सफेद घर में आपका स्वागत है।

Monday, February 28, 2011

पूँछ उठावन.....री री री रीss रेssss ..... :)


      कभी-कभी पुरानी चीजों को झाड़ पोंछ कर निहारने में आनंद आता है, कुछ कुछ वैसा ही आनंद मुझे अपनी इन ग्राम्य सीरीज़ की पोस्टों को पढ़ते समय मिल रहा है, और इसी के चलते रीठेल श्रृंखला के तहत पेश है वही बतटोवन पोस्ट......जिसे पढ़ते हुए कुछ यूं लगा जैसे कोई गँवई मनई साईकिल चलाते हुए ....आस पास किसी को न पा.....सूनसान राह घाट देख लंबी तान छेड़ते हुए गाये............ रीss रीss रीss......रीss  रेsssss ........ :)
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       गाँवों में कई कहाँनिया...कई बातें....कई गोपन छिपे होते हैं.....आराम कर रहे होते हैं.....जिन्हें यदि खुलिहार दिया जाय तो ढेर सारी बातें उघड़कर सामने आ जांय ..... मानों वह बातें खुलिहारे ( छेड़े) जाने का ही इंतजार कर रही हों।

      ऐसी ही एक दिलचस्प घटना मेरी ग्राम्य यात्रा के दौरान घटी जब भरी दुपहरी एक जगह जनगणना कार्य के दौरान फार्म में किसी महिला का नाम लिखने की बारी आई। महिला का नाम और उम्र का कॉलम लिखने के दौरान बात चली कि फलांने की पत्नी का क्या नाम है..... यह कौन गाँव से ब्याहकर आई हैं ...... मायका किधर से  हैं......। पूछने पछोरने पर घरवाले कुछ असहज से  हो गए और बात को वहीं खत्म किया गया।

  बाद में एक साथी से पूछा तो पता चला कि यह महिला पूँछ उठावन टाईप है।

 सुनकर एक बार झटका सा लगा कि.... क्या कहा जा रहा है ....पूँछ उठावन ?


        ज्यादा कुरेदने पर पता चला कि फलां महिला की यह चौथी या पांचवी शादी है। इसके पहले की शादियां उसके चाल चलन और संबंधों के कारण न टिक पाईं।  कई लोगों से संबंध की जानकारी होने पर छुटा छूटी हो गई।

तो इस घर में विवाह कैसे हो गया ?

  इस घर में इसलिए विवाह हो गया क्योंकि लडके की उम्र निकली जा रही थी.....कोई इसे अपनी लड़की देने को तैयार न था......लड़के का घर भी कुछ ठीक नहीं ....और ऐसी ही तमाम बातें थी...जिस वजह से लड़के ने जैसे तैसे विवाह कर अपनाया.....और एक तरह से द्विपक्षीय उद्धार किया गया। 

अब ?

 अब दोनों जन कहीं बाहर शहर वगैरह में रहते हैं.....लडका कहीं छोटा-मोटा.... काम-ओम करता है मिस्त्री वगैरह वाला।

  यह सब बातें जानकर एक बारगी लगा कि यार यह गॉसिप है या सच.....लेकिन गाँव वालों की बातें.......।

 आगे एक जगह जाने पर सभी घरवालों का नाम आदि लिखा गया...चलने को हुए तो एक जन ने कहा कि फलांने का नाम छूट रहा है। घरवाले ने एतराज किया कि उनका नाम क्यों लिखा जाय....कल को कहीं कानूनी पचड़ा न आ जाय।

 बात खोली गई तो पता चला कि घर मालिक  की साली का तलाक हो गया है और उसे अपनी बहन के यहां यानि इस घर में रहना पड़ रहा है। अब ऐसे में जनगणना में मकान नंबर....परिवार के मेंम्बर आदि लिख देने पर कहीं को कल साली के बच्चों वगैरह को लेकर कोई कानूनी पचड़ा न आ जाय। इस डर से घर मालिक हिचकिचा रहे थे नाम लिखवाने में। तब उन्हें समझाया गया कि कोई कानूनी पेंच इस जनसंख्या फार्म से नहीं आने वाला क्योंकि इसमें रिश्ते वाले कालम में साफ साफ लिखा जायगा कि - मुखिया की पत्नी की बहन

 सो यह सब लिख-उख कर काम चलाया गया।

     लेकिन इसी मकान नंबर पर छिड़े बहस पर बात ही बात में एक और दौर हंसी मजाक का भी चला।

 किसी ने कहा कि -  सुनने में आया है कि जनगणना वाले लोगों से यह कह कर पैसे लेते हैं कि लाईए आप का मकान नंबर सोझ  ( ठीक)  कर दूँ ताकि जो आपके भाई से मुकदिमा वगैरह चल रहा है....आपके फेवर में हो जाय। थोड़ा खर्च वर्च हो जाय बस।

  वहीं किसी ने कहा कि-  कुछ लोग तो सामने से आकर कहते हैं कि भाई मेरा यह मकान नंबर वगैरह डाल दो....सौ-पचास ले लो और क्या।

 यह बातें मजाक मजाक में ही लोग बोल रहे थे और कहीं खूब हंसी ठट्ठा हो रही थी।

 बात की बात मे इंसानों की दो कैटेगरी मान ली गई ।

 जो लोग प्रगणक के कहने से पैसे देते हैं कि इससे उनका काम हो जायगा वह - जाहिल और जो लोग सामने से आकर प्रगणक को पैसे का लोभ देते हैं वह - चालू

   तो भईया....यह तो मजाक मजाक में हुई बातें थी....लेकिन कहीं न कहीं यह होता तो होगा ही......मेरे गाँव में नहीं तो किसी और के गाँव में........तभी तो गाँव वाले आपसी हँसी-पडक्का में यह बातें कह सुन रहे थे।

 आगे और जाने पर ऐसी न जाने कितनी दिलचस्प बातें.....दिलचस्प किस्से सुनने मिलते लेकिन एक तो भरी दुपहरी और उपर  से भूख की कुलबुलाहट ने घर लौटने की इच्छा जागृत की।  अगले दिन मुझे वापसी के लिए ट्रेन भी पकड़नी थी। सो लौट पड़ा गमछा बाँधे-बाँधे ।

  लेकिन इतना तो तय है कि यदि साहित्यकार, रिपोर्टर, लेखक आदि कभी कहानी का रोना रोएं.....रोचकता की कमी का रोना रोएं तो एक बार उन्हें जरूर किसी इस तरह के अभियान में साथ हो जाना चाहिए.....। परिवार.....बिखराव....प्रेम प्रपंच.....और ऐसे तमाम मुद्दे हैं जो उन्हें  यहां से सीधे सीधे गाँव के जरिए कन्टेंट दे सकते हैं.....लेकिन बात वही है कि एसी ऑफिस का सुख छोड़कर .....लूची वाली आँच झेलने के लिए यह जमहत कौन उठाए ?

    मीडिया में जो चल रहा है....जैसा चल रहा है चलने दिया जाय.....यू ट्यूब से कंटेंट देकर....नाग नागिन के विवाह दिखाकर....चमत्कार महिमा बताकर.....गणेशवाणी सरीखी बातें बताकर.....काली गाय को पके आलू खिलाकर.....कल्याण कराकर........या फिर सल्लू.....कैट के किस्से सुनाओ.....की फर्क पैंदा ए.....चल्लण दो ऐंवे ही :)


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ रहकर  गुलजार लिखते हैं...... चाँद की गठरी....सर पे ले ली....आपने ये कैसी जहमत दी हैss.....पहली बार मुहब्बत........

ये आँखों की ज़द और ये गमछे के साये  :)
समय - वही, जब चाँद की गठरी उठाकर कोई चला जा रहा हो और धरती रास्ता रोक कर कहे- कभी मेरी भी गठरी उठा कर देखो......चाँद से  छह गुना भारी है।

( अपनी आँख की जद तक गमछा बाँधे हुए मैं भरी दुपहरिया गाँव गाँव तस्वीरें लेते हुए जब घूम रहा था तब उसी दौरान साथ चल रहे प्रगणक ने मेरी भी एक तस्वीर खेंच ली.... गमछा बाँधे हुए ये मेरी वही तस्वीर है )



( ग्राम्य सीरीज चालू आहे......)

Sunday, February 27, 2011

जनगणनात्मक मौसम की चहचह.....देशज हिलोर :)


     
     कल मेरे यहां जनगणना वाले आये थे......उनके पूछ पछोर को देख मैं भी थोड़ा सा जनगणनात्मक मूड़ में आ गया ......और इसी का असर है कि आज वही दुपहरीया वाली पोस्ट लिख रहा हूं जिसे लिखते समय मन गदगदायमान  हो उठा था ......कुछ कुछ प्रगणकों जैसी पूछायन प्रवृत्ति को धारण करते हुए........अमरीका इन माय विलेज  : )

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      जब गर्मी के मौसम में तपिश के साथ पछिवहीं लूची वाली आँच चेहरे पर पड़ती है तो लगता है जैसे चेहरे पर किसी वेल्डिंग नोजल का मुंह खोल दिया गया है। एकदम आग। रस्ता चलना दूभर ....... बाहर निकलने में जैसे पतंग पड़ी  है.....और ऐसी ही खड़खड़िया दुपहरी के समय मैं अपने गाँव में जनगणना करने वालों के साथ घूम रहा था।

      इतनी गर्मी में बाहर घूमना........कारण....... मेरी ललक......एक आकांक्षा.... कि... अपने गाँव वालों को ठीक से जान लूं.... पहचान लूं ।  यूँ तो मैं गाँव हर साल जाता हूँ लेकिन केवल राम-रहारी-जैरमी के अलावा मेरा गाँव वालों से कम ही वास्ता पड़ता है। कभी कभार शादी ब्याह पड़ने पर किसी के यहाँ न्योता-हकारी के लिए जरूर चले जाता हूँ लेकिन वह भी बहुत कम.....एक तो जब मैं आता हूं तब विवाह का सीजन या तो बीत चुका होता है या अभी आया ही नहीं होता.....सो जनगणना सर्वे के दौरान गँवई विजिट का यह अच्छा मौका था....सो चल पड़ा , बगल में कैमरा दबाए-दबाए ।

   वैसे इस बार जब गाँव गया था तो परिवार को...बच्चों को वापस लाने गया था.....स्कूल खुलने वाले थे । इधर ट्रेन पकड़ने से ठीक एक दिन पहले मैं जनगणना वाले प्रगणकों के साथ घूम रहा था। मन में शंका थी कि कहीं इस दुपहरी में टहलने से बीमार न पड़ जाउं और कल की यात्रा त्रासद न हो जाय और सबसे बढ़ कर कहीं किसी नाड़ाधारी डॉक्टर और गोले वाले डॉक्टर के यहाँ न जाना पड़ जाय। सो लूचही आँच से बचने का पूरा इंतजाम करते हुए सिर पर सफेद गमछा आदि बाँध कर निकला।

    सर्वे के दौरान पता चला कि किसी- किसी को अपने दादा-दादी का नाम ही नहीं पता...... तो किसी को ससुर या सास में से ही किसी का सही सही नाम  नहीं मालूम,  कोई कोई अपने पूरे परिवार के बारे में जानता तो है पर कन्फर्म नहीं है कि यही उनका ऑफिशियल नाम है......ज्यादातर लोग जनाब को बिजई.....गोबिन्द आदि नाम से जानते हैं पर स्कूल के रजिस्टर और जमीन जायदाद के कागजों पर क्या नाम दर्ज है इसके बारे में कुच्छौ  नहीं पता........ किसी को यदि पता भी था तो वह अपने मुँह से उन लोगों का नाम लेना हेठी समझता था।

 यह सब देख कर मैं सोचता हूँ कि हम किस बिना पर अपने किसी परिजन की अप्रिय हरकत पर नाम डुबा देने की शिकायत करते हैं जबकि लोगों को अपने से पहले की दो-तीन पीढ़ीयों तक के नाम का ही पता नहीं है। खाप पंचायतें किसका नाम खराब होने का रोना रोती हैं......किसके लिए और क्यों......।

  मन तो कह रहा है प्रार्थना करने के लिए कि -  हे खाप देवता.....यदि आपको अपनी औकात जाननी हो तो कृपया गाँवों का दौरा करें......नाम में क्या रखा है यह शेक्सपियर ने जरूर कहा था....लेकिन उसको अमली जामा भारत के गाँव पहना रहे है......किसका नाम डुबो देने की डुगडुगी खाप देवता बजाए जा रहे हो.....अब बंद भी करो खाप की थाप।      

    अगले घर में सर्वे एक आम के पेड़ के नीचे खटिया बिछाकर हो रहा है।  एक शख्स के जन्म तारीख के बारे में तो गाँव वालों का हिसाब है कि -  जब इनका जन्म हुआ तब रजई के बाबू शहर गए थे और खूब पानी बरस रहा था छकछकाय के।

      अब बताईए....कैसे पता लगाया जाय कि रजई की क्या उम्र है। ज्यादा पूछताछ करने पर इतना ही हिसाब लग सका कि फलाने देखने में चालीस ओलीस के लग रहे हैं और चूँकि रजई के बाबू जब शहर गए थे तो छकछका कर पानी बरस रहा था यानि सावन का महीना पकड़ लिया जाय.....चालीस जोड़ दिया जाय... हो गया उम्र का खाना पूरा।

चलो, अब इनका हुआ।

हाँ जी, आप बताईए......और..... क्या लिए हो गठरीया में।

दाना है

अरे तो रख दोगे कि सिर पर लिए खड़े रहोगे। मार के भागना है क्या  ?

उमिर..... लिखिए पैंसठ बरीस।

अच्छा........औ महीना ?

लिख दो जो समझ में आए।

ठीक......अब ये बताईये कि आपके घर में कितने दपंत्ति हैं।

धमपत्ती तो कोई नहीं है मेरे यहां।

अरे दादा....दंपत्ति माने..... विवाहित जोड़ा पूछा जा रहा है.....कि केतना लोग के बियाह हो गया है..।

अच्छा..... लिखिए चार गो.......

घर........नाबदान.......फोन........मोबाईल...........कार......और क्या क्या है...........घर खपड़े वाला है कि पक्का।

अरे एतना पूछ ताछ काहे कर रहे हो.....मालूम पड़ रहा है बियाह खातिर देखौआ बन कर आए हो  ?

अरे दादा...पूछना पड़ता है। लिखा है सब......

हां तो लिखिए खपड़हा घर .......कौनो जोजना में फैदा मिली खपड़हा लिखाए से।

अब दादा कुल फायदा ही देखोगे कि कभी नुकसान भी देखोगे।

अरे तो ये सब लिख पढ़ के किसके लिए ले जा रहे हो......कौन पढ़ेगा ये सब।

       दादा...ये सब जाकर कंपूटर में चढ़ा दिया जाएगा.....उससे पता चलेगा कि हमारे गाँव में केतना मनई लोग हैं.....केतना के पास कच्चा घर है ...केतना के पास पक्का घर है.....औ वही देख के सरकार योजना बनाएगी कि किसको क्या कमी-बेसी है.......लोगों को देखेगी ताकेगी.....बस यही है इस लिखा पढ़ी का कारन।

      अरे त क्या बिना लिखा पढ़ी के सरकार को पता नहीं चल रहा है कि किसको क्या कमी है...क्या तकलीफ है। पचास बरीस से देख रहा हूँ....जब जब कौनो सरकारी फैल आता है तो गाँव में गदर मच जाता है......जमीन बंदोबस्ती के नाम चकबंदी होनी है....... तो चलिए लेखपाल के पीछे पीछे जमीन का नाप जोख करवाने कि मेरा हिस्सा उल्टा सीधा न कर दे....रकबा कम ज्यादा न दिखा दे......इंट इधर उधर न गड़ जाय......सीओ के यहां दरखास.....फलाने के यहां दरखास......औ अंत में ले देकर हाय हुप्पा करके चकबंदी खतम हुई त अब नरेगा औ सड़क के नाम पर लूट मच गई......मुखिया के घर वालों का सगरौं नाम रहेगा कि फलांने भी काम करते हैं.....और पता चला कि मेहरीया घर में रोटी बना रही है....औ नाम रजिसटरी पर अमर हो रहा है.........आंय.......अरे बचवा हमार उमिर ऐइसै नहीं बीती है......कभी जो रासन पर कोटा पर चीनी, मिट्टी क तेल आवा है तो पता ही नहीं चलेगा कि कब आया और कब गया......माटी का तेल माटी में मिल गया कि असमान में सुरूक उठा कौन जाने...........

     दादा का उखड़पन जारी रहा.....हम लोग आगे बढ़ गए। इसी दौरान कहीं कहीं जाने पर रस वगैरह घोर घार कर पिलाया गया। मिंयाना में पहुंचने पर पहले ही पूछ लिया उन लोगों ने कि - ..... हमारे यहां का अन्न-पानी यादौ जी आप को चलेगा । मेरे हंस कर कहने से कि अरे मुझे सब चलता है....लाईए क्या ला रहे हैं......तो अंदरखाने में खट-खूट  होने लगी।

       यहाँ एक  नीम के पेड़ के नीचे बैठ कर फार्म भरा जा रहा था कि तभी एक ट्रे में रूह-अफ्जा वाला शर्बत अंदर से आया। तपती दुपहरी में मनसायन.......जियो काजी चचा...।

  एक जगह जाने पर मेरी परिचित एक काकी की जब मैने पैलगी की...तो उन्होंने मुझे पहचानते हुए पूछा - तूं पंचम के बेटवा हउवा न।

हाँ काकी।

 बातचीत के दौरान काकी से बताने पर कि बच्चों के स्कूल खूलने वाले हैं और इसलिए परिवार लेने आया हूँ तो काकी कहती हैं -

त अबहीं दुलहिन को लेने खातिर आए हो ?

दुलहिन.....। शादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी गाँव में बहू को दुलहिन ही कहा जाता है जबकि मेरे मन मानस में तो यही बैठा है कि विवाह के चंद रोज पहले और चंद रोज बाद का समय ही दुल्हा और दुल्हन कहलाने लायक समय होता है।

 खैर, आगे की जनगणना चलती रही....सर्वे फर्वे होता रहा....लौटानी बेला पर बाकी साथियों के साथ मैं भी लौटने लगा ।    

     यहां मैंने देखा कि कई महिला प्रगणकों के बदले उनके पति इस काम में लगे हुए हैं जिनका मानना था कि कहां इस दुपहरीया तिपहरीया में इतनी गर्मी में पत्नी को सर्वे वगैरह के लिए भेजते....स्कूल में पढ़ाने की बात अलग है.....जहां गाँव में बड़े बुजुर्ग हों .....सामने पड़ते ही माथे पर पल्लू लाना पड़ता हो..... उनसे भला परिवार में कौन कौन है....क्या कैसे आदि के बारे में क्या पूछ पछोर करेंगी हमारी घरवालीयां......थोड़ा लाज-लिहाज बरतना पड़ता है.....हैं तो हम गाँव के ही.....अमेरिका थोड़ी न हो गए हैं......।

 वाकई .......जनगणना करना बड़े जीवट का काम है। बहुत कुछ सोच समझ कर लिखना पड़ता है.......और सबसे बढ़ के बुढ़उ दादा जैसों के अनुभवी व्यंगावलीयों को झेलना पड़ता है......- लिख कर तो ले जा रहे हो....लेकिन कौन पढ़ेगा यह सब ? 



-   सतीश पंचम

स्थान - वही, जहाँ की सरजमीं पर जनगणना करते समय संख्या सौ थी.....अगले दरवाजे पर पहुंचते पहुंचते जनसंख्या एक सौ एक हो गई ।

समय - वही, जब प्रधानमंत्री के कार्यालय में लगी डिजिटल जनसंख्या घड़ी अचानक रूक जाय और प्रधानमंत्री जी कहें.....आज किसी ने इसमें चाभी क्यों नहीं भरी :)


( ग्राम्य सीरीज चालू आहे......)

Saturday, February 26, 2011

चार चक्काईजेशन ऑफ ग्रेट इंडियन मैरिजेस........

     यहाँ देखौआ, छेकौआ के लिये कमरा मिलता है। जी हाँ, ऐसा ही तो लिखा था शारदा मंदिर के पास वाले दुकानों के सामने। साथ चल रहे परिचित ने बताया कि यहाँ पर अब लडका लडकी को एक दूसरे को देखने दिखाने के लिये कमरे मिलते हैं, यानि देखौआ। पसंद आने पर विवाहोपयोगी लडका-लडकी के परिवार के बीच कुछ उपहार आदि का आदान-प्रदान होता हैं जिसका अर्थ होता है इस जोडे को हमने छेंक लिया है- यानि कि छेकौआ। परिवार के लोग भी साथ होते है। मित्र बता रहे थे कि विवाह आदि तय होने के लिये अब ऐसे स्थल ज्यादा उचित माने जाने लगे हैं।

     
    मैं सुनता जा रहा था और मंदिर के आस पास की दुकानों में नजर भी दौडाये जा रहा था। मैंने अनुमान लगाया कि इस प्रकार के मिलन स्थल का निर्माण बढने के पीछे आये सामाजिक बदलाव ही हैं। पहले केवल घर वालों की रजामंदी से विवाह संपन्न हो जाता था। लडका न लडकी को देख पाता था, और लडकी न लडके को। दोनों एक दूसरे को विवाह होने के बाद ही देख पाते थे। लेकिन धीर-धीरे यह कलुषित प्रथा बंद होती गई और लडका-लडकी को देख कर ही विवाह आदि संपन्न होने लगे। ये देखौआ-छेकौआ वाले नवनिर्मित कमरे, उसी बदलाव के मर्मस्थल हैं।

       आज भी सुदूर देहात में जब कभी तिलकहरू लोग आते हैं तो उनके आने और जाने तक स्वागत सत्कार आदि में पूरे कुनबे को ही बटुर कर एक जगह उपस्थित रहना पडता है। स्वागत आदि में कोई कमी न रह जाये। घर की महिलाओं को भी सहेजना पडता है कि देखो बच्चों को ज्यादा डिस्टर्बेंस न करने दो। तिलकहरू लोग आ रहे हैं। लडका देखने आ रहे हैं, ये न हो.....वो न हो। मेरी नजर दुकानों में रखी चीजों पर पडी। कहीं सिंदूरदान रखा है, कहीं माँग-टीका। एक ओर सस्ती किताबों की दुकान भी है जिसमें ज्यादातर व्रत-जप आदि के लिये उपयोगी किताबें ही ज्यादा नजर आ रही हैं। सँतोषी माता कथा, विवाहोपयोगी गाली गीत, गाली सागर, सत्यनारायण कथा, हरितालिका कथा और ऐसी ही अनेकों किताबें। मैं आगे बढा।

     एक सज्जन जो बहुत आतुर होकर हमारी ओर देख रहे थे उनसे मित्र ने पूछा - एक कमरा मिलेगा ? देखौआ के लिये।

कितने लोग होंगे ?

यही कोई आठ-दस लोग।

   आईये देख लिजिये। छोटा कमरा दो सौ एक रूपये। और बडा चाहिये तो तीन सौ एक रूपये।
मैं राउण्ड फिगर से एक रूपये ज्यादा लेने के पर कुछ सोचने लगा। ये क्या बात हुई दो सौ एक, तीन सौ एक.....यानि एक ज्यादा ही रहे। तभी बात कुर्सी गद्दे की होने लगी। एक कुर्सी पाँच रूपये, एक गद्दा छह रूपये। पाँच घण्टों का चार्ज।


     ठीक है। चलो दिखाओ। हम आगे बढे। इधर हॉल में कई लडकियाँ अपने परिवार के साथ बैठी थीं। हमारे पहुँचते ही उन सबकी नजर हमारे उपर पडी। शायद उन्हें लगा हम लडके वाले आ गये हैं, जिसका कि वे इंतजार कर रहे हैं। लडकियाँ सहम कर सिर से ढरके पल्ले को ठीक ठाक करने लगीं। अन्य साथी औरतें अपने आप को यथावत रखते हमारी ओर इस तरह देख रही थी मानों कुछ ढूँढ रही हों......उनकी आँखे शायद भावी दुल्हे को खोज रही थीं। लेकिन जैसे ही हमारे साथ उस शख्स को देखा जो कि कमरे किराये पर देता है......वह अपने आप पहले जैसे सहज हो गये। उन्हें पता चल गया कि यह भी हमारी तरह देखौआ-छेकौआ के लिये कमरा बुक करने आये हैं।


     तभी मेरी नजर दीवाल पर लगी एक तखती पर पडी जिसपर लिखा था - विवाह कोई कानूनी बंधन नहीं, जन्म जन्माँतर का अटूट बँधन है जिससे पिढियाँ बनती हैं। इसे बहुत कुछ सह कर निभाना पडता है। - प.पू श्री........

      कमरा देख-ताक कर हम मंदिर के प्रांगण में ही एक ओर खडे हो गये और इंतजार करने लगे अपने सगे-संबंधियों का जो कि लडका-लडकी को लेकर अपने-अपने निवास स्थान से चल चुके थे और थोडी ही देर में पहुँचने वाले थे। तभी बगल में किसी के हो-हल्ला करने की आवाज आई। एक शख्स काफी तल्ख लहजे मे किसी से कह रहा था - अरे यार ऐसे थोडी होता है, इतना दो तो शादी होगी नहीं तो दूसरा तैयार है।

     बात शादी के लिये लेन-देन पर आकर बिगड गई थी। जोर-जोर से बोलने वाला शायद लडकी वालों की ओर से था। उसके आगे कहे गये कुछ शब्द भद्दे जरूर थे लेकिन अपने-आप में हकीकत तो उघाड कर रख रहे थे।

    वह कह रहा था - अरे यार झाँ* जल जाता है जब इतनी तैयारी करके ले फाँद कर, गाडी-घोडा करके लडकी लेकर देखने आओ और यहाँ साले गाँ* खोल देंगे कि इतना दो.....उतना दो।

   दूसरा उसे समझा रहा था - अरे, गजब करते हो यार । मंदिर है.....थोडा ख्याल करों।

   क्या-क्या ख्याल करूँ। ये मंदिर है इतना तो मैं भी जानता हूँ.....लेकिन वो लोग को समझ है। मुँह खोल रहे हैं दो लाख नकद, चार चक्का अलग......अरे हद है।

    तो क्या करोगे। कुछ न कुछ तो देना ही होगा। आगे जाकर कम - ज्यादे करवाया जा सकता है। ऐसा तो है नहीं कि कह दिया और देना ही पडेगा। लडके वाले शुरूवात में कहते ही इतना है कि आखिर में बात कहीं सम पर आकर टिके। मैं हूँ न, चिंता मत करो।

     इस दुसरे शख्स की बातों से लगता था कि यह अगुआ है और इसकी ही अगुआई से बात-चीत चल रही है शादी की। बात को कहाँ संभालना है और कहाँ उछालना ये शख्स बखुबी जानता लगा। तभी वह अगुआ आदमी कुछ धीमी आवाज में बात करने लगा। लेकिन तल्ख लहजे में बोलने वाले की आवाज पर कोई असर नहीं हो रहा था।

     अरे क्या - एक अस्सी और एक-पचासी कर रहे हो। सोनार के यहाँ बैठे हो क्या। सुनकर कपार से ससुर खून चूने लगता है एतना दो ओतना दो।



     
     तो क्या करोगे, फोकटे में निबाह ले जाना चाहते हो। देखो, जिस समाज में तुम हो, उसी में मैं भी हूँ। इतना जान लो। आज लडकी के बखत देते समय तो ना-नुकुर कर रहे हो। कल जब तुम्हारे लडके का होगा तो पैर जमीन पर न रखोगे। ये कहो, हम लोग हैं जो कह कर दबाये हुए हैं नहीं तो पाँच नगद गिनवाता और चार चक्का पहूँचाने को कहता।
    
      पहले वाले के चेहरे पर अब भी शिकन ढिली न हुई थी। धीरे-धीरे वह दोनों अंदर कमरे की ओर बढे जहाँ लडका-लडकी के परिजन बात-चीत में लगे थे। इधर मैं भी बाहर की ओर थोडी चहल-कदमी के लिये चला। मित्र ने आँख के इशारे से कुछ कहा - मानों कह रहे हों - देखा यही होता है यहाँ। मैं चला जा रहा था और नजर आ रही थी वह तखती जिस पर लिखा था - विवाह कानूनी बँधन नहीं है। यह जन्म-जन्माँतर का अटूट बंधन है जिससे पीढियाँ बनती हैं। इसे बहुत कुछ सहकर निभाया जाता है - प. पू. श्री........।

 - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर देखौआ-छेकौआ हेतु 'हॉटेल हनुमान' का इस्तेमाल किया जाता है। 

समय - वही, जब देखौआ-छेकौआ के बाद लड़की अपने फेसबुक पर स्टेटस अपडेट करते हुए लिखे 

-  Thanks to Ratan TATA ,  

........ चार चक्का पर अटकी हुई बात, आखिरकार संभल गई.  

(दो साल पहले मेरी जौनपुर यात्रा के दौरान लिखी गई पोस्ट) 

Tuesday, February 22, 2011

वो जो कहते नहीं बनता.......अई... अईया.....करूं मैं क्या...... सूक्कू सूक्कू :)

     हम कभी कभी अनजाने में ही ऐसे हालात में फंस जाते हैं कि हमें खुद पर ही हंसी आती है कि यार....ऐसा कैसे हो गया। मैं अभी हाल ही में इसी तरह के सिचुएशन में फंस गया था .... न तो कुछ करते बन रहा था न धरते :)

         हुआ यूं कि मुझे अभी जल्दी ही एक कॉरपोरेट ऑफिस में विजिट के लिये जाना पड़ा। मिटिंग खत्म होने पर मुझे बाथरूम जाने की तलब हुई। मीटिंग रूम से बाहर आकर कलीग को कहा कि तुम तब तक दूसरे काम निपटा लो मैं अभी वाशरूम से आता हूं।  अब मुसीबत ये कि वाशरूम है कहां......उधर जिससे पूछो वो हाथ से  इशारा करता कि उधर सामने है। अब वह कह तो देता लेकिन मुसीबत ये कि सामने है मतलब कितना सामने है। एक तो बडे बड़े दरवाजे, तमाम केबिन, कॉरिडोर, लंबे चौड़े उस कॉरपोरेट ऑफिस वाले इलाके में जिधर भी नजर डालो सब एकदम चकाचक। कहीं बाथरूम जैसा कुछ नज़र ही नहीं आ रहा था (संभवत, उम्मीद कुछ मलिन क्षेत्र सी होती है )।  अब वहां यूं घूमते हुए बाथरूम ढूंढना कुछ मुझे अजीब भी लग रहा था।

     तभी मेरे सेल पर एक कॉल आई और मै उसी के बहाने बात करते करते बाथरूम भी ढूंढते जा रहा था कि बाथरूम के सामने आते ही उसमें घुस जाउंगा और किस्मत देखिये कि मुझे वह साइनबोर्ड दिख भी गया जहां पर कि  Restroom का साईन लगा होता है। मैं बात करते हुए सीधे अंदर जा घुसा। लेकिन ये क्या....पुरूषों वाला मूत्र विसर्जन क्षेत्र नदारद........ मूत्र विसर्जन क्षेत्र बोले तो जिसे पुरूषों वाला Standing Ovation क्षेत्र भी कहा जाता है ....वही Urinal यार  :)

   इधर  मुझे लगा कि भई कॉर्पोरेट ऑफिस है... कॉर्पोरेट स्टाइल के अपने Restroom Norms होंगे। इधर Urinal नहीं है,  हो सकता है उसके लिये अलग रूम हो..... मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया ....एक तो प्रेशर भी बन आया था। सो,  सेलफोन कट करके सीधे टॉयलेट के अंदर चला गया। अभी थोड़ी देर ही हुई थी कि टॉयलेट के बाहर  चप्पलों की आवाज हुई। मैं चौंक गया कि यार आज तो कोई फ्रायडे भी नहीं हैं, कि कॉर्पोरेट ऑफिस की तर्ज पर Informal wear पहन कर लोग चप्पल पहनें आयें......ना ही कोई Casual wear Occasion है।  थोड़ी शंका हुई कि कहीं ये लेडिज बाथरूम तो नहीं है। यह बात मन में आई ही थी कि फिर क्या था......मैं अपनी हालत बयां नहीं कर सकता....अंदर ही अंदर अजीब सी बातों का उमड़न घुमड़न चलने लगा। और जैसे इसी की कसर बाकी थी.....किसी की चूड़ियों की खनक सुनाई पड़ी....जी धक्क से हो गया....ये लेडिज बाथरूम ही है और मैं गलती से आ गया हूं।

  इसके बाद आप समझ सकते हैं कि मेरी हालत क्या हुई होगी.....। जल्दी से फ्लश किया और इस इंतजार में रहा कि बाहर थोडा सा सुनसान हो और जैसे ही लगा कि हां सब ठीकठाक है तुरंत बाहर को निकला और सीधे दरवाजा खोलकर अगले ही पल सामने के मर्दाना बाथरूम में जा घुसा। थैंक गॉड....इस बीच किसी लेडिज की नज़र नहीं पड़ी :)

   मर्दाना बाथरूम में घुसते ही जहां Standing Ovation क्षेत्र को देख जान में जान आई...वहीं एक किस्म का सुकून भी रहा कि चलो बच गये ..... उस दौरान बाथरूम में कोई फूलवा रानी सामने पड़ जाती तो संभवत: शोर भी मचा देती....खैर,  उस वक्त बाहर आकर मैंने कितना रिलीफ महसूस किया इसे मैं ही जानता हूँ......उसे शब्दों में नहीं बता सकता  :) 

  लेकिन, इस वाकये से इतना तो तय है कि यह 'अनुभव' अब जिंदगी भर याद रहेगा  :)

 -सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां के 'कॉर्पोरेट कॉमनरूम',  कॉमनमैन के 'कॉमन लिविंग रूम' से भी बड़े और लजीले-सजीले से होते हैं :) 


समय - वही, जब अंदर बाथरूम में घोटाले के आरोपी  ए  राजा के नाड़े का बन्धन नहीं खुल रहा हो और उसी वक्त टीवी पर प्रधानमंत्री कहें - गठबन्धन हमारी मजबूरी है....... स्थिर सरकार के लिये इसे बनाये रखना होगा  :)

(सभी चित्र - गूगल दद्दा से साभार :)

Monday, February 21, 2011

गुलज़ार का लिखा कॉमर्शियल Ad और उसकी खूबसूरती....

    Bajaj Allianz का यह पुराना Ad देखा है आपने ? जब टीवी पर यह Ad चल रहा था तभी इसे देखकर लगा कि हो न हो इसे गुलज़ार ने लिखा होगा और नेट पर सर्च करते ही मेरा अनुमान सच निकला। उपर से इन लिरिक्स को जिस अंदाज में सुखविंदर ने अपनी आवाज दी है वो इस Ad को और भी खूबसूरत बना गया। साथ है विशाल भारद्वाज का संगीत.....


  हाल फिलहाल यह Ad  अब फिर से खूब दिखने लगा है.......लिरिक्स की खूबसूरती देखिये.....


ये किस प्यारी हिफ़ाजत में हो


बेफ़िक्री की हालत है


याराsss


बड़ी मज़बूत बाहों में हो


सूरज की हरारत है


याराsss


तुम्हारे वास्ते तूफ़ान सहलेंs


मुस्कराओ तुम,


जियो हर लमहाss



तुम्हें ज़िंदगी पीने की आदत है

याराsss याराsss याराsss


- गुलज़ार


  आप भी देखिये इस Ad को और गुनगुनाइए ......कि.... तुम्हें ज़िंदगी पीने की आदत है :)







  प्रस्तुति - सतीश पंचम

Friday, February 18, 2011

एक क्लासिक फिल्म देखते हुए.....नॉस्टॉल्जिया रॉक्स

       अभी हाल ही में मित्रों के साथ देवानंद की फिल्म 'हम दोनो' देखने का मौका मिला जिसे कि ब्लैक एण्ड वाइट से रंगीन किया गया है। जब सिनेमा हॉल के बाहर पहुंचे तो ज्यादातर उम्रदराज लोग ही नज़र आए और वह भी जोड़े में। दादी - दादा लोगों को देखकर एक बार लगा कि शायद हम लोग गलत च्वाईस पर चल रहे हैं। कोई यंग नहीं दिख रहा, कहीं हम लोगों की सोच तो बूढ़ी नहीं हो चली है :) 

       सिनेमा  थोड़ी देर में चालू होने वाला था सो बाहर ही मूंगफली ली गई, अंदर पॉपकॉर्न का प्लान था लेकिन सत्तर रूपये का मकई पैक देखकर मन वैसे ही बिदक जाता है।  बिदकने का कारण भी है। मैं भले ही इस महानगरीय संस्कृति के भीतर बचपन से रहते रहते रच बस गया हूं....लेकिन ये मेरे किसानी संस्कार हैं जो मुझे कहते हैं कि ये मकई के दाने जरूरत से ज्यादा महंगे हैं। मत लो। और मैं दो कदम पीछे हट जाता हूं।  ये वही किसानी संस्कार हैं जिन्हें अक्सर मैं गर्मी की छुट्टियों में गाँव जाने पर खेती बाड़ी के छुटपुट काम करते हुए ग्रहण करता हूं.....उन्हें करते हुए आनंदित होता हूं। ये अलग बात है कि कभी कभी मरकही भैंस के द्वारा दौड़ा भी लिया जाता हूं और उस पर पोस्ट लिख मारता हूँ  :)

  तो समय पर हम दोनों फिल्म देखने के लिये भीतर गया। मन में एक किस्म का नॉस्टाल्जिया ठांठे मार रहा था....देखें तो देवानंद को बड़े परदे पर। अंदर जाते ही जो सीट मिली वो थोड़ा किनारे वाली थी। जो लोग आते वो घुटनों को रगड़ते फगड़ते जा रहे थे...मुसीबत ये कि ज्यादातर लोग बूढ़े थे....टॉर्च जलाकर सीट दिखाने वाला बंदा उनमें से हर एक को सीट के पास लाकर छोड़ता था.....शायद उसे डर था कि ये उम्रदराज लोग अपनी सही सीट न पकड़ पाएंगे या गलत बैठ जाएंगे। जो लोग रो में एंटर करते वो सीटों को पकड़ पकड़ कर एक तरह से बेबी स्टेप लेते हुए चल रहे थे।

  फिल्म शुरू होते ही VICCO वज्रदंती के ऐड आने लगे....तो लगा कि यार ये तो सही में नॉस्टॉल्जिया है। बड़े दिनों बाद विको के ऐड देखा था। फिल्म शुरू हो चुकी तो बूढ़ों का खांसना छींकना शुरू हो गया। समझ गया कि अब पूरी फिल्म ऐसे ही खांसते खंखारते बूढ़ों के बीच देखनी पड़ेगी। शायद एसी का भी असर रहा हो जो बूढ़ों को ज्यादा खांसी और छींक आदि आ रहा था। तभी वो गाना शुरू  हो गया - अभी ना जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं......। और ये क्या....पीछे बैठे  एक बूढ़ऊ तो सीटी मारने लगे। उनको देखने के लिये सभी लोग पीछे को मुंडी घुमाए तो एक ने मराठी में कहा -  काय आजोबा....आली का आठवण ?  (क्यों दादाजी, कुछ याद आ गया लगता है ) और सभी लोग ठठाकर हंस पड़े। 
   
   फिल्म देखते हुए मैं भी मुग्ध हो रहा था...बहुत अच्छा लग रहा था। पहली बार देवानंद की फिल्म बड़े परदे पर देख रहा था, वरना तो वीसीआर पर ही ज्यादातर देखा है और वो भी ब्लैक एण्ड वाइट में। गाईड अपवाद है, उसे कई बार देखा है। 

        अभी फिल्म चल रही थी कि एक बेहद फिलॉसफिकल सीन आया। सीन कुछ यूं था कि गरीब देवानंद साधना के अमीर पिताजी से उसका हाथ मांगने जाते हैं। दोनों के बीच बहस हो जाती है। अपना इंटरव्यू बीच में ही छोड़कर आये देवानंद से साधना के पिताजी कहते हैं कि-  उन्होंने अपनी बेटी को काफी अमीरी में रखा है......वह तुम जैसे बेरोजगार के साथ कैसे रह पाएगी। तब देवानंद कहते हैं कि -  मैं जानता हूं वह मेरे साथ सूखी रोटी खाकर भी खुशी खुशी रह लेगी। इतना सुनना था कि साधना के पिताजी भड़क जाते हैं। वो कहते हैं कि - तुम अब भी सूखी रोटी की बात करते हो। इतना जान लो कि गरीबी और सूखी रोटी अमीर लोगों की कवितायें हैं। वो इनकी बातें कर करके अपनी जी बहलाते हैं, ये उनका फैशन है। रही बात गरीबी की तो वह एक श्राप है और उसमें पड़ा रहना एक तरह की हिमाकत।

       उन दोनों के बीच कुछ और बातें हुई लेकिन साधना के पिता के द्वारा कही बातों में वाकई दम है। गरीबी आज एक अभिशाप ही तो है, और उसमें पड़े रहना वाकई हिमाकत है। वे दिन हवा हुए जब रूखा सूखा खाकर ठंडा पानी पीने की बातें की जाती थीं। अब उस तरह का सुकून की बातें करने वाला एक तरह का आलसी माना जायगा......निकम्मों में गिना जायगा। आज के इस दौड़ते भागते दौर में बहुत सी बातें हैं जो पहले के मुकाबले बदल सी उठी हैं। अब इसे ही देखिये कि एक और फिल्म थी 'मेरा गाँव मेरा देश' जिसकी बातें मुझे कुछ कुछ धुंधली सी याद है जिसमें कि धर्मैन्द्र एक बच्चे को पैसे देते हैं तो उसकी माँ कहती है कि उसे पैसे मत दिया करो.....वो खर्च करना सीख जायगा। तब धर्मेन्द्र कहते हैं कि-  खर्च करना सीखेगा तभी तो कमाना सीखेगा। 

      और अब देखिये... लोग कर्ज पर कर्ज लेकर खर्च कर रहे हों.....उन तमाम चीजों पर खर्च कर रहे हैं जिन्हें पहले हासिल करने में पूरी जिंदगी लग जाती थी क्योंकि वो जानते हैं कि इन खर्चों को आगे कैसे पूरा करना है.... कैसे ज्यादा से ज्यादा कहां से कमाना है.....। ये अलग बात है कि इस चक्कर में सूकून - आराम, जितनी चादर उतना पैर वगैरह वाली बातें कहीं पीछे छूट गई हैं। 

    खैर, बात हो रही थी फिल्म हम दोनों देखने के अनुभव की और मैं खर्च -बचत आदि के पचड़ों में उलझ गया। क्या किया जाय। पहले फिल्मों से कुछ न कुछ सीखने को भी मिल जाता था, अब तो शायद पटियाला पैग लगाने आदि की सीख मिलती है :) 

    Anyway, फिल्म अच्छी लगी। पूरी फिल्म में देवानंद हिलते डुलते ही रहे। कभी एक जगह सीधे नहीं खड़े दिखे।  लोग उनका लगातार हिलना डुलना देखकर हंस भी रहे थे। फिल्म के गाने बेहद अच्छे हैं। खासकर वो गाना जिसके बोल हैं - मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया....हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया।  

   आप भी जरूर देख आयें....देवानंद की एकदम मस्त क्लासिक फिल्म है 'हम दोनों'. और हां, सिनेमा हॉल में जाकर सबसे कोने वाली सीट पकड़ें क्योंकि बीच वाली या किनारे वाली सीट पकड़ने पर आप को शायद पूरी पिक्चर देखने नहीं मिले..... क्योंकि ज्यादातर समय साठ-सत्तर के डायबिटीज वाले दर्शकों को टटोल टटोल कर रास्ता देने में,  उन्हें छींकते खांसते हुए आगे बाथरूम की ओर सरकाने में ही निकल जाने की संभावना है :)

  - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर कि देवानंद रहते हैं। 

समय - वही, जब सिनेमा हाल में टार्च जलाकर टिकट देखते बंदा कहे - अंकल...उधर D-15 ,16 है....उधर जाओ कोने में और तभी अंकल कहें.....उधर नहीं..... मेरे को उधर नहीं बैठना....बाथरूम जिधर से नजदीक हो वो सीट बताओ :) 

Wednesday, February 16, 2011

सुन्नर पाण्डे की पतोह

       ऐसा माना जाता हैं कि लेखक जिस परिवेश में रहता है, उसके लेखन पर भी उस इलाके की बोल चाल, लोगों की सामाजिक - सांस्कृतिक अभिरूचियों आदि का असर पड़ता है, और यह बात मैंने कई बार नोटिस की है। मसलन, धर्मवीर भारती को पढ़ते हुए एक तरह का इलाहाबादी परिवेश आपकी आँखों के सामने आ जायगा.....भले ही आप कभी इलाहाबाद न गये हों....लेकिन महसूस करेंगे कि हां सब कुछ सामने ही है.....वो अतरसुइया वाला इलाका......वो रिक्शेवालों की ट्रिन ट्रिन....वो पीपल का पेड़..... सब कुछ सामने घटित होता लगता है। ऐसे ही शरद जोशी को पढ़ते हुए लगता है कि मुंबई के किसी इलाके की बात कही जा रही है, मोहन राकेश को पढ़ते हुए किसी पहाड़ी इलाके को निहारते हुए संतूर के बजने का आभास होता है। इसी तरह काशीनाथ सिंह के लेखन पर बनारस की छाप दिखाई देती है तो पुन्नी सिंह के लेखन पर छत्तीसगढ़ी माहौल का असर।

    फिर ग्राम्य परिवेश वाले लेखकों का तो कहना ही क्या.....प्रेमचंद, रेणू, विवेकी राय....इन सभी के लेखन पर ग्रामीण संस्कृति, ग्रामीण अभिरूचियों आदि का अच्छा असर दिखता है। इन सभी के लेखन में जहां तहां देहात की बोली-ठिठोली, हंसुआ-कुदाल, गाय- भैंसों आदि का अच्छा खासा चित्रण देखा जाता है, इतना कि इन लेखकों का  केवल नाम लेते ही जेहन में किसी सूदूर देहात का परिदृश्य कौंध जाता है।

       कुछ इसी तरह के लेखक हैं अमरकान्त, जिनको पढ़ते हुए जेहन में धर्मवीर भारती जी की तरह ही इलाहाबादी परिदृश्य उपस्थित होता है। मैंने अमरकान्त जी की कई रचनायें पढ़ी हैं, कुछ अच्छी थीं, कुछ बेहद अच्छी तो कुछ के बारे में शब्द नहीं मिलते कि उनके लिये क्या कहा जाय। कुछ इसी तरह की कृति है 'सुन्नर पाण्डे की पतोह' जिसे पढ़ते हुए मन एकदम से शहर से एक कस्बे की ओर कूच कर जाता है।

    बता दूं कि अभी हाल ही में ज्ञानदत्त जी ने जब धूप सेंकती एक बुढ़िया का चित्र अपने ब्लॉग पर प्रस्तुत किया था तो मुझे तुरंत ही अमरकान्त की लिखी 'सुन्नर पाण्डे की पतोहू'  की याद हो आई। यह बुढ़िया चपरासी भी अमरकान्त के  लिखे उपन्यास की तरह ही धूप सेंक रही है....संभवत: घर में होने पर यह भी धूप सेंकते हुए अमरकान्त के पात्र की तरह ही गतर गतर हाथों में तेल लगाती होंगी......आते जाते लोगों को देखती होंगी.....अपने अतीत को याद करती होंगी।
    
   अब तनिक अमरकान्त के लिखे उपन्यास 'सुन्नर पाण्डे पतोहू'  कहानी का कुछ अंश भी बताते चलूं जिसमें कि राजलक्ष्मी नाम की एक स्त्री के विवाह के बाद उसे एक नया नाम मिलता है-'सुन्नर पांडे की पतोह' ।  सुन्नर पांडे की पतोह का पति झुल्लन पांडे एक दिन उसे छोड़कर कहीं चला जाता है और फिर लौटकर नहीं आता। अन्तहीन प्रतीक्षा के धुंधलके में जीती राजलक्ष्मी के पास पति की निशानी सिन्दूर बचा रहता है। 
   
     राजलक्ष्मी नाम की वह स्त्री अपने लंबे परित्यक्त जीवन काल को जीते हुए न केवल नर-भेड़ियों से भरे समाज में अपनी अस्मत बचा के रखती बल्कि अपनी सहज और इमानदार जीवन शैली से कुछ लोगों के लिए  प्रेरणा का स्त्रोत भी बनती है। लोगों के हारे-गाढ़े वक्त पर अपनी छोटी सी उपस्थिति के जरिये ही कई सारे ऐसे कार्य करती चली जाती है जिसे देखकर लगता है मानों इसी के लिये वह बनी हो। 


     उदाहरण के तौर पर एक वकील के घर शादी पड़ती है और सत्तर वर्षीय सुन्नर पांडे की पतोहू को घर की महिलाओं की ओर से बुलावा जाता है कुछ ऐसे काम के लिये जिसे कि मर्दों की नजरों से चुराकर किया जाना है। दरअसल वकील के घर में महिलायें चोरी छिपे कुछ गहना बनवाना चाहती थीं, उनका मानना था कि मर्द गहनों का नाम सुनते ही गरजना तड़फना शुरू कर देते हैं। ऐसे में कोई जानकार महिला साथ होनी चाहिये जो कि मर्दों के कचहरी चले जाने के बाद दुपहर में सर्राफ की दुकान तक चले और गहने लेने में आसानी हो। इस उद्देश्य के लिये सत्तर वर्षीय सुन्नर पाण्डे की पतोहू से योग्य और कोई नहीं लगता। पहले भी वे लोग अपने कई ऐसे ही काम सुन्नर पाण्डे की पतोहू के जरिये करवा चुके थे। 
    
     एक बार तो खुद मर्दों ने ही सुन्नर पाण्डे की पतोहू को एक विवाह के सिलसिले में समधी के यहां बहाने से भेजा था ताकि घर बार का पता चल सके, लड़का लड़की के लायक है कि नहीं पता किया जा सके और इस सबमें सुन्नर पाण्डे की पतोहू पूरी तरह से खरी उतरी थी। जहां कहीं उसे लगा कि सामने के घर बार में खोट है उसने तुरंत ही अपनी असहमति जता दी और उसकी बात को घर के  लोगों ने ब्रम्ह वाक्य की तरह माना। 
   
     सुन्नर पाण्डे पतोहू के वर्तमान अवस्था के बारे में अमरकान्त लिखते हैं कि -    दशहरे तक तो वह अच्छी भली थी। बरसात के दिनों में कीट-पाँक हेल-लाँघकर बनाया था। मुरली मनोहर सिंह के बीमार पड़ने पर वह घर में भारी आर्थिक संकट पड़ गया था, उस सयम वकील साहब की स्त्री का एक गुप्त सन्देश लेकर उनके मायके चिटबड़ागाँव गई थी, जिसका परिणाम अच्छा निकला था। हरिहरप्रसाद पेशेकार की बूढ़ी माँ को रोज आठ बजे सवेरे पुराने रोहे और फुल्की की दवा कराने के लिए गुदड़ी बाजार के पास जंगली मियाँ के घर ले गईं थी। लेकिन दीवाली आते-आते उसने बिस्तर पकड़ लिया। वह दोमितलाल की रखैल सुनरी के साथ एक दिन सबेरे-सबेरे नदी नहाने गई थी। वहां से लौटकर आई तो बाएं पैर के पंजे में दर्द होने लगा। शाम तक वह पाँव सीज गया और चलना-फिरना बंद हो गया। इसके बाद उसे बुखार रहने लगा। उसका पाँव काला पड़ गया औ उसका हिलना-डुलना भी मुश्किल हो गया वह दिन-रात चिल्लाती रहती और रो रोकर यमराज से प्रार्थना-विनती करती। जाड़े भर उसकी ऐसी स्थिति रही कि कई बार उसके मुँह में गंगाजल और तुलसी दल डाला गया दवाँए खाकर वह उठ खड़ी हुई। । 
      
        उपन्यास में कई जगह अमरकान्त जी ने देशज हल्के फुल्के क्षणों को भी बखूबी उकेरा है। मसलन, जब सुन्नर पाण्डे की पतोहू वकील के घर लाठी टेकते टेकते पहुँचती है तब का प्रसंग लिखते हुए अमरकान्त कहते हैं -  वकीलाइन, उनकी लड़कियों, लड़कों और नाती-पोतों ने सुन्नर पाण्डे की पतोहू को घेर लिया।
  "गोड़ लागीं पँड़ाइन जी", सबके मुँह से अभिवादन के स्वर लगभग एक ही साथ निकले, जो आपस में टकराकर समाप्त हो गए।
"जीओ - जीओ, " सुन्नर पाण्डे की पतोह ने सबके अभिवादन का उत्तर दिया। इसके बाद बरामदे में ही एक बोरा बिछा दिया गया, जिस पर सुन्नर पाण्डे की पतोह बैठ गई और उसको घेरकर वकीलाइन, उनकी दो लड़कियाँ, बच्चे-कच्चे भी जमीन पर बैठ गए।
       
   हाल-चाल के बाद बच्चों ने जिद की कि सुन्नर पांडे की पतोहू वह नये किस्म का गीत सुनाये जिसे कभी वह अपनी चुटीली आवाज में सुनाती थी। लेकिन आवाज कहां रही अब। सत्तर की अवस्था में जब आवाजें केवल फंस-खंस जाती हैं तब भी सुन्नर पांडे की पतोहू चंद पंक्तियां सुनाती है जिसका तात्पर्य था कि 

इलाहाबाद की लड़कियां बड़ी सउखीन होती हैं
कभी जूता, कभी चप्पल, कभी सैंडिल पहनती हैं


      अभी यह सब हंसी मजाक चल ही रहा था कि बच्चों ने जिद की कि रंडी मुहल्ला वाला प्रसंग जरा बोल कर बतायें सुन्नर पांडे की पतोहू। दरअसल पुराने जमाने की सुन्नर पाण्डे की पतोहू रंडी को रोंड़ी कहती हैं  और उसी रंडी मुहल्ले में एक बार एक राजनीतिक जुलस निकला था जिसमें झण्डा उठाकर लोग चल रहे थे। उसी नजारे को पेश करते हुए सुन्नर पाण्डे की पतोहू अपनी पोपली आवाज में कहती हैं कि - ए बच्चा....... आज रोंड़ी महल्ला में झाँड़ा उठेगा ......औऱ उनके इस रोंड़ी और झाँड़ा बोलने का ही असर था कि आसपास के लोग ठठाकर हंस पड़ते हैं......कुछ बोलने की शैली से..... तो कुछ मुक्त हृदया सुन्नर पाण्डे की पतोहू के ब्योहार से।

  लगभग सौ पृष्ठों की इस पतली रूचिकर किताब को एक बैठक में ही और अधिक से अधिक दो बैठकों में खत्म किया जा सकता है। राजकमल  द्वारा प्रकाशित इस किताब का मूल्य है - 60/-


  - सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां के सड़क किनारों को पटरी न कहते हुए फुटपाथ कहा जाता है। 


समय - वही, जब सुन्नर पाण्डे की पतोहू लाठी टेकते टेकते सड़क की पटरी पर चली जा रही हों और एक तेज हवा का झोंका आते ही कुनमुना कर कहें - अरे तनिक धीरे चलो न....बड़ी जवानी छाई है। 
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 Update - फीड सब्सक्राईबर पाठकों की कुछ क्वेरिस आई हैं कि इस किताब को कहां से प्राप्त किया जा सकता है - तो उनकी सुविधा हेतु कुछ फोन नंबर दे रहा हूं - आशा है अन्य पाठक भी इसका लाभ उठायेंगे।



मुंबई के पाठक इस किताब को संभवत: मुंबई के कस्तूरबा चौक के पास स्थित हिंदी ग्रंथ कार्यालय से प्राप्त कर सकते है। उनके पास उपलब्ध न होने पर वे किताबें राजकमल और अन्य प्रकाशकों के जरिये मंगवा कर भी देते हैं। हिंदी ग्रंथ कार्यालय में और भी ऐसे देशज उपन्यासों का स्टॉक है मुंबई के साहित्यनुरागी यहां संपर्क कर सकते हैं।


मुंबई में उनका फोन नंबर है - 022-23826739

वैसे राजकमल वालों से सीधे बात करके यह किताब आप अपने पते पर भी मंगवा सकते हैं - उनका दिल्ली का फोन नंबर है - 011-23240464

मेल के जरिये online@rajkamalprakashan.com से पुस्तक प्राप्त की जा सकती है।

- सतीश पंचम

Sunday, February 13, 2011

डू यू नो बलटिहान बाबा......दैट कोपीन वाला बाबा...... ओ या.....हाउ स्वीट


   Disclaimer - यदि इस लेख से किसी की प्रेमिल भावनाएं आहत होती हैं तो इसकी जिम्मेदारी उस शख्स की पत्नी की होगी.........पति तो वैसे भी गैरजिम्मेदार माने जाते हैं : )

  बहरहाल आप लोग अपनी अपनी सीट बेल्ट बाँध लें क्योंकि यह विलेज फ्लाइट सीधे गंवई पगडंडी पर रीठेल अंदाज में दौड़ने वाली है.......जिसमें हिचकोले भी हैं....मौज भी है.... और एक किस्म का सौंधापन भी है। 

 - Satish Pancham

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     आज सदरू भगत वैलेंटाईन डे मना रहे हैं। एक नई नीली रंग की पट्टेदार चढ्ढी, उस पर सेन्चुरी मिल वाली परमसुख छाप धोती, सफेद रंग का कुर्ता, एक नया अँगोछा कंधे पर रख यूँ चले, मानों समधियाने जा रहे हैं। धोती में नील इतना ज्यादा लगवा लिये थे कि लगता था बसपा का बैनर ही कहीं से झटक लाये हैं और वही पहन-ओढ कर निकले हैं। इधर रमदेई भी आज पूरे फॉर्म में थी। नई-नई साडी को बिना एक बार भी पहने धो-कचार कर धूप में सूखा रही थी, जानती थी नई साडी एक-दो बार धोने से कपडे का बल टूटता है और पहनने में नरमाहट बनी रहती है।

        बगल वाली जलेबी फुआ ने टोक भी दिया था, काहे नया लूगा को धो रही हो, पहन लो एसे ही....लगेगा बियाह वाली साडी है। चलोगी तो लूगा खसर-खसर बोलेगा सो अलग। तो जानते हैं रमदेई ने क्या कहा - अरे नई साडी खसर-खसर बोलती है इसिलिये तो धो-कचार कर धोती का खसरपन कम कर रही हूँ। मैं तो नहीं पहनती लेकिन मेरे बुढउ मानें तब न। बोल रहे थे हम लोग बलटिहान बाबा को मनायेंगे।

बलटिहान बाबा ? वो कहाँ के बाबा है ? जलेबी फुआ ने अचरज से पूछा।

अरे जैसे हमारे बरम बाबा, हरसूबाबा, डीह बाबा हैं न, वैसे ही अंगरेज लोगन के बलटिहान बाबा ।

अच्छा, तो उनके लिये ही पूडी- कढाई चढाने की तैयारी हो रही है ।

हाँ, वह सब तो करना ही पडेगा। कढाही चढेगी, परसाद बंटेगा। बाकी सब भी काज-करम होगा। अब तो देखो बलटिहान बाबा कहाँ तक पार लगाते हैं।

सब पार हो जायेगा बहिनियाराम, सब पार हो जायेगा। बस बलटिहान बाबा पर भरोसा रखो।
   
           रमदेई और जलेबी फुआ की बातें चल ही रही थीं कि सदरू भगत टहकते-लहकते आँगन में आ पहुँचे। देखा जलेबी फुआ पहले ही से बैठी हैं। रमदेई अलग कपडों को उपर-नीचे अलट-पलट कर सुखा रही है, ताकि कपडे जल्दी सूख जायें। एक गठरी में सिधा-पिसान बाँधा जा रहा है ताकि पूडी-उडी का इंतजाम हो, कढाई चढे। थोडे पुआल भी लिये जा रहे हैं ताकि आग जलाकर कढाई देने में आसानी हो। थोडी देर के लिये सदरू भगत को लगा कि औरतें न हों तो तर-त्यौहार का पता ही न चले। वो तो चार औरतें मिल बैठ कर बोल-बतिया लेती हैं, थोडी लेनी-देनी कर लेती हैं तो पता चलता है कि कोई त्यौहार है। एसे समय बच्चों की कचर-पचर अलग चल रही होती है। किसी का पाजामे का नाडा नहीं खुल रहा तो किसी की सियन खुल गई है। इन्हीं सब बातों में सदरू भगत मगन थे कि बाहर पंडित केवडा प्रसाद की आवाज सुनाई पडी।

अरे भगत......अंदर ही हो क्या ?

   अरे पंडितजी। आइये- आइये। कहिये , कैसे आना हुआ। सदरू भगत आँगन से बाहर आते हुए बोले। आना क्या, बस जब से ये सुना कि तुम बलटिहान बाबा को कढाई चढाने जा रहे हो, हम तो दौडे चले आये। पानी भी नहीं पिया, पैर देख लो अभी भी धूल से अंटे पडे हैं।

       हाँ, कढाई चढा तो रहा हूँ। सुना है बहुत पहुँचे हुए बाबा हैं। बहुत पढे लिखे कालेज के छोकरा-छोकरान तक उन्हें मानते हैं।

   कालेज के छोकरा-छोकरान बाबा लोग को मानते हैं ? विसवास नहीं होता भगत। देखा नहीं था हरकिरत का लडका जो शहर में पढ रहा था, गाँव आया तो हम लोगों को पिछडा कह रहा था। कहता था कि क्यों पाथर को पूजते हो। कहीं पाथर पूजने से दुख दुर होते हैं। ये बाबा ओबा लोग कुछ नहीं होते बस बेकार के लोग होते हैं। और आज देखो, सब पढुआ-ठेलुआ लोग बलटिहान बाबा को एकदम मान ही नहीं रहे बल्कि उनके लिये मार भी खा रहे हैं। बदनामी झेल रहे हैं। हर जुलुम हँस कर झेल रहे हैं ।

सच कहते हो पंडितजी। मैं तो समझता हूँ कि जितना हम लोगों के देसी बाबा लोगन में शक्ति है, उससे कहीं ज्यादा विदेसी बाबा में शक्ति है। देखा नहीं, क्या बडे, क्या बूढे सब के सब बलटिहान बाबा को मान रहे हैं। सुना है वह एसे बाबा हैं कि उनके लिये गुलाबी रंग की चड्ढी का चढौवा लगता है।

अच्छा।

हां और क्या ? एसे वैसे बाबा थोडे न है।

लेकिन आज तक तो हम लोग अपने यहां चढावे में कोपीन अ लंगोट छोड कुछ चढाये ही नहीं हैं। लंगोट चढाते थे तो एक सिरा एक ओर बाँध देते थे और दूसरा दूसरी ओर। अब इ गुलाबी चड्ढी का चढावा कैसे चढेगा बाबा को।

बस वही मैं भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि बलटिहान बाबा का चढौवा गुलाबी चड्ढी कैसे अर्पित किया जाता है, कैसे चढाया जाता है।

अभी यह चर्चा चल ही रही थी कि कुछ लोग भजन गाते हुए बगल से निकले -

बलटिहान बाबा, तेरो अजब है हाल
रे बाबा, तेरो अजब है हाल
मांगे न मोती, नाहीं हीरा
नाही मांगे गहना-गुरिया ,
मांगे चड्ढी-पुआल रे बाबा
तेरो अजब है हाल
रे बाबा......

- सतीश पंचम


 नोट:  सेंट वैलेंटाईन के लिये बलटिहान बाबा नाम ज्ञानदत्त जी द्वारा दिया हुआ है।  विशु्द्ध देशज नाम है। आशा है वैलेंटाईन के विरोधक इस बलटिहान बाबा नामकरण से तमाखू के साथ पिपरमिंट का स्वाद पाएंगे    :)

Saturday, February 12, 2011

प्रेम इकोफ्रेण्डली होता है .......... श्री बनानादास 'बम्बुल' :)

Its Business  plantation ?  ...No.....The love plantation
           आज अख़बार देख रहा था तो आगामी चौदह फरवरी को मनाये जाने वाले वैलेंटाइंस डे को लेकर एक रोचक ख़बर दिखी।  खबर के अनुसार  अमेरिका की वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी ने वैलंटाइंस डे के मौके पर प्रेमीजनों से ऐसे उपहारों से परहेज करने को कहा है, जिनसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता हो। इनके अनुसार प्रेमियों को चाहिये के वे इकोफ्रेण्डली कार्ड का इस्तेमाल करें ताकि पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचे। ग्रीन वैलेंटाइंस मनाने के लिये प्रेमी और प्रेमिकाएं एक-दूसरे को फूलों के गुच्छे की जगह छोटे गमले में लगा पौधा भेंट कर सकते हैं। वे अपने प्यार की पहचान के रूप में अपने आसपास की खाली जगहों पर पौधे लगा सकते हैं। वे पर्यावरण के लिए काम करने वाले संगठन को डोनेशन दे सकते हैं। वाइल्ड लाइफ रिजर्व एरिया, पार्क या जू में घूमने का प्लान बना सकते हैं.....वगैरह वगैरह। 
  पूरी खबर पढ़ते पढ़ते सोचने लगा कि देखो कित्ता कूट कूट कर ग्रीनरी भरी है इन लोगों के भीतर.......हर चीज में पर्यावरण का ध्यान रखते हैं। कंडोम से लेकर कोपेनहेगेन तक इनके पर्यावरण प्रेम के गमनचिन्ह हैं। फिलहाल इस ग्रीन वैलेंटाइन डे का जहां तक सवाल है मैं समझता हूँ प्रेमी जोड़े अक्सर पर्यावरण प्रेमी होते हैं.....वे हमेशा ऐसी जगह पाये जाते हैं जहां पर कि चारों ओर पेड़ हों....पौधे हों......चिड़ियों की चह चह हो.....जहां कोई आता जाता न हो....बस हरियाली ही हरियाली। वैसे विवाहोपरांत ये पर्यावरण प्रेम और घनिष्ठ होकर दिखाई देता है....उस वक्त और जब ऑफिस जाते वक्त आवाज सुनाई देती है - शाम को आते बखत बाजार से कोई हरी सब्जी लेते आना :) 
The Weaving of business Fibres
    खैर, विदेशियों का नज़रिया है.....ससुरे तमाम किस्म के रोग भी वही देते हैं दवा भी वही बताते हैं......कभी पर्यावरण को लेकर हलकान रहेंगे तो कभी किसी बीमारी को लेकर......कभी कुछ तो कभी कुछ। और इनकी देखा देखी हमारे बुद्धिजीवी भारतीय विद्वान भी चिंता जताने लगते हैं। अखबारों में फुल पेज का पर्यावरण प्रेम दर्शाते विज्ञापन निकलने लगते हैं....पर्यावरण प्रेमी संस्थाओं की ओर से बैनर, पोस्टर छपने लगते हैं, टीवी पर, थियेटर में तमाम जगह पर्यावरण ही पर्यावरण टिल्लो मारता नज़र आता है। 


 फिलहाल, आप ये 'बाँस कथा' बांचिये जिसे कि पढ़ने के बाद श्री बनानादास 'बम्बुल' ने कभी पिंक चड्डी से लेकर बनाना चड्ढी तक का अभियान चलाया था.........   :)
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       सामुज यादव ने जब से सुना है कि बाँस के बने अंडरवियर बाजार में आ गये हैं तब से सोच रहे हैं कि लोग उसे पहनते कैसे होंगे.....चुभता तो होगा ही....बाँस जो ठहरा। आम के पेड के नीचे बैठे रहर की सीखचों से खाँची (टोकरी) बनाते सामुज के मन में रह-रह कर यह सवाल आ रहा था....कहें तो कहें किससे.....सभी अपने काम में व्यस्त....कडेदीन अपने खेतों में रहर बो रहे हैं......फिरतू चमार आज रामलखन केवट के यहाँ जुताई कर रहे हैं......मन की बात कहूँ तो कहूँ किससे। तभी साईकिल से आते मास्टर लालराम प्रजापति दिखाई पडे। 
    
     दूर से ही सामुज बोले - अरे कहाँ जान दे रहे हैं ई भरी दुपहरीया में....क्या करेंगे इतना रूपया कमाकर। मास्टर ने सामुज की बात को अपने से बातचीत करने का न्योता समझ अपनी साईकिल सीधे आम के पेड के नीचे ले आये। साईकिल से उतरते हुए कहा......अरे तुम्हारी तरह आम के पेड के नीचे बैठ खाँची बनाने जैसा आरामदेह काम थोडे है कि बस....हाथ और मुँह चलाते रहो बाकी सब काम होते रहे। 
    
   अरे तो आप भी तो वही करते हैं - मुँह - हाथ चलाते हैं.....कोई लडका सैतानी किया तो बस हाथ की कौन कहे कभी-कभी पैर भी चलाने लगते हैं - सामुज ने हँसते हुए कहा।
      मास्टर सिर्फ सिर हिलाकर हँसते रहे और साथ ही साथ साईकिल को पेड के तने से सटा कर खडा भी कर दिया।
   

    सामुज ने धीरे-धीरे बात को मोडते आखिर पूछ ही लिया - अच्छा ये बताओ मास्टर - कि लोग बाँस की बनी अंडरवियर कैसे पहनते होंगे।


       बाँस की बनी अंडरवियर ? मास्टर के मन में जिज्ञासा जगी कि ये क्या कह रहे हैं सामुज यादव, भला बाँस का भी अंडरवियर होता है कभी...पूछ ही लिया.....ये किसने कह दिया तुमसे कि बाँस का अंडरवियर होता है। सामुज ने फट से वो अखबारी कागज निकालकर दिखाया जो हवा से उडते-खिसकते उसी पेड के नीचे आ पहुँचा था जहाँ वो खाँची बना रहे थे- लिखा था - लंदन में बाँस के रेशों से बनी इकोफ्रेंडली अंडरवियर बनी है जो कि लगभग तीस पाउंड की है.....।
Eco-freindly.....the business slogan


       मास्टर ने पहले तो उस धूल-धूसरित कागज को ध्यान से देखा.....फिर कुछ सोचने की मुद्रा बनाई और कहा - इकोफ्रेडली माने - पर्यावरण का मित्र.....तीस पाउंड माने केतना होता है कि......एक गुडे अस्सी माने अस्सी गुडे तीस....माने चौबीस सौ.....यानि अढाई हजार का अंडरवियर.........। हाँ तो सामुज वो अंडरवियर अढाई हजार का है और उससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुँचता......यही लिखा है इस कागज पर....। तो क्या हम लोग जो पहनते हैं उससे पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है क्या......ये नई बात सुन रहा हूँ......। मास्टर भी सोच में पड गये कि बात तो ठीक ही पूछी है.......वो जो सन्नी देओल आकर कहता है......चड्डी पहन कर चलो और न जाने क्या-क्या तो ईसका मतलब सब पर्यावरण के खिलाफ ही बोल रहा है क्या, कहीं ये अमीरों के चोंचले तो नहीं हैं। 


    सामुज बोले - अरे अढाई हजार की चड्डी कौन पहने......और फिर हम तो वो हैं कि पट्टेदार नीली चड्डी पहनते है..........शकील मिंया की दर्जियाने में दस रूपये में सिला ली......नाप ओप का झंझट नहीं........सालों से जानते है कि मेरा साईज क्या है.....पहनने में भी आसान, खुला और हवादार। 
  
    मास्टर बोले - अब खुला और हवादार का बखान मत करो मेरे सामने......उस दिन देख रहा था यहीं इसी पेड के नीचे तुम्हारी आंख लग गई थी......तुम्हारी धोती जरा सा बगल में क्या खसकी......गाँव के लडकों को मानों कोई खेलने का सामान मिल गया........सब तुम्हारी खुले मोहडे वाली चड्डी में देख-देख हँस रहे थे और तुम बेफिक्र सो रहे थे। लडके छोटे-छोटे पत्थर तुम्हारे उस खुले स्थान पर फेंक रहे थे। वो खदेरन का लडका दग्गू एक पतली लकडी से तुम्हारे चड्डी में कोंच न लगाता तो तुम उठते भी नहीं, सोये ही रहते। 


valentine tree
  सामुज ने हँसते हुए कहा - अरे तो लडके हैं अब शरारत नहीं करेंगे तो कब करेंगे। और जहाँ तक पर्यावरण प्रेमी की बात है तो मैं तो खुले और हवादार में होना पसंद करूँगा वही सबसे ज्यादा ठीक लग रहा है। 


   तो इस मायने में तो वो अंगरेज लोग ज्यादा ही पर्यावरण प्रेमी होंगे जो चाहे समुदर हो या नदी फट से ओपन हो जाते हैं - मास्टर ने हँसते हुए ही कहा।    तभी झिंगुरी सिर पर बोझा लिये आते दिखे.......


मास्टर ने कहा -  वो देखो कितना बडा पर्यावरण प्रेमी आ रहा है.......आज तक कभी इसने धोती के अंदर चड्डी नहीं पहनी.......अढाई हजार की कौन कहे अढाई रूपये का भी खर्चा नहीं है इस पर्यावरण प्रेम में......न रहे बाँस और न बजे बाँसुरी :)

- सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर पर्यावरण प्रेम को दर्शाते Valentine day Tree मिलने शुरू हो गये हैं।
समय - वही, जब प्रेमी जोड़े मुंबई के बोरीवली स्थित नेशनल पार्क में एकांत बैठे हों और तभी वहां  बाघ प्रकट हो कहे - तुम लोगों का वैलेंटाइन डे मन चुका हो तो खिसको यहां से......तुम्हारे वैलेंटाइन डे के चक्कर में मेरे वैलेंटाइन की वाट लग रही है.......कम्बख्त बाघिन को भी आज ही शरमाना था :)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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