सफेद घर में आपका स्वागत है।

Tuesday, November 15, 2011

पूंजीवादी पोल-डांस v / s मेहनतकश भिखमंगे ........

       'किन्न-पिसर को बेलआउट चहिये...वही 'किन्न-पिसर' जिसके कैलेण्डरों में 'मलाई टांगों' वाली बालाएं अठखेलीयां करती नजर आती हैं जिन्हें देख देख मदेरनहे बूढ़े 'बाईग्रा टून्टी फोर' औ 'सिक्सटी प्लस' गुलखोंस की चाहना करने लगते हैं। जियो रे मदेरनहे बूढ़ो...जियो..।  उधर लाल घोड़ी जी कह रही हैं कि यह तो अमीरों, राजाओं का शौक है, जो हुआ उसमें कत्तई आपत्तिजनक नहीं है। वाह री लल्लन टाप छौंड़ी....जिती रह।

       बदे की बात है, वरना यही भंवरजाल वाली कहीं मदेरन के घर आकर लाली सिन्दूर पहन बैठ जाती, तो देखना था कि इन मोहतरमा का क्या रियेक्शन होता। क्या पता कोई बैठी भी हो लेकिन जतलाना न चाहती हों। भई राजाओं की पटरानी फटरानी जैसा भी तो कुछ होता है न, बस वही समझ लो। मैं इसीलिये इस तरह के लोगों के लिये 'खंभेबाज बुद्धिजीवी' शब्द इस्तेमाल करता हूं क्योंकि ये जानते हैं कि देश का समूचा सिस्टम डेमोक्रेसी के चार खंभों के इर्द गिर्द सिमटा है जिससे सटकर वह बेखटके पोल डांस कर सकते हैं, टांग उठाकर उसे नम कर सकते हैं, फ्लाइंग किस का आदान प्रदान कर बहस की जुगाली कर सकते हैं और तो और खुले आम ललकार कर कह सकते हैं कि जो करना है कर लो, हम तो ऐसे ही जीतकर आए हैं, और आगे भी आएंगे।

        उधर युवराज पर दिग्गी गुरू की संगत खूब गुल खिला रही है, खूब रंगत बिखेर रही है। कमाने धमाने, गरीबी को पीछे छोड़ विकास की अलख जगाने अपना गाँव-देश छोड़ कर बाहर गये लोग उन्हें भिखारी नज़र आते हैं। वाह रे सोच। गजब की सोचैती है। लेकिन क्या युवराज को यह नहीं दिखता कि हर प्रदेश में कहीं न कहीं से लोग माइग्रेट करके भिखमंगे बने हुए हैं, मेहनत से, पसीना बहाकर
किसी तरह जी खा रहे हैं। उन्हीं के लहजे में कहा जाय तो एक तरह से पूरा देश ही भिखमंगा है.... और ग्लोबल स्तर पर वे सारे देश जहां इस तरह की माइग्रेटरी परिस्थितियां मौजूद हैं। अमेरिका में तो अमूमन  ज्यादातर लोग भारत से भीख मांगने ही गये हैं, बाकायदा ग्रीन कार्ड और अला फला रंग के कार्ड लेकर।

        वैसे भी  जिस पंजाब के बारे में बड़ा गुमान से बतिया रहे हैं, क्या उन्हें नही पता कि पंजाब के भिखारी ( युवराज की जुबान में)  भारत के हर प्रदेश में स्पेयर पार्ट बेच रहे हैं, दूर दराज के इलाकों में भी ढाबा खोले हुए हैं। क्या उन्हें नहीं दिखता कि राजस्थान के मारवाड़ी भिखारी कलकत्ता में जमें हुए हैं, फल फूल रहे हैं। नहीं, उन्हें कैसे दिखेगा, उन्हें तो वही दिखेगा जो उन्हें दिखाया जायगा, पढ़ाया जाएगा। उन्हें किन्नफिसर की मंगैती में भिखमंगापन नजर नहीं आता, उस तरह के भिखमंगेपन में भी एक तरह की एलीटनैस नजर आती है। 'बेलआउट' जैसे शब्द ऐसे ही एलीट भिखमंगेपन को खूबसूरती से ढंकने वाले शब्द हैं।

        बहरहाल जो कुछ कहना था, ऐसी तैसी करनी थी युवराज ने कह दिया। अब दूसरे लोग खेलें 'हिंगोट'..... वही 'हिंगोट' जिसमें दो गाँवों के लोग जलते हुए गोलों को एक दूसरे पर फेंक खुश होते हैं, ठहाका लगाते हैं, हल्ला मचाते हैं और मौके पर परंपरानुसार पहुंचे बड़े गणमान्य लोग लोहे के जाल की ओट में बैठ खेल और उससे जुड़े सरोकार से जुड़ते हुए खेल का आनंद लेते हैं। यहां भी वही 'राजनीतिक हिंगोट' खेली जा रही है। एक पक्ष ने पहले जो कुछ कहना था कह दिया, अब दूसरा पक्ष अपने हिंगोट तौल रहा है, मिट्टी के तेल में भिगो रहा है। वह भी कुछ न कुछ करतब दिखायेगा ही वरना इस हिंगोटपन्ती का आनंद अधूरा रहेगा।

      इधर देखने में आया कि एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेश के लोगों को भिखारी का तमगा दिये जाने से मगन हैं, साफ है कि उन्हें अपने विकसित होने पर गर्व है। उन्हें लगने लगा है कि औरों के मुकाबले हम विकास की दौड़ में आगे हैं। यह वह राजनीतिक जादूगरी है जो बिरले लोग ही कर पाते हैं। विकास को लेकर कुछ ठोस भले न किया हो, कम से कम एक प्रदेश को दूसरे का दाता बताकर जरूर उनमें विकसित होने का दंभ तो भरा जा सकता है। भले ही उस विकसित राज्य का फटा सीने में भिखारी राज्यों का खून-पसीना ही क्यूं न लगा हो। अभी कुछ दिनों पहले आंध्र प्रदेश में चलने वाले आंदोलन से के चलते रेल सेवाएं बाधित हुई, वहां से आने वाले कोयले की आवक पर असर पड़ने लगा और देखते ही देखते विकसित कहलाने वाले राज्य के हाथ पैर फूल गये कि इतने दिन का ही कोयला बचा है, बताओ कैसे चलेगा। न्यूक्लियर भट्टी लगाने का माद्दा है नहीं, जापानी विनाश को देख हिम्मत नहीं हो रही औ जुबान दस गज़ की, ......हम प्रभु प्रदेश हैं। हुंह......थू है ऐसी प्रभुताई पर जो गरीब गुरबों की पसीने की कीमत को एक झटके में भिखमंगा कहकर नकार दे।

       यदि बात भीख मांगने पर ही होनी है तो ठीक है, हम भिखमंगे ही सही, कहीं न कहीं कुछ कर खा लेंगे, जीयेंगे लेकिन इतना जरूर पता है कि युवराज और उन जैसे लाल घोड़ा छाप नेताओं को जिस दिन आम आदमी की तरह खटना पड़ेगा, सब्जी की भारी भरकम टोकरी सिर पर रख गली कूचे चलना पड़ेगा, ट्रक से बोरा उतार सड़क पार कर दुकान में रखने जैसा काम करना पड़ेगा उस दिन वे ईश्वर से जरूर मनायेंगे कि इससे अच्छा तो भगवान उन्हे मौत दे दे...कम से कम इस जीते जी नरक जैसा जीवन तो न जीना पड़ेगा.... तिल तिल कर मरना तो न होगा....कोई उनके मेहनत को हिकारत से देख अपने वोटों की ललक में भिखारी तो न बतायेगा।

    उफ्........अभी और कितना पतन बाकी है पूंजीवादियो.....और कितना.........मानव श्रम का ऐसा मान-मर्दन ?

घृणा आती है मुझे तुम जैसे राजनेताओं से सिर्फ घृणा...।


- सतीश पंचम

15 comments:

रचना said...

ये युवराज कहना मीडिया का कुछ ज्यादा कांग्रेस प्रेम दर्शाता हैं बाकी लिखा तो बढ़िया हैं ही आपने और सही भी http://mypoeticresponse.blogspot.com/2011/11/blog-post_15.html

प्रवीण पाण्डेय said...

हर जगह ही विकास हो और उसमें हर एक सहयोग हो, किसी एक को श्रेय क्यों दिया जाये।

Gyandutt Pandey said...

1880 से 1930 के बीच कश्मीरी भी इलाहाबाद आये थे। नेहरू, सप्रू, काटजू --- पता नहीं तब कोई भिखमंगत्व उनमें देखा परखा गया था या नहीं!

Poorviya said...

allahabad main kiya ganga main dubki lagane gaya thaa..


vote ki bheek magane hi to gaya tha sa....l ....bhikari kahi ka...

jai baba banaras...

Vivek Rastogi said...

किन्न फ़िसर की तो फ़िस फ़िसी ही निकल जायेगी और सही है नेताओं को छोड़ भिखारी ही सही।

त्यौहार पर सीधे पहली गाड़ी पकड़कर अपने घर अपने जड़ की तरफ़ भागते हैं, अब आप कैसे समझोगे युवराज !

रंजना said...

सौ टका वाजिब कहे...हम सब के हिरदय की बात...

rashmi ravija said...

'बेलआउट' जैसे शब्द ऐसे ही एलीट भिखमंगेपन को खूबसूरती से ढंकने वाले शब्द हैं।

बिलकुल सही कहा...'भीख' जैसे शब्द की जगह गरीबी से बेल आउट करवाना कहना चाहिए.

संजय @ मो सम कौन ? said...

काहे बेचारे के पीछे पड़े हैं आप? कोई अपने मन से थोड़े ही न बोले हैं, जैसा सिखाया पढ़ाया गया, बोल दिया।
’ हम भिखमंगे ही सही, कहीं न कहीं कुछ कर खा लेंगे, जीयेंगे ...’ - लावारिस में गाना है न, आप का क्या होगा जनाबे आली - वो याद आ गया।

वाणी गीत said...

अभी तो उत्तर प्रदेश के चार हिस्से और होने हैं और देश के जाने कितने ...
फिर हर व्यक्ति प्रवासी भिखारी ही होना है !

संतोष त्रिवेदी said...

यू बुढवन के लिए मदेरनहे शब्द का ईजाद हाहाकारी है !

लल्लन-टॉप पोस्ट !

ajit gupta said...

और उनकी मैया इटली से भीख मांगने यहाँ चली आयीं? अब अमेरिका इलाज की भीख मांग रही हैं। आज प्रांतवाद फैला रहे हैं कल शहर-शहर का खेल खेलेंगे। वैसे एक-दो मुकदमें ठुक गए हैं तो ठीक ही रहा।

Arvind Mishra said...

इन दिनों घृणा की बयार ही नहीं आंधी के आसार हैं ...बस लोगों को केवल सत्ता दिखायी पड़ रही है ....मगर अभी तो पिजरे वाली मुनिया का अही जोर है -और ऐसी बेवकूफियां उसे और शान पर चढ़ा रही हैं !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सिक्के की खनक से ही पता लगता है कि खोटा है या खरा। इन्हें बोल-बोलकर अपनी असलियत खुद ही ज़ाहिर करने दो। लोक उतना कमअक्ल नहीं होता जितना कुछ "अधेड़राज" मानते हैं। भारत ही नहीं, संसार की प्रगति के पीछे आप्रवासियों का चिंतन-श्रम-खून-पसीना लगा है। ... और आपकी लेखन शैली तो लाजवाब है ही।

Udan Tashtari said...

एकदमे सन्नाट.,...

Udan Tashtari said...

एकदमे सन्नाट.,...

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.