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Thursday, December 15, 2011

रागदरबारी का लंगड़ और अन्ना हजारे का 'एतिहासिक विपर्यय'

    श्रीलाल शुक्ल रचित रागदरबारी में एक बेहद दिलचस्प पात्र है ‘लंगड़’, जिसके बारे में लोगों का मानना है कि वह बड़ा झक्की आदमी है, उसकी बुद्धि बालकों सी है...फलां है, ढेकां है। बात ही बात में एक दिन लंगड़ के बारे में एक युवक रंगनाथ जानना चाहता है तो उसे गाँव वाले बताते है कि लंगड़ पास ही के गाँव का रहनेवाला है। घर-परिवार से बेपरवाह लंगड़ भगत आदमी है, भजन ओजन गाता रहता है।


          एक बार लंगड़ को तहसील से किसी मुकदमें के लिए एक पुराने फ़ैसले की नक़ल चाहिए थी। उसके लिए पहले तहसील में दरख्वास्त दी थी। दरख्वास्त में कुछ कमी रह गयी, इसलिए वह ख़ारिज हो गयी। इस पर इसने दूसरी दरख्वास्त दी। तहसील में जब लंगड़ नक़ल लेने गया तो नकलनवीस ने उससे पाँच रूपये माँगे। लंगड़ बोला कि रेट दो रूपये का है। इसी पर बहस हो गयी, लंगड़ और नक़ल-बाबू में बड़ी हुज्जत हुई। लंगड़ को भी गुस्सा आ गया। उसने अपनी कण्ठी छूकर कहा कि “जाओ बाबू, तुम क़ायदे से ही काम करोगे तो हम भी क़ायदे से ही काम करेंगे। अब तुमको एक कानी कौड़ी न मिलेगी। हमने दरख्वास्त लगा दी है, कभी-न-कभी तो नम्बर आयेगा ही। मैं बिना रिश्वत दिये ही नकल लूंगा”। उधर नक़ल बाबू ने कसम खायी है कि “रिश्वत न लूँगा और क़ायदे से ही नक़ल दूँगा”। इसी बात पर दोनों में ठन गई थी।

         दोनों की इस लड़ाई को गाँव का युवक रंगनाथ समझ नहीं पाया कि – ये क्या बात हुई। अब तक इतिहास में यही देखने में आया है कि एक पक्ष कहता था नहीं दूंगा दूसरा कहता था जरूर लूंगा। न जाने कितनी लड़ाईयां इसी वजह से हुईं। सिकन्दर ने भारत पर कब्ज़ा करने के लिए आक्रमण किया था; पुरू ने, उसका कब्ज़ा न होने पाये, इसलिए प्रतिरोध किया और लड़ाई हुई थी। अलाउद्दीन ने कहा था कि मैं पद्मिनी को लूँगा, राणा ने कहा कि मैं पद्मिनी को नहीं दूँगा। इसलिए लड़ाई हुई थी। सभी लड़ाईयों की जड़ में यही बात थी। एक पक्ष कहता था, लूँगा; दूसरा कहता था, नहीं दूँगा। इसी पर लड़ भिड़ जाते थे। पर यहाँ लंगड कहता था, धरम से नक़ल लूँगा। नक़ल बाबू कहता था, धरम से नक़ल दूँगा। फिर भी दोनों में लड़ाई चल रही थी। युवक रंगनाथ को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर यह ‘एतिहासिक विपर्यय’ क्योंकर है ?

         उधर नकलनवीस, पेशकार सभी की ओर से लंगड़ की अर्जी में कुछ न कुछ नुक्स निकाल लंगड़ की अर्जी लटका दी जाती। कभी मुकदमें की फीस वाला टिकट कम लगा बताया जाता तो कभी मिसिल का पता ग़लत लिखा है तो कोई ख़ाना अधूरा पड़ा है-ऐसी ही कोई बात बताकर नोटिस-बोर्ड पर लिख दिया जाता। यदि उसे दी गयी तारीख़ तक ठीक न किया जाये तो लंगड़ की दरख्वस्त खारिज कर दी जाती।

            इसीलिए लंगड़ अब पूरी-पूरी तैयारी के साथ मोर्चा संभालता है, अपने गाँव छोड़कर तहसील में ही बराबर नोटिस-बोर्ड के आसपास चक्कर काटा करता है। उसके द्वारा नकल लेने के सारे कायदे रट लिये जाते हैं। उसकी तमाम तैयारी आदि को देख पेशकार उसे झक्की और न जाने क्या क्या कह देता हैं, कुछ कुछ वैसे ही जैसे कि लोकपाल मसौदे को संसद में पेश करने को लेकर कुछ सांसदों द्वारा अन्ना हजारे पर छींटाकशी की गई थी। यहां भी मामला लंगड़ और सरकारी मुलाजिम की लड़ाई सरीखा ही है। उन्हीं की तरह यहां भी एक पक्ष कहता है कि हम लोकपाल कानूनी प्रक्रिया से लेकर रहेंगे तो सरकार भी कह रही है कि हां, हम भी लोकपाल कानूनी प्रक्रिया देकर ही रहेंगे। दोनों अपनी ओर से दे ही रहे हैं, फिर भी लड़ाई चल रही है। फिर वही एतिहासिक विपर्यय। ऐसे में जनता उस युवक रंगनाथ की तरह मन ही मन भावुक हुई जा रही है। रंगनाथ पर भी लंगड़ के इतिहास का गहरा प्रभाव पड़ा और वह भावुक हो गया। भावुक होते ही ‘कुछ करना चाहिए’ की भावना उसके मन को मथने लगी, पर ‘क्या करना चाहिए’ इसका जवाब उसके पास नहीं था। क्यों नहीं था इस बात को यदि आज के संदर्भ में देखा जाय तो समझा जा सकता है क्योंकि जनता भी उसी उहापोह से गुजर रही है। किस पार्टी को वह शुचित मानें, किस पार्टी को अपवित्र यह उसे समझ नहीं आ रहा। जो लोग लोकपाल को लेकर जोर शोर से समर्थन कर रहे हैं उन्हें जब ध्यान से देखती है जनता तो पाती है कि यही वे लोग हैं जिन्होंने खनन प्रक्रिया में रिश्वतखोरी के दम पर खान के खान उलट दिये हैं, तो दूसरे पक्ष पर नज़र पड़ते ही उसे टू जी स्पेक्ट्रम की बंटाई याद हो आती है कि फलां के इतने बिगहे स्पेक्रट्रम बंटे तो ढेकां के इतने बिगहे। जहां औरों पर भी नज़र जाती है तो सब कुछ गड्डम-गड्ड ही नज़र आ रहा है।
 
        ऐसे में जनता केवल यही कर पा रही है कि रंगनाथ की तरह भावुकता भरी बोली बोल रही है – "कुछ करना चाहिये",  लेकिन क्या करना चाहिये इसे न वह समझ पा रही है न दूसरों को समझा पा रही है, बस ‘भरमजाल’ में पड़ी है। देखें कब तक जनता इस ‘भरमजाल’ से निकल पाती है।
 
- सतीश पंचम

अपडेट: 30/12/2011 - @ नकलनवीस, पेशकार सभी की ओर से लंगड़ की अर्जी में कुछ न कुछ नुक्स निकाल लंगड़ की अर्जी लटका दी जाती। कभी मुकदमें की फीस वाला टिकट कम लगा बताया जाता तो कभी मिसिल का पता ग़लत लिखा है तो कोई ख़ाना अधूरा पड़ा है-ऐसी ही कोई बात बताकर नोटिस-बोर्ड पर लिख दिया जाता। यदि उसे दी गयी तारीख़ तक ठीक न किया जाये तो लंगड़ की दरख्वस्त खारिज कर दी जाती।

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कल रात दिये गये समय में नुक्स ठीक न करने की वजह से सांसदों द्वारा लंगड़ की दरख्वास्त फिर खारिज हो गई। लंगड़ को मिसिल अब तक नहीं मिल पाई है, अभी इंतजार और लंबा लगता है।

14 comments:

आशीष श्रीवास्तव said...

समस्या यह है कि जनता मे "रंगनाथ" नही है, शनिचर, छोटे पहलवान, बद्री पहलवान की भरमार है!

GYANDUTT PANDEY said...

लंगड़ को मिसिल मिलनी चाहिये। और जल्दी।
हम न जनता हैं, न रुप्पन/रंगनाथ, न बद्री न हेन न तेन।

हम सब मॉडीफाइड लंगड़ हैं। समय कम है हमारे पास।

ajit gupta said...

लंगड को तो एक दिन नकल मिल ही गयी थी वो और बात है कि मिली तब जब वह दुनिया से कूच कर गया था। लेकिन यहाँ तो कोई उम्‍मीद नहीं है। चालीस साल से लटक रहा है बिल तो अगले चालीस साल और सही।

प्रवीण पाण्डेय said...

लंगड़ के चरित्र ने व्यवस्था का वह स्वरूप दिखाया है वह आज के युग में खरी उतरता है।

Arvind Mishra said...

चाहे लंगड़ हो या लक्ष्मण का आम आदमी -ये व्यवस्था के संकेतक हैं ....
अन्ना को भी ऐसे ही दरकिनार करने की कोशिश है ...आपकी आशंका सच है !

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बेचारी जनता को लगता है कि 15.8.1947 की ही तरह जब वे लोकपाल बिल पास होने बाद 16.8.1947 को जागेंगे तो सब करप्ट, देश छोड़ कर जा चुके होंगे, जो कुछ बचे होंगे उन पर कोड़े बरसाए जा रहे होंगे, कई विजय चौक और इंडिया गेट पर फांसी पर लटकाए मिलेंगे... चारों तरफ ईमानदारी की शहनाइयां गूंज रही होंगी, अफ़सर-नेता लोगों के आगे नाक से लकीरें निकाल रहे होंगे, स्कूल-कालेजों के बाहर लाइन लगा कर मुफ़्त सीटें बांटी जा रही होंगी, लाला लोग आवाज़ें लगा लगा कर सबकुछ मुफ़्त बांट रहे होंगे....

लंगड़ जनता सचमुच ही बौराई घूम रही है

रंजना said...

एकदम सही पकड़ा...

Abhishek Ojha said...

इ किताब भी साल भर से पढने के लिए रखी हुई है !

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बहुत शानदार तुलना किया है आपने। सुबह-सुबह पढ़कर मन खुश हो गया।

लेकिन दुख इस बात का है कि हमारा समाज इस व्यवस्था को बदलने के लिए कत्तई तैयार नहीं है। शायद इस लिए कि जो बदल सकने में सक्षम हैं उन्हें बदलाव की आवश्यकता ही नहीं है। उनके स्वार्थ तो इसे बनाये रखने में ही निहित हैं।

नारे लगाने और भाषण देने का काम अलग है, अपने निजी हित के आलोक में असली फैसले लेने का काम बिल्कुल अलग।

सञ्जय झा said...

kya accha ho ke 'sansad' ko vadyaji ka parn-kutir banaya jai aur sare
sansad(rag-darvari ke sare patra), ko
subah-dopahar-sandhya-ratri 'sankarvati' ki ghutti pilaya jai....

pranam.

आचार्य परशुराम राय said...

बहुत सुन्दर तुलना। साधुवाद।

वाणी गीत said...

वास्तविक जीवन और कथा के पात्र ...तभी तो कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है !
वर्षों पहले लिखी गयी साहित्यिक रचना भी यही बताती है कि बीते वर्षों में देश में कितना भी परिवर्तन हुआ हो ,आम आदमी और व्यवस्था वही कि वही है!
रोचक झन्नाटेदार प्रविष्टि !

ANURAG SHUKLA said...

bahut umda

सतीश पंचम said...

@ नकलनवीस, पेशकार सभी की ओर से लंगड़ की अर्जी में कुछ न कुछ नुक्स निकाल लंगड़ की अर्जी लटका दी जाती। कभी मुकदमें की फीस वाला टिकट कम लगा बताया जाता तो कभी मिसिल का पता ग़लत लिखा है तो कोई ख़ाना अधूरा पड़ा है-ऐसी ही कोई बात बताकर नोटिस-बोर्ड पर लिख दिया जाता। यदि उसे दी गयी तारीख़ तक ठीक न किया जाये तो लंगड़ की दरख्वस्त खारिज कर दी जाती।

कल रात दिये गये समय में नुक्स ठीक न करने की वजह से लंगड़ की दरख्वास्त फिर खारिज हो गई। लंगड़ को मिसिल अब तक नहीं मिल पाई है, अभी इंतजार और लंबा लगता है।

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