सफेद घर में आपका स्वागत है।

Thursday, December 29, 2011

हे सखी.......मांग ले मांगटीका :)

- मेरे पति तो लोकपाल होने जा रहे हैं सखी, अबकी मैं तो उनसे झुमका लूंगी।


- अभी हुए तो नहीं न, जब हो जांय तब जरूर लेना....और  मेरे पति भी कहां लेखपाल होने जा रहे हैं, वो भी तो बड़े.....

- तो तुम क्या लोगी उनसे झुमका कि कंगना ?

- सखी, न तो मैं झुमका लूंगी न कंगना, मैं लूंगी कम्पनी में हिस्सेदारी ।

- सो तो मैं पहले ही ले चुकी हूँ, मेरे पति को मुझ पर इतना विश्वास है कि उन्होंने न सिर्फ अपनी कम्पनी में मुझे हिस्सेदार बनाया बल्कि मेरे रिश्तेदारों की कम्पनी का हिस्सेदार बना दिया सखी।

- तब तो तुम बड़े आनंद से रहती होगी सखी, किसी बात की कमी न होती होगी ?

- अरे कहां, कोई कम्पनी में हिस्सा हो तो चल भी जाय, जब सोलह सत्रह कम्पनीयों में हिस्सेदारी हो तो मुश्किल हो जाती है सखी ।

- हां, सो तो है।

- अच्छा सखी, क्या तुम्हारे पति ने अब तक तुम्हें कहीं कम्पनी में हिस्सेदार नहीं बनाया ?

- कैसे बनाते, पहले इमानदार जो थे ।

- तो क्या वे अब बेईमान हो गये हैं ?

- नहीं, अब उन्हें तुम्हारे लोकपाल पति का डर सताने लगा है सखी ।

- तो क्या हुआ, मैं अपने पति से कहकर तुम्हारे पति को भी लोकपाल बनवा दूंगी ।

- नहीं, अब वे बुढ़ौती में और किसी चीज की चाह नहीं रखते, कह रहे थे कहीं से जुगाड़ लगाकर राज्यपाल बन जाऊं तो बुढ़ौती आराम से राजभवन में कटे। तुम बगइचे में फुलवारी निहारना, मैं गार्डन में छतरी लगाकर उसके नीचे आराम कुरसी पर अखबार पढ़ूंगा, सामने ही प्लेट में अंगूरों के गुच्छे पड़े होंगे, और....

- तो क्या राज्यपाल हो जाने से आराम ही आराम हो जाता है सखी ?

- हां, कुछ ऐसा ही समझो।

- ऐसी सुविधा मेरे लोकपाल पति को क्यों नहीं मिली सखी ?

- वो इसलिये कि तुम्हारे पति का ओहदा संवैधानिक नहीं है सखी जबकि मेरे पति का ओहदा संवैधानिक है

- आग लगे उस कमलहे पार्टी वालन को जो लोकपाल संवैधानिक नहीं होने दिया, हाथ वाले तो जी जान से लगे थे लोकपाल को संवैधानिक करने में, एक बार संवैधानिक हो जाता तो......

- वो देखो तुम्हारे पति आ रहे हैं, अंगूर के गुच्छे लिये हुए..... मैं चलती हूँ।

- कहां हैं अंगूरों के गुच्छे, वो तो फाइलें हैं।

- ध्यान से देखो.....वो फाइलें नहीं, अंगूरों के गुच्छे ही है, आज उनसे तुम कंगना, झुमका, नौलखा हार चाहे जो मांगोगी दे देंगे।

- ऐसा क्यों ?

- क्योंकि अब तक उनकी स्थिति उहापोह वाली थी.....लेकिन अब वे आधिकारिक रूप से असंवैधानिक हो चुके हैं......अंगूरों के गुच्छे भले ही टेबल पर रखी प्लेटों में फबते हों लेकिन फलते हमेशा ऐसे ही 'कलमी ओहदों' पर हैं......आज भले लोग इमानदारी की पकौड़ी छान रहे हों......लेकिन जब चारों ओर से यह बिल उल पास हो जायगा, तब  हरियाली छा जायेगी सखी....आज नहीं तो कल जब  कलमी अंगूरों का मौसम आयेगा  तो देखना यही लोग 'बाड़ फाँद' जाएंगे........और हां,...........आज अपने मन की साध पूरी कर लेना.......झुमका, कंगना, बिछुआ, मांगटीका  : )

- सतीश पंचम

19 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

लोकपाल का झुनझुना यहां भी जोरदार बजा है:)

kshama said...

Ha ha ha!
Naya saal bahut mubarak ho!

Poorviya said...

lekhpal ...lokpal...


jai baba banaras...

देवांशु निगम said...

एक पोस्ट से कई शिकार : लोकपाल, लेखपाल, कमलहे नेता, हाथ वाले नेता, साथ वाले नेता, साथ छोड़ गए नेता | सरों को लपेट लिया !!!!
बहुत बढ़िया !!!

Abhishek Ojha said...

बड़ा सखीमय पोस्ट है. आप कहाँ छुप के सुन आये ये सब ? :)

Arvind Mishra said...

पता नहीं बिलवा राज्यसभा में पास हुआ या नहीं!

अनूप शुक्ल said...

सखियों की निजता का उल्लंघन ठीक बात नहीं है जी।

Rahul Singh said...

अब तो बात फैल गई, गांव-गांव गली-गली.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बौरा गए हैं लोग, 187 संशोधन प्रस्तावित करने से अच्छा था कि कहते 'मज़ा नहीं आया दोबारा लिखेंगे.'

वाणी गीत said...

:):)...
सबकी खबर ले ली !

प्रवीण शाह said...

.
.
.
- वो देखो तुम्हारे पति आ रहे हैं, अंगूर के गुच्छे लिये हुए..... मैं चलती हूँ।

- कहां हैं अंगूरों के गुच्छे, वो तो फाइलें हैं।

- ध्यान से देखो.....वो फाइलें नहीं, अंगूरों के गुच्छे ही है, आज उनसे तुम कंगना, झुमका, नौलखा हार चाहे जो मांगोगी दे देंगे।



लगता है कि आप भविष्य को साफ-साफ देख पा रहे हैं... होना यही है...और यही होगा भी...



...

ajit gupta said...

हम भी जुगत भिड़ाते हैं, राज्‍यपाल बनने की। अभी तक तो कभी बच्‍चे-पाल तो कभी पति-पाल, कभी परिवार-पाल ही बने हुए थे। अंगूरा का गुच्‍छा अभी तो खट्टा ही लगता है, राज्‍यपाल बनने के बाद मीठा हो जाएगा।

anju(anu) choudhary said...

ज़बरदस्त व्यंग्य .......

कौशल किशोर मिश्र said...
This comment has been removed by the author.
दीपक बाबा said...

किसी का पति पोस्टपाल, किसी का टीपपाल होगा, उ सखियाँ भी कुछ न कुछ बतिआती होंगी... :)

आज फिर अपने रंग में रंगे - पंचम जी.

फिलहाल मौजपाल की राम राम

Vaneet Nagpal said...

"टिप्स हिंदी" में ब्लॉग की तरफ से आपको नए साल के आगमन पर शुभ कामनाएं |

टिप्स हिंदी में

प्रवीण पाण्डेय said...

हमें तो लग रहा है कि सबके हृदय में झुनझुनी मची है।

सञ्जय झा said...

jabar mouj li hai.......apne lokpal ke moujpal pe....

dheerendra said...

बेहतरीन अभिव्यक्ति,सुंदर व्यंग ,.....
नया साल "2012" सुखद एवं मंगलमय हो,....

मेरी नई पोस्ट --"नये साल की खुशी मनाएं"--

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.