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Friday, November 4, 2011

PUC वैन.......

            मैं सड़क के किनारे खड़ी PUC वैनों को जब भी देखता हूँ मुझे यूँ प्रतीत होता है जैसे यह PUC Van डिट्टो हमारी भारत सरकार ही है। चार बेहद पुराने घिसे पहियों पर टिकी वह वैन एकदम भारत सरकार का प्रतिरूप नजर आती है, जिसके पहियों को देख कुछ 'खंभेबाज बुद्धिजीवी' इन्हें लोकतंत्र के चार स्तम्भ बताने का शौक पालते हैं। यदि ध्यान से इस PUC Van को देखा जाय तो पता चलेगा कि पिछले डेढ-दो साल से यह PUC Van एक ही जगह खड़ी है, उस पर धूल की मोटी परत चढ़ी है, टायरों के पास छोटे-छोटे पौधे उग आये हैं, झाड़ झंखाड, चींटियां-तिलचट्टे रेंगने लगे हैं, चेसिस के नीचे एकाध कुत्ते जीभ बाहर निकाले ठंडक ले रहे हैं और ऐसे ही दिव्य माहौल में यह PUC Van बेफिक्र होकर शहर भर की महंगी-सस्ती, अच्छी-बुरी सभी गाड़ियों को लाइसेंस बांटे जा रही है। पचास रूपये टिकाओ, पंप सटाओ और पप्पू पास। अब ले जाइये इस 'पास' को शान से लहराते हुए।


          ठीक यही हाल हमारी सरकार का भी है। सालों से एक ही जगह टिकी उसकी छांह में भी दलाल टाइप श्वान प्रजाति छंहाती नजर आती हैं, छोटे छोटे पौधे, तिलचट्टे, चीटियों के मानिंद दलाल लोग रेंगते नजर आते हैं। कुटीर- बृहद...अल्प-बहुल सभी टाइप के लाभार्थी नजर आते हैं सरकारी छांह में। एकाध बार तो देखा गया गोजर टाइप की प्रजाति भी उसके टायरों में आश्रय पाने में सफल होती है जिसके चलते समय उसके पैरों का सिंक्रोनाइजेशन भ्रष्टाचारी हथेलीयों का समरूप नजर आता है। पहले इस विभाग में कुछ टिकाओ....फिर अगले....और अगले.....और.....तब आप की फाइल आगे बढेगी। मजे की बात तो ये कि सारे के सारे गोजर प्रजाति के जीव इन टायरों पर ही ज्यादा नजर आते हैं जिसे खंभेबाज बुद्धिजीवी लोकतंत्र के चार स्तम्भ बताते नहीं थकते। कुछ कविता भाव में कहूं तो - एक टायर कार्यपालिका का.....एक टायर न्यायपालिका का.....एक टायर विधायिका का....और एक टायर पत्रकारिता का। इन तमाम टायरों पर चिपके गोजर, फफूंद, तिलचटटे आदि मिलजुलकर एसा सटायर क्रियेट करते हैं मानों वे बने ही एक दूसरे के लिये हों। इसी बीच एकाध कुत्ता कहीं से आकर टायरों को नम कर जाता है तो उन टायरों में और नमी आ जाती है।

      बहरहाल, अगली बार आप जब भी किसी PUC वैन को देखें तो एक बार उसकी बॉडी लैंग्वेज, उसकी नाप-जोख, उसकी भाव भंगिमा पर थोड़ा ध्यान दें। बच्चों को यदि नागरिक शास्त्र पढ़ाना चाहें या दिखाना चाहें कि सरकार किसे कहा जाता है, वह दिखने में कैसी होती है, काम कैसे करती है तो बेखटके किसी PUC वैन के पास उन्हें लेकर जाइये और बताइये.......सरकार ऐसी होती है :-)



- सतीश पंचम

17 comments:

संतोष त्रिवेदी said...

कुत्ता-स्नान के बाद फफूँद महराज भी अपना ठीहा जमा लेते हैं !
भयंकर दृश्य !

Gyandutt Pandey said...

सरकार के प्रति इतना आक्रोश है कि जो भी चिरकुट, घटिया, सड्डल्ला, अहदी नजर आता है, सरकार सा ही लगता है!
आपकी कलम तो उत्तरोत्तर निखार पर है! बहुत जानदार लिखते हैं बेजान चीजों पर भी!

प्रवीण पाण्डेय said...

और जब यह भोंपू बजाये तो।

Poorviya said...

.सरकार ऐसी होती है ...satya kaha ...


jai baba banaras.....

संजय @ मो सम कौन ? said...

जबरदस्त तुलना।
परसों ही बाईक का पोल्यूशन चैक करवाया था और कमोबेश यही ख्याल आ रहे थे लेकिन इतने सशक्त तरीके से नहीं।
मान गये उस्ताद।

Vivek Rastogi said...

अपन तो इससे अभी तक बचे हुए हैं, क्योंकि अपन कोई वाहन ही नहीं चलाते हैं, और ऐसे जाने कितने डब्बे हमने लिंक रोड पर स्थापित देखे हैं ।

rashmi ravija said...

इन तमाम टायरों पर चिपके गोजर, फफूंद, तिलचटटे आदि मिलजुलकर एसा सटायर क्रियेट करते हैं मानों वे बने ही एक दूसरे के लिये हों।

वाह..क्या तुलनात्मक अध्ययन है..:)

ajit gupta said...

देश में कोई सरकार भी है, अब तो शक सा होने लगा है। बस एक झमूरा रोज कुछ न कुछ बोलता दिखायी दे जाता है तब लगता है कि यह बताने की कोशिश कर रहा है कि सरकार है और वो सो रही है बस हम ही जाग रहे हैं तो कुछ न कुछ बड़बड़ाते हुए घूम रहे हैं। ऐसी दुर्दशा इससे पहले कभी नहीं रही। आपने सही चित्रण किया है।

abhi said...

हा हा :) सही है!!! :P

Arvind Mishra said...

सटीक और जोरदार तुलना

संगीता पुरी said...

मैं सड़क के किनारे खड़ी PUC वैनों को जब भी देखता हूँ मुझे यूँ प्रतीत होता है जैसे यह PUC Van डिट्टो हमारी भारत सरकार ही है। चार बेहद पुराने घिसे पहियों पर टिकी वह वैन एकदम भारत सरकार का प्रतिरूप नजर आती है, जिसके पहियों को देख कुछ 'खंभेबाज बुद्धिजीवी' इन्हें लोकतंत्र के चार स्तम्भ बताने का शौक पालते हैं।
क्‍या सोंच है !!

Abhishek Ojha said...

हा हा. ये तो हमने भी ओबजर्व किया है, पुणे में जब भी औंध के पास ब्रिज क्रोस करते. एक बार अपने दोस्त से जरूर बोलते की ये गाडी पोल्यूशन कण्ट्रोल के लिए है या बढाने के लिए :)

अनूप शुक्ल said...

ज्ञानदत्त जी की टिप्पणी से सहमत!

एक और उपमा - सरकार को मंदिर के घंटे की तरह समझा जाता है जिसे जिसे देखो आकर बजा देता है और सोचता है उसकी मुराद तो पूरी होइबै करेगी! :)

सतीश पंचम said...

अनूप जी,
यह सच है कि सरकार को मंदिर के घंटे की तरह समझा जाता है जिसे कोई भी आकर बजाना शुरू कर देता है। मजे की बात यह है कि सरकार भी मंदिर के भगवान की तरह ही है। उस पर चढ़े बिल्वपत्रों को जब तब बकरियां आकर चर जाती हैं लेकिन सरकार कुछ नहीं करती( ज्ञानजी गवाह हैं इस दृश्य के :)

वैसे देखने में आया है कि भक्त मंदिर में घंटा बजाकर भक्तिभाव से ताकता रहता है लेकिन सरकारी मूर्ति मंद मंद मुस्की मारते रहती है। ऐसे में भक्त को लगता है कि सरकार हमारा मजाक उड़ा रही है। जाहिर है ऐसे में भक्तिभाव वाला शख्स तात्कालिक रूप से अमिताभ बच्चन बन जाता है जोर से घंटी बजाकर पूछता है - खुश तो बहुत हुए होगे तुम.....हांय :)

उधर एक घंटा अन्ना हजारे भी लगातार बजा रहे हैं कि इस वैन को सुचारू रूप से चलाने हेतु उन्हें भी एक टायर के रूप में शामिल किया जाय लेकिन सरकार है कि इस बात पर डटी है कि यह वैन मूल रूप से चार टायर वाला ही है, इसमें पांचवा टायर कहां लगेगा। आपका बहुत मन है तो स्टेपनी के तौर पर रख लेते हैं। जब कहीं कुछ पंचर हुआ तो बदल देंगे।

लेकिन टीम अन्ना इस बात पर अडी है कि जब वैन चल ही नहीं रही, एक जगह खड़ी है तो पंचर होने का सवाल ही नहीं। ऐसे में स्टेपनी के तौर पर लोकपाल मंजूर नहीं। लगाना है तो पांचवे टायर के रूप में फिट करो, हो सके तो जैसे ट्रकों में पीछे दो दो टायर एक साथ लगते हैं वैसे ही सटाकर न्यायपालिका वाले टायर में जोड़ दिया जाय तब ही हम मानेंगे। लेकिन सरकार है कि अड़ी है। पांच टायर वाला वैन नहीं होगा, चार टायर इसकी मौलिक संरचना है और अदालती आदेश के तहत किसी के मौलिक ढांचे से छेड़छाड़ निषिद्ध है :)

btw, कुछ लोग कह रहे हैं कि अन्ना आप टायरों में हवा भरने वाला पंप बन जाइये, खड़े खड़े वैन के पहिये फुस्स हो रहे हैं, रह रहकर हवा भरने का काम करेंगे तो भी चलेगा। अन्ना शायद तैयार भी हैं लेकिन टीम अन्ना के बाकी सदस्यों के हिसाब से पांचवा टायर/ स्तंभ बनने से कम पर बात नहीं होगी। पांच टायरों वाला वैन बनकर रहेगा।

मनोज कुमार said...

क्या कहूं? हम भी सरकारी आदमी हूं। बस एक ठो गाना गा लेता हूं ...
ऊपर वाला दुखियों की नाही सुनता रे
कौन है जो उसको गगन से उतारे

दीपक बाबा said...

जबरदस्त

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

बहुत सुन्दर गजब का ध्यान आकर्षित कराया आप ने
आनंद आ गया विचारणीय पोस्ट ..ऐसा ही है कौन है देखने वाला ..
भ्रमर ५

चार बेहद पुराने घिसे पहियों पर टिकी वह वैन एकदम भारत सरकार का प्रतिरूप नजर आती है, जिसके पहियों को देख कुछ 'खंभेबाज बुद्धिजीवी' इन्हें लोकतंत्र के चार स्तम्भ बताने का शौक पालते हैं। यदि ध्यान से इस PUC Van को देखा जाय तो पता चलेगा कि पिछले डेढ-दो साल से यह PUC Van एक ही जगह खड़ी है, उस पर धूल की मोटी परत चढ़ी है, टायरों के पास छोटे-छोटे पौधे उग

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