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Thursday, December 8, 2011

'ब्रिजायन'.....बजरिये मुम्बईया चौताल :)

          खबर सुनने में आई है कि राज्यसभा के स्टैंडिंग कमेटी की मीटिंग के दौरान भाजपा के सांसद अहलूवालिया और कांग्रेस के राशिद अल्वी के बीच कुछ धक्का धुक्की हुई। एक ने आरोप लगाया कि उसने मुझे धक्का मारा तो दूसरा कहता है कि मैंने नईं किता। खैर, इन दोनों की धक्कम धुक्की का मसला इतना बड़ा हो गया कि दोनों ही प्रेस में आकर बयान देने लगे। .च्च...च्च..च्च.। अब इन लोगों को क्या कहूं।


        मन करता है कि ऐसे लोगों को लाकर मुंबई के तमाम रेल्वे ब्रिजों में से किसी एक पर खड़ा कर दूं...ठीक वैसे समय जब प्लेटफार्म पर कोई गाड़ी आने वाली हो। न न मैं कोई उन्हें ब्रिज से नीचे धक्का देने की नहीं सोच रहा न कूदने के लिये प्रोत्साहित ही कर रहा हूं....बस उन्हें किसी ब्रिज पर खड़ा होने को कह रहा हूं। जो लोग मुंबई की लोकल से यात्रा करते हैं वह समझ गये होंगे कि मेरा इशारा किस ओर है। दरअसल ब्रिज पर खड़े होने वालों का अपना अपना उद्देश्य होता है, अपनी अपनी सुविधा होती है। होता यह है कि मुंबई की जीवनरेखा कही जाने वाली लोकल ट्रेनें कुछ स्लो होती हैं कुछ फास्ट। स्लो से तात्पर्य ऐसी लोकल ट्रेनें जो हर स्टेशन पर रूकते जांय और फास्ट का मतलब ऐसी लोकल ट्रेनें जो कुछ बड़े स्टेशनों पर ही रूकते हुए जांय। अब मुंबई ठहरी मिनट मिनट का हिसाब रखने वाली। सो हर किसी को जल्दी होती है। हर कोई चाहता है कि घर या ऑफिस जल्दी पहुंचे और इसी दौरान उन्हें चुनाव करना होता है कि स्लो ट्रेन पकड़े या फास्ट। चूंकि दोनों ही किस्म के ट्रेनों के आने जाने का प्लेटफार्म अलग अलग होता है तो लोग दोनों प्लेटफार्मों के बीच यानि ब्रिज पर खड़े हो जाते हैं कि जो भी ट्रेन आये उसे पकड़ा जाय।

            ऐसे में होता यह है कि ब्रिज पर खड़े अनावश्यक लोगों की संख्या बढ़ जाती है। लोग वहीं ब्रिज के उपर खड़े होकर ताकते हैं कि देखें पहले कौन सी ट्रेन आती है....जो ट्रेन पहले आती दिखे लोग उसी प्लेटफार्म की ओर लपक लेते हैं। उधर ट्रेन के आते ही उसमें से उतरने वाले यात्री भी ब्रिज की ओर लपकते हैं और बड़ी तेजी से क्योंकि देर करते ही पीछे से आने वाले यात्रीयों की भीड़ बढ़ जायेगी और ब्रिज पर चढ़ना मुश्किल हो जायगा।

 उसी बीच कोई मछली बेचने वाली अपना टोकरा लेकर आ गई तो हो गई मुसीबत। फिर तो उस भीड़ भड़क्के में आप हैं, आपकी घुटती हुई सांस है और है उपर से टपकता मछली वाला गन्धाता पानी। एक दो बूंदें पड़ने की देर है कि फिर सारा दिन आप ऑफिस में गन्धाते फिरेंगे। बहुत संभव है अमिताभ बच्चन जो पोलियो ड्राप पिलाते वक्त कहते हैं - 'दो बूंद जिन्दगी के' वाली पंचलाइन किसी ऐसे ही वक्त पर लिखी गई हो जब लेखक ऐसे ही किसी ब्रिज पर चढ़ने उतरने के दौरान अंटा पड़ा हो और पीछे खड़े मछलीवाले की टोकरी से दो बूंद उस पर टपक पड़े हों। वहीं से उसे अपनी जिन्दगी की ये दो भयंकर बूंदें याद रह गई हों और वही लिख मारा हो - दो बूंद जिन्दगी के। सच मानिये वे दो बूंदे किसी को भी जिन्दगी भर याद रहेंगी ऐसी तीखी गंध होती है मछलीवाली टोकरी से रिसते पानी का। अक्सर देखा गया है कि उन्हीं महिलाओं को ज्यादा अखरता है ये मछलीवाला पानी जो बहुत पावडर आदि लगा लूगू कर जाती हैं ऑफिस या फिर ऐसे टाईदार फस्स क्लास वाले यात्रीयों को जो कि नाक पर रूमाल रख चलने को मजबूर होते हैं।

ऐसे में मछलीवाले भी यह असहजता समझते हैं और बोलते हुए चलते हैं कि मच्छी का पानी...मच्छी का पानी ताकि सामने वाला थोड़ा रास्ता देकर चले अन्यथा दो बूंद टपक गया तो पूरा दिन ऑफिस में गन्धाते फिरेंगे। इसलिये लोग जैसे ही सुनते हैं - मच्छी पानी वैसे ही बगल हटने लगते हैं और मछली वाले को रास्ता मिलता जाता है। उसी बात का कुछ यात्री फायदा भी उठाते हैं और चुहल करते हुए नाहक मुंह से मच्छी पानी...मच्छी पानी की रट लगाते हैं जिससे कि भीड़ भाड़ में से रास्ता मिले और उन्हें रास्ता मिल भी जाता है , ये अलग बात है कि रास्ता देनें वाला उन्हें देर तक घूरते रहता है या मुंह में ही बड़बड़ाकर गरिया देता है।

           अब बात यहीं तक होती तो ठीक थी लेकिन यहां आप को ब्रिज पर चलने की अपनी रफ्तार सहयात्रियों की रफ्तार के साथ बनाये रखनी होती है। जरा सा भी आप रूके या धीमे हुए तो पीछे वाले यात्री चिल्लाने लगते हैं कि अरे जरा जल्दी चलो....नहीं चलने का तो साइड में हो जाओ। इस चिल्लाहट की भी अपनी वजह है। यात्री एक प्लेटफार्म पर उतर कर दूसरी ट्रेन बदलते हैं या दूसरे प्लेटफार्म पर किसी तेज लोकल के आने के अंदेशे में वहां जल्दी पहुंचना चाहते हैं ताकि ट्रेन छूटे नहीं। ऐसे में आप यदि चल रहे हैं तो पीछे वाले को भी लगना चाहिये कि आप को भी उतनी ही जल्दी है जितना कि उसे है वरना वो आप को टोकेगा कि जल्दी चलो। आपकी भाव भंगिमा ऐसी होनी चाहिये जैसे आप इस सुस्त चाल से परेशान हैं, चुपचाप चलने का मतलब है कि आप को कोई जल्दी नहीं है और पीछे वाला आपकी इस चाल को भांपते ही टोकेगा जरूर - अरे लवकर चलो ना।

           अब जहां इतनी जल्दीबाजी मचेगी तो शॉर्ट टेम्पर्ड लोगों के बीच कहासुनी भी होने की संभावनाएं हैं और जमकर कहा सुनी होती भी है। लोग समझते हैं इस धक्कामुक्की को और बच बचाकर चलते भी हैं कि किसी से धकड़ धुकड़ को लेकर कहासुनी न हो जाय वरना सुबह सुबह मूड खराब हो जायगा। कुछ रोचक स्लैंग्स या कहें बतकही भी सुनने में आती है। एक बार अंधेरी स्टेशन के ब्रिज पर देखा कि एक युवती किसी युवक से धक्का धुक्की वाली बात पर कुछ अनाप शनाप कह रही थी। युवक भी तैश में आ गया। लगा गरियाने कि - अगर तू इज्जतवाली होती तो ऐसे सबके सामने आरडा-ओरडा नहीं करती.....गरदी का टाईम है...धक्का लग गया तो शुरू हो गई बोम्बा-बोम्ब करने कू.... तू है ही अइसी लफड़ेवाली। अब युवक की इस बात से चौंकना स्वाभाविक है। हां भी नहीं कह सकते ना भी नहीं कह सकते। हो सकता है युवक ने जान बूझकर युवती को धक्का दिया हो या अनजाने में लग गया हो लेकिन युवती द्वारा आवाज उठाना उसे 'चालू टाइप' में कैटेगराइज कर गया। ( नारीवादी पढ़न्तू जरा इस पैरे को इग्नोर करके चलें....फालतू में हम बहसबाजी में अपना मूड़ खराब करना नहीं चाहते, क्योंकि असल मामला क्या था न मैं जानता हूं न कोई और...ये उन दोनों की बतकही थी जिसे जस का तस रखा गया है )

            ओह....इस चक्कर में तो हम भूल ही गये कि बात सांसदों के आपसी धक्का मुक्की की हो रही थी :) खैर, इन मुम्बईया ब्रिजों के बारे में थोड़ा और बताता चलूं कि जब कोई भी धक्का लगने को लेकर किसी यात्री से उलझता है तो उसे बदले में और भी धक्के लगते रहते हैं जिसका उसे पता तो चलता है लेकिन वह पहले वाले धक्के को लेकर ही अड़ा होता है कि मुझे धक्का क्यूं मारा ? उधर दोनों की पूछ पूछोर चलती रहती है पीछे वाले यात्री दोनों को धक्का देकर आगे निकलते जाते हैं। उनके लिये बाकी धक्के गौण हो जाते हैं, पहला धक्का अतिमहत्व का हो जाता है। तूने धक्का क्यों मारा......लगा क्या....लग गया तो भीड़ में चलता है.....वो छोड़.....तूने धक्का क्यों मारा ?

           समझ सकते हैं कि ऐसे माहौल में जब इन धक्काबाज सांसदों को खड़ा कर दिया जायगा तो क्या होगा ? इधर उनके बीच हुई धक्कम-धुक्की को लेकर बहस चल रही होगी उधर पीछे से आ रहे नये यात्रियों का रेला उन्हें आगे की ओर ठेल देगा। देश आगे बढ़े न बढ़े सांसद जी आगे जरूर बढ़ जायेंगे। दोनों में से कोई चालाक निकल गया तो घोषणा भी कर देगा कि मेरी लोकप्रियता का पैमाना नापना हो तो मेरे अगल बगल सट कर चल रहे लोगों को देखो, मैं कितना लोकप्रिय हूं कि लोग मूझे छूने को लालायित हैं.....सट कर चलने को बेताब हैं।

उधर दूसरा सांसद यदि और चालू निकल गया तो कहेगा - इन्हें मैने ही भेजा है...... तूम्हें घेरने के लिये :)

      हांय....ये सब मैं क्या लिख गया..... सांसद कोई  आम आदमी हैं जो इस तरह उल्लेखित किये जा सकते हैं......एक सिद्धू  भाई साहब को ही देख लिजिए.......गार्ड ने आईडेंटिटी क्या पूछ ली भाई साब  उखड़ लिये :)   कल को कहीं सिब्बल चच्चा ने देख लिया कि सांसदों को 'ब्रिजायन' करवा रहा हूँ  तो डिफेमेशन और विशेषाधिकार जैसी येअ बड़ी बड़ी धाराएं लगा देंगे......:) 

 क्या करें, जमाना बड़ा खराब है मउसी..... फिर कहा भी तो है -

रामचंद्र कह गये सिया से ऐसा भी युग आएगा,
सेंसर होगा फेसबुक और ट्वीटर भी हकलायेगा

ऐअे....रामचंद्र कह गये सिया से :)


- सतीश पंचम
 
 
 
Image Courtesy : http://www.flickr.com/photos/36838887@N05/

14 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

माझा कमरा मछिआइन मछियाइन झाला।
छान आहे तुम्ची धकियाइन पोस्ट।
काय सांगला..? नेता..! हेचा बरबर नाहीं झगड़ुन सकत। ब्लॉगर मधे शक्ति आहे।

ऐसा दृष्य आज से पहले, न देखा न सुना। ...मस्त!

रंजना said...

आजतक कभी साक्षात्कार नहीं हुआ इस दृश्य से, सो अनुमानित कर ही काम चलाना पड़ रहा है...

लेकिन जब अनुमाने पसीना छुड़ा दे रहा है तो साक्षात्कार कैसा होगा...बाप रे बाप...नै जाना मुंबई...

और नेता तो बनना ही नहीं...

:))

बाकी, बात ही बात में बात जबरदस्त कहे हैं आप...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

मस्त पोस्ट है, बोले तो लिटरेचर। मच्छी का पानी...मच्छी का पानी चिल्लाना पड़ता है? घोर अन्याय है। आरडा-ओरडा वाला डिस्क्लेमर लगाके ठीक ही किया वर्ना पता नहीं ब्लॉगर बैन एक्ट की कौन सी धारा कब कहाँ किसे खामखाँ लग जाये।

संजय @ मो सम कौन ? said...

मैं तो सेंसर लगवा रहा था,
तुझको धक्का लगा तो मैं क्या करूँ...:)

प्रवीण पाण्डेय said...

वहाँ धक्का क्या देना, जहाँ कोई निष्कर्ष न निकले।

सतीश पंचम said...

E-mail से प्राप्त गिरिजेश जी की प्रतिक्रिया....


बहुते बढ़िया! मैंने तो फेसबुक पर शेयर कर दिया।

3 महीने बम्बई में लोकल अप डाउन किया हूँ। मच्छी वाली दो बूँद से हमेशा डरता रहा।
कहाँ से शुरू कर बात कहाँ तक पहुँचा देते हैं!
भै वाह


गिरिजेश

GYANDUTT PANDEY said...

राशिद अल्वी तो चिमिरखी लगते हैं और अहलूवालिया तो ऐसे कि धरती की सेण्टर ऑफ ग्रेविटी उनकी तोन्द में हो!
ऐसे में अल्वी धक्का भी मारेंगे तो क्या लगेगा?! :)

सतीश पंचम said...

'चिमिरखी' से याद आया रागदरबारी का रूप्पन :)

अनूप शुक्ल said...

कहीं आप जनप्रतिनिधियों को ज्यादा आभिजात्य पीड़ित बताकर उनको कमतर आंकने का प्रयास तो नहीं कर रहे? ज्यादातर जनप्रतिनिधि यहीं से आगे आकर धक्का-मुक्का स्थल तक पहुंचते हैं।

Arvind Mishra said...

अब हम तो मुम्बई ,तब के बाम्बे में इसी दो बूद ज़िंदगी के बीच ही समय गुज़ार दिए ....मतलब इन दृश्यों ,बात ब्यवहार से संसद से सड़क तक आदमी अगर इम्यूनिटी गें कर ले तो उसी की सेहत के लिए अच्छा हैं न भाई!

Vivek Rastogi said...

वाह आज आपने मुंबई के सारे दृश्य हमारे सामने जीवंत कर दिये। वो लोकल और वो लोकल के पुल, और दूसरे शहर जाते हुए यात्री इन सबको आँखें फ़ाड़फ़ाड़ कर देखते हुए देखना।

अगर ऐसी च्च च्च मुंबई लोकल यात्रियों की होने लगे तो टीवी चैनल कम पड़ जायेंगे।

rashmi ravija said...

आपने ब्रिज पर का दृश्य लिखा...इसके आगे का बता दूँ..:)

जब ये मच्छीवालियाँ अपनी मच्छी वाली टोकरी लेकर लेडीज़ कम्पार्टमेंट में चढ़ जाती हैं और आराम से पसर कर बैठ जाती हैं...अगर किसी महिला ने जरा सी तेज आवाज़ में, उन्हें परे होकर बैठने को कहा नहीं कि डरा देती हैं.."फेंकू क्या मच्छी वाला पानी ??' और डर कर वो मोहतरमा दूसरी तरफ देखने लगती हैं.
एकदम राप्चिक पोस्ट

Abhishek Ojha said...

हा हा. बीच में मुझे याद आया... जब झगडा होता है और बात बहुत आगे बढ़ जाती है तो कोई बोलता है 'अबे बात पैसे की नहीं है बात इज्जत की है' और सारा लफड़ा होता ही है पैसे के लिए :)

ajit gupta said...

अरे बाप रे मुम्‍बइया ब्रिज का यह हाल! धमाकेदार रपट है। इस बार जनता यही करने वाली है कि सांसदों को लड़ता छोड़कर धकियाकर आगे निकलने वाली है। देर से पढ़ पायी, कारण, बाहर गयी हुई थी।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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