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Sunday, December 25, 2011

साहित्यिक सौगात.....

राग दरबारी.... राग केदार...राग मल्हार.....राग... 
         नहीं जानता था कि जिस फेसबुक को मैं इतना सशंकित नज़रों से ताकता था वह कभी ऐसा भी खूबसूरत उपहार दे जायगा। जी हां, मैं अपने लिये इसे उपहार ही कहूंगा। हुआ यूं कि अभी इसी हफ्ते फेसबुक पर था कि जाने माने साहित्यकार सूरज प्रकाश जी का स्टेटस अपडेट देखा जिसमें उन्होंने अपनी इच्छा जाहिर की थी कि वे अपने चार हजार किताबों के संग्रह को लोगों के बीच बांटना चाहते हैं, उन पाठकों के हाथों में समर्पित करना चाहते हैं जो कि साहित्य में रूचि रखते हैं, या जिन्हें पठन पाठन अच्छा लगता है। बस फिर क्या था मुझे तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई। किताबें.....किताबें.....किताबें... ओह मैं तो सोच कर ही रोमांचित हो उठा। कहीं धर्मवीर भारती, कहीं निर्गुण, कहीं गोविंद, कहीं रेणु, कहीं राजेन्द्र यादव, तो कहीं विवेकी राय.......कितना तो दिलचस्प......कितना तो सुखकर। लेकिन तभी सूरज प्रकाश जी के स्टेटस पर आगे नजर पड़ी, लिखा था - किताबें लेने वाले अपने यहां से थैलीयां लेकर आएं। पढ़ते ही सूरज जी से चुहल करने का मन हुआ और मैंने लिखा - बोरा चलेगा क्या ? तात्पर्य - हम जैसे 'किकी' ( किताबी कीड़े) को थैली भर किताबों से कहां संतोष होने वाला है, हमें तो बोरा भर किताबें चाहिये :)

       खैर, प्लान बना डाला। 24-25 दिसंबर की तारीख तय की थी सूरज प्रकाश जी ने किताबें पाठकों के हाथ सौपने हेतु। बात ही बात में रश्मि रविजा जी को भी सूरज प्रकाश जी की उस पोस्ट का लिंक थमा दिया जिसमें उन्होंने अपने द्वारा संग्रहित किताबें पाठकों को देने की इच्छा जाहिर की थी। नियत समय पर सूरज प्रकाश जी के घर की ओर चल दिया। उनके सोसायटी में पहुंचने पर गेटकीपर के रजिस्टर में अपना नाम-फोन नंबर आदि दर्ज किया और लिफ्ट की ओर बढ़ा। पता चला कि वे फर्स्ट फ्लोर पर ही रहते हैं। सो सीढ़ियों से ही चल पड़ा।

       दरवाजे पर पहुंचते ही बेल बजाई, दरवाजा सूरज प्रकाश जी ने ही खोला। दुआ-सलाम हुई और तभी नज़र भीतर की ओर गई। कई लोग दिखे जो किताबों का बंडल बांध रहे थे, समेट रहे थे, गिन रहे थे। कोई कह रहा था - "अरे तेवारी, इहौ लेय ल्य हो" ! मन में कहीं हूक उठी कि शायद मुझसे पहले ही ढेर सारे 'किकी' पहुँच कर किताबें समेंट चुके हैं, लेकिन नहीं, ....मैं गलत था। वे लोग किताबें लेने जरूर आये थे लेकिन एक सीमा तक ही ले जा सकते थे और वही बांध बूंधकर ले जा रहे थे। असल भंडार तो अंदर खाने में था जहां सोफा से लेकर अलगनी, जमीन और ताखे तक किताबों से अटे पड़े थे।

       अंदर रश्मि रविजा जी दिखीं किताबें चुनते हुए। उनसे यात्रा के दौरान सम्पर्क में था तो पता ही था कि वे वहां पहुंच गई हैं। हाय हैलो के बाद मैं भी लग गया किताबें चुनने में। कहीं बिमल मित्रा की किताब दिखी कहीं कृष्णा सोबती, कहीं कमलेश्वर तो कहीं धर्मवीर भारती। एक ओर सोफे पर विश्वप्रसिद्ध कृतियों के अनुवाद करीने से सजे थे तो अलगनी पर परसाईं सजे थे। फर्श पर भी किताबें कुछ इस तरह से सजाकर रखीं गईं थी कि लेखकों के नाम पढ़ने और किताबें चुनने में आसानी हो। मैं जोरशोर से जुट गया। हर किताब लगती कि इसे भी ले लूं....उसे भी ले लूं लेकिन सब तो नहीं ले सकते थे। औरों को भी तो मिलनी चाहिये। यही तो ध्येय था सूरज प्रकाश जी का कि उनकी पढ़ी किताबें, औरों को भी मिलें, औरों तक वह ज्ञान, वह आनंद पहुंचे। सो किताबों का चयन बेहद कठिन हो गया। कुछ पन्ने पलटते, पढ़ते, फिर किताब रखते, सरकाते।

सोफे पर हिमालय.....
       दूसरी ओर सूरज प्रकाश जी बेहद व्यस्त थे। वे किताबें चुनने वालों को उनकी इच्छानुसार यथाशक्ति सहायता कर रहे थे। कोई कुछ किताब मांगता कोई कुछ। कई बार किताबें होने के बावजूद नहीं मिलतीं,ऐसे में सूरज प्रकाश जी भी कुछ परेशान दिखे। उनका परेशान होना लाजिमी था क्योंकि पिछले कई दिनों से वे अपने बदन पर लगे दर्द निवारक पट्टे के बावजूद किताबें तरतीब से सजा रहे थे ताकि पाठकों को ज्यादा ढूँढना न पड़े। लेकिन वहां इतना अंबार था कि जब चाहो तब किताबें मिलती ही नहीं थीं। पाठक के चले जाने के बाद न जाने कहां से प्रकट हो जातीं मानों कहना चाहती हों मैं यहीं तो थीं, याकि वे किताबें खुद ही सूरज जी के घर से न जाना चाहतीं थीं। इसी तरह किताबों की छुपम छुपाई बड़ी देर तक चलती रही।

      इन तमाम किताबी सेलेक्शन्स के बीच कुछ अलहदा चीजें भी देखने में आईं। एक सज्जन किताबें यह कह कर चुन रहे थे कि स्कूली बच्चों के लिये ले रहे हैं। सूरज जी की नजर पड़ी तो वह किताब मुक्तिबोध की थी। भला बच्चे कब से मुक्तिबोध पढ़ने लगे ? ऐसे में सूरज जी का झुंझलाना स्वाभाविक था कि ऐसे कैसे लोग हैं जिन्हें बच्चों की किताबें और बड़ों की किताबों में फर्क ही न मालूम पड़े। दरअसल व्यक्तिगत तौर पर किताबों के लेने की संख्या सीमित थी लेकिन लाइब्रेरी के तौर पर लेने पर संख्या दस गुना थी और इसी का लाभ उठाते हुए सज्जन जी दिखे। जो भी हाथ आया उठाते चलें। ऐसे ही वक्त पर वहां सुनी उस आवाज का अर्थ समझ आता है जिसमें बोला गया था - "अरे तेवारी, इहौ लेय ल्य हो" !

सूरज प्रकाश

          खैर, अभी किताबों का चयन चल ही रहा था कि एक पाठक ने अलगनी पर रखी भगवद्गीता भी लेनी चाही। मुझे चुहल सूझी - हां ले लिजिए...इससे पहले की बैन हो जाय....भगवद्गीता ले ही लिजिए :) और भी ढेरों किताबें ली गईं। रह रहकर सूरज प्रकाश जी से पाठकों की बातचीत भी सुनने में आती जिससे पता चलता था कि किताबों के बारे में, साहित्य के बारे में लोग अब भी कितनी रूचि रखते हैं। तभी बात राहुल सांकृत्यायन जी पर चली जिनके बारे में सूरज जी ने बताया कि वे अपने दिमाग का आम इंसान के मुकाबले कई गुना बेहतर इस्तेमाल करते थे, उनकी बातें सुनना अच्छा लग रहा था। इस बीच काफी समय बीतता जा रहा था। हमारी चुनी हुई किताबें तय व्यक्तिगत संख्या से उपर जा रहीं थी। हर किताब लगती कि इसे अपना होना चाहिये लेकिन क्या करें। उधर रश्मि जी भी कई किताबें बटोर चुकीं थीं और उनकी संख्या भी तय संख्या से ज्यादा जा रही थी। सूरज प्रकाश जी से हमने इसकी चर्चा की तो उन्होंने कहा कोई बात नहीं - आप 'रून्गा' के तौर पर ले लिजिए....रून्गा यानि 'घेलुआ' जिसका अर्थ है कि खरीदी गई वस्तुओं के साथ एकाध वस्तु ग्राहक की मांग पर या दुकानदार द्वारा अपनी ओर से डाल देना। तो इस तरह 'घेलूआ' के समानार्थी शब्द 'रून्गा' से परिचय हुआ।
सूरज प्रकाश जी के साथ मैं, सतीश पंचम.... :)

        उधर समय तेजी से बीता जा रहा था, लोग आते रहे, किताबें चुनते रहे। सूरज जी बड़ी शिद्दत से उनकी सहायता करते रहे। मन में आया कि सूरज जी से पूछूं कि आपकी इन किताबों को हम लोग लिये जा रहे हैं तो आप को कुछ तकलीफ तो नहीं हो रही लेकिन यह सवाल कुछ वैसा ही लगा जैसा कि न्यूज चैनलों पर रिपोर्टर लोग किसी को दुख में देख पूछते हैं कि आपको कैसा लग रहा है। सो मन की बात मन में ही रखा। जानता हूं कि किताबों से भावनात्मक लगाव सभी में कुछ न कुछ रहता ही है, फिर सूरज जी के संग्रह को देख समझा जा सकता है कि वे कितने बड़े 'पुस्तक प्रेमी' हैं।
  

ये साथ गुजारे हुए लमहात की दौलत

             अभी कुछ समय पहले ज्ञान जी के ब्लॉग पर भी इसी बात को लेकर चर्चा उठी थी कि हिन्दी वाले अंग्रेजी वालों के मुकाबले अपनी हिन्दी किताबों से कुछ ज्यादा ही भावनात्मक लगाव रखते हैं। उन्हें रद्दी में जल्दी नहीं देते जबकि अंग्रेजी की किताबें रद्दी की दुकानों पर आसानी से देखी जा सकती हैं। यहां भी सूरज जी का वही भावनात्मक लगाव झलक रहा था। उन्होंने किताबें रद्दी में देने की बजाय उन्हें साहित्य रसिकों के बीच बांट देना उचित समझा। हां, इस बात का ध्यान जरूर रखा कि जो कोई भी किताबें ले जाय वह उन किताबों का नाम, विवरण, अपना फोन नंबर वहां रखी डायरी में जरूर दर्ज करे ताकि भविष्य में जब कभी उन्हें रेफरेंस के लिये या कभी पढ़ने की जरूरत महसूस हो तो उस पुस्तक प्रेमी से संपर्क कर सकें।

हल्कू....झूरी.....महतो...धनिया....हामीद....चिमटा...
         वहीं एक और बात देखने में आई कि हर किताब पर सूरज जी एक विशेष स्टैम्प लगाने को कह रहे थे जिस पर सूरज प्रकाश जी के नाम, ईृमेल आई डी, फोन नंबर के साथ नीचे लिखा था कि - 'ये किताब पढ़ कर किसी और पुस्तक प्रेमी को दे दें' । इस स्टैम्प से सूरज जी के इस अनूठे प्रयास का महत्व पता चलता है जिसके जरिये उन्होंने अपनी किताबों के प्रति मोह-माया का त्याग करते हुए उन्हें पाठकों के बीच आगे भी फैलाने की चाहना रखी है । सूरज जी द्वारा किताबों के पठन-पाठन, किताबों के फैलाव, किताबों से भावुकता भरा बिलगाव देख मुझे महेन्द्र कपूर द्वारा गाया वह गीत बहुत शिद्दत से याद आ रहा है जिसे सुनते हुए लगता है कि यह गीत शायद ऐसे ही किसी लम्हे के लिये लिखा गया होगा जब कोई किसी से वक्ती तौर पर अलविदा होने को हो, बिछडा जा रहा हो और आगे कभी मिलने की उम्मीद भी रक्खे। यहां जिस अंदाज में किताबों से बिलगाव हो रहा है, उनसे फिर से कहीं नये सौगात के रूप में मिलने की उम्मीद रखी जा रही है, उनकी महक, उनके कशिश को पाने की इच्छा रखी जा रही है वह शब्दश: महेन्द्र कपूर के गाये उस गीत की याद दिला जाते है जिसमें वे कहते हैं -
हम जायें कहीं इनकी महक साथ तो होगी


अभी अलविदा मत कहो  दोस्तो
न जाने फिर कहाँ मुलाक़ात हो.....

        सचमुच, ये किताबें इसी तरह आगे भी एक दूसरे के यहां संचरित हों, पठन-पाठन हेतु फैलें तो कहीं न कहीं आपस में फिर से मिल ही जायेंगी। साथ ही इन किताबों से लिये हुए अनुभव, उनकी कशिश भी जुड़ती चली जायगी। आगे की पंक्तियां और भी बहुत कुछ कहती हैं जिनमें - चेहरे दर चेहरे से गुजरने की रवायत और महक को बखूबी उकेरा गया है.......।

ये चेहरे, ये नज़रें, ये जवां रूत ये हवायें
हम जायें कहीं इनकी महक साथ तो होगी


ख्वाबों में ही हो चाहे मुलाकात तो होगी

और अंत में गीत के बोल जैसे इन किताबों की सौगात के बारे में ही कह रहे हैं कि....
कुछ पास न हो पास ये सौगात तो होगी

ये साथ गुजारे हुए लमहात की दौलत
जजबात की दौलत, ये खयालात की दौलत
कुछ पास न हो पास ये सौगात तो होगी


बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी.....


         सूरज प्रकाश जी के इस अनूठे प्रयास की जितनी प्रशंसा की जाय कम है। उम्मीद करता हूँ कि जो लोग हिन्दी सेवा का रात-दिन दम भरते हैं, साहित्य सेवा की भावना को निरंतर भुनवाते रहते हैं, डांय-डांय सम्मेलनों, कचर-सम्मेलनों में थोथे सम्मान, बजर-सम्मान ले-देकर  'दंतिल मुस्कराहटें' बिखेरते नजर आते हैं  वे भी सूरज प्रकाश जी के इस अनूठी पहल से प्रेरणा लेंगे और अपनी साहित्यिक सेवा को एक नये नजरिये से देखने का प्रयास करेंगे।


- सतीश पंचम

स्थान - वही, जिसके सोसायटी के रजिस्टर में मैंने In-Time तो दर्ज किया लेकिन बाहर जाते वक्त पुलकित मन और किताबों के ओज़ में Out Time दर्ज करना भूल गया...... कागजी तौर पर मैं अब भी सूरज प्रकाश जी के घर में ही हूँ....उन किताबों के संग....बिनती....होरी....झुनिया....हल्कू जैसे पात्रों के बीच । ( जी हां, मैं सचमुच सूरज प्रकाश जी के सोसायटी रजिस्टर में आउट टाइम डालना भूल आया हूं :)

समय -   मिथिलेश्वर रचित 'बैराडीह की चंद्रावती' पढ़ने जैसा !

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26 comments:

Rahul Singh said...

धन्‍य है सूरजप्रकाश जी का अपरिग्रह, प्रत्‍याहार.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

'ये किताब पढ़ कर किसी और पुस्तक प्रेमी को दे दें' की स्टैम्प के बारे में पढ़ कर अच्छा लगा. रेल यात्रा के दौरान मैं भी अक़्सर कुछ पत्र-पत्रिकाएं लिया करता था जिन्हें यात्रा में ही चाट जाता था इसलिए अपने गंतव्य पर उतरते समय मैं उन्हें हमेशा पीछे ही छोड़ देता था ताकि कोई दूसरा भी उन्हें पढ़ ले. वर्ना घर पर तो पत्र-पत्रिकाएं रद्दी में भेजने का रिवाज़ होता है.

प्रवीण पाण्डेय said...

लूट सके तो लूट, साहित्य गतिमय रहे..

संतोष त्रिवेदी said...

सफ़दर हाशमी की कविता की याद दिला दी...किताबें कुछ कहना चाहती हैं. जो पुस्तक-प्रेमी हैं उन्हें पता कई अपना और किताबों का दर्द,पर इनका मोह त्यागना जितना पीड़ादायक है,उससे कहीं ज़्यादा परोपकारी और सुकून देने वाला.

सूरजप्रकाश जी 'उन' पाठकों और किताबों के बीच में कहीं न कहीं मिलते रहेंगे !उनका आभार !

@ मैं,सतीश पंचम ....क्या कभी-कभी बिना मैं के भी होते हैं ?

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

भाग्यशाली हैं आप! वैसे सूरज प्रकाश जी की विशालहृदयता से परिचय होने के साथ ही हिन्दी सेवकों के लिये भी सन्देश मिला इस पोस्ट में।

संतोष त्रिवेदी said...

कई=है

GYANDUTT PANDEY said...

भगवान करें कभी हममें भी सूरज प्रकाश जी जैसी क्षमता आ जाये, किताबें देने की। अभी तो उस भालू की तरह हैं जो आसन्न सर्दी के लिये चर्बी (पुस्तकों) का संग्रह करता जा रहा है!
बहुत सुन्दर ब्लॉग पोस्ट!

rashmi ravija said...

आपका धन्यवाद सतीश जी...आपके सौजन्य से ही मुझे भी सूरज जी की इस विशाल हृदयता का लाभ उठाने का मौका मिला..और कई नायाब पुस्तकें मिलीं.

सूरज प्रकाश जी के इस निर्णय की प्रशंसा के लिए शब्द नहीं हैं.

बी एस पाबला BS Pabla said...

हालाँकि इस शब्द का प्रयोग यहाँ उचित नहीं लेकिन

स्तब्ध

और आपसे रश्क

Arvind Mishra said...

सूरज प्रकाश जी का यह निर्णय अनुकरणीय है ...आप भी गहरे बिबिलियोफाईल निकले....
मैं भी अपनी कुछ पुस्तकों को ऐसे ही दान देने का प्रयास करता हूँ....
वे चाहते तो सेकेण्ड रेट बेच भी सकते थे....रद्दी के भाव भी =कुछ तो टेंट में आता ही :)
मगर उनकी नैतिकता पर नतमस्तक ही हुआ जा सकता है ...
राहुल सांस्कृत्यायन नहीं, राहुल सांकृत्यायन!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

किताबों के साथ सूरज प्रकाश जी यह संदेश भी बांट रहे हैं कि जब तुम्हें भी लगे अब तुम इन किताबों को नहीं पढ़ सकते तो तुम भी इन्हें ऐसे ही उनको बांट देना जो पढ़ना चाहते हैं।
..अनुकरणीय साहित्य सेवा।

अल्पना वर्मा said...

इस तरह प्रयास अनुकरणीय है !
आशा है साहित्य प्रेमी इस श्रृंखला को आगे बढायेंगे..

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

ध्यान दिलाने के लिये शुक्रिया। आवश्यक सुधार कर दिया हूँ।

सतीश पंचम said...

काजल जी, आप की तरह मैं भी यात्रा के दौरान किताबें चाट डालता हूं.....मूलत: 'किकी' प्रजाति होती ही ऐसी है :)

सतीश पंचम said...

संतोष जी,

सच कहा कि किताबों से विछोह का दर्द बड़ा सालता है लेकिन उन्हें किसी को देने में भी एक तरह का सुख है।

सतीश पंचम said...

क्या पाबला जी,

मुझे तो लगा आप को पता होगा, हिन्दुस्तान के 54 एडीशन में सूरज जी के इस इच्छा को प्रकाशित किया गया था :)

Anyway, कभी मुंबई आयें तो जरूर आपकी उन किताबों से भेंट करवाउंगा।

वो क्या एक ऐड आता है न - जब मिल बैठें चार यार.....वैसे ही साहित्य का आनंद लेने में भी चार यार मिल जांय तो मजा आ जाय :)

सतीश पंचम said...

@ अभी तो उस भालू की तरह हैं जो आसन्न सर्दी के लिये चर्बी (पुस्तकों) का संग्रह करता जा रहा है!

गजब कहा ज्ञान जी :)

मनोज कुमार said...

बढ़िया संदेश देती साहित्य सेवा।

सतीश पंचम said...

अनुराग जी,

दरअसल कई लोग हिन्दी सेवा का रात दिन दम भरते नहीं अघाते...जब तब सम्मानित होते....खिंसे निपोरते नजर आते हैं तब कोफ्त होती है कि पता नहीं ये कैसी सेवा है कि जिसे करने के लिये सम्मानित किया जाता है :)

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर और अनुकरणीय उदाहरण सूरजप्रकाशजी ने प्रस्तुत किया अपनी किताबें पुस्तक प्रेमियों को बांटकर!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

bahut bhaagyashalee hain aap log.

वाणी गीत said...

रश्मि रविजा जी की पोस्ट के बाद यहाँ भी पढ़ा सूरजप्रकाश जी की दरियादिली को ...
राहुल जी की एक पंक्ति अच्छी तरह बखान कर गयी !

संजय @ मो सम कौन ? said...

सूरज प्रकाश जी की यह पहल बहुत अच्छी लगी, और आप लोग जो इस मौके का सदुपयोग कर सके इसके लिये बधाई।
आपने जो एक और पहल की है, उसके लिये भी साधुवाद।

anitakumar said...

सतीश जी हमें भी आप से और रश्मि जी से रश्क हो रहा है। हमें भी बताना था न:)
सूरज जी का दिल सच में बहुत बड़ा है। खैर उनकी स्टेंप को ध्यान में रखते हुए किताबें पढ़ने के बाद हम से भी शेयर कीजिएगा, कौन कौन सी उठाईं आप ने वो तो बताइए

ajit gupta said...

बढिया कार्य है। रश्मि रवीजा जी की पोस्‍ट पढ़ चुकी हूँ।

सतीश पंचम said...

अनिता जी,

किताबों पढ़ने के बाद जरूर शेयर की जाएंगी....सूरज जी के स्टैम्प निर्देश का जरूर पालन किया जायगा। फिलहाल जो किताबें याद आ रही हैं - जमुनी(मिथिलेश्वर), ग्लोबल गाँव.. (रणेन्द्र), पहली यात्रा(सूर्यदीन यादव), पियरी की चाह(मैत्रेयी पुष्पा), कई और किताबें हैं फिलहाल याद नहीं आ रहीं। एक आदिवासीयो पर कोई साहित्यिक कृति है जिसे सूरज जी ने छांटकर दिया है। पढ़ने के बाद जरूर शैयर करूंगा :)

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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