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Sunday, January 30, 2011

जलदेवता की राशनिंग.... सररर्र... सों.... सों......


    हम लोग अक्सर अपने जीवन में किसी किस्म की राशनिंग बर्दाश्त नहीं करते। नहीं चाहते कि कोई हमें अपने जीवनयापन के लिये नाप कर राशन देनाप कर पानी आदि की सुविधा दे। यदि कभी इस तरह की नौबत आ भी जाय तो तुरंत पैसे लेकर मार्केट से उस वस्तु की उपलब्धता के लिये जुगाड़ करने में लग जाते हैं ताकि नपा नपाया पाने से बचा जाय। यदि गरीब तबके को छोड़ दें तो खाये अघाये स्ट्रैटा वाले न जाने कितने घरों में राशन कार्ड केवल एक सरकारी दस्तावेज बन कर रह गये हैं। उनका इस्तेमाल यदा कदा सरकारी कामकाज के दौरान ही पड़ता है। कइयों को तो पता भी नहीं होगा कि उनका राशन कार्ड एरिया के किस राशन वाली दुकान के अंतर्गत अलॉटेड है। लेकिन यह भी सच है कि राशनिंग की अपनी उपयोगिता रही है। पहले भीअब भी और शायद आगे भी रहेगी।
  
     अभी हाल ही में मुझे एक तकनीकी वजह से विशेष किस्म की राशनिंग से दो चार होना पड़ा।  विशेष इसलिये क्योंकि फिलहाल मेरे घर में पानी की राशनिंग चल रही है। न सिर्फ मेरे घर में बल्कि पूरी सोसाइटी में। दरअसल  हमारे एरिया में पानी की पाइपलाइन की मरम्मत का काम पिछले दस दिनों से चल रहा है। इस वजह से पानी बहुत कम आता है। पहले भी कम ही आता था लेकिन एनफ़ था। चल जाता था काम। अब हालत यह हो गई है कि केवल पीने का पानी भर पा रहे हैं और वही टंकीयां जिन्हें पहले पौना-तिहा भर पा रहे थे अब आधी से भी कम भर पा रही है। ऐसे में समझ सकते हैं कि पानी की कितनी शॉर्टेज चल रही है। 
     
      अब इस तरह की शॉर्टेज में कुछ मजेदार वाकये भी होते रहे हैं। सोसाइटी में जहां एक ओर पानी के लिये कांव कांव चलती रहती है वहीं समूची लिफ्ट गीली रहती है क्योंकि लोग पानी की कमी के चलते बिल्डिंग से उतर कर पास के ही किसी नल से पानी भर-भुर के ढो-ढवा कर ला रहे हैं। बिल्डिंग की लिफ्ट उसी के लिये भरपूर काम में लाई जा रही है। कहीं कहीं पर तो पानी की कमी के दौरान बरतन ज्यादा न धोना पड़े इसलिये खिचड़ी या ऐसी ही किसी चीज को खा पीकर काम चलाया जा रहा है तो कहीं कपड़े बाहर लांड्री में धुलाए जा रहे हैं। यानि कि जलदेवता ने एक ओर खिचड़ी खिलाकर गरीबी का एहसास दिलाया है तो दूजी ओर लांड्री मं कपड़े धुलवाकर अमीरी का भी रूतबा दिलाया है। 

    लेकिन मैं यहां अपनी बात करूं तो मेरे घर में जलदेवता थोड़ा अलग ढंग से बिहेव कर रहे हैं। न सिर्फ जलदेवता बल्कि पवन देवता भी गलबहियाँ डाले अपनी कलाकारी दिखा रहे हैं। दरअसल मेरे घर में एक बड़ी टंकी है और एक छोटी। बड़ी टंकी का पानी एक नॉन रिटर्न वाल्व के जरिये छोटी टंकी में जाता है, यानि कि बड़ी टंकी से पानी छोटी टंकी में जा तो सकता है लेकिन रिटर्न नहीं आ सकता।
    
       इधर कन्सील्ड पाइपलाइनों का ये हाल है कि वे दीवार के अंदर ही अंदर आपस में चुप्पे चुप्पे बोल बतियाती रहती हैं। सभी पाइपें आपस में जुड़ी हुई हैं। उनकी आपसी बातों का पता तब चलता है जब उपर पानी की छोटी टंकी खाली होने के दौरान ...सांय....सुर्र....सों.. सों  की आवाजें सुनाई पड़ती है। और यहीं से शुरू होती है जलदेवता की राशनिंग। 

    दरअसल होता यह है कि बड़ी टंकी में पानी होने के बावजूद टोटी से पानी पूरे फ्लो में तभी उतरता है जब छोटी टंकी में कम से कम एक- डेढ़ इंच लेवल का पानी बचा हो। वरना बड़ी टंकी में चाहे जितना पानी हो, वह पतली धार के रूप में ही आएगा।  इधर पानी की शार्टेज के दौरान वह डेढ इंच का मिनिमम स्तर भी नहीं रह पाता। पूरी टंकी खाली हो जाती है और उन खाली पाइपों में पवन देवता आकर विराजमान हो जाते हैं। 
   
      अगले दिन जब बड़ी टंकी में पानी आता भी है तो उस पानी में इतना प्रेशर नहीं रहता कि वह छोटी टंकी के पाइपों में बसे पवन देवता यानि कि एयर पैकेट्स को धकिया सके। और  इसलिये छोटी टंकी खाली की खाली ही रहती है। ऐसे में बड़ी टंकी में पानी रहने के बावजूद वह पूरे फ्लो के साथ टोटी से नीचे नहीं उतर पाता।  बूंद बूंद वाली पतली धार के जरिए एक बाल्टी भरने में पंद्रह बीस मिनट का वक्त लग जाता है। 
  
    अब जहां इतनी पतली धार हो तो घर के तमाम काम निपटाने, कपड़े बर्तन आदि धोने के दौरान खीझ तो होती ही है कि इतना वक्त लग रहा है। उधर ऑफिस जाने, बच्चों के स्कूल जाने के वक्त पर स्लो पानी आने का साइड इफेक्ट भी दिख रहा है। मसलन, नहाने के दौरान बाल्टी की धीमी भरावट देख घर के लोग आधी पौनी बाल्टी होते होते अधीर होकर उतने में ही नहा ओहा कर फारिग हो रहे हैं, वरना नहाने में अब तक कम से कम दो बाल्टी पानी हर किसी को लग रहा था। 
    
      उधर श्रीमती जी अलग टोकती रहती हैं कि प्लंबर को बुलाकर ठीक क्यों नहीं करवाते। ये क्या बात हुई कि बड़ी टंकी में पानी होने के बावजूद सिर्फ इसलिये की छोटी टंकी को क्यों नहीं भरा गया थोड़ा थोड़ा ही पानी मिले। इधर मैं खुश हूं कि चलो इस पानी की पतली धार वाली राशनिंग के चलते पूरी टंकी फटाक से खाली होने से बच जाती है। थोड़ा बहुत जो बड़ी टंकी में बच जाता है अगले दिन के पानी के साथ मिलकर थोड़ा सा राहत ही देता है। वरना तो पूरे फ्लो में यदि पानी टोटियों से उतरता तो निश्चित था कि घर के लोग तब पुरानी आदत के हिसाब से ही पानी का इस्तेमाल करते और टंकी निश्चित ही खाली हो जाती। मजबूरन मुझे भी बाकियों की तरह बिल्डिंग से नीचे जाकर पानी ढोकर लाना पड़ता। 
    
    अपनी तरह के इस अनोखी राशनिंग का ही असर है कि घर के तमाम पानी वाले काम धीमे ही सही हुए जा रहे हैं, बाकीयों की तरह नीचे नहीं उतरना पड़ रहा है। और तो और,  मैं निश्चिंत हो इस पर पोस्ट भी लिख रहा हूं :)   

     लेकिन एक डर है, पोस्ट लिखने के बाद कल को कहीं जलदेवता खुशी से फूले न समाने लगें और पूरे फ्लो से टोटीयों में नहीं उतर जांय, वरना टंकी का खाली होना तय है।  वैसे भी हम इंडियन कही गई बातों को लेकर कुछ ज्यादा ही आशंकित रहते हैं कि कहीं हमारे द्वारा किसी बात पर खुशी व्यक्त करते ही कल को उसका उल्टा न होना शुरू हो जाय.....I Mean....The Great Indian superstitious Mentallity............. .......Laden with....... 'थोथी आशंका' :)

   - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर जलदेवता पवन देवता के साथ मिलकर मेरे घर की टोटियों में सन सनन सांय सांय गीत गाते हैं।

समय - वही, जब अमरीकी सरकार कुछ लोगों के पैरों में रेडियो कॉलर लगा रही हो ताकि उनको अमेरिका में ट्रैक किया जा सके, उनकी मूवमेंट पता चल सके और तभी करीना कपूर आयें और कहें - प्लीज एक ट्रेकिंग कॉलर शाहिद कपूर के पैरों में भी पहना दें। कम्बख्त  इन्कम टैक्स वालों ने छापा मारा प्रियंका चोपड़ा के घर ताकि टैक्स चोरी का पता लग सके और सुबह सुबह शाहिद कपूर ने आँख मलते हुए वहां दरवाजा खोला था।  पता नहीं आजकल कहां-कहां मुँह मारता फिरता है मुआं :)

Wednesday, January 26, 2011

ये जो है न....सो कभी था....अब भी है......है न.

       अब वे दिन सपने हुए हैं कि जब सुबह पहर दिन चढे तक किनारे पर बैठ निश्चिंत भाव से घरों की औरतें मोटी मोटी दातून करती और गाँव भर की बातें करती। उनसे कभी कभी हूं-टूं होते होते गरजा गरजी, गोत्रोच्चार और फिर उघटा-पुरान होने लगता। नदी तीर की राजनीति, गाँव की राजनीति। लडकियां घर के सारे बर्तन-भांडे कपार पर लादकर लातीं और रच-रचकर माँजती। उनका तेलउंस करिखा पानी में तैरता रहता। काम से अधिक कचहरी । छन भर का काम, पहर-भर में। कैसा मयगर मंगई नदी का यह छोटा तट है, जो आता है, वो इस तट से सट जाता है।

    ये लाईनें हैं श्री विवेकी राय जी के एक लेख की जो उन्होंने एक नदी मंगई के बारे में लिखी हैं।  इसे पढते हुए गाँव घाट की जीवंत तस्वीर नजर आ जाती है। ये अनुभव उन्होंने तब लिया था जब देश अभी हाल ही में आजाद हुआ था। गुलामी की जंजीरों से मुक्त हुआ था और चारों ओर मन हिलोर जीवन था। मंगई तब एक भरी पूरी नदी थी।  विवेकी राय जी मंगई नदी को गांव की मां कहते हैं और लिखते हैं कि -

      हम थके मांदे बाहर से आते, यह निर्मल नीर लिये राह-घाट छेंक सदा हाजिर, घुटने तक, कभी जांघ तक पैर धो देती, शीतल आँचल से पोंछ देती, तरो ताजा कर देती। हम खिल जाते। मुंह धोते, कुल्ला करते, हडबड-हडबड हेलते, उंगली से धार काटते और कुटकुर किनारे पर पनही गोड में डालकर भींगे पैरों की सनसनाहट के साथ धोती हाथ से टांगे अरार पर चढते तो एक अनकही-अबूझी आनंदानुभूति होती थी ….

      गरमी के दिन में लडके छपक छपक कर नहा रहे हैं। सेवार और काई के फुटके छत्ते धार के साथ बह रहे हैं। लडके उन्हें उठा-उठाकर एक दूसरे पर उछाल रहे हैं। झांव- झांव झाबर।   एक दूसरे पर हाथो –हांथ पानी उबिछ रहे हैं, हंस रहे हैं, किलकारी भर रहे हैं। हाथ पैर पटक कर अगिनबोट बन तैर रहे हैं। हाडुक-बाडुक। नहाते नहाते ठुड्डी और मूंछ वाले स्थान पर हलकी काई जम गयी। कोई बुडुआ बनकर दूसरे का पैर खींच रहा है। कोई पानी में आँखें खोलकर तैरता है। अच्छा देखें कौन देर तक पानी में सांस रोककर डूबता है। खेल शुरू। एक पट्ठा रिगानी (चालाकी)  कर जाता है। सिर काढ कर साँस ले रहा है और तब तक उपर उठने के लिये कोई सिर मुलकाता है, तब तक डम्भ। साँस ले रहा लडका पानी में घुस जाता है। दिन भर नहान। न जाने किस पुण्य प्रताप से यह नियामत मिली। आज कल के लडके तो अभागे निकले। चुल्लू भर पानी के लिये छिछियाते फिरें। कुएं पर खडे खडे लोटे से देह खंघार लें बस।

        उधर दादा दोनों हाथों से मार-मार फच्च फच्च धोती फींच रहे हैं। कहते हैं कि उनके कपडे कभी धोबी के घर नहीं जाते। परंतु क्या मजाल कि कोई कहीं धब्बा मैल या चित्ती देख ले। एक जिंदा दृश्य। मानों यह मंगई का तट ही गाँव के लिये सिनेमा, थियेटर, मनोरंजन पार्क, क्लब, क्रीडागार स्थान है।

      लेकिन अब वो बात नहीं रही। स्वतंत्रता के समय जो मंगई नदी कल कल बहती थी, अब सूख गई है। गाँव में घुसने से पहले उसी का महाभकसावन सूखा, गहरा, लेटा हुआ कंकाल लांघना पडता है। मिजाज सन्न हो जाता है। बंसवारि खडी है, पेड खडे हैं। घर खडे हैं। मगर वह रौनक कहां है। अखर गया है।

     एक वह भी समय था जब चैत रामनौमी के दिन अछत कलश भरने का काम शुरू होता। किसी कलश को घी से टीककर, तो किसी कलश को घी से ही राम-नाम लिखकर अंवासा गया है। माता मईया की गज्जी कचारने, सिरजना और पीढा धोने का काम रात भर चलता है।

      मंगई के तट पर नहान उतरा है। जिनको माता मईया की पूजा करनी है, जिन्हें कडाही पर बैठना है, वे नहा रही हैं। पहले दौर में सोझारू औरतों ने और लडकियों ने स्नान किया। जब रात भीन गयी और राह-घाट सूनी हो गयी, तब लजारू बहुरीया लोग निकलीं।

     अब वह बात कहां रही। नहान की बेला में अबकी बार सियार फेंकरते रहे। फटे दरारों की शतरंजी पर भूत-प्रेत बैठकर सत्यानाशी खेल खेलते रहे। मनुष्य का स्वभाव माहुर हो गया है, देवता उन्हें दंड दें, लेकिन उसके लिये जीव जंतुओं और मवेशियों को क्यों दंड दिया जाय। अब भैंसे कहां घंटों पानी में बैठकर बोह लेंगी। अब दंवरी से खुलकर आये बैल कहां पानी पियेंगे। कहां उनकी गरमाई हुई अददी खुरों को जुडवाने के लिये पाक में हेलाया जाएगा। खेह से भठी हुई उनकी देह कहां धोयी जाएगी। दिन में चरने वाले जानवर और रात-बिरात दूर-दूर से टोह लगाते आये सियार-हिरन आदि अब कहां पानी पियेंगे। कुछ समझ नहीं आ रहा।

     जेठ-बैसाख में जिनकी शादी होगी, उनका कक्कन कहां छूटेगा । मौर कहां पर सिरवाया जाएगा। कहां पर
खडी होकर औरतें गाएंगी -

अंगने में बहे दरिअइया
हमारे जान नौंसे नहा लो
कोठे उपर दुल्हा मौरी संवारे,
सेहरा संवारे ओकर मईया
हमारे जान नौंसे नहा लो…….

      अब हालत यह है कि खेतों के लिये दौडो, पंपिंग सेट जुटाओ,ट्यूबवेल धंसाओ….मगर मंगई के लिये क्या करोगे। ऐसे लुरगिर कमासुत लोग जनमें कि आपस में वैर, विद्वेष, रगरा-झगरा से फुरसत नहीं । बरमाग्नि उठी कि आकाश धधक उठा। दुख दाह से नदी का करेजा दरक गया है।

     मंगई का करेजा तो देर से फटा है, क्या गांव का करेजा बहुत पहले नहीं फट गया। चुनाव आया एक गांव के कई गांव हो गये। सुख शांति में आग लग गई है। गोल-गिरोह और पार्टीयां बन गई हैं। राजनीतिक पार्टीयों ने वह सत्यानाशी बीज बोया कि गाँव गाँव दरकते चले गये। जूझ गये एक दूसरे से लोग, खून के प्यासे, स्वार्थी-लोलुप और एक विचित्र किस्म के कामकाजी हो गये। उनका सारा ध्यान सरकार पर और अँखमुद्दी लूट पर लग गया। यह लूट उसी प्रकार सत्य रही जिस प्रकार सूरज। मंगई का पानी इसी में सूख गया। कितना सहे। नदी सत्त से बहती है। आसमान सत्त से बरसता है। आदमी का सत्त चला गया। जो किसी युग में नहीं हुआ वह इस युग में हो गया।

      मंगई का पानी था तो आधा पेट खाकर भी गांव में तरी थी। वह तरी पुरानी थी, परंपरागत और सांसकृतिक थी। सो इस कनपटी पर विद्रोही काल ने ऐस थप्पड मारा है कि चटक गयी है। अब इसका खाली पेट जनता के खाली पेट का प्रतीक हो गया है। चहल  पहल माटी हो गयी है। माटी दरार हो गई और इस तिकोनी चौकोनी कटी दरारों के बीच की बरफी पर गदहे घूम रहे हैं, बकरीयां उछल-कूद कर रही हैं। दरारों में मुंह चिआरकर सीपियां पडी हैं, जिनमें से अपना खाना ढूँढते कौए आतुर हैं।

      लोग जूता फटकारते आ-जा रहे हैं। बैलगाडियां बे रोकटोक पार हो जा रही हैं। अरार पर से उतरने वाले संस्कारवश एक बार घूरकर देखते हैं कि कहीं जूता तो नहीं उतारना है। लेकिन अब जूता क्यों उतारा जाय, मंगई तो सूख गई है।

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      आजादी के समय जो मंगई कल कल बह रही थी, विवेकी राय जी के अनुसार उनके जीवन काल में ही वह नदी सूख गई है। इससे बडा अचंभा क्या होगा। आज देश गणतंत्र दिवस भले ही मना रहा हो, लेकिन लगता है मंगई नदी और देश की हालत एक सी है। दादा अब भी फच्च फच्च धोती फटकारते हैं लेकिन उनकी धोती अब लॉड्री में धोकर आती है। उस पर दाग ही दाग हैं। कहीं नारायण दत्त तिवारी नुमा तो कहीं कोडा के फोडे का मवाद लगा है। कहीं पर प्रांत और भाषा के नाम पर कौए अपना खाद्य पदार्थ सीपियों में ढूँढ रहे हैं तो कहीं राज्यों के विभाजन के नाम देश की सूख चुकी माटी की फटी दरारों वाली बरफी पर देश के गदहे और बकरीयां उछल कूद मचाये हुए हैं। बंसवारी को काट कर टॉवर और कॉम्पलेक्स बनाये तो बनाये गये हैं लेकिन मंगई का वह आनंद कहीं बिला गया है, गुम हो गया है। देश और मगई एक ही अवस्था से गुजर रहे हैं। लोग मंगई के लिये जूता तो अब भी उतारते हैं पर उसे पार करने के लिये नहीं, बल्कि मंगई के प्रति श्रद्धा जताने में कौन पीछे रह गया है उस पर जूता फेंकने के लिये, आपसी सिर फुटौवल के लिये। न जाने यह जूता उतरौवल कब तक चलेगा। देश और मंगई की हालत एक सी हो गई है।



-  पिछले साल आज ही के दिन पब्लिश की गई थी यह  पोस्ट....स्थितियां आज भी वही हैं.... उम्मीद है आगे भी कुछ काल ऐसे ही चलता रहेगा.


ये जो है न....सो कभी था....अब भी है......है  न......




- सतीश पंचम


स्थान - वही, जिसे अंग्रेजों ने कभी दहेज के रूप में दे दिया था।


समय - वही, जब माउंटबेटन सत्ता हस्तांतरण के मुद्दे पर बुलाई गई मीटिंग में चाय पी रहे हों और नेहरू उनसे कहें - हुजूर, ये बाघ-बकरी चाय है..... बांट-बखरा तनिक ढंग से करिएगा :)

Sunday, January 23, 2011

खेंचातानी की गलबहियाँ


     प्रधानमंत्री कह रहे हैं तिरंगे पर राजनीति न करो.......उधर भाजपा कह रही है भला अपने देश में तिरंगा फहराने में कैसी राजनीति........इसे तुम राजनीति कहो तो यही सही लेकिन ....हम फहराएंगे तिरंगा.....लाल चौक पर.......हम फहराएंगे..........इन सबमें कौन सही है...... कौन गलत.........कुछ समझ नहीं आता.....एक को तिरंगे के फहराने में राजनीति दिखती है तो दूसरे को न फहराने में.....सोचता हूं कि कांग्रेस और भाजपा दोनों को दौड़ा दूं रेस के घोड़े की तरह.......दौड़ो.......जो पहले आये उसके मन की हो.....लेकिन यह डर्बी का सीज़न भी तो नहीं है भाई.....और फिर घुड़दौड़ के लिये और घोड़े आ गये तो क्या हो.....किस किस को संभाला जायगा......घोड़े की पीठ पर बैठने के लिये किसे राजी किया जायगा.....जनता को.........नहीं उसे क्यों तकलीफ देना....वैसे भी क्या कम तकलीफें हैं उसके पास.....तिरंगा ही तो फहराना है।

     इधर क्रिकेट में भारत हार गया....ढेर सारे तिरंगे खुद ब खुद लपेट उठे.......उधर जैतापुर में न्यूक्लियर प्रोजेक्ट का बवाल चल ही रहा है.......इलाहाबाद अलग सुलगने को तैयार बैठा है.....तिस पर काले झण्डों की बहार.....बताओ तिरंगा जी....आप किस ओर हो....न....न....ये मत कहना कि मैं किसी ओर नहीं हो पा रहा हूं..........कहीं न कहीं तो ठौर ढूँढना ही होगा......मादाम कामा की ओर मत ताको टुकुर टुकुर........उन्होंने तुम्हारे लिये नर्सरी का इंतजाम किया था जब तुम बहुत छोटे थे.......अब तो तुम बहुत बड़े हो गये हो.........गाँधी........नहीं वो भी नहीं......उनके पास और काम है.........तिरंगा फहराने के लिये नोटों पर से उन्हें हटाना उचित नहीं...... फिर अदालत.......कोर्ट.....कचहरी....मर मुकदिमा.....क्या अब ये सब भी होगा.....हाँ...तुम्हें तो आदत हो गई है.........कभी लोगों ने तुम्हारे लिये जान दी थी.......यूनियन जैक को एक झटके में उतार फेंका था .......अब न वो सीने रहे न वो दीवाने रहे....... .आज तुम खुद कटघरे में हो.....बताओ किस ओर हो.....राजनीति के या अराजनीति के.........वक्त लेना चाहोगे......ठीक है...........कोई बात नहीं....आओ....हम लोग मिल कर टीवी देखें.....वो देखो रवीश की रिपोर्ट चल रही है......गलीयों के भीतर कैसे चले जा रहा है जवान....एकदम सधे अंदाज मे ......वो देखो चूने के भीतर गरीबों के वाईट हाउस से परिचय करा रहा है .......... ....देखो....देखो.....वो रिक्शे वाले के पास भी जा रहा है....वही रिक्शेवाला जिसे देखकर होंडा सिटी वाला नाक भौं सिकोड़ता है...मुंह बिचकाते हुए कहता है.....पूअर गाईस......इन लोगों को शहर के बाहर करना मांगता....सब ट्रैफिक जाम येही लोगों की वजह से होता है.........होंडा सिटी......आओ तिरंगे प्यारे यहां देखें.....सब टीवी पर 'कभी कभी' चल रही है अमिताभ की............क्या गाना है....कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है ..........अरे ये सीन तो कश्मीर का लग रहा है...........पेड़ के नीचे बैठे अमिताभ लिख रहे हैं.....ज़िंदगी तेरी जुल्फों की नर्म छांव में गुजरने पाती तो शादाब हो भी सकती थी.......ये रंजो-गम की सियाही जो दिल पे छाये है तेरी नज़र की शुवाओं में खो भी सकती थीं......मगर ये हो न सका, और अब ये आलम है.....तू नहीं....तेरा ग़म नहीं.....तेरी जुस्तजू भी नहीं......बढ़िया लिखा है न.....अरे तुम तो उदास हो गये.......अरे......डोंट बी इमोशनल प्यारे......डिप्लोमेसी में इमोशनल होना कमज़ोरी है......यूँ गुमसुम न बैठो...... वरना लोग कहेंगे.......पक्ष और प्रतिपक्ष के खेंचातानी में आज तुम उदास हो......वही जिसके लिये कभी कहा गया था.....विजयी विश्व तिरंगा प्यारा.....झंडा उंचा रहे हमारा।

- सतीश पंचम

स्थान - कश्मीर से तकरीबन सौलह-सतरह सौ किलो मीटर दूर।

समय - वही, जब टीवी पर रवीश की रिपोर्ट चल रही हो और तभी एक कश्मीरी युवक रवीश के पास आकर कहे..... ओय आशिकां नुं दरश कराया करो.... जी कदी साडी गली पूल्ल के वी आया करो जी...... कदी साड्डी गली पुल्ल के वी आया करो।    


(हाल ही में तिरंगा यात्रा को लेकर चल रही राजनीतिक पार्टियों की गंदी सियासत से व्यथित मन द्वारा गढ़ा गया 'शब्द कोलाज')

Saturday, January 22, 2011

चेकायन......वासन्ती


         कुछ अनुभव रोचक होते हैं। अपने आप में अलग सी बानगी लिये हुए।  इस बार गाँव जाने पर कुछ कुछ वैसा ही अनुभव हुआ। एक विवाह समारोह के दौरान जब बारात घर से निकली तो  ढेर सारी गाड़ियों का काफिला चल पड़ा। आगे पीछे धूल उड़ाती गाड़ियां जब शहर की ओर बढ़ ही रहीं थी कि मोबाइल पर कॉल आई - फलां रूट पर चेकिंग चल रही है जिनके पास गाड़ी के पेपर न हों वो बायपास से गाड़ियां निकालें।

  मैं कुछ समझ पाता कि धड़ाधड़ साथ बैठे लोगों ने अपने साथियों को फोन घुमाना शुरू कर दिया और धीरे धीरे सब शांत। पूछने पर पता चला कि गाँव देहात में सब लोग गाड़ी का कागज लेकर नहीं चलते। यहां कौन सा हमेशा ट्रैफिक हवलदार रहता है कि गँवई सड़क पर खड़ा मिले। जब शहर की ओर निकलना होता है तो पेपर साथ ले लिया जाता है वरना जै राम जी की।

     आज चेकिंग इसलिये चल रही है क्योंकि लगन तेज है, विवाह आदि का दिन है। ढेर सारी गाड़ियों का काफिला शहर के रस्ते गुजरेगा।  किसी के पास पेपर होगा किसी के पास नहीं और  इसी के चलते पुलिस वालों को थोड़ा बहुत खाने कमाने का मौका मिल जायगा। चेकिंग तो महज बहाना है।  मैं मन ही मन अपने इन साथियों की चतुराई पर मुग्ध था। एक तरह का यूज टू वाला माहौल लगा। लोगों को इन सब की आदत पड़ गई है।

 अभी यह सब चल ही रहा था कि फिर फोन आया नचनियों के लिये ठेके पर से थोड़ा माल मसाला लेना है। गाड़ी आगे रोककर ले लेना नहीं तो ससुरे ढंग से नहीं नाचेंगे। मैंने फिर प्रश्नवाचक निगाहों से एक को देखा तो वो मुस्कराते हुए बोला चिंता मत करो समझा दूंगा। एक ने बताया कि जब गाँवों में नाच गाने और बैंड बाजे वालों का सट्टा होता है तो साथ ही एक सादे कागज पर वो लिख देते हैं कि इतने हजार का मेहनताना और पंद्रह - बीस बोतल अलग से।  यानि नचनियों के लिये शराब आदि का भी इंतजाम करना पड़ेगा। मैं मन ही मन इस गँवई डांस प्रोग्राम के कांट्रेक्ट पेपर पर मुग्ध हो रहा था कि कैसी तो अलग किस्म की अर्थव्यवस्था चलती है यहां। न वैट का चक्कर न रिटर्न फिटर्न का तामा झामा। जो है सो सादे कागजों पर ।

  अब गाड़ी आगे ही आगे बढ़ी जा रही थी और हमारी निगाहें उस बोर्ड की ओर टंगी थी जहां पर कि लिखा होता है

 जानेवाले ध्यान किधर है
 मधुशाला इधर है

  देखते देखते एक जगह वह दुकान दिख गई जिस पर कि लिखा था - सरकारी लायसेंस प्राप्त मान्य शराब की दुकान।

 गाडी़ को साइड में लगाया गया। उतर कर हाथ पैर सीधे करते हुए शराब की दुकान की ओर बढ चला। साथ में औऱ लोग भी थे। अभी कुछ दूर था कि शराब का ऐसा भभका छूटा कि आगे जाने की हिम्मत नहीं हुई। लेकिन शराब लेना तो था ही। मन मारकर आगे बढ़ा। काउंटर पर बैठे शख्स को देखकर लगा कि जरूर ये केस्टो मुखर्जी का अवतार है। रह रहकर हिचकी ले रहा था।

  मुझे कभी इस तरह से शराब वगैरह लेने का अनुभव नहीं था। न ही कभी लेना चाहूं ,  लेकिन  अब जो सामने था सो था। एक ने पूछा कितने वाला है।

 जवाब मिला -  कितने वाला लोगे....हिक्

 अब दूसरे ने कहा - वही दे दो संतरा मुसम्मी टाइप।

सादा वाला या मसाला वाला.....हिक्

मसाला दे दो।

ये लो ....हिक्.....और चाहिये.... हिक्......

 हां यार दे दो....। पूरा थैला भर दो.....ससुरे पियें जितना पीना है। नाचना चाहिये बस्।

 काउंटर पर बैठे  उस शख्स का  इस तरह हिचकी लेते हुए विशेष अंदाज में पूछना पछोरना मुझे उस गाने की
याद दिला रहा था जिसके शब्द थे

थाने मे बइठे दरोगा जी लें हिचकी
लगता है साहिब ने मारी है चुसकी

    उधर थैला भर कर शराब खरीदने के बाद वापस लौटे तो मैंने राहत की सांस ली। वहां खड़े खड़े मेरा सिर चकरा रहा था, पता नहीं पीते कैसे हैं इस तरह की शराब।  यूं तो मैंने भी एक दो बार बीयर का सेवन किया है,  लेकिन उसे चखना ही कहा जायगा, पीना नहीं। फिर ये तो देसी था। जो पियें वो जानें।
 
   गाड़ी में आकर वापस बैठा और मन ही मन सोचने लगा कि यार आजकल शायद बिना पिये पिलाये कोई शादी ब्याह नहीं हो पाता लगता है। उधर बारात की दूसरी गाड़ी दिखी जिसमें कि स्कॉच और विस्की का कैरट लादा जा रहा था। बगल में ही बोर्ड दिखा जिसपर लिखा था - यहां पर मिलती है महाठंडी बियर। संभवत : चिल्ड बियर का ही तर्जुमा है 'महाठंड' ।

 उधर अगले दिन मुझे जमीन पर गिरी हुई उसी तरह की एक खाली बोतल दिखी जिसे कि शराब के ठेके वाले के यहां से लिया गया था। खाली बोतल और उस पर लगे लेबल को देख मन हुआ कि देखूं तो क्या लिखा है इसपर। पास स्थित कैमरे से उसकी तस्वीर उतारी। तस्वीर उतारने के दौरान ही ध्यान गया कि  बोतल पर चिपका  लेबल डबल चिपकाया लगता है । एक के उपर एक ।

    लेबल पर मैन्युफैक्चरिंग डेट वगैरह लिखी थी। शंका हुई कि अंदर वाले लेबल पर कुछ और डेट वगैरह न लिखी गई हो। लेकिन बोतल को हाथ से उठाने की हिम्मत न हुई। एक तो वैसे भी गाँव के बच्चे चेकाबाजी किये रहते हैं। यहां चेकाबाजी से तात्पर्य शराब आदि की खाली बोतलों में बच्चे मूत्र विसर्जन कर उसे पेड़ से लटका देते है या पेड़ की किसी डाली पर रख देते हैं औऱ छोटे छोटे कंकड़ पत्थरों से उस बोतल पर निशाना साधते हैं। ये अपने आप में गँवई बच्चों की अलग किस्म की मौज होती है, फ्री फंड का खेल होता है जिसका अंदाजा शहर के लोग शायद न लगा पायें। शहर मे तो एस्सेल वर्ल्ड और वो तमाम मनोरंजन के साधन होते हैं। लेकिन गाँवों में इस तरह के क्रियेटिव फिरी फण्ड वाले खेल बच्चे खुद से खोज ओज कर  खेलते हैं। वहां उन्हें इसके लिये पैसा नहीं देना पड़ता।

*******    


जारी.....




- सतीश पंचम


स्थान - वही, जहां पर चेकायन हेतु Bowling Game खेला जाता है। 


समय - वही, जब गाँव में बच्चों द्वारा बोतल पेड़ से लटका कर चेकायन खेला जा रहा हो और तभी एक बच्चा  कहे - अरे वो देख जिसकी बोतल थी वो रामरजवा इधर ही आ रहा है   :)

 (ग्राम्य सीरीज़ चालू आहे.........)

Wednesday, January 19, 2011

वही ओनईस सौ चउंसठ...... वही दुई हजार गियारह

       हाल ही में  मोहन राकेश की डायरी पढ़ रहा था। वही डायरी जिसके लिंक को सिद्धार्थ जी ने मोहन राकेश से संबंधित मेरी एक पोस्ट में दिया था।  कई दिलचस्प बातें पढ़ने को मिलीं। जालंधर में मोहन राकेश के बिताये दिन, उनके अध्यापकीय अनुभव, इलाहाबाद के साहित्यिक माहौल के बीच साहित्यकारों की आपसी गलबहियां,  उनके बीच स्टेशन पर एक दूसरे को विदा करते समय की बातें, कौन कहां दिख गया, कब किसको पैसे की तंगी हो गई, निजी जीवन के कुछ तल्ख लम्हे सभी को बहुत ही महीन ढंग  से मोहन राकेश ने उकेरा है।

      साहित्यिक बातों के अलावा कई ऐसी रोजमर्रा की बातें भी दर्ज हैं उस डायरी में जिन्हें पढ़ने पर लगता है कि ये तो अभी हाल फिलहाल की हमारे आसपास किसी के द्वारा कही गई बातें हैं। वही तल्खी, वही देख लेने की फितरत, राजनीतिक बहसबाजी......जबकि ये बातें आज नहीं,  तकरीबन पचास साल पहले की लिखी हुई हैं।

 एक बानगी देखिये कि,  मोहन राकेश अपनी डायरी में दिनांक 16-8-64 के दिन लिखते हैं कि -

टी-हाउस।

मेज़ के इर्द-गिर्द चार आदमी। चौधरी, कश्यप और दो अपरिचित। अपरिचितों में से एक आँखें आधी-आधी भींचता हुआ कह रहा है,...‘बेचकर तो दिखाएँ एक गाड़ी भी। एक दिन दो गाड़ी अनाज मँगवा लें और बेचकर दिखाएँ। मैंने कहा नन्दाजी से कि भाई हम तो हैं ही ऐसे—हमारा तो काम ही है हेरफेर करना। चोरी-चकारी हम नहीं कर सकते, डाका हम नहीं डाल सकते, किसी औरत पर ज़ोर-ज़बर्दस्ती करने का हौसला हममें नहीं—हम लोग बनिए की जात, कलम की हेरफेर ही तो कर सकते हैं। तुम लाओ अनाज...हमसे एक आना कम में बेचो, तो ग्राहक तुमसे ही खरीदेगा। उसे जो सस्ता
देगा, उसी से तो वह लेगा। आओ तुम मार्केट में हमारे कम्पीटीशन में। आते क्यों नहीं?



‘कीमत गिरेंगी—गिर सकती हैं—अगर तुम्हारे अपने आदमी करोड़ों के सौदे न कर रहे हों। तुमने कैरों को पकड़ा—वह तो छोटी-मोटी हेरफेर ही कर रहा था। सत्तर-अस्सी लाख की हेरफेर भी कोई चीज़ है और वह मारा गया अपने लडक़ों की गुंडागर्दी की वजह से। वरना तुम बिज्जू पटनायक को क्यों नहीं हाथ लगाते? उसे जिसने पचास करोड़ की हेरफेर की है? वह तो साफ कहता है कि पचास लाख खर्च करके मैं चीफ मिनिस्टर हो गया। प्राइम मिनिस्टर बनने में कितना लगेगा? ज्यादा से ज्यादा दो करोड़?


‘और कुम्भन दास (?) राजस्थान का। उसने गुड़ में पचास लाख बना लिया है और मूँछों पर हाथ फेरता बैठा है। गुंडागर्दी वह करता है, लोगों की लड़कियाँ वह उठवाता है, डाके वह डलवाता है, यहाँ तक कि चीफ मिनिस्टर के लडक़े को ही अगवा करवा दिया और तीन लाख वसूल करके वापस छोड़ा...राजस्थान की विधान सभा की चाबी उसके हाथ में है। जिसे चाहे बनाए, जिसे चाहे बिगाड़े—उसको तुम छू भी सकते हो? बनाने को कमेटियाँ तुम चाहे कितनी बना लो—स्टेटमेंट चाहे कितने दे दो—कीमतें क्या कमेटियाँ और स्टेटमेंटों से गिरती हैं? अनाज क्या काग़ज़ों और भाषणों से पैदा
होता है? हम तो कहते हैं कि हम रखते हैं अपने गोदामों में, बनिए हैं, इसलिए नफे पर बेचते हैं, तुम आओ भरे बाज़ार में बनिए बनकर और हमारे कम्पीटीशन में बेचो।




‘ये लोग चिल्लाते हैं को-आपरेटिव, को-आपरेटिव। यही साझेदारी की भावना है लोगों में जो को-आपरेटिव कामयाब होंगे? को-आपरेटिव बनते हैं दस दिन मुनाफा कमाने के लिए—उस वक़्त जब किसी चीज़ की किल्लत होती है। माल बाज़ार में आते ही को-आपरेटिव नदारद हो जाते हैं। यह है तुम्हारी को-आपरेटिव योजना। कि जो चीज़ प्राइवेट व्यापारी छ: रुपये क्विंटल ढोकर यहाँ से महाराष्ट्र पहुँचा सकते हैं, उसके लिए तुम किसी अपने गुरगे के को-आपरेटिव को ओबलाइज करने के लिए चौदह रुपये क्विंटल में ठेका दे देते हो?



‘यह मुल्क है जहाँ गन्दम और चावल तक लोगों को आसानी से मयस्सर नहीं, उस दिन एक अमरीकन कह रहा था कि चिकन को तो वे लोग रफ फूड समझते हैं। कहते हैं अंडा-मुर्गा
भी कोई खाने की चीज़ है? एक डबलरोटी के बराबर वहाँ एक मुर्गे की कीमत होती है। वे खाते हैं स्टीक जिसमें अच्छी गिज़ा की सभी खासियतें मिली रहती हैं, जो कि प्योर और मेडिकेटिड फूड होता है। वहाँ भी है को-आपरेटिव मगर किस काम के लिए? फसलों को कीड़े से, चिडिय़ों से बचाने के लिए। ज़रूरत हुई, तो हज़ारों मीलों में को-आपरेटिव से दवाइयाँ छिडक़वा लीं, बुलडोज़र मँगवाकर मीलों में जमी बर्फ तुड़वा ली कि वह पिघलकर सिंचाई के लिए पानी बन जाए। को-आपरेटिव की भी एक मोरेलिटी होती है। यहाँ है कोई भी मोरेलिटी तुम लोगों में—सिवाय इसके कि अगली
इलेक्शन के लिए जो दस-बीस-पचास लाख रुपया चाहिए, वह कैसे और किससे हासिल करो?’’


      मोहन राकेश की डायरी के इन अंशों को पढ़कर पता चलता है कि हमारे लेखकों, बुद्धिजिवियों के बीच उस वक्त की निजी बातचीत किस तरह की होती थी, उनके लेखन के लिये कच्चा मैटेरियल कहां से मिलता था, उनके सोचने समझने की दिशा किस ओर थी।

   अभी यहीं उपर लिखी इन पंक्तियों को ही देखिये कि, किस तरह बातें बढ़ती कीमतों पर चल रहीं थीं कि फिर वह राजनीतिक बहस में तब्दील होते हुए कोऑपरेटिव मूवमेंट की ओर मुड़ गयी। अचरज होता है कि 1964 में कही गई ये बातें 2011 में भी जस की तस अपने कहे को पत्थर की लकीर की तरह साबित करती हैं।  महसूस होता है कि 1964 से लेकर 2011 तक दुनिया चाहे जितनी भी बदल गई हो, पेट की भूख आज भी शाश्वत सत्य है और उसी के साथ सत्य है भ्रष्टाचार, महंगाई, जमाखोरी, जिसके कि हाल फिलहाल दूर होने की कहीं से भी सूरत नज़र नहीं आ रही।


- सतीश पंचम

स्थान -    बम्बई,    जिसके लिये मोहन राकेश अपनी डायरी में लिखते हैं कि -

बम्बई...?

बहुत उलझन होती है अपने से। सामने के आदमी का कुछ ऐसा नक्शा उतरता है दिमाग़ में कि दिमाग़ बिल्कुल उसी जैसा हो जाता है। दूसरा शराफत से बात करे, तो बहुत शरीफ़। बदमाशी से बात करे, तो बहुत बदमाश। हँसनेवाले के सामने हँसोड़। नकचढ़े के सामने नकचढ़ा। जैसे अपना तो कोई व्यक्तित्व ही नहीं। जैसे मैं आदमी नहीं, एक लेंस हूँ जिसमें सिर्फ़ दूसरों की आकृतियाँ देखी जा सकती हैं। कभी जब तीन-चार आदमी सामने होते हैं, तो डबल-ट्रिपल एक्सपोज़र होता है। अपनी हालत अच्छे-खासे मोंताज की हो जाती है।


समय - वही, जब चाय की दुकान में बैठा शख्स कहता है - बनाने को कमेटियाँ तुम चाहे कितनी बना लो—स्टेटमेंट चाहे कितने दे दो—कीमतें क्या कमेटियाँ और स्टेटमेंटों से गिरती हैं? अनाज क्या काग़ज़ों और भाषणों से पैदा होता है?

 और तभी चायवाला कहे - साब, चाय पी लिया तो खुरची खाली करो.....दूसरा गिराइक लोक को बैठना मांगता  :)

Monday, January 17, 2011

अरे, तुम भी ?

      शायद आप सबने दुष्यंत कुमार की इस कविता मत कहो आकाश में ..... पहले भी पढ़ा हो। लेकिन मुझे महसूस हो रहा है कि आज इसे सफ़ेद घर पर प्रस्तुत करना जरूरी है।  अभी जो हाल ही में बमचक मची, छीछालेदर हुई चाहे वह मानसिक रूप से हो, वैचारिक स्तर पर हो या किसी मतभिन्नता की वजह से, यह कविता अपने आप में वह बात रखती है जिसे मेरा मन कहना चाहता है। जिसे मैं दिली तौर पर महसूस कर रहा हूं। 

    क्योंकि मुझे लग रहा है कि शायद नरम झूठ सुनने की इतनी आदत पड़ गई है कि कठोर सच सुनते ही आश्चर्य व्यक्त किया जाता है कि -  अरे, तुम भी  ? 

    सो मैं अपनी ओर से और ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा, कोई स्पष्टीकरण नहीं, कोई मत-विमत नहीं.....सिर्फ और सिर्फ दुष्यंत  -   


मत कहो आकाश में कोहरा घना है।
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से ।
क्या करोगे सूर्य का,  क्या देखना है ।

इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है ।
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।

पक्ष औ प्रतिपक्ष संसद में मुखर है ।
बात इतनी है कि कोई पुल बना है ।

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है ।
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था।
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।

दोस्तो अब मंच पर सुविधा नहीं है ।
आजकल नैपथ्य में संभावना है ।

- दुष्यंत कुमार


Saturday, January 15, 2011

विशेष मानसिकता का दोहन....बजरिये कप, टी शर्ट, कार और ..... कस्टमाइज्ड पोस्टल स्टैंप से भी :)

      हाल ही में CNBC चैनल पर खबर देखा कि Indian Postal Department ने  पर्सनलाईज्ड स्टैंम्प की कवायद शुरू करी है। पर्सनलाइज्ड स्टैंप से तात्पर्य लोग अपनी तस्वीरों वाले डाक टिकट पैसे  देकर बनवा सकते हैं और उसे पत्रों आदि पर इस्तेमाल कर सकते हैं। इस तरह के Personalised Stamps के पीछे डाक विभाग की सोच है कि ऐसे लोगों की मानसिकता का दोहन किया जाय जोकि हर किसी चीज को कस्टमाइज्ड तरीके से चाहते हैं और उसके लिये पे करने को भी तैयार हैं। 

      खबर देखकर मुझे अपने कई मित्रों की याद हो आई जोकि हर चीज में अपने आप को ही देखते हैं, उनके चाय के मग को देखिये तो उस पर उनकी या उनके बेटे की तस्वीर होगी, टी शर्ट पर देखिये तो वहां भी कोई तस्वीर वगैरह चस्पां होगी। मैं इसे गलत नहीं मानता, बाकी चीजों की तरह यह भी एक किस्म का शौक है, सनक है, एक तरह की चाह है। लेकिन लगता है कि हम लोग इस तरह के मैं ही  मैं  में  कुछ ज्यादा ही. 
 'मैं-नुमा' हो गये हैं।  

     मुझे अपने छात्र जीवन का एक वाकया याद आता है।  मेरे हिंदी के शिक्षक श्री एम पी सिंह जी की क्लास चल रही थी और एक छात्र (नाम याद नहीं आ रहा) हिंदी की क्लास में मस्ती करते हुए आस पास के छात्रों के किताब, कंपास आदि पर अपना नाम लिखे जा रहा था।  इधर वह किताब में फीं फीं करते हुए दबी हंसी के साथ नाम लिखता, दूसरा उससे तेरी तूरी करते हुए झगड़ता, इसी छीना झपटी में क्लास डिस्टर्ब हो रही थी।   एम पी सिंह जी ने बोर्ड पर लिखते लिखते कनखियों से देखा और सीधे जाकर उस छात्र के पास खड़े हो गये। सभी चुप।  

   बता दूं कि  मेरे हिंदी के शिक्षक श्री एम पी सिंह जी कभी किसी छात्र को मारते नहीं थे। कभी मारना भी पड़ गया तो केवल कान उमेठते थे हल्के से। छात्रों पर काबू करने का उनका जरिया होता था एक दो पंक्तियों का उनका सरल व्यंग्य इतना सरल कि हम बच्चे समझ जांय। 

 पूछा  - क्या हो रहा था ?

 एक ने बताया कि सर, ये मस्ती कर रहा था। हम लोगों के किताबों पर अपना नाम लिख रहा था। 

    किताबें खोलकर दिखाई गईं। शिक्षक महोदय ने किताबों पर उसका नाम लिखे देखा और मुस्कराते हुए बोर्ड की तरफ बढ़ गये। कक्षा चुप। पिन ड्राप साइलेंस। 

 अपनी गंभीर आवाज में बोले  - अपना नाम हर जगह लिखा होना बहुत अच्छा लगता है,  नहीं ? यहां भी मेरा नाम, वहां भी मेरा नाम, इत मेरा नाम, उत मेरा नाम। 

      ऐसा करो कि आज से आप लोग सुबह उठते ही अपना नाम जपना शुरू करो। शीशे के सामने खड़े हो जाया करो और बोलना शुरू   करो - 


          अजय....अजय....अजय......रमेश....रमेश...रमेश......वीणा...वीणा.......गीता....गीता......  आप लोगों को बहुत अच्छा लगेगा........... नहीं ? 

   लोग दूसरों का नाम जपते हैं अपने इष्टदेव राम, वाहेगुरू का नाम जपते हैं महान लोगों के नाम जपते हैं...... आप अपना नाम जपो...... देखो....एक बार करके देखो तो। 

     उसके बाद जिस छात्र ने मस्ती की थी वह तो शांत ही हो गया बाकी लोग भी चुपचाप लेक्चर पर ध्यान देने लगे। एम पी सिंह जी की यही तकनीक थी। गलती एक करेगा लेकिन संबोधन पूरी क्लास को होगा वह भी व्यंग्य बाण के साथ ताकि अगला सावधान हो जाय। 

       इस घटना को यहां लिखने का विशेष कारण यह है कि डाक विभाग की Personalised मानसिकता दोहन स्कीम मुझे  एम पी सिंह जी की खुद का नाम जपे जाने की स्कीम की तरह लग रही है। अब तक केवल बड़ी हस्तीयों के ही चित्र आदि छपते थे डाक टिकटों पर, उनके जन्मशती या कि किसी विशेष घटना आदि के यादगार के तौर पर। लेकिन आगे सब लोग अपना चित्र डाक टिकटों पर देख पाएंगे, देख देखकर प्रसन्न होंगे।  

     फिलहाल तो विदेशों में कई सरकारों के यहां Personalised Stamps का चलन है। लोग पैसे देकर अपनी तस्वीरें स्टैंम्प पर छपवाते भी हैं। अभी कुछ साल पहले एक खबर पढ़ा था कि किसी फिल्मी हीरो के नाम पर एक विदेशी सरकार ने डाक टिकट जारी किया है। यहां की मीडिया में खूब प्रचारित किया गया, लेकिन बाद में पता चला कि अरे वहां तो कोई भी पैसे देकर सरकारी छापेखाने से अपनी तस्वीरों वाले स्टैंप जारी करवा सकता है। ये तो हमारे मीडिया भाई बंधु लोग थे जो भारतीयों में पब्लिसिटी स्टंट के जरिये प्रचारित कर रहे थे कि फलां हीरो इतना महान है कि उसे विदेशी सरकार ने सम्मानित करते हुए उसके नाम स्टैंप जारी किया है। 

     खैर, स्टैंप वगैरह की स्कीम जब आएगी तब आएगी। अभी तो कई सारे साफ्टवेयर इस तरह की सुविधा देते हैं कि आप अपनी तस्वीरें स्टैंप के तरह की छाप सकते हो। नेट पर भी ढेर सारी साइट्स दिखीं जहां पर कि आप अपने नाम का कस्टमाइज्ड स्टैंप बनवा सकते हो। केवल फोटो अपलोड करने और पेमेंट देने की देर है।  

    इसी चुहल में मैंने अपने गाँव के एक बुजुर्ग शख्स की तस्वीर को एक साइट पर अपलोड किया। प्रिव्यू में तस्वीर स्टैंप वगैरह के साथ दिखने लगा। Next Step के दौरान साइट से पैसे मांगे जाने लगे तो मैने एक शरारत की। तस्वीर जहां प्रिव्यू दिखा रहा था उस पेज का स्क्रीन शॉट ले लिया और पिकासा में जाकर क्रॉप कर दिया। बदले में आई ये स्टैंप वाली तस्वीर जो बगल में लगी है :)

   यहीं ब्लॉगजगत में देखता हूं तो लोगों को अपनी तस्वीरें डिफरेंट डिफरेंट पोज़ में अपनी पोस्टों पर दिखाते  है। किसी से बतियाते हुए, बैगपैक टांगे हुए, कहीं जाते हुए, गंभीर दिखते हुए, सोचते हुए, सोते हुए, खंखारते हुए, मेरी तरह नहाते हुए भी :) 

       ऐसे लोगों के लिये ये गोल्डन चांस है कि स्टैंप पर अपनी तस्वीरें लगा लें।  यार मित्रों को भी दिखायें। बतायें कि मैं कैसा लगता हूं इस तरह के पोज़ में..... ब्लॉगजगत में तो सब देख ही चुके हैं कुछ नाते रिश्तेदारों को भी दिखाएं। वैसे भी मुझे लगता है कि जो लोग इस तरह से अपनी पोस्टों में विभिन्न विभिन्न पोज़ में अपनी तस्वीरें लगाते हैं वह अपनी अधूरी इच्छाओं को ब्लॉगजगत में पूरा करते हैं। संभवत: जवानी में उनकी इच्छा मॉडलिंग आदि में में जाने की हो लेकिन तब वह इच्छा पूरी नहीं कर पायें .....अब जाकर ब्लॉगिंग में वह साध पूरी कर रहे हों  :) 

       तो भई, अभिव्यक्ति के इसी संसार में लोग अपनी मॉडलिंग की इच्छा भी पूरी कर ले रहे हैं। कुछ मेरी तरह के हैं कि ब्लॉगिंग के जरिये अपने  फोटोग्राफी का भी शौक पूरा कर ले रहे हैं ।  नेट पर ढेर सारे फोटोग्राफी वाले ब्लॉग देखता हूं जहां पर कि केवल तस्वीरें ही तस्वीरें हैं। एक से बढ़कर एक। प्रकृति की, जीवन की, मुश्किलों की, विषय आधारित....ढेरों। मैं भी चाहता था कि अपने द्वारा खिंची गई प्रकृति, पर्यावर, खेत खलिहान, कीट- पतंगों, कोटर, मेंढक, चरखी, फूल आदि की तस्वीरों के लिये अलग ब्लॉग बनाउं लेकिन एक इस सफ़ेद घर ब्लॉग को ही संभालना बड़ी मुश्किल से हो पाता है, समय नहीं मिल पाता तो दूसरे ब्लॉग को कहां समय दे पाउंगा। इसलिये जो है सो यहीं है। धीरे धीरे विषयों के साथ, पोस्टों के साथ  एक- एक चित्र का अपलोड चलते रहेगा। कभी किसी विषय पर तो कभी किसी विषय पर। मेरे लिये गुगल के ब्लॉगर प्लेटफार्म का एक उपयोग यह भी सही..... मेरे कीट पतंगों को, कोटर वाले जीवों को नेट पर जगह तो मिल रही है  :)  

     और हां, जिस किसी को मॉडलिंग का शौक हो तो डाक विभाग से जरूर संपर्क करें । Personalised Stamps के लिये Indian Postal department ऐसे लोगों की आतुर निगाहों से बाट जोह रहा है  :)

 देखना चाहता हूं कि कितने लोग इतने महान हैं कि डाक विभाग उनके नाम से डाक टिकट तक जारी कर रहा है :)

 - सतीश पंचम 


Friday, January 14, 2011

एक बानगी ऐसी भी...... खोइया .... पुलुई ...... रस ...

    मित्रो, पहले भी सफ़ेद घर पर आप सबने डॉ. विवेकी राय जी को पढ़ा है, सराहा है। ग्रामीण लेखन के इस अद्भुत चितेरे की ही कृति है 'सर्कस' जिसमें कि उनकी एक शानदार रचना है 'तू क्यों सोया' ?

   उद्यम और आलस्य के बीच पनपे भावों को एक खेत के आसपास के माहौल से परिचय कराता उनका यह लेख जीवन के कई बिंदुओं से साक्षात्कार कराता है। 

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        निस्संदेह वह एक कुत्ता था। आराम से सोया था। किकुरकर पैरों और मुँह को इस प्रकार समेट लिया था कि गोल पत्थर के भूरे पिंड की भाँति लक्षित होता था। ऐसा कसा हुआ मांसल शरीर होना प्रमाण था कि आवारा नहीं था; लेकिन सदगृहस्थ होकर इस प्रकार बेतुके सोया क्यों था ? आधा शरीर तो खोइया में ढक गया था। अभी और भी ढक सकता था, क्योंकि ईख पेरने का काम जारी था। बिजली का कोल्हू घड़र-घर-घड़र-घर कर चल रहा था। यह आवाज इतनी कर्कश और भारी थी कि आस-पास किसी का कुछ बोलना सुनाई नहीं पड़ रहा था। लोग इशारों से अथवा चिल्लाकर बात करते थे। कभी-कभी यह चिल्लाहट तीखी चीख बन जाती। आश्चर्य ! कुत्ते की नींद तब भी नहीं टूटती। वह एकदम हिल-डुल नहीं रहा था। कभी-कभी भ्रम होता, मर तो नहीं गया है ? क्यों जैसे कहीं से साँस चलने और शरीर के किसी मध्य भाग के आहिस्ता आहिस्ता उठने गिरने के लक्षण भी नहीं मिल रहे हैं ? किंतु कुत्ता मरा नहीं था। मरे की चमक और भाँति की होती है और जीते की चमक और भाँति की। गाँव को ही हम लोग झटके में कह देते हैं - 'गाँव मर गया' । किंतु यहाँ बैठकर अनुभव किया जा सकता है कि गाँव मरा नहीं है। वह पूर्णत: जीवित है। यांत्रिक सभ्यता की संपूर्ण ग्रामीण हलचलों और उपलब्धियों के बीच, उसके शोर-शराबे के बीच वह इस कुत्ते की भाँति अभावों की खोइया पर सिर्फ सो गया है।

  चलो मिठास तोड़ें :)
  
      बेशक यहाँ शोर बहुत है। एक तो मशीन दोहरा काम कर रही है। एक ओर ईख पेरने का 'करासर' चल रहा है, दूसरी ओर अलग फीते पर धान कूटने का 'हालर' चल रहा है। इधर मीठा-मीठा रस गिर रहा है, उधर कन-भूसी में भी अपनी चमक छोड़ता उजला-उजला मंसूरी धान का चावल। भीतर घर में आटा पीसने की चक्की है, कहीं एक फीता और लगा उसे भी एक साथ चालू कर दें तो और बने। तब कितनी हलचल बढ़ जाएगी ? अभी तो चावल और ईख का मोर्चा ही कितने हाथों के सहयोग से सँभल रहा है। कठिन है ईख का मोर्चा। खेत में खड़ी ईख गुड़ की भेली आसानी से नहीं बन जाती है। तैयार होने तक परेशानी की बात छोड़ो। अभी इसी वक्त कितने प्राणी जुटे हैं। एक आदमी ईख को मशीन में लगा रहा है और एक ला-लाकर उसके पास रख रहा है। यह ईख ढोनेवाला आदमी एक साधारण निकर और सेंडो बनियान पहने है और सहज भाव से जाड़े को चुनौती दे रहा है। इधर मोटे-मोटे ऊन, कोट औऱ स्वेटर में भी हालत खराब है। शीत-लहरी के तमाचे बीस पड़ रहे हैं। बीच में धरहरी करनेवाला घाम नाकाम साबित हो रहा है। पूस का घाम फूस जैसा। तिस पर भी कुहरे की धुंध है। सबकुछ ठंडा है। गरमी बस एक चीज की है, धुआँधार चल रहे कार्य की।
मेरे गाँव के ही एक बुजुर्ग

     देखा, अस्सी के लगभग बूढ़े मालिक साहब धीरे-धीरे ठेंगुरी टेकते घर से यहाँ नलकूप तक आ गए। जहाँ मशीन चल रही है वहाँ न जाकर वे सीधे खेत में पहुँचे। उनका बड़ा पोता ताबड़तोड़ गँड़ासी चला रहा है और कटी ईख को बाएँ हाथ से एक जगह इकट्ठा करता जा रहा है। यह पास के एख इंटर कॉलेज में अध्यापक है। घड़ी हाथ में है। जब-तब उसे देख लेता है। पौने नौ बजते ही वह काम छोड़कर नहा-खा साइकिल उठा भगेगा। उससे छोटे उसके दो भाई भी स्कूल का वक्त होने तक ईख छील रहे हैं। पत्ती अलग, गेंड़ा अलग। गेंड़ा अर्थात ऊपरवाली पुलुई का रसहीन भाग घर जाएगा और उत्तम कोटि के चारे का काम करेगा। पत्ती एकत्र होकर बोझ बना खेत में छोड़ दी जाएगी। जेठ-असाढ़ में सोने के भाव बिकेगी। कहता है बुढ़वा मालिक, जितने रूपए की खाद खेत में लगी वह पैसा तो ईख की पत्ती से आ जाएगा और रस पकनेवाले कड़ाहे की आग में क्या झोंकेंगे ? उसके लिए खोइया है। हाँ, बेकार खोइया और किस काम आएगी ? खोइया माने सीठी।

     खोइया, जिसका सारा रस निचुड़ गया, जो कठिन चक्रों में चँप, अति क्षीण, लुजलुज और अशक्त हो गई, जो ढीली-ढीली होकर बे-पहचान हो गई, भरे-भरे की तगड़ी जवान चमक छोड़ जो सफेद पड़ गई, जिसका पोर-पोर छितरा गया, जो बेकार सी, उपेक्षित और धूर-कतवार जैसी नीसठ ठठरी मात्र रह गई और जिसे मशीन के पिछवारे बारंबार हटा दिया जाता है, टाल दिया जाता है। वह छितरा जाए, पसर जाए, कुचल जाए, परवाह नहीं। परवाह ईख की होगी, खोइया को कौन पूछता है। खोइया तो पूरे माल का मल है, बेकार चीज, किसी काम की नहीं। बैठे उस पर कुत्ता ! या सोए भी।

      पर बूढ़े बाबा कहते हैं, खोइया चूल्हे में झोंक उस ईख के खर-पात को बचा लेंगे जो समय पर नोट बन जाएगा तो कुछ सोचना पड़ता है। अभी-अभी देखा, बूढ़ा बाबा सीधे खेत में जा ईख छीलने में जुट गया। ठीक वैसे ही जैसे बे-काम सी खोइया चूल्हे की आग बन जाती है। ईख की खोइया और परिवार का बूढ़ा दोनों में कितनी समानता है। किसान-जीवन के कसे कर्म चक्र में कोई चीज बेकार नहीं है। बेकार अगर है तो यह परंपरित किसान जमात। सामूहिक रूप से यह ऊपर उठ नहीं पाती है। इस जमात की खोइया आग नहीं बन पाती। समय की आँधी में सबकुछ उड़ता जाता है और किसान की जड़ता नहीं टूटती है। इन भाग्यवादी जड़ परंपराभोगियों के बीच जब कोई उद्यमी परिवार उकसता है और कहीं नलकूप जैसी जगह पर जीवन जगता है तो लोग तमाशा देखते हैं। कहते हैं, विधाता ने खूब दिया है।

   हाँ, खूब दिया है। एक अदद परिवार में जो अति बूढ़ा है, वह ईख छीलने के लिए खड़ा हो जाता है। एक उत्साहप्रद वातावरण बनता है। दो-चार ईख छीलकर बोझ-दो बोझ क्या, खेत के खेत ईख छील देने की शक्ति अपने पीछे खड़ी नवछटिया कतार में भर देता है। शक्ति जहाँ खुलकर उपयोगिता बनती जाती है, कितना अच्छा लगता है। यहाँ मशीन की शक्ति आदमी की शक्ति है, जाग्रत शक्ति है, स्वत:स्फूर्त शक्ति है, पूस के हाड़-सिकोड़ प्रभात में उपटी शक्ति है। गाँव के भीतर आलसी किसान जब कि कउड़ पर गप्पों के गुच्छे तोड़ रहे होंगे, यहाँ गाँव के बाहर मशीन के साथ मशीन बना एक पूरा परिवार पिछड़ेपन के बंजर को तोड़ रहा है। यहाँ कहाँ है आलस ? यहाँ जीवन जगा है।
     
    शायद कुछ समय के लिये आलस का प्रतिनिधि बनकर यह कुत्ता खोइया पर सोया है; लेकिन जहाँ निरालस-भाव इतना सक्रिय, सक्षम, चुस्त-दुरूस्त और सजग है, क्या आलस ठहर पाएगा ? यहाँ भी यही हुआ। मैं वह घटना भी लिख लूँ ।
 
तस्वीर कहां की है नहीं पता....बस खींच लिया था ....कुछ साल पहले

    मैंने बताया न, बूढ़े का एक पोता एकदम नंगे बदन ईख ढो रहा है। सो मास्टर साहब के स्कूल चले जाने के  बाद वह दोहरे काम में जुट गया। दोहरा क्यों, तेहरा काम कि खड़े होकर ईख छील रहा है; मशीन के पास ईख कम पड़ जाती है तो झपटकर छीली गई ईख को रख आता है और फिर जब-तब मशीन के पीछे खोइया, जो एक स्थान पर अधिक एकत्र हो जाती है तो उसे पैरों से झटका देकर टार देता है। ऐसे ही एक मौके पर जब वह खोइया टारने के लिए मशीन के पीछे गया तो कुत्ते से भिड़ंत हो गई।

    क्यों भिड़ंत हुई ? क्या लड़का ईर्ष्या कर रहा है कि मेरी तरह यह क्यों जाड़े को चुनौती दे खुले में खोइया पर सोया है ? लड़के में तो परिवेश के जीवंत कर्म-प्रवाह की गरमी है, कुत्ते में क्या है ? कुत्ते में ठीक उलटे आलस है। लड़का आलस को क्यों टिकने देगा ? मन में एक मौज आ गई। पहले उसने कुत्ते के ऊपर पड़ी खोइया को हटाया, फिर धब्ब से एक धमाका हाथ से लगाकर जगाया। देखा, जगता नहीं है तो उसे उलाट दिया। कुत्ता उलटकर नई जगह पर फिर से किकुरकर वैसे ही पड़ा रहा। वाह रे आलस !
लड़का मुसकरा उठा। मुझे लगा, कुत्ता कठुआ गया है। कहीं मर तो नहीं गया है ?
मेरे खेत.... 

      अब लड़के ने उसे दोनों हाथों से आगे-पीछे मजबूत पकड़ में जकड़ उठा लिया। अरे, यह क्या करेगा ? और देखते-देखते उसने उसे जैसे हवा में उछाल दिया। फिर क्या हुआ ? बिजली जैसी तेजी से कुत्ता उछाल से उछलकर कान फटफटा मटर के खेत की ओर भगा....भगा.....भगा एकदम सरपट । और कुछ दूर जाकर तगड़ी आवाज के साथ लाइन पर आ गया - भूँ.......भूँ......भौं......भौं.....

-  विवेकी राय

पुस्तकांश – 'तू क्यों सोया' ?
साभार प्रस्तुति 'सर्कस' (कहानी संग्रह)
प्रकाशक - ग्रंथ अकादमी, दरियागंज, नई दिल्ली 
मूल्य - 125 /-          



प्रस्तुति - सतीश पंचम

स्थान - वही, जहां पर गन्ना जूस के दुकानों की खोइया, पुलुई कचरे में फेंकी जाती है।

समय - 'ईख चूसने'  वाला ।

Saturday, January 8, 2011

एक गँवई हकीकत यह भी............सतीश पंचम


        हाल ही में खबर पढ़ने को मिली कि केरल में चुनी गई महिला प्रधानों के पतियों के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया ताकि उन्हें अपने पत्नी के द्वारा किये जाने वाले सामाजिक कार्यों में सहुलियत हो सके, उनकी पत्नियों को खुलकर लोगों से मिलने जुलने का मौका मिल सके। इसी के साथ यह भी कोशिश की गई कि जब महिलाएं किसी सामाजिक कार्यों के दौरान बाहर हों तो उनके पति कैसे बिहेव करें, कैसे इन सब बातों का निर्वाह करें। 

  मुझे यह खबर देखकर मेरे गाँव में हुए पंचायत चुनावों का दृश्य याद आ गया जिसमें कि तमाम पोस्टरों में महिला प्रत्याक्षी के साथ ही अलग से उनके पति का भी नाम चस्पा था। यह एक तरह से जमीनी हालात की हकीकत बयां कर रहा था कि महिला आरक्षण माने क्या होता है, उसका यथार्थ क्या है। 

 मैंने जितने भी पोस्टर महिला प्रत्याक्षियों के देखे थे सब में उनके पतियों के नाम अलग से लिख दिये गये थे। कोई पोस्टर बिना पति के नाम वाला नहीं दिखा। एक पोस्टर में महिला प्रत्याक्षी के बेटे का नाम लिखा गया था। यानि कुल मिलाकर पिता और बेटे के नाम से ही महिलाओ की लाकतांत्रिक गाड़ी सरक सकती है ऐसा परिदृश्य उपस्थित होता दिखा। 

 उधर संसद  में महिलाओं के लिये आरक्षण की मांग इतनी जोर शोर से की गई कि बहस मुबाहिसों से संसद के पलस्तर तक झड़ कर गिरने लगे लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात.......वैसे अरहर के भी अक्सर तीन पात ही होते हैं, बेचारा ढाक ही क्यों बदनाम है रब्ब जाणे :)  

   आप तो इन पोस्टरों का लुत्फ उठाइये,  साथ ही कुछ अन्य तस्वीरें उसी सामाजिक ताने बाने को बताते हुए  :)



आरक्षित सीटें.....बस नाम ही काफी है......




क्या मस्त चुनाव चिन्ह है...........घुड़सवार


चुनाव चिन्ह - पेड़......hmm..... फल बेटा न खाएगा तो कौन खाएगा

चुनाव चिन्ह....... कैंची ??

'पर कातर'.....अरे नहीं  ..... 'पर दुख कातर'   :)



एक हकीकत यह भी...... कब्जे में है सुगन  और  T-Shirt पर लिखा है  Boss 



पिया तुम जाओ प्रधानी करने.....मैं चली रोटी बनाने........


       - सतीश पंचम

Friday, January 7, 2011

जब अपनी दबंगई भूल कर मुझे भागना पड़ा था......सतीश पंचम

         हमारे जीवन में कई बार ऐसी घटनाएं हो जाती है कि हम अपनी सारी दबंगई भूल कर भाग खड़े होते हैं। मैं भी भाग खड़ा हुआ था अबकी, जब गाँव गया था। हुआ यूँ कि गाँव में मेरी एक भैंस है जिसे कि हमेशा पिताजी ही चारा, सानी-पानी देते हैं। दूसरे किसी को अपने करीब आने नहीं देती।  कोई उसके करीब जाय तो सिंगों के जरिए मारने का इशारा करती है। 

     उसके नखरे देखकर मैं भी उसके पास जाने से बचता  हूँ ।  नांद में पानी वगैरह डालने के लिये बाल्टी भर पानी जरूर लेकर जाता था। नांद से कुछ  दूर पानी भरी बाल्टी रख देता, पिताजी उस बाल्टी को उठाकर वही नांद में पलट देते। साथ ही चोकर या दर्रा आदि भी भूसे में मिला देते। बता दूं कि दर्रा से तात्पर्य दालों की दराई से बने दरदरे अन्न से है जिसमें कि दाल का छिलका और उसके अंश मिलकर पशुओं के लिये एक तरह का ललचहा भोजन का काम करते है। 
 
      इसा बात को ऐसे समझा जा सकता है कि केवल भूसे और पानी से बना भोजन पशु भी नहीं पसंद करते। उन्हें भी हम मनुष्यों की तरह किसी घी जैसी चीज मिले तो ही वह मन से भोजन करते हैं अन्यथा पशु भी बगावत कर देते हैं। कुछ पशु तो दर्रा आदि न मिलने पर पूरी नांद को ही उलट पलट देते हैं, फोड़ देते हैं और कुछ पगहा तुड़ाकर इधर उधर हरियर खेत में मुँह मारने चले जाते हैं। फसलों का नुकसान होता है सो अलग। ऐसे में अक्सर गाँव के लोगो के मुँह से जो पहली भावनात्मक शब्द निकलते हैं वह होते हैं -  ई छिनरिया अउरौ ........यानि कि यह छिनाल तो और..... शुचितावादी पाठकगण,  यहां छिनाल शब्द पढ़कर धीर गंभीर न हों, क्योंकि गँवईं बोलचाल में इस शब्द का प्रचलन आम बात है, और संभवत: ठीक भी है। जो पशु अपने नांद को छोड़ इधर उधर मुँह मारे उसे और किस शब्द से नवाजा जाय भला  :)  

        हाँ,  तो नवंबर की गुनगुनी धूप का छत पर बैठा मैं आनंद ले रहा था कि किसी ने बताया कि मेरी भैंस ने खूँटा उखाड़ लिया है और फलाने के खेत में मुँह मार रही है। मैं थोड़ा आशंकित हुआ। एक तो पिताजी भी घर में नहीं थे, दूसरे किसी और को वो करीब आने नहीं देती थी। हुई मुसीबत।  भैंस के पास जाकर उसकी जंजीर को सावधानी से पकड़ कर नांद की ओर खींचना चाहा लेकिन वह टस से मस नहीं हो रही थी। चर्र...चर्र सामने खेतों में उगी बरसीम को लगातार चरे जा रही थी। अब भला उस हरे बरसीम के बजाय वह मेरे सूखे भूसे को याद करती ? सो चरती रही। मैं समझ नहीं पा रहा था कि इसे कैसे काबू में करूं। 
मउनी   

      तभी मैने एक उपाय सोचा। दर्रे से भरी एक छोटी मउनी  (सरपत से बना  Bowl ) को लेकर  भैस के सामने थोड़ी दूरी पर जा खड़ा हुआ। भैंस अब भी हरी हरी बरसीम चरे जा रही थी। उसे उपर देखने की फुरसत ही नहीं थी। इधर मेरा द्वारा उत्पन्न की जा रही ध्वनि....हुई....का  उस पर असर ही नहीं पड़ रहा था। तब हिम्मत करके उसके गले की सिकड़ी को थोड़ा सा खींचा तो उसने सिंग उठा लिया और हुमक कर मेरी ओर जो लपकी तो मैं पल भर को समझ ही नहीं पाया कि क्या हो गया । और अगले ही पल नजारा कुछ ऐसा था कि मैं आगे आगे भैंस मेरे पीछे पीछे.। बहुत तेज भागा था मैं। मुझे याद नहीं पड़ता कि इससे पहले जिंदगी में मैने कभी इतनी तेज दौड़ लगाई होगी। भैस मेरे पीछे भागी हुई आ रही थी और मैं अब भी सरपट दौड़ा जा रहा था। बेइंतहा रपट उठा था।  भागते हुए  चप्पल कहां छूटी, खूंटा कहां गड़ा कुछ खबर नहीं। भैस मुझे लगातार रपटे हुए थी।  और एक समय वह भी आय़ा कि हाथ में रखा दर्रा भी छूट कर गिर गया। जब जान पर बन आई हो तो क्या दर्रा और क्या फर्रा। 
मुझे दौड़ा देने वाली भैस अपने पाड़ा के साथ
 

     काफी आगे भागने पर लगा कि भैंस शायद अब पीछा नहीं कर रही है। हिम्मत करके भागते भागते भागते ही गर्दन घुमा कर पीछे देखा तो भैस मेरे द्वारा फेंके गये उस दर्रे को खा रही है, जीभ निकाल कर चाट चूट रही है और आसपास के घरों से लोग निकल निकल कर मेरे इस दौड़म भाग का मजा उठा रहे हैं। मेरी साँसे अब भी उखड़ी हुई थीं, हाँफा छूट गया था। एक पेड़ के पास खडा हो सुस्ताने लगा तब तक चाचाजी मेरी हालत पर हंसते हुए करीब आए और बोले - बहुत जीउ गाढ़े में पड़ होए हो कि अब का होगा। 

    मैने भी उखड़ी सांसो से मुस्कराते हुए कहा - ससुरी रपट लिहेस। 

         तब तक और दो चार लोग आ गये। एक ने कहा अरे वो तो तुम्हारे हाथ में रखे उस दर्रे के लिये लपकी थी और तुम समझे कि तुम्हें ही रपट रही है। बताओ, ये भी कोई बात हुई। ऐसा ही होगा तो कर चुके किसानी।  

    मैं मन ही मन सोच रहा था एक तो कम्बख्त ने पचास साठ गज़ की नाहक दौड़ लगवा दी सुबह सुबह और ये लोग हैं कि इनको हंसी ठट्ठा सूझ रही है। फिर खींस निपोरते हुए मैंने अपनी साँसों के नॉरमलीकरण पर ध्यान दिया जो कि अब भी उखड़ी हुई थीं। उधर भैंस थी कि आराम से जुटी हुई थी दर्रा खाने में। 

      अब जब यह संस्मरण लिख रहा हूँ तो सोचता हूँ कि हम बुद्धिजीवी कितना तो सांसारिक विषयों पर अपने ज्वलंत विचार रखते हैं, विनायक सेन, कश्मीर, आतंकवाद पर गरमा गरम बहस करते हैं। कभी कभी बुद्धिजीवी होने का स्वांग रचते हुए एक दूसरे के प्रति हौंकते- फौंकते हैं, एक दूसरे के प्रति विषवमन करते हैं, मैं ये कर दूंगा, मैं वो कर दूंगा और उधर एक भैंस के द्वारा थोड़ा सा भी हड़काने से भाग खड़े होते हैं।  

      इस लिहाज से तो 'अकल बड़ी कि भैंस' वाली उक्ति अपने आप में एक नवीन भाष्य चाहती है.....संभवत: दर्रा दुर्री सहित :)

 
- सतीश पंचम

स्थान - वही जहां पर कि जीविका हेतु  खूँटे से बंधा हूँ :)

समय - वही,  जब टीवी पर बाबा रामदेव अनुलोम विलोम प्राणायाम सिखा रहे हों और तभी खबर फ्लैश हो कि सर्वाधिक ताकतवर माने जाने वाले  भूतपूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश अपने गले में बिस्कुट फंस जाने से बेहोश हो गये हैं  :) 
 

Thursday, January 6, 2011

जब मैं सोनिया गाँधी के लिये भाषण लिखने की कवायद से रूबरू हुआ ............सतीश पंचम

       हाल ही में मुझे सोनिया गाँधी के लिये भाषण लिखना पड़ गया। अरे भई वही सोनिया गाँधी जिनके नाम पर काँग्रेस पार्टी का रूक्का चलता है :)

     दरअसल हुआ यूं कि मेरी बिटिया पूजा के स्कूल में हाल ही में एक फंक्शन था। जिसमें कुछ लड़कियों को राजनेताओं की भूमिका निभानी थी। उन्हीं की तरह बोलना था, उन्हीं की तरह बतियाना था। कोई प्रतियोगिता नहीं, बस एक 'फन एन फेयर टाइप एक्टिवीटी' । सो, स्कूल वालों ने सभी से कुछ न कुछ करने धरने को बांट दिया। किसी को कुछ रोल मिला तो किसी को कुछ।  मेरी बिटिया को सोनिया गाँधी का रोल मिला। उसकी सहेलियों को मायावती, तो किसी को ममता बनर्जी, कोई अहिल्याबाई होल्कर तो किसी को इंद्रा गाँधी । 

    अब  समस्या आई कि भाषण क्या लिखा जाय।  शर्त यह थी कि वह भाषण  तीन-चार पंक्तियों का ही हो ताकि बच्चियों को याद करने में मुश्किल न हो।  स्कूल वालों ने कह तो दिया लेकिन यह नहीं सोचा कि इस तरह तो तीन-चार पंक्तियों में केवल स्वागत  सत्कार टाईप भाषण ही हो पाता है। 

     खैर, मुसीबत मेरी हो गई।  सोनिया गाँधी का भाषण मुझे ही जो लिखना था। इधर सोनिया गाँधी के Snippets कभी कभार न्यूज में तो देखा था लेकिन कभी पूरा भाषण नहीं सुना था कि कैसे शुरूवात करती हैं और कैसे अंत। फिर थोड़ी देर बाद नेट पर सर्च करना शुरू किया तो मिला हाल ही में कांग्रेस के 125 वर्ष पूरे करने पर सोनिया गाँधी द्वारा दिया गया भाषण। लेकिन उस भाषण से लेकर कुछ लिखने की हिम्मत नहीं हुई।  कहीं कोई भाव नहीं, कहीं कोई मन को छूने लायक वक्तव्य नहीं। सब कुछ जैसे प्लास्टिक के पेपर शीट में लपेट कर कहा गया था।  वही घिसे पिटे जुमले जैसे आम आदमी, गरीब, हमारी सरकारी, तुम्हारी सरकार....ब्ला ब्ला ब्ला। 

     मन मारकर  कीबोर्ड पर टाइप करना शुरू किया तो समझ ही नहीं आया कि ऐसा क्या लिखा जाय जिसे सोनिया गाँधी स्टाईल कहा जाय, टिपिकल अंदाज कहा जाय..... मसलन राजीव गाँधी की टिपिकल स्टाईल..... हमें देखना है, हम देखेंगे, हमने देखा......या फिर अतीत में खोया हुआ आडवाणी स्टाईल.....मैं जब उपप्रधानमंत्री था.....मैं जब वहां गया था ...मैंने ऐसा देखा था.........तब मैंने ऐसा कहा था.......वगैरह वगैरह। 

       इस लिहाज से देखा जाय तो सोनिया जी की कोई टिपिकल स्टाईल नहीं है सिवाय बोलने के इतालवी लहजे को छोड़ कर। सो, अब काम और भी मुश्किल हो गया। कुछ पुराने भाषण फिर से नेट पर खंगाले, कुछ यू- टूब , मी- बल्ब तब जाकर एक साग स्टाईल वाला भाषण चंद पंक्तियों का बन पाया। साग स्टाईल माने जिसमें कहीं कोई लटके झटके की गुंजाईश नहीं , न आरोप प्रत्यारोप की चिर्र पिर्र....केवल स्वागत, सत्कार....मिलना जुलना टाईप।  तो मैंने लिखा......साग टाईप भाषण......जिसके बोल थे.....

    मैं सोनिया गाँधी आप सभी लोगों का हार्दिक स्वागत करती हूँ। मैं आप लोगों से ये कहना चाहती हूँ कि हमारी सरकार आम आदमी के लिये है। वह आम आदमी के लिये काम करती थी, करती है, और आगे भी उनके लिये ही काम करती रहेगी। हमारी सरकार ने देश के किसानों और मजदूरों के लिये लाभ के लिये ढेर सारी योजनाएं बनाई हैं। हम चाहते हैं कि वे उनका समुचित लाभ उठायें। हम चाहते हैं कि हमारा देश विज्ञान और तकनीक के मामले में आगे रहे, ताकि लोग सुखी और खुशहाल बनें। 

     अब इस 'साग भाषण' को लिख तो दिया लेकिन असली मुश्किल तब हुई जब बिटिया पूजा के लिये सोनिया गाँधी की तरह दिखने वाली 'बार्डर साड़ी' की जरूरत महसूस हुई। श्रीमती जी से पूछा तो मुझ पर ही त्यौरियां कस उठीं .....लाकर दिये हो कि सिर्फ पूछ ही रहे हो........।

हांय......ये क्या बात हुई। आखिर मैने चुहल करते हुए पूछ ही लिया ...... मतलब अब तक लाई साड़ियां कोई और लाकर दे रहा था क्या ? अजीब बात है, एक तो लाकर दिये जाओ और उपर से बात भी सुनो।  

 वैसे भी साड़ी वगैरह के मामले में मेरा मानना है कि महिलाओं के पास चाहे जितनी साड़ी हो, उन्हें कम ही लगती है। संभवत: पुरूष बिरादरी मेरी इस बात से इत्तफाक भी रखती हों :)

 इधर श्रीमती जी कहने लगीं -  क्या मैं आपको सोनिया गाँधी लगती हूँ जो उन्हीं की तरह की महंगी साड़ी रखूंगी ?

 मैने कहा  हाँ ये भी सही है - सोनिया गाँधी होती तो इस तरह भला तुम किचन में सब्जी काट रही होती ? 
तब ? 

तब क्या अब आस पास ढूँढना पड़ेगा कि किसके घर में सोनिया गाँधी की साड़ी  है। 

        इसके बाद आस पडोस में ढूँढाई शुरू हुई।  साडियां तो खूब मिली पर हर किसी में कोई न कोई पै निकल आता। कोई साड़ी कुछ ज्यादा ही चटक होती तो किसी का बार्डर पतला होता तो कुछ ज्यादा ही फूलदार होती। 
  
      ढूँढते ढूँढते जब थक गये तो श्रीमती जी कहने लगी कि अच्छा होता सोनिया गाँधी की बजाय मायावती का रोल इसे मिला होता। कम से कम साड़ी के लिये तो इतना हम लोगों को ये परेशान नहीं उठानी पड़ती। एक पंजाबी सूट पहनाया, दुपट्टा डाला, हैंडबैग पकड़ाया बस। 
  
   मैंने कहा - वाह, भला ये भी कोई बात हुई कि एक साड़ी न होने की वजह से केन्द्र को छोड़कर राज्य लेवल पर संतुष्ट हो लिया जाय। इतनी गिरावट तो राजनीति में नहीं देखी कभी। और मान लो मायावती का रोल मिल ही गया होता तो वो नोटों का हार कहां से लाओगी जिसे कि उनके गले में पहनाने के बाद ही उनका ड्रेस कोड पूरा होता है ? 

     अभी घर में यह बमचक चल ही रही थी कि तभी बगल से एक आंटी जी के पास उसी तरह की साड़ी मिल गई।  उन्होंने सहर्ष साड़ी और उसी से मैच करता ब्लाउज दे दिया।
     उधर बिटिया ने भाषण रटना छोड़ साड़ी पहनने की कवायद शुरू की। सिर्फ तैयारी होती तो और बात थी, लेकिन यह तो एक तरह का स्पेशल इवेंट सा हो गया। आस पड़ोस की बिटिया के उम्र वाली सखी सहेलियां भी आ पहुँची उसे सोनिया गाँधी बनाने के लिये। इधर चहल पहल के बीच  मैं  चल पड़ा बाजार की ओर कुछ खरीददारी करने।
      लौट कर आया तो देखा बिटिया वही साड़ी पहने हुए सामने शीशे में खुद को देख रही है, सोनिया की तरह दिखने बोलने की एक्टिंग कर रही है। उसे चुपचाप एक नजर कनखियों से देख मैं अंदर किचन की ओर बढ़ लिया, सब्जी वगैरह वहीं किचन के प्लेटफार्म पर रखते हुए लगा कि मेरी उम्र अचानक ही कुछ बढ़ सी गई है। बालों में सफ़ेदी भी कुछ ज्यादा ही हो आई है।
   
     उधर किचन से श्रीमती जी भी बिटिया को देखे जा रहीं थी, मैं भी। अचानक मेरी और श्रीमती जी की नज़रें आपस में मिली और एक तरह का भुनभनाहट वाली 'चुप्पी बतकही' शुरू । किचन के प्लेटफार्म पर रखी सब्जीयों की ओर देखते हुए श्रीमती जी ने कहा -   

  -  सब दिन साठ रूपइया किलो वाला पियाज ही खाते रहोगे कि कुछ जोड़ ओड़ के पइसा-कउड़ी भी जमा रखोगे ?  देख नहीं रहे ...... कांधे से उपर कान तक तो आ पहुँची है बिटिया ।  कुछ साल बाद जिसके दरवाजे देखुआरी करने जाओगे तो वह यह नहीं पूछेगा कि कितना रूपया किलो वाला पियाज खिलाये थे.....पढ़ाई लिखाई के साथ साथ वो यह भी पूछेगा कि कितना गिन कर रखोगे.....तब याद करना अपनी इन महंगी सब्जियों को।

  मैं सुन तो रहा था लेकिन मन कहीं और टंगा था  - ये बेटियां बेटों की बजाय इतनी जल्दी बड़ी कैसे हो जाती हैं ? वही खाना तो लड़के भी खाते हैं वही लड़कियां भी। 
फिर  ?  
  
   उधर बाहर की ओर नज़र दौड़ाया तो बिटिया आईने के सामने खड़ी होकर सोनिया गाँधी के रूखे नकली भाषण की तैयारी कर रही थी जिसमें न रस था न भाव न दुख न खेद।  इधर किचन में मैं सोनिया गाँधी की मम्मी का असली भाषण सुन रहा था - जब किसी के दुआरे जाओगे लड़का देखने......जब पड़ेंगे नोट गिनने.....जब पड़ेंगे फेरे .......। 

 और  मुझे सोनिया गाँधी की मम्मी के इस असल भाषण में वह सब कुछ  मिल रहा था जो कि मेरे लिखे उस नकली भाषण में नहीं था........भाव, सोच, विचार, मनन और कुछ अलहदा किस्म की चिन्ताएं जिनकी कि अक्सर जरूरत पड़ती रहती है  :) 

- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसे कभी अंग्रेजों ने दहेज में दे दिया था।

समय - वही, जब सोनिया जी बाजार से प्याज खरीद रही हों और कृषि मंत्री अपनी ठेला गाड़ी से कहें -  मैडम ज्यादा प्याज खरिदियेगा....अभी कुछ दिन और प्याज का दाम तेज रहने की आशंका है। 

 सुनते ही मनमोहन जी कहें - आज अवैध दुकानों, ठेलों को हटवाने वाले नगर निगम के कर्मचारी नहीं दिख रहे मैडम...... नहीं तो अब तक इसका पूरा ठेला ही उठवा लेता :) 

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 इस पोस्ट को लिखते हुए मुझे  घूघूती जी की एक टिप्पणी याद आ रही है जिसे उन्होंने मेरी एक पोस्ट जिसमें मैंने गाँव देहात की बारात का वर्णन किया था और एक पिता के तौर पर बेटियों की शादी में आने वाली समस्याओं की ओर इशारा किया था, उस पोस्ट पर उन्होंने  टिप्पणी करते हुए लिखा था.....आपने अपने बिटिया के पिता होने पर थोड़ी सी चिन्ता व्यक्त की है। यदि मेरी राय का कोई मूल्य हो तो मैं दो बेटियों की माँ हूँ। न तो चिन्ता की न ही उनके विवाह में कोई समस्या आई, न ही किसी के नखरे सहे। यदि बेटियों को स्वाभिमानी बनाएँगे और उनकी पसन्द के व्यक्ति से विवाह करेंगे तो ऐसी समस्या कम ही सामने आती है।  

  - घुघूती बासूती

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गिरिजेश जी ने एक कविता  सयानी होती बिटिया और एक पिता के मुद्दे पर बहुत सटीक लिखी है। सुधी पाठकों हेतु उस कविता को यहां पेश कर रहा हूँ।  ....... मैं बूढ़ा हो गया 


सुबह सुबह आज 
दाढ़ी बना रहा था। 
थोड़ा सा एकांत देख 
बीवी ने कहा 
सुनते हो, बिटिया सयानी हो गई है 
कहीं बातचीत तो करो ! 

उसी पल 
शीशे में कनपटी के बाल सफेद हो गए। 
चेहरे की झुर्रियाँ उभर कर चिढ़ाने लगी मुँह । 
आँखें धुँधली हो गईं। 
उसी पल 
मैं बूढ़ा हो गया। 
... मेरे भीतर कुछ टूट गया। 
       -   गिरिजेश राव 

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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