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Sunday, December 11, 2011

हे अमात्य......हे लोकपाल.....हे द्वारपाल....

- द्वारपाल..... हमें सम्राट से मिलना है .....

- आपका परिचय  ?

- हम हैं सोलह महाजनपदों के 'महा-लोकपाल' ...

- प्रणाम स्वीकारें अमात्य.....खेद है कि आप सम्राट से नहीं मिल सकते....वो सीवीसी अफसरों की मीटिंग में व्यस्त हैं।

- शाम को तो मिलेंगे ?

- शाम को लिच्छवी नरेश से भिड़न्त के सिलसिले में सीबीआई से समन आया है.....उसी की इन्क्वायरी में जायेंगे।

- लेकिन लिच्छवी नरेश तो उनके करीबी हैं, आखिर उनसे कैसे भिड़न्त हो गई।

- कोई स्पेक्ट्रम की बंटाई में कुछ उंच नीच हो गई थी सो भिड़ गये।

- कितने बिगहे का स्पेक्ट्रम था ?

- यही कोई बावन बिगहा दस डिसमिल !

- लेकिन उसके लिये सम्राट को भिड़ने की क्या जरूरत थी, दण्डपाल को भेज दिये होते।

- दण्डपाल को आप लोग कुछ करने दो तब न.....

- हमने क्या किया ?

- महाजनपदों में हुई सैनिक भर्ती को लेकर आप लोग ही तो इन्क्वायरी कर रहे हैं

- तो महादण्डपाल या क्षेत्रपाल को भेज दिये होते...

- वो भी किसी भूमि अधिग्रहण के सिलसिले में फंसे हैं.......अवन्ति की जनता ने धांधली का आरोप लगाया है...

- कैसी धांधली ?

- सैनिक फार्म की जमीन को गांधार के वणिक विश्वशर्मन के हाथों औने पौने दामों में अलॉट करने के कारण।

- तो वह वणिक गांधार का विश्वशर्मन ही था ?

- हां, लेकिन आप क्यों पूछ रहे हैं लोकपाल जी ?

- हमारे लोकपाल भवन बनाने का ठेका भी उसी वणिक विश्वशर्मन को मिला है .

- तो क्या आपको गांधार के उस वणिक विश्वशर्मन की पृष्ठभूमि नहीं पता थी ?

- नहीं, हमारे पास ऐसी कोई सूचना प्रणाली नहीं है जिसके जरिये हम किसी की पृष्ठभूमि की जांच कर सकें.

- तब किस बूते आप लोग सोलहो महाजनपदों की लोकपाली करे जा रहे हैं ?

-किस बूते कर रहे हैं, अब कैसे बतायें द्वारपाल........अच्छा....ये बताओ कि सम्राट मिलेंगे कब

- सूखे सूखे बता दूँ ?

- ओह...समझा.....तो तुम्हें तर माल चाहिये ?

- अब आप लोगों से क्या छुपाना...सब कुछ तो जानते ही हैं.

- आपको भय नहीं लगता.....लोकपाल से ही रिश्वत मांगते ?

- भय कैसा लोकपाल जी, आप लोकपाल...मैं द्वारपाल.....और किसी नाते से न सही....कम से कम नामों की साम्यता के नाते ही इतना तो हक बनता है.

- तो ऐसे न बताओगे ?

- नहीं.

- तो जाओ हमें सम्राट से नहीं मिलना....हम ऐसे ही चले जाते हैं.....लेकिन याद रखो....हम सम्राट से तुम्हारी शिकायत जरूर करेंगे.

- तो जाओ कर लो......सम्राट खुद तुम से नहीं मिलना चाहते.....कह रहे थे उनके तमाम अमात्य, दण्डपाल, क्षेत्रपाल अपना काम धाम छोड़ तरह तरह की जाँच में फंसे हैं न कहीं नये पोखर खुद रहे हैं न राजप्रासाद....न कोई विजय-स्तम्भ गड़ रहे हैं न कुछ....औरों की छोड़िये, खुद राजमहल के नाबदान का निर्माण इन तमाम जांच प्रिक्रियाओं से बाधित हो रहा है.....और लोगों को लोकपाल के दायरे में लाते तो चलता, आपने सम्राट तक को लोकपाल के अधीन ला दिया......

- क्या करें, पारदर्शिता जरूरी है द्वारपाल

- पारदर्शिता माय फुट .... उधर शकों द्वारा सीमांत प्रदेश में लूटपाट की खबरें आ रही हैं....उन पर अंकुश करने की रणनिति बनाने की बजाय हमारे सम्राट राजमहल के नाबदान में उलझे हैं।

- शुक्र मनाओ कि नाबदान में ही उलझे हैं, कभी लोकपाल से उलझें तो पता चलेगा, बावन बिगहे का स्पेक्ट्रम, मात्र 'पगहे' भर में सिमटा देने का क्या अंजाम होता है.

- वो देखिये सम्राट यहीं चले आ रहे हैं......

- लेकिन वे रूककर मुझसे मिले क्यों नहीं

- लगता है नाबदान चोक होने से पानी फैल गया है.....अबके संभाले नहीं संभल रहा :)


- सतीश पंचम

21 comments:

Arvind Mishra said...

कालखंडों का यह गड़बड़झाला क्यों हो रहा है -कौन सी आफत आने वाली है अब ! हम किस युग में हैं भगवन!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सही बात है घुन कहां नहीं लगा है.

संतोष त्रिवेदी said...

ई सम्राट को इसी बहाने अपने नाबदान के चोक होने का पता तो चला...परजा के यहाँ तो ससुर पानी न आने से वह भी सुख नसीब नहीं :-)

गज़ब राजा ! एकदम पुराने ज़माने में पहुंचाय दिहो !!

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

हा हा हा बहुत बढिया, अमात्य भी लैन में लगे हैं तो परजा को भूल जाईए/:)

प्रवीण पाण्डेय said...

आप वाले राज्य का तो ईश्वर मालिक है।

आशीष श्रीवास्तव said...

:-)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मन की बातें भी संकेतों में कहनी पड़ती है..बड़ा खराब कालखण्ड चल रहा है। शायद ऐसे ही लिखा गया होगा यह शेर..

मत कहो आकाश में कुहरा घना है
यह किसी कि व्यक्तिगत आलोचना है।
..शानदार पोस्ट।

shilpa mehta said...

:)
:)
:)

abhi said...

जबरदस्त!! :) :)

GYANDUTT PANDEY said...

वाह! लेखन तो पूरे निखार पर है।
लाजवाब!

Abhishek Ojha said...

:) सही है !

रौशन said...

bahut khoob

देवांशु निगम said...

ऑफिस में पढ़ा और वहीँ खुले आम हसने लगे..बहुत बढ़िया लिखा है ...

Archana said...

हे....हे....हे .....हँस नहीं रही मैं ..."हे" के आगे कुछ निकल ही नहीं रहा ...

rashmi ravija said...

क्या बात है....:)

ajit gupta said...

ऐसा लग रहा है कि चाणक्‍य धारावाहिक देख रहे हैं। लेकिन बीच में ही यह "पारदर्शिता माय फुट" कहाँ से आ गया? आनन्‍द आया।

बी एस पाबला BS Pabla said...
This comment has been removed by the author.
बी एस पाबला BS Pabla said...

मजेदार

अतुल प्रकाश त्रिवेदी said...

लोकपाल पर इससे अच्छा किसी ने लिखा है , हो सकता है . मज़ा नहीं आयेगा हो तो भी . एक शब्द नाबदान भारी पड़ेगा . त्वरितर से यहाँ तक आ गया . हमारी पसंदीदा जगहों में से एक . वैसे एक बार आपका यहाँ से लिंक त्वरितर पर दिया था . कुछ लोगों को वहाँ भी खूब पसंद आया . संतोष जी देखे थे और दोबारा पढ़े भी .

सतीश पंचम said...

अतुल जी,

ट्वीटर पर मैं बहुत कम जाता हूँ...सो पता नहीं चलता...जस्ट एक अकाउंट बना रखा है :)

उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत धन्यवाद!

P.N. Subramanian said...

प्रभु रक्षा करो

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