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Tuesday, December 6, 2011

चकचोन्हर बालम.....मादलेन बबुनी.........

    यह वो वक्त था जिस दिन दुपहरीये में साढ़े तीन बजे अयोध्या मसले पर फैसला आना था। चारों ओर फैले तनाव और दहशत के बीच यह शब्द कोलाज़ लिखा उठा। 'लिखा उठा' इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि उस माहौल में यही सब 'लिखहरी' चलती है, सारे  दिमागी तंतु तब च्यवनप्राश घोंटते प्रतीत होते हैं। उस पोस्ट के पुन:प्रकाशन के बीच पेश है वही......गुले-गुलज़ार.....चकचोन्हर बालम.....मादलेन बबुनी।

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       बस में बैठा हूँ...... मोबाइल एफ एम से गाने सुनते हुए नज़रें खिड़की के बाहर .......फिज़ा में अयोध्यात्मक धुंधलका फैला है...... …मन ही मन सोच रहा हूं.......उस अँधे कुँए की तलहटी किस युग तक गई होगी ......द्वापर....त्रेता....कलि.....या फिर वर्तमान सतयुग ही उस अँधे कुएं की तलहटी है.......साठ साल के अदालती उजाले से जी नहीं भरा प्यारे.......देखना चाहोगे सतयुग ईरा...... वो देखो कहीं बसों की खिड़कियों पर जाली बंधी है...... कहीं पुलिस की वैन खड़ी है........ कहीं राजनीतिक पार्टीयों के बैनर ........हर एक में पासपोर्ट साइज फोटो से लेकर लार्जर देन लाइफ वाले मुखड़े......जिन्हें देखते ही भय होता है.......इनके घर वाले इनको कैसे झेलते होंगे........कही कोई अदनी सी अपील कर रहा है शांति बनाए रखें......कोई भर भर के मार्मिक अपील कर रहा है......तो कोई धकधका कर अपील उड़ेल रहा है ....लेकिन अपील जरूर कर रहा है .........शांति की अपील.....अमन की अपील...... लेकिन किससे......जनता से.....पब्लिक से.......अरे.....जनता तो पहले ही शांत है बे...... उससे अपील क्या करना....लफड़ा करने वाले तुम लोग.....छूरी चाकू वाले तुम लोग...... औ अपील जनता से...... जा घोड़ा के सार लोग।

           एक बैनर बोल रहा है.....हिन्दु-मुसलिम-सिक्ख-इसाई.....आपस में सब भाई-भाई.....अच्छा....तो भाई होने से आपस में लड़ाई नहीं होती ......ओ अंबानीया........पढ़ा कि नहीं रे.....सर्व शिक्षा अभियान.....सब पढ़ो...सब बढ़ो............भाई भाई में कौन लड़ाई............अच्छा छोड़ो..... मत पढ़ो..... गाना सुनो एफएम वाला .....बीड़ी जलइले जिगर से पिया.....जिगर मां बड़ी आग है.....जियो रे जिगर......साला जिगर न हुआ कंपनी का बाइलर हो गया........फक फका कर जलता है।
             उ छुटभैया बैनर कहता है - जब Diwali में Ali है और Ramzan में Ram तो क्यों लड़े हिन्दु और क्यों लड़ें मुसलमान.....धुत् सारे ......अब रोमनवा में लिख लिख कर पब्लिक को बताएगा कि देखो इसमें ए है तो उसमें उ है..... इही को कहते हैं चोरकटई चाह। अरे जहां मन चंगा तो काहे का दंगा और तुम आए हो कहने इसमें अली है औ उसमें वली है.........हटाओ अपना बैनरहा बुद्धि .....साला फ्लैक्स की तरह बुद्धि भी फ्लैक्स वाली हो गई है तुम लोगन की......


              औह.......रह रह कर जेहन में ‘इनभर्सिटी’ के प्रोफेसर काशीनाथ सिंह की लिखी ‘काशी का अस्सी’ पन्ने दर पन्ने फड़फड़ा रही है – ‘परलै राम कुक्कुर के पाले....खींच खांच के लै जाएं खाले’ ......... अब जाकर पता चल रहा है कि इहका मतलब.............अशोक पांड़े जी कहिन बजरिए काशी का अस्सी............ कहां तो भगवान राम की महिमा.......और कहां तो राजनीतिक कुकुरबाजी.....ससुरों ने ले जाकर राम जी को भी मोकदिमा-मोहर्रिरी में घसीट लिया।


            बताया है काशीनाथ सिंहवा ने लिखते हुए कि - काशी के अस्सी घाट पर रहने वाले शास्त्री की दुविधा ........ मकान को किराए पर देना है इसाई महिला मादलेन को.....लेकिन कैसे दें...... एक तो इसाई.....औ दूजे महिला..... लेकिन मोह ए किराया बड़ा भारी...... लागी छूटे नाहीं रमवा............मन मारकर तैयार हुए.........आखिर समझाने वाले कन्नी गुरू ...... समस्या आई अटैच बाथरूम की......मादलेन को अटैच बाथरूम चाहिए....करने कुरने के लिए............

          तब बोले कन्नी गुरू.......औ जम के बोले...... शास्त्री जी आप का गोत्र मेरे गोत्र से नीचे है.....मेरा गोत्र आपके गोत्र से उंचा है........ मैं बता रहा हूँ ..... वही मानिए ...... टाइलेट के लिए वही कमरा दे दो.... थोड़ा फेरबदल करने से अटैच टाइलेट बन जाय तो क्या हरज ।
             अरे वो कमरा....... उहां तो महादेव जी हैं....रास्ते में आते जाते लोग फूल माला भी चढ़ाते हैं महादेव जी पर.........कैसे उसे स्थान को टाइलेट में बदल दूं.......लेकिन जब समझाने वाले कन्नी गुरू..... तो जाता कहां है रे......अरे महादेव जी कोई रामलला हैं जो एक जगह जम गए तो जम गए.....अरे महादेव जी ठहरे नंदी बैल वाले हैं....आज इहां....तो कल उहां.....वो कौनो एक जगह टिकने वाले थोड़ी हैं......और आप हो कि महादेव जी को कैद करके कुठुली में रखे हो.....पाप....घोर पाप..... दे दो कमरा मादलेन को....बना दो टाइलेट....और......देखते देखते घर के आगे बालू.....इंट....गिरने लगी......टाइलेट जरूरी..........किराया जरूरी.......जय हो प्रभू तार लिया..........ओ काशीनाथ.....आरे वही कासिनाथ राजेस ब्रदर के सामने पेपर बिछा कर लाई रख के एक झउआ मिरचा बूकता था.....ओही कासीनाथ.................जियो रे इनभर्सिटीया बुद्धि .....का लिक्खा है........जय हो मादलेन...... जय हो कन्नी गुरू.......जय हो दालमंडी.....दालमंडी बूझते हो न कि उहो में फइल......।

        लेकिन है बतिया वही........... कि राम रहें कि महजिद ..........औ फिर उन चकचोन्हर पार्टी लोगन का क्या.....किस पर लड़ेंगे.....किस पर लड़वाएंगे ........मु्द्दा खतम......ए नेताइन......कल ......कचहरी लग रही है...........फैसला हुई जाई.....आज से नेताई वाला खरचा पानी बन्न......कहां से खिलाएंगे लइका बच्चा.......कहां से फीस उस भरेंगे..............कचहरीया बालम छिटकाने वाले हैं. ..... इल्लो.... गुलजार बीड़ी सुलगाय दिए हैं...... जलाते हुए FM पर बोल रहे हैं..........इक दिन कचहरी लगाय लियो रे....बोलाय लियो रे ....दुपहरी...............का हो पांड़े........मुकदिमा का फैसला कब है........अरे उहै आर....कहा है न कि....... पान खाए मुन्नी जरूर मिलना...... साढ़े तीन बजे....... मुन्नी जरूर मिलना .........साढ़े तीन बजे......... चलो जो भी होगा..... फइसला मनबै के परी......बकि सुपरीम कोरटो त है बाद में........


           धुत्त सारे......तूम ठीक दुपहरीया की पैदाइस हो.........जौन होगा इहीं होगा कि तुम और सुपरीम कोरट को बीच में ला रहे हो.......एकरे बाद सब बवाल फवाल बंद........... का कहते हो यादौ जी......बोलो जोर से ...........बिरिन्दाबन बिहारी लाल की जय......राम लला की जै.......भईया राम राम..... जय सिरी राम....... गुड आफ्टरनून.......... अबे साले तुम अब जैरमी करना भी छोड़ि दोगे क्या .................बोलो आँख मून्न......गुड आफ्टर नून्न.


- सतीश पंचम


स्थान - अयोध्या से पन्नरह सौ किलोमीटर दूर।


समय - वही, जब साठ साल पुराने अँधे कुँएं मे झांकते समय आँखों पर चोन्हा मारने लगे।

(इस शब्द कोलाज़ का आधार काशीनाथ सिंह की लिखी 'काशी का अस्सी' और गुलज़ार की 'बीडी़ जलइले' है.....बेहतर परिणाम हेतु काशी का अस्सी जरूर पढ़े.....दिमाग के सारे तंतु खिल उठेंगे :)

15 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अगर आपकी पोस्ट झाड़ कर इसकी सारी बिंदियां (.................) गिरा दी जाएं तो इसका साइज़ आधा तो कम हो ही जाएगा :-).

पोस्ट नि:संदेह बढ़िया है.साधुवाद.

प्रवीण पाण्डेय said...

पढ़ा हुआ पुनः याद आ गया, शब्जों का दम शाश्वत बना पहता है।

Arvind Mishra said...

मिक्सचर काशी गुलजार पंचम -बड़ा मीठा है !

Rahul Singh said...

यह तो एक छोटी सी लेकिन पूरी फिल्‍म चल गई.

ajit gupta said...

भाई-भाई नहीं लड़ते क्‍या? अम्‍बानी बंधुओं का स्‍मरण तो गजब कर गया। इस दुनिया में लड़ाई ही शाश्‍वत है। आज ये लड़ रहे हैं कल और कोई लड़ेगा।

GYANDUTT PANDEY said...

देश भड़वा है, रांड़ है।
राम देव नहीं, बन गये ब्राण्ड हैं!

संजय @ मो सम कौन ? said...

इत्ती चर्चा सुन चुके हैं काशी का अस्सी’की. तलाशते हैं फ़्लिप कार्ट पर।

देवेन्द्र पाण्डेय said...
This comment has been removed by the author.
देवेन्द्र पाण्डेय said...

अबहिन जारी है 'गँड़ऊ गदर'।

पोस्ट चकाचक है पर इत्ती सारी बिंदी काहे सजाई दियो! ई का भांग क गोली अहै जौन छाने जात हौ चकाचक !

mukti said...

पहले पढ़ चुके हैं. एकदम सतीश पंचम टाइप चौचक पोस्ट है. काशीनाथ सिंह की जय :)

अनूप शुक्ल said...

पोस्ट के पुनर्प्रकाशन पर टिप्पणी का पुनर्डन किया जा रहा है:

कभी-कभी तो लगता है कि ये कुछ शाश्वत लफ़ड़े न होते तो हम अपनी ऊर्जी की ऐसी-तैसी कैसे करते?

बहुत खूब!

Abhishek Ojha said...

कासीनाथ सिंगवा तो गजबे किताब लिखा है. अभिये पढ़े हैं :)

संजय @ मो सम कौन ? said...

पंचम भाई, दोहरा धन्यवाद स्वीकारें। मजा आ गया है, आ रहा है, आता रहेगा:)

रंजना said...

हम पहिला बार पढ़े हैं....

का कहें अभी त बकारे बंद है एकदम से...

लेखन अस्तर का परसंसा का सब्द खोजने कहाँ जायं??

माथा खजुआ खजुआ प्राण दिए हुए हैं,मुदा बुझा नहीं रहा कुच्छो...का कहें...??

अद्वितीय है....अद्वितीय !!!

abhishek shrivastava said...

sateesh bhaiya, maja aa gaya,gachagcha ke.

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