये।

      कोर्ट के आदेश के तहत सभी 12 सदस्य एक कमरे में बंद हो जाते हैं। उन्हें बाहर जाने की तब तक इजाजत नहीं है जब तक कि फैसला न हो जाये। शुरूवात में ही कई सदस्य उस कमरे को कोसते दिखते हैं जिसमें वह बंद हैं। पंखा नहीं चल रहा, गर्मी है ये है वो हैं। यानि वह सब कमियों की बातें करते हैं लेकिन जिस बात पर Decision लेना है वही नहीं करते। कुछ देर बाद सभी सदस्य एकसाथ बैठते हैं। शुरूवात में ही कोर्ट में चले इस बच्चे के केस को ध्यान में रखते हुए जूरी मेंबर आपस में वोटिंग करते हैं कि बच्चा Guilty है या नहीं। कोर्ट में चली बहस और अपनी जो कुछ भी आधी अधूरी जानकारी के तहत 11 सदस्य बच्चे को Guilty मानते हैं, दोषी मानते हैं लेकिन एक सदस्य बच्चे को दाषी नहीं मानता। 

      बाकी के सदस्यों की भौंहे टेढी हो जाती हैं इस एक सदस्य के प्रति। वह उसका मजाक उडाते हैं कि 11 सदस्य एकमत हैं लेकिन अकेला वही है जो बहुमत के खिलाफ है। तब उस पर लोग दबाव डालते हैं कि अब वह भी एकमत से शामिल हो और बच्चे को guilty माने और हम सभी इस बंद कमरे से बाहर निकले। हम सभी को अपने अपने काम निपटाने हैं। किसी को फिल्म देखने का वक्त हो रहा था तो किसी को कुछ। लेकिन चूंकि फैसला कोर्ट आदेश के तहत एकमत से होना चाहिये अत वह बारहवां सदस्य अपने सहमत न होने का कारण बताता है और हर एक प्वॉइंट को तफ्सील से रखता है। लेकिन फिर भी जूरी के सदस्य उससे सहमत नहीं होते। वह चाहते हैं कि जल्दी से फैसला हो और उन्हें घर जाने मिले। कुछ बहस और झडप के बाद वह बारहवां सदस्य एक प्रस्ताव रखता है कि अब तक मैने जो यहां बात बताई है उसके बाद भी आप लोग सहमत नहीं हैं। इसका काट ये है कि एक बार और वोटिंग करवाई जाये और यदि एक और वोट बच्चे को निर्दोष माने तो बहस जारी रखी जाय। इस बार वह बारहवां सदस्य खुद से ही वोटिंग में हिस्सा नहीं लेता।

        वोटिंग होती है और आश्चर्यजनक ढंग से एक औऱ सदस्य बच्चे को निर्दोष मानता है। NOT GUILTY वाला वोटिंग पर्चा सबके आंख की किरकिरी बन जाता है। इस बात पर भी बहस होती है कि किसने किया होगा ये एक वोट। तभी वह शख्स जिसने बच्चे के पक्ष में वोट किया था खडा होता है और अपनी बात को रखता है कि क्यों वह बच्चे को निर्दोष मानता है। अब जूरी का फैसला टर्न लेना शुरू करता है 10 लोग बच्चे को दोषी मानते है लेकिन 2 लोग बच्चे को दोषी नहीं मानते।

     उन्ही के बीच एक जूरी सदस्य यह कहते हुए लगातार अपनी बात रखता है कि बच्चा दोषी है और रहेगा। पडताल करने पर वह खुद बताता है कि उसके घर में उसका बेटा उसका सम्मान नहीं करता। स्पष्ट था कि वह जूरी मेंबर उस बच्चें में अपने बेटे का अक्स देख रहा था और फैसला भी उसी हिसाब से ले रहा था।

      बहस आगे बढती है और फिर उन लोगों की बीच रायशुमारी होती है। अबकी बच्चे को निर्दोष मानने वालों की संख्या बढ जाती है। जूरी का फैसला एक दूसरी तरफ जाते देख एक और सदस्य बच्चे को निर्दोष मानने लगता है। यह सदस्य उस तबके का प्रतिनिधित्व करता लगता है जो कि देखा देखी फैसला करता है। उसका खुद का कोई डिसिजन नहीं होता।


     एक सदस्य तब अपना फैसला पलट देता है जब उसे लगता है कि जल्दी फैसला हो जाय तो उसे घर जाने को मिले । सिनेमा की टिकटें उसकी जेब में उमड घुमड रही होती हैं। इस पर एक सदस्य भडक जाता है उस शख्स को कहता है कि उसने अपना फैसला क्यों बदला उसे Explain करे। सिर्फ इसलिये कि सिनेमा देखने उसे देर हो रही है, वह अपना फैसला नहीं बदल सकता। आखिर उसने अभी कुछ देर पहले एक बच्चे को मौत की सजा देने के पक्ष में फैसला दिया था....अचानक फैसला क्यों बदला ?

Explain Me !

     बहस और आगे बढती है और धीरे धीरे जूरी पलट जाती है और अंत में फैसला सर्वमान्य ढंग से आता है कि बच्चा निर्दोष हैं।

       इस पूरी फिल्म को एक ही कमरे में फिल्माया गया है। फिल्म की जान है इसकी Script.....



  उस वक्त का सीन गजब का है जब मनोरंजन टिकट के कारण एक सदस्य फैसला बदलता है और उसे सामने वाला अपने शब्दों से पानी पानी कर देता है......उस वक्त मुंह से बरबस ही निकल आता है.....औह.....क्या लपेटा है बंदे ने। 

     पूरी फिल्म को एक तरह से आदर्श फिल्म माना जा सकता है जो कि विभिन्न तबके के लोगों, उनकी मानसिकता और Decision Making की उनकी क्षमता को खूबसूरती से पेश करती है। 

- सतीश पंचम



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 इस पोस्ट पर आई कुछ टिप्पणियां - 

उन्मुक्त said...



न्यायमूर्ति होमस्, अंग्रेजी में फैसला लिखने वाले न्यायमूर्तियों में सबसे जाने माने न्यायमूर्ति हैं। उनका कहना है,



१ - जज़ वास्तव में फैसला मुकदमों के तथ्यों पर ले लेते हैं फिर उस पर कानून का जामा पहना कर उसका कारण लिखते हैं।

२ - उनके तथ्यों पर लिये गये, अधिकतर फैसले, कानून दायरे के बाहर होते हैं और inarticulate major premise पर निर्भर होते हैं।

     मैं inarticulate major premise का ठीक से अनुवाद तो नहीं कर पाउंगा पर यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस प्रकार बड़े हुऐ और हमें कैसा वातावरण मिला।


ऐसे लेखों पर कमेंट कम क्यों आते हैं?



यह भी हो सकता है क्या कि पढ़ने के बाद कहने को कुछ न बचे?

मैं तो अक्सर ऐसी 'भीड़' से रूबरू होता हूँ। अभी हम लोगों ने एक आंतरिक प्रोजेक्ट पूरा किया। 45 दिन चले इस प्रोजेक्ट में फिल्म में वर्णित सारी मनोवृत्तियाँ देखने को मिलीं।

अच्छा होता यदि आप उनको अलग से समझाते ताकि ऐसे मौकों पर काम आता।

इस लेख के लिए बधाई।
ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...


फिल्म की कथा बहुत रोचक लगती है। और यह तो होता है कि जल्दी जान छुड़ाने को कुछ लोग सहज सहमत हो जाते हैं।


अच्छा प्रबन्धक वह है जो इस तरह के लोगों और स्थितियों को पहचान कर दुहे। :)



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Friday, March 11, 2011

लाज लगने का 'साटि-फिटिक' और लिंगानुपात .......

    कभी- कभी परिस्थितियां बड़ी अजीब सी बन आती हैं और उन्हीं परिस्थितियों से निकल आता है हास्य और कुछ सामाजिक सरोकार भी। ऐसी ही एक विचित्र परिस्थिति बनी थी दो साल पहले एक महिला के साथ और उसी मुद्दे पर मैंने एक पोस्ट लिखा था। चुनिंदा पोस्टों की श्रृंखला में पेश है वही पोस्ट। 


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    क्या कभी ऐसा भी हुआ हैं कि लोक-लाज के कारण छुट्टी का कारण आप नहीं बताना चाहते ? 


    ऐसा ही एक 'लजाधुर' वाकया जानकर मैं थोडा हैरान हुआ हूँ। दरअसल बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने में कई महिलाओं की आपस में मित्रता स्कूल के प्रांगण में यूं ही बन जाती है, उनमें बतकूचन भी खूब होता है, कभी बच्चों को लेने स्कूल जल्दी पहुँच गईं तो बतकूचन का दौर लंबा भी हो जाता है, हास-परिहास का दौर तो खैर चलते ही रहता है। 

    अभी हाल ही में श्रीमतीजी ने एक इसी तरह की महिला की बात बताई जोकि स्कूल में अपने छोटे बच्चे को लेने आती हैं, उस महिला की उम्र लगभग चालीस-पैंतालीस के आसपास होगी। बातचीत के दौर में पता चला कि उन महिला की एक बडी बेटी है जिसकी अभी जल्दी ही अगले महीने शादी होने वाली है, इस कारण अपने बच्चे को, जो कि पहली कक्षा में पढता है, शादी के दौरान अपने साथ गाँव ले जाना है । लेकिन मुसीबत ये है कि छुट्टी मांगे तो कैसे, टीचर सोचेगी कि इनकी बेटी की शादी होने जा रही है और लडका पहली कक्षा में पढ रहा है, इतनी उम्र में ये सब ? 

    पहले तो मैं भी माजरा नहीं समझ पाया कि आखिर इसमें लाज की क्या बात है, कइयों के बच्चे शादी के काफी दिनों बाद होते हैं तो इसमें असमंजस कैसा.....लेकिन फिर पता चला कि अभी उनकी कुल पाँच बेटियां है, लडके के इंतजार में एक के बाद एक लडकियां होती गई और जब बडी उम्र में छठे पर लडका हुआ तो जाकर खुशी का ठिकाना न रहा, लेकिन यह खुशी यह असमंजस भी ले आएगी, ऐसा उन्होंने न सोचा था। 

    बातचीत के दौर में अन्य महिलाओं ने हंसते हुए उस महिला को सलाह भी दी कि ,बता दो सही कारण, इसमें इतना शर्माने की क्या बात है, लेकिन उन लोगों की मित्रवत हंसी भी उस लाज को ढंक न सकी और अंत में एक दूसरे उपाय के तहत बात बनाते हुए कारण दिया गया कि घर में किसी और की शादी पड गई है इसलिये जाना पड रहा है। 

    खैर, अभी तक यह पता चला है कि बच्चे को स्कूल से ले जाने की छुट्टी मिल गई है औऱ वह महिला अब तक स्कूल में अन्य महिलाओं के बीच बतकूचन का मुद्दा बनी हुई है, खुद ही हास-परिहास में शामिल यह कहते हुए कि - इतनी उम्र में....यह सब :)

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- सतीश पंचम


 (जब पहली बार इस पोस्ट को लिखा था तो कुछ रोचक टिप्पणियाँ आई थी, सोचा उन्हें भी शेयर करता चलूं  :)





दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...



अरे! उस महिला को तो सामाजिक रूप से परमवीर चक्र का सम्मान मिलना चाहिए था। इन्ही के कारण तो समाज में लिंग अनुपात कुछ बना हुआ है, और वे हैं कि शर्म से मरी जा रही हैं।




सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...


सतीश जी,

आपने तो बड़ी अच्छी चर्चा छेड़ दी। लड़कियों की संख्या बढ़ाकर भी लड़का पाने की लालसा लिंग-अनुपात को ठीक रखने में बड़ी कारगर रही है। यह हमारी पुरातन सोच का एक उज्ज्वल पक्ष है। आधुनिक सोच तो कन्या (भ्रूण) की हत्या करा रही है।


एक रोचक उदाहरण अपने ब्लॉग पर पोस्ट करता हूँ। विषय प्रवर्तन का धन्यवाद।:)

lata said...


ऐसा एक वाक़या मेरे साथ भी हुआ था,
कुछ एक साल पहले मै अपनी एक सहकर्मी के घर पहली बार गई,उसने मुझे अपनी 2 बहनो, मम्मी-पापा से मिलवाया और एक 11-12 साल की बच्ची से मिलाते हुए कहा की वो उसकी मौसी की लड़की है,
बाद मे जब मेरा आना जाना उनके घर बढ़ गया तो काफ़ी बाद मे पता चला को वो उसकी रियल सिस्टर थी :)
Gyan Dutt Pandey said...


मेरा मंझला मामा मुझसे छ महीना छोटा है!


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Thursday, March 10, 2011

देहाती बारात का आनंद


      कभी गाँव देहात की बारात में शामिल हुए होंगे तो आप समझ सकते हैं कि वहां का क्या क्या आनंद होता है और किस तरह की परेशानीयां होती हैं.....किससे रार ठनती है ...... किससे हंसी ठिठोली होती है । 


    अपनी चुनिंदा पोस्टों की श्रृंखला में पेश है मेरी वही गाँव देहात वाली बारात का वर्णन जिसे सफ़ेद घर में कभी पोस्ट किया था।

    और हां जगह देखकर बैठिएगा कहीं आप के कपड़ों में भी रसगुल्ला की चाशनी न चपोड़ उठे :)


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     गाँव-देहात की या शहर की ही किसी बारात में शामिल होना यानि की अपने सिर में कौवे की कलगी लगाने जैसा है। लोगों ने एक आईटम खा कर खत्म किया नहीं कि कौवे की तरह घरातीयों की ओर ताकने लगेंगे कि देखें अब क्या आ रहा है। महक तो बहुत बढिया आ रही है, पर साले कर क्या रहे हैं…….ला क्यों नहीं रहे। ये उस बारात का हाल होता है जो गाँव देहात में खेतों में उस समय ठहराई जाती है जब गेहूँ कट चुके हों, अरहर वगैरह ढो सटक कर एक लाईन कर दिये गये हों। ऐसे मे बिना हॉल वगैरह बुक किये केवल शामियाना तान कर बारात ठहरा दी जाती है। जिसका अपना अलग ही आनंद है।

      ऐसी ही एक बारात में मैं अबकी शामिल हुआ। बहुत मन से इस बारात में गया था क्योंकि तीन चार साल बाद कोई बारात करने का मौका मिला था वरना तो कभी गर्मियों में शादि व्याह के मौसम में मेरा जाना कम ही हो पाता है । थोडा जल्दी ही मैं चल पडा। गाँव देहात का रास्ता है जाने कैसा रास्ता हो। मोटर साईकिल थी ही । रास्ते में कल्लू धोबी की दुकान पर भीड देखा। लोग बीच बाजार बनियान पहने, खडे खडे शर्ट उतार कर प्रेस करवा रहे थे । उनका मानना था कि बारात में जा रहे हैं तो एकदम कडक इस्त्री किये हुए जाना चाहिये। इसके लिये लोगों में बीच बाजार अधनंगे खडे होने में भी कोई हिचक नहीं थी। कुछ लोग नाई की दुकान पर जमें थे। खत को इतना सफाचट करवाना चाहते थे मानों वहाँ कभी बाल ही नहीं थे। सब को जैसे आज ही चंदन टीका लगा कर केंचुली छोडना था।

     ईधर मोटर साईकिल पर बैठते ही साथी ने इतनी जोर की किक मारी की लगा एक और किक मारे तो बस सीधे द्वारपूजा पर पहुँच जाउंगा। थोडी दूर सडक पर चलते ही बडी बडी गिट्टियों से सामना हुआ, मोटरसाईकिल तो ऐसे छिटक रही थी जैसे जमीन पर कुछ ढूँढ रही हो।
हम लोग रास्ता बदल कर चले। काफी आगे जाने पर एक जन से रास्ता पूछे तो बोले आपको उसी गिट्टी वाली सडक से जाना चाहिये था…..बहरहाल रास्ता तो आगे ठीक था। उसका ‘बहरहाल’ वाला शब्द कानों में गूँजने लगा। ये साला ‘बहरहाल’ क्या होता है ?


     किसी तरह बचते बचाते लडकी वालों के घर के पास बारात स्थल पहुँचा। काफी जल्दी पहुँच गाया था। सात-साढे सात बजे होंगे। गाने बजाने की आवाज से पता चल गया था कि हाँ यही घर है जिसके यहाँ शादी पडी है। अन्य बाराती आते होंगे। अक्सर गाँवों में बारात के रूकने की जगह लडकी के घर से सौ सवा सौ मीटर दूर ठीक की जाती है जहाँ से चलकर बारात द्वारपूजा वगैरह के लिये गाते बजाते आती है। तो, मैं और मेरे मित्र वहीं मोटर साईकिल से उतर गये। एक नीम का पेड था। उसके नीचे कुछ टेंन्ट हाउस वाली फोल्डिंग खाटें पडी थीं। उन्हीं पर हम लोग जा बैठे। जा क्या बैठे, बस यूँ समझिये कि उन खाटों पर पसर गये। आँखें उपर आसमान की ओर लगीं थी। हल्की हल्की हवा भी चलने लगी। नीम की कुछ झुकी हुई टहनियों देखते समय पता लगा आज तो अँजोरिया रात है। चाँदनी रात। नजर घुमाई तो देखा चाँद भी निकल ही रहा था। नीम की पत्तियाँ कुछ और नरम लगने लगीं।

    तभी बगल के घर से किसी बुढिया की आवाज आई जो अपनी पतोह को डाँट रही थी –

 - तुझे क्या जरूरत थी सिलबट्टा उठाकर बियाह वाले घर देने की। कह नहीं सकती थी कि अम्मा का फोडा पका है उस पर पीस कर नींम की पाती लगानी है। बस , उन लोगों ने पूछ लिया और इसने उठा कर दे दिया। बाहर वाले आयें, चाहे घर ही लूटकर चल दें, मजाल है जो इस घर के लोग मना कर दें।

         गाँव देहात में अक्सर शादी-ब्याह के समय चीजें आपस में बाँट कर एक दूसरे को ले देकर काम चलाया जाता है। चूँकि बगल में ही शादी पडी थी तो सिलबट्टे वगैरह का काम निकल आया होगा, और लडकी वालो ने इस बुढिया के सिलबट्टे को उधार ले गये होंगे। लेकिन अब बुढिया है कि पतोह की जान खा रही है।

          खैर, यही सब देखते सुनते नींद सी आने लगी। अभी बाकी बारात पहुँची नहीं थी। तब तक कुछ लोग आये बाल्टी में बेल का शरबत लेकर। उनके आग्रह करने पर कि बाकी जब बाराती आयेंगे तो वो भी पी लेंगे आप लोग पहुँच गये हैं तो लिजिये पी लिजिये। बेल का शरबत पीकर तृप्त हुआ। धीरे धीरे बाराती लोग जमा होने लगे। इलेक्ट्रानिक रथ वगैरह तैयार होकर जगमग जगमग दिखने लगा। उसके आगे आगे बीस बाईस लोग सिर पर गमला लाईट आदि लेकर चलने लगे। देखते ही देखते बारात द्वारपूजा के लिये निकल पडी।
  
    डीजे खूब जमकर बज रहा था । कोई गुड्डू रंगीला फंगीला गा रहा था - थोडा सा जीन्स ढीला करो…..ऐसा ही कुछ। लोग डीजे पर जमकर नाच रहे थे। मैं ऐसे मौकों पर अक्सर ठूँठ हो जाता हूँ। समझ ही नहीं आता कि नाचूँ कि न नाचूँ। और कोई जगह होती तो नाच भी लेता लेकिन गाँव देहात में नहीं । इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण है जो कि गाँव देहात में रहने वाले ही जानते हैं। दरअसल होता यह है कि, गाँवों में गाय भैंसों को तो खिला पिलाकर शाम को ही हटा दिया जाता है ताकि बारात के लिये रास्ता बने लेकिन खूँटा वहीं गडा रहने दिया जाता है । अब एक दिन के लिये खूँटा कौन उखाडे-पखाडे। सो जो डीजे शहर के लोगों को नचा रहा होता है वही डीजे गाँव के लोगों को लहूलूहान करवा रहा होता है। लोगों का आधा ध्यान नाचने में और आधा ध्यान खूँटा ढूँढने में होता है कि कहीं लग न जाय।

       मैंने देखा कि डीजे अब भी बज रहा था। सिर पर रखे लाईटें लिये लोग आगे बढ रहे थे कि तभी एक मुसीबत आन पडी। बाँस की कईन / टहनी कई जगह पर इन लाईटों में उलझ रहीं थी। अब या तो बाँस की इन कईनियों को काटा जाय या लाईटों को वहीं रोक दिया जाय। लेकिन लोगों ने जज्बा दिखाया, बँसवारी के हर बाँस को दो दो लोग पकड कर एक ओर दाबे रखे ताकि कईन लाइटों से न टकराये और देखते ही देखते पूरा रथ बिना रोकटोक आगे बढ लिया। डीजे अब भी गा रहा था थोडा सा जीन्स ढीला करो।

      लोग नाच भी खूब रहे थे। कोई कोई तो नाचने में इतनी मेहनत कर रहा था, पसीने-पसीने हो रहा था कि लगता था जैसे उसे कोई मंडवे में से देख रहा है और उसका नाचना देखकर आज ही उसकी शादी भी फिक्स हो जायेगी। एकाध जन तो गमछा लेकर नचनिया बनने में ही परम आनंद प्राप्त कर रहे थे। कुछ पियक्कड जाँबाज लोगों को तो लगता था अब नहीं नाचेंगे तो बारात मालिक अगली खुराक में कमी कर देगा।
     

        जैसे तैसे द्वार पूजा का कार्यक्रम संपन्न हुआ। मिठाई और जलपान आदि के लिये बारात को शामियाने में नॉयलॉन वाली फोल्डिंग खाटों, कुर्सियों आदि पर बिठाया गया जो गेहूँ के खाली खेत में बिछे थे। बगल के खेत में अरहर की कटी हुई खूँटिया जमीन से दो-तीन इंच निकली हुई कह रहीं थी जरा उधर ही रहना गेहूँ वाले खेत में, इधर आये तो बस गड जाउंगी। (शर्म से नहीं ).

     खैर, थोडा इंतजार करके कुछ लोगों के जलपान करके चले जाने के बाद अगली खेप में मैं भी एक कुर्सी पर बैठ गया। लेकिन बैठते ही पता चल गया कि पैंट के नीचे छेना मिठाई की चाशनी लग गई है जो कि कुर्सी पर गिरी थी/ गिरा दी गई थी। मन मसोस कर थोडा पानी ले साफ सूफ किया ही था कि मित्र बोले - यार मेरा भी लगता है पैंट चाशनीया गया है :)
मैंने कहा लो मजा अब। ले- देकर किसी तरह पानी से चाशनी लगी जगह को किसी तरह धोया । धोया क्या बस धोने का छलावा भर किया।


   इतने में कई लोगों को लघु शंका की सूझी तो बढ लिये कटे अरहर के खेत की तरफ। जमकर खेत को नम किये। सुबह जब खेत मालिक अपने खेतों को देखेगा तो जरूर सोचेगा, चलो इसी बहाने खाद-पानी का खर्चा बच गया । अभी ये सब क्रिया कलाप चल ही रहा था कि किसी के नाराज होने की खबर आई। ये नाराज होना भी एक परंपरा बन गई है। जिस शादी में कोई नाराज न हुआ तो समझो कि शादी का कोई मजा नहीं आया। कोई जीजा इसलिये नाराज है कि उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा तो कोई इसलिये क्योंकि किसी घराती ने गलती से पानी भरी बाल्टी पैर पर दे मारी। ये लोग इस आन्हर गाँव में जाने क्यों रिश्ता करने आ गये। एक बाल्टी के पैर में हल्के से लग जाने से पूरा गाँव ही अंधा कैसे हो जाता है ये बारात में आकर बखूबी समझा जा सकता है।

     धीरे-धीरे खाने का समय भी हो आया। लोग अब पंगत में बैठना अपमान समझने लगे हैं। टेबल कुर्सी की पांत चलेगी। समझदार बाराती कभी ट्यूबलाईट के आसपास वाली सीट पर बैठ कर भोजन नहीं करता। वो अंधेरा कोना तलाशता है क्योंकि गाव देहात में कीट पतंगे ट्यूबलाईट के आस पास ही बिना डीजे की धुन बजाये ही नाचते रहते हैं और जो ट्यूबलाईट के पास बैठा हो उसकी थाली में जरूर गिर कर खुशी मनाते हैं। अंधेरे कोने में बैठने का एक फायदा यह भी होता है कि निस्संकोच होकर भोजन गपागप भकोसा जा सकता है।

             एक बात मैंने नोटिस की है कि जब परोसने वाला आता है तो लोग उससे बडे आग्रह से कहेंगे कि -'उनको भी' दो....इस 'उनको भी'... में 'भी' बडे काम का होता है जिसका छुपा मतलब है कि उनके साथ साथ 'मुझे भी' भोजन परोसो ।

        खैर भोजन आदि करने के बाद जो लोग आस पास के थे या जिनके पास आने जाने का निजी वाहन था वो धीरे-धीरे चलने लगे। एक के बाद एक मोटर साईकिलों की आवाज जब आने लगी तो गाँव के कुत्ते तक हदस गये कि जाने कौन लोग हैं जो हडर-हडर किये हुए हैं। उन बारातियों के जाने के बाद कुत्तों में भी एक तरह के इत्मीनान की झलक दिखाई दे रही थी कि जितने चले जांय उतना अच्छा। शायद नाहक ही मोटर साईकिल की लाईट जला जला कर कुत्तों की विश्रांति में खलल पड रही थी। एक कुत्ते को तो देखा, अपने लिये सोने की जगह तलाश रहा था। लेकिन कहाँ जाय, उसके सोने की जगह पर तो शामियाना तना है और लोग हैं कि शामियाना छोडकर बाहर चाँदनी रात में खाट बिछाकर पडे हैं। मजबूर होकर कुत्ते ने शामियाने में ही सोना ठीक समझा।

       मैंने चाँदनी रात में खेतों में बिछी खाट का आनंद लेने की सोची। खाट पर पडते ही नींद सी आने लगी। आस पास लोग अब भी भुनुर - भुनुर बातें कर रहे थे। कोई कुछ कहता तो कोई कुछ। एक जन का कहना था सब्जी कुछ कम जम रही थी तो एक को तो दाल में नमक तेज । मैंने सिर घुमा कर उन लोगों की ओर देखा तो पाया कि ये वही लोग थे जो कडक और बिना सिलवट पडे इस्त्री वाले कपडे पहनने के लिये बीच बाजार कल्लू की दुकान पर शर्ट उतार कर खडे थे ताकि ताजा ताजा शर्ट प्रेस हो और बिना सलवट वाली शर्ट पहने बारात में चमक सकें।

       मैं सोच रहा हूँ, जो लोग खुद बाजार में अपने कपडे उतार कर खडे थे उनसे किसी की इज्जत के बारे में उम्मीद रखना भी बेमानी है । उनींदी आँखों से न जाने क्या क्या मैं सोचता जा रहा था, एक बेटी मेरी भी है । आज नहीं तो कल मेरे घर भी यही लोग आयेंगे। बारात होगी, गाजे बाजे होंगे, शोर-शराबा होगा, तमाम नाते रिश्तेदार जुटेंगे, तमाम तरह के खर्चे होंगे औऱ होंगे ऐसे ही कपड उतारू लोग । 
मेरी आँखें नींद से बोझल हो रहीं थी। चाँदनी रात में, खुले आसमान के नीचे, खेत में मैं सोने की कोशिश कर रहा था कि तभी आसमान से चाँद ने झुक कर मेरे माथे से कुछ उठाया और कहा - उफ्फ.... ये शिकन अभी से क्यों ला रहे हो, बिटिया तो अभी छोटी है न :) 

- सतीश पंचम

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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