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Sunday, November 27, 2011

जिन्दगी का एक एपिसोड ऐसा भी रहा......

     यूं तो हम बड़ा हउंकते-फउंकते हैं कि हम ये हैं, हम वो हैं लेकिन शरीर की एक जरा सी नस क्या खिंच जाती है, नजरिया 'तिरपन-चउअन' हो उठती है। उस वक्त शरीर के सारे अवयव धमनी, शिराएं, नील, अलय, अलिंद एक साथ सारे कपाट सामूहिक क्रंदन करते हुए लगते हैं। अभी हाल ही में कुछ इन्हीं तरह की परिस्थितियों से दो चार हुआ हूँ।


          हुआ यूं कि बेड पर बैठे-बैठे लैपटाप पर कुछ काम कर रहा था कि अचानक लगा कि बायें पैर की नस कुछ खिंच सी रही है। लैपटाप साइड में रखकर खड़ा हुआ लेकिन नस सामान्य होने की बजाय और तेजी से खिंचने लगी। अभी एक-दो सेकंड बीते थे कि यूं लगा जैसे बांए पैर की नस एंठने सी लगी है, ठीक से खड़ा होना मुश्किल। श्रीमती जी और बच्चे एकसाथ चौंके कि ये क्या हो रहा है मेरे साथ। श्रीमती जी के कंधे का सहारा लेकर खड़े होने की कोशिश की लेकिन कटे पेड़ की तरह जमीन पर मैं गिरा जा रहा था। श्रीमती जी परेशान कि अब क्या करूं। और तभी मुझे अचानक ही तमाम आवाजें सुनाई देनी बंद हो गईं। कानों में एक पतली सीटी सी बजती लगी। भयंकर गर्मी से मेरा पूरा बदन पसीने से नहा गया। करीबन तीस-पैंतीस सेकण्ड बीते होंगे कि मुझे उल्टी सी आने लगी, किसी तरह श्रीमती जी वाश बेसिन की ओर ले गईं, पहुंचते ही भड़ाक्...... जो कुछ खाया पिया था सब बाहर।

अब......

    उल्टी होते ही अगले कुछ क्षणों में महसूस हुआ कि जी हल्का हुआ है, मेरा ध्यान पैरों की ओर गया। दर्द वहां कुछ कम तो हुआ था लेकिन नसें अब भी जैसे चटक रहीं थीं, खिंच रही थीं। एक दो सेकंड बाद आवाजें भी हल्के-हल्के सुनाई देनें लगीं, मेरी श्रवण शक्ति कुछ-कुछ लौट रही थी। नसों की एंठन अब भी रूकी न थी। जरा सा पैर हिलता और नस फिर खिंच उठती। मैं लेटना चाहता था, श्रीमती जी मुझे वाश बेसिन के पास से हटा उचित जगह पर सुलाना चाहती थीं लेकिन हालत ऐसी नहीं थी कि जरा भी आगे बढ़ पाउं। जरा सा पैर इधर-उधर मुड़ते ही फिर से नसों का भयानक दर्द शुरू होना चाहता। नतीजतन वाश बेसिन के पास वहीं जमीं पर मैं धीरे से लेट गया। परिवार के लोग सकते में थे कि क्या किया जाय, किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाय। उधर मैंने धीरे से अपना एक पैर दूसरे पैर पर सहारा देते हुए रख दिया। नसों का एंठना कुछ कम हुआ। धीरे-धीरे सारा दर्द कम से कमतर होता गया और अगले दो तीन मिनट के भीतर ही मैं सामान्य सा हो गया। वाश बेसिन में मुँह धोया, पानी के छींटे मारे और बिस्तर पर पड़ गया। श्रीमती जी ने चादर ओढ़ा दी। जिद करने लगीं कि डॉक्टर के पास अभी के अभी चला जाय, भाई भी तब तक आ गये, उन्होंने भी जिद किया कि चलिये अभी के अभी डॉक्टर के पास। लेकिन मुझे उस वक्त सोना अच्छा लग रहा था। मुँह पर पड़े पानी के छींटे शीतलता प्रदान कर रहे थे। मुझे जहां तक याद आ रहा है, मैं बिल्कुल बच्चे की तरह पैरों को सिकोड़कर सोया था और बदहवास श्रीमती जी जिद कर रही थीं कि डॉक्टर के पास चलते क्यों नहीं।

       आँख खोलकर श्रीमती जी को आश्वस्त किया कि अब सब ठीक है, सुबह चलते हैं। इस वक्त इतनी रात मैं नहीं जाने वाला। उधर छोटे भाई मुझ पर गुस्सा हो रहे थे कि नाहक जिद कर रहा हूँ। लेकिन मैं था कि उठना नहीं चाहता था और अंतत: नहीं ही गया। इतना याद है कि रात भर श्रीमती जी उठ उठ मुझे देखतीं, माथे पर हाथ रखतीं, पैर दबाती और फिर सो जातीं। मेरी नींद ऐसे में कई बार खुली। अगले दिन जब उठा तो सिर भारी-भारी लगा। सुबह सुबह ही अपने कश्मीरी डॉक्टर गुप्ता जी के पास पहुँचा। उनसे पिछली रात वाली घटना का जिक्र किया तो उन्होंने तुरंत ही CT Scan की सलाह दी। जरूरी भी था क्योंकि जिस वक्त नस खिंची थी मैं क्षण भर के लिये कुछ सुन नहीं पा रहा था और उस दौरान उल्टी भी आई थी। डॉक्टर से मिलते वक्त भी सिर दर्द हो रहा था। अमूमन सिर में या ऐसे किसी हादसे के बाद उल्टी आना काफी खतरनाक माना जाता है।

      नतीजतन, अगले ही घंटे CT Scan की मशीन के सामने था। फिल्मों में कई बार देखा था कि लोगों को सुलाकर एक मशीन के भीतर खिसकाया जाता था, लेकिन यह मेरा पहला अनुभव था। ठंडे ठंडे माहौल में जब मुझे मशीन पर लिटाकर उस गोल चैम्बर में खिसकाया जा रहा था, तब कुछ अजब सा लगा। अंदर चैम्बर में जब सिर गया तो अचानक आपरेटर ने कुछ बटन-बूटन दबाया और एक हल्की रोशनी मेरे सिर के इर्द गिर्द घूमने लगी। यूं लगा जैसे सारा ब्रह्माण्ड मेरे सिर के इर्द गिर्द चक्कर लगा रहा है। तीन चार मिनट बाद वह सारा जादुई माहौल खत्म हुआ। ठंडे चैम्बर से बाहर आया। मन में एक आशंका कि क्या होगा, क्या न होगा, बदन में अब भी पिछली रात के हादसे की वजह से हरारत थी। रिसेप्शन पर पूछा तो पता चला कि रिपोर्ट अगले दिन शाम को मिलेगी।

      घर पहुंचने तक मन में तमाम उलूल-जूलूल खयाल आते रहे। न जाने रिपोर्ट में क्या आये क्या न आये। ध्यान बंटाने के लिये फेसबुक पर समय बिताया, एकाध स्टेटस अपडेट किया। ब्लॉगों पर चक्कर लगाया तो हर जगह पवार को पड़े तमाचे की गूंज थी। हरविन्दर, पवार और तमाचा सब जगह छाया था। मन में आया कि फेसबुक पर स्टेटस लिख दूं - 'जब जब सीता जैसे पवित्र लोकतांत्रिक प्रणाली का  बलशाली नेताओं द्वारा हरण होगा, हरविन्दर जैसे जटायु झपट्टा मारते रहेंगे'। लेकिन वह सब लिखने का मन भी न हो रहा था.... न ही किसी की खिंचाई कर मौज लेने जैसी बात मन में उठ रही थी। ध्यान बार-बार पिछली रात के हादसे की ओर जा रहा था कि आखिर क्या था जो मेरी हालत अचानक ही एकदम असहाय, जीर्ण, कटे पेड़ सी हो गई थी। मन कई आशंकाओं से दो चार हो रहा था। किसी तरह एक दिन बीता। फेसबुक पर स्टेटस अपडेट में अपने इस मशीनी अनुभव को चंद पंक्तियों में लिखा। इस बीच घर में मेरी बड़ी फिक्र की गई। श्रीमती जी हर घंटे डेढ़ घंटे मेरा हालचाल लेती रहतीं। बड़ा अच्छा लग रहा था। मन किया ऐसे ही हालचाल लेती रहा करो, वरना तो बाजार से भिण्डी, तोरई और पालक लाना है जैसे रोजमर्रा वाली बातें ही सुनने में आती थी :)

       होते होते वह वक्त भी आया जब CT Scan की रिपोर्ट मेरे हाथ आई। खोलने से पहले ही धुकधुकी बढ़ गई कि क्या होगा। सफ़ेद कागज पर लिखे एक शब्द पर नजर पड़ी - Normal. और मैं चहक उठा। बाकी लाइनें भी पढ़ा। सारा कुछ नॉर्मल। दिल से जैसे कोई बोझ हट गया। काले रंग की शीट निकालकर देखा तो मेरे दिमाग की स्लाइस कटिंग दिखी। मन ही मन खुश हुआ कि चलो मेरे पास अब सबूत है कि हां, मेरे पास दिमाग है। वरना तो श्रीमती जी, कई बार मेरे दिमाग के होने न होने को लेकर आशंका व्यक्त कर चुकी हैं :)

      लौटानी में डॉक्टर से मिलता आया। उन्होंने भी राहत की सांस ली। ताकीद दी कि लैपटॉप आदि लेकर ज्यादा देर एक ही पोजिशन पर न बैठूं। उनकी बात सच भी थी। जिस वक्त नस खिंची थी उस दौरान करीब तीन चार घंटे लैपटाप के साथ बैठा था। श्रीमती जी, जो मेरे लैपटाप को हारमोनियम की तर्ज पर 'पेटी-बाजा' कहती हैं, ने उस वक्त भी टोका था कि - अब अपना 'पेटी-बाजा' बंद भी किजिए। चाय पड़े पड़े ठंडी हो रही है, लेकिन न जाने क्या हुआ कि मैं काफी देर तक सामने टीवी देखते हुए लैपटाप में घुसा रहा। कभी ऑफिस का कोई काम तो कभी अपना ही कोई लेख-लूख। इसी बीच पैर की नस खिंच गई। हड़बड़ी में लैपटॉप साईड में रख तुरंत खड़ा होने से नस पर नकारात्मक असर पड़ा और फिर एंठन जो हुई तो बढ़ती चली गई।

        खैर, डॉक्टर की मीठी डांट सुन घर आया, परिजनों, मित्रों और ऑफिस के कलीग्स को इन्फार्म किया। घर में सबने राहत की सांस ली। उधर पिताजी का गाँव से फोन आया कि हरदम लैपटाप में आंख गड़ाये रहते हो, तनिक डोल-हिल लिया करो। श्रीमती जी, अलग भुनभुना रहीं थीं....और बैठो लैपटाप लेकर, .....फलां...ढेकां....और भी न जाने क्या-क्या। चुपचाप सब कुछ सुनता रहा। कर भी क्या सकता था। बाद में दोपहर में फेसबुक ओपन किया, थोड़ा रवीश कुमार के स्टेटस पढ़ा, थोड़ी मौज ली, थोड़ा ज्ञान जी के जवाहिरलाल से मौज ली। मन थोड़ा हल्लुक हुआ तो सोचा इस अनुभव को भी ब्लॉग पर शेयर किया जाय। आखिर ऐसे मौके बार बार थोड़े ही आते हैं कि सारा ब्रह्माण्ड अपने चारों तरफ घूमता लगे। जब मैंने यह बात फेसबुक पर लिखा तो प्रशांत प्रियदर्शी का कहना था कि - वह तो इस टेस्ट के दौरान सो गये थे :-)   विवेक सिंह जी का कहना था कि बिना मशीन में गये हुए ही उन्हें ब्रह्माण्ड अपने सिर के चारों ओर घूमता लगता है :)

         Anyway, अब अपनी तबियत बिल्कुल चंगी है। 'पेटी-बाजा' अब भी इस्तेमाल करता हूँ लेकिन संभलकर। लेकिन जिंदगी के इस भयानक एपिसोड से गुजरने के बाद अब महसूस हो रहा है कि उम्र के इस अड़तीसवें साल में डेंजर जोन आन पहुंचा है। गिरिजेश बाबू एक बार पहले भी ताकीद कर चुके हैं कि अब संभलना होगा, फुल बॉडी चेकअप होना मांगता। देखें कब उस फुल बॉडी चेकअप से दो-चार हो पाता हूं :) 

- सतीश पंचम

31 comments:

Vivek Rastogi said...

ऐ लो अब पक्का हो गया कि आप पके हुए ब्लॉगर हो गये हो। अब आराम किया जाये और पेटी बाजा का जरा संभल कर उपयोग किया जाये। ऐसी ही परिस्थितियों में इन नवी नवी मशीनों का अवलोकन हो पाता है।

GYANDUTT PANDEY said...

शुक्र है कि टेस्ट नॉर्मल निकला। पर एहतियाद बरतिये। पेटी-बाजा जिन्दगी के सामने कुछ महत्व नहीं रखता।
मैं जो इस तरह के अनुभवों से पिछले डेढ़ साल से गुजर रहा हूं और कई सी.टी. और एम आर आई स्कैन से गुजर चुका हूं, यही सलाह दूंगा कि जिन्दगी की वांछित पेस की इज्जत करें!

I am concerned dear. Take care.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

इस पेटी बाजा के चक्कर में कुछ महीने पहिले हम पेटी बाजा का नियमित इस्तेमाल करने वालों नकी तरह हो गए थे, मतलब टेनिस एल्बो के शिकार और "अल्लाह के नाम पर कुछ दे दे बाबा" वाली मुद्रा में..
ये नस खींचने वाली बात (शायद लिगामेंट खींचना है ये) मेरे साथ कई बार हुयी है और मेरी श्रीमती जी के साथ अक्सर.. मैंने हमेशा उस दौरे को पहले से भांप लिया करता हूँ कि अब ये होने वाला है और लगभग मुर्दे की तरह लेट जाता हूँ.. लेकिन आपने जो बताया वो सुनकर बहुत डर लगा... बात वाकई परेशानी की है.. ध्यान रखें!!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

चलो अच्छा है कि बात बस नस की एंठन तक ही रही.

मेरा अनुभव है कि डैस्कटाप के अलावा ये सब लैपटाप, टैबलेट, मोबाइल बगैहरा वाहियात हैं. ये नज़रबट्टू हैं. शरीर को अपने हिसाब से तो रखवाते ही हैं ये, इन्हें एक निश्चित दूरी पर रख कर ही काम किया जा सकता है. आफ़िस में बात चली कि चलो नए नए माडल आए हैं, नया लैपटाप हो जाए. मैंने लैपटाप जारी करवाने से मना कर दिया कि भई मेरे लिए डैस्कटाप का पुराना फ़ैशन ही अच्छा है. डैस्कटाप शरीर व आंखों के लिए कहीं ज़्यादा मुफ़ीद है.

rashmi ravija said...

शुरूआती कुछ पंक्तियाँ पढ़ने के बाद मुझे लगा..अब आप लिखेंगे...'और मेरी आँख खुल गयी'
यानि कि सब सपना था

पर वह सब तो हकीकत था....चलिए रिपोर्ट नॉर्मल थी..जानकर राहत मिली....पर इसे वार्निंग सिग्नल ही समझिए...और अपनी सेहत का ख्याल रखिए.
लैपटॉप पर काम करना नुकसान नहीं करता...पर मुश्किल ये है कि 'पोस्चर' सही नहीं होता...और फिर तो तकलीफ होनी ही है.
जितनी देर भी लैप टॉप पर काम कीजिए..इस बात का ख्याल जरूर रखिए

गिरिजा कुलश्रेष्ठ said...

स्थिति कोई भी कैसी भी हो पर पढ कर बडा अच्छा लगा ।

आशीष श्रीवास्तव said...

'पेटी बाजा’ का उपयोग थोड़ा कम किया जाये और जब भी किया जाये तब हर १० मिनिट मे एक बार खडे होकर १० कदम चलकर वापिस आया जाये। एक स्थिती मे ज्यादा देर बैठने से भी समस्या हो सकती है।

प्रवीण पाण्डेय said...

यह अच्छी खबर है कि सब सामान्य है। शरीर कुछ न कुछ नौटंकी करेगा ही। जब सब ठीक था तो यह भयानक अनुभव काहे हुआ। पेटी बाजा की पूजा करवा दीजिये।

संतोष त्रिवेदी said...

'लौटानी' में आप सही-सलामत लौट आये,पढकर सुकून हुआ.वैसे आपकी मजाकिया-स्टाइल से लग रहा था कि यह कथा कहीं आप पवार साब के सर ही न फोड़ दो !
बहरहाल ,इतनी जल्दी आप नहीं जाओगे,बहुत सारे पुण्य जो किये हैं !
स्वास्थ्य के लिए सच्ची में शुभकामनायें !

अनूप शुक्ल said...

अब हम ये तो न कहेंगे कि पेटी बाजा का इस्तेमाल एहतियात से किया जाय। ऊ त सब लोग कह चुके हैं। लेकिन यह बात भी सही है कि 38-40 की बाली उमर में जटायु बनने से बचा जाये! :)

मस्त रहा जाये। :) :)

Rahul Singh said...

ठीक कारण पकड़ में आना जरूरी है.
लगभग ऐसी स्थिति हमारे एक परिचित के साथ बनी, रिपोर्ट पा कर उदास हुए, कहा- 'सारा बेकार का तमाशा, इसमें तो कुछ नहीं निकला'

अभय तिवारी said...

"अरे भाई.. सम्हालिए.." इस तरह के वाक्य आप को हम जैसों को लिखने चाहिये और आप हम से लिखवा रहे हैं- ये नहीं चलेगा.. सच मे सम्हालिए!!

और पेटी-बाजा तो गजब नाम है भाई.. हमें बहुत भा गया.. अपनी श्रीमती जी को हमारी तरफ़ से शब्द चर्चा में शामिल होने का न्यौता दीजिये!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

रश्मि जी की तरह मुझे भी पहले यही लगा कि सपने की बात है, फिर झटका लगा। खैर, सब कुछ नॉर्मल है यह तसल्ली की बात है। ऐहतियात बरतिये। शुभकामनायें!

ajit gupta said...

सलाह तो खूब मिल ही गयी है, अब हम भी क्‍या सलाह दें? तबियत कोई कबूतर भी नहीं है जिसको पिंजरे में बैठाकर ख्‍याल रख लें। अब इस शरीर की माया तो बनाने वाला ही जानता है कि कब क्‍या उठा-पटक हो जाए। लेपटॉप पर काम करने में यही दुविधा है कि पैर सुन्‍न होने लगते हैं। पता नहीं आप युवा लोग इसपर इतना काम कैसे कर लेते हैं? हमें तो यह डेस्‍कटॉप ही भाता है।

Poorviya said...

sab kuch narmal hai ...


jai baba banaras.....

Arvind Mishra said...

टेक केयर

दीपक बाबा said...

फुल बॉडी चेकअप होना मांगता - जरूरी है भैया... इस पेटी बाजा नें 'छोटे छोटे' का बाजा बजा रखा है.. और आप तो अड़तीसवें साल के डेंजर जोन में दाखिल हो चुके हैं...

ध्यान दीजिए.

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

टेक केयर सतीश जी।

Abhishek Ojha said...

संभल के :)
वैसे कहने से थोड़े न फर्क पड़ता है मैं तो अपने आप से अक्सर कहता हूँ कि अब हिसाब से पेटी बाजा का इस्तेमाल करना चाहिए. लेकिन जब तक गर्दन नहीं टेढ़ीयाती फिर से भूल जाता हूं !

संजय @ मो सम कौन ? said...

पंचम दा और पेटी बाजा, प्रेम प्रताप पटियाले वाला और उसका नाड़ा तो ’लागी छूटॆ न अब तो सनम’ वाली बात है।
आप जैसे लोग बड़ी से बड़ी समस्या में भी मजाक ढूंढ लेते हैं। आपही की एक पोस्ट थी न 'लेखन विधा में एक बीमारी ऐसी भी..........' @ http://safedghar.blogspot.com/2011/10/blog-post_1942.html
हम ही क्यों पीछे रहें,सबकी सलाह मानने की सलाह हम भी टिकाये देते हैं।

दीपक बाबा said...

काजल कुमार से सहमत.

Praveen Trivedi said...

ऊ का है कि इत्ती जल्दी आपको कुछ नहीं होने वाला जी ....मस्त रहा जाए.....व्यस्त रहा जाए .....और....उत्कृष्ट रहा जाए !!

जय जय भैये !!!!

सतीश पंचम said...

आप लोगों की स्नेहिल प्रतिक्रिया देख जिया हरियर हो गया :)

'पेटी-बाजा' न चाहते हुए भी मुझे मजबूरन इस्तेमाल करना ही पड़ेगा क्योंकि काम ही ऐसा है कि उसके बिना मैं असहाय हो जाउंगा, जबकि कार्य करने की सुगमता को देखते हुए मेरी भी पहली पसंद डेस्कटाप ही है। हां, इस हादसे के बाद मैंने लेटकर या ओठन्ग कर लैपटाप इस्तेमाल करना बंद कर दिया है। बल्कि इस भयानक दौर से गुजरने के बाद मेरा तो मन है कि कुछ ऐसा 'लल्लनटॉप लैपटाप' बने जो इस्तेमाल कर्ता के ज्यादा देर तक टाईम पास करने, गलत पोस्चर से बैठने या लेटने पर अलार्म बजाने लगे। यूजर फिर भी न माने तो 'लल्लनटॉप लैपटाप' घुमा के एक 'कनटॉप' दे दे :)

सतीश पंचम said...

और हां, जिस अंदाज में मुझे यह वार्निंग मिली है वह देख लगता है मेरे पेटी बाजा ने कुछ संभलकर ही मुझे कनटॉपा था वरना तो उस वक्त जब नस चटकी थी, कुछ भी हो सकता था, कान तो बंद हो ही गया था, बस थोड़ी ही बाकी थी 'कोर कसराहट' में :)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

अंत भला तो सब भला। बहरहाल बुरा भी भला हुआ। कष्ट आपने उठाया मगर सभी का भला कर दिया। हम तो पढ़ते ही घबड़ाकर बीच में बैठ कर पढ़ने लगे। ई ससुरा का है हमरो गर्दन दुखाता..गरदन को झटका दिया फिर पढ़ने लगा। इसका मतलब ई हुआ कि एक्कै पोजीशन में कौनो काम नाहीं करना चाहिए।

वैसे ई उमर में इत्ता घबड़ाये वाली बात नहीं है। अपन तो पचास के करीब पहुंचत हैं..कौनो समस्या नहीं है। हां एक काम जरूर करैं..रोज सुबह उठकर एक घंटा घूमे-टहरें, थोड़ा व्यायाम करें और बाबा रामदेव का अनुलोम-विलोम, कपाल भारती करें। लोग बाग जितनो मजाक उड़ावें लेकिन है ई काम की चीज। कब्बो कौनो समस्या नहीं आयेगी।

"जाटदेवता" संदीप पवाँर said...

अरे ये तो सच निकला, सपना नहीं

सञ्जय झा said...

aapka poorkalik pathak is tarah ke
sannipat se niptne ke liye anshkalik
vishram ka salah deta hai.........

jai ho.

वाणी गीत said...

ब्लॉगिंग के साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी ज़रूरी है ...
शुभकामनायें !

shilpa mehta said...

ओह सतीश जी - अब आशा है आप ठीक हैं | ध्यान रखिये सेहत का |

रंजना said...

लेखक हरदम लेखक ही रहेगा...तडके नस का ऐसा ब्यौरा दिया कि अब जब भी कोई इस स्थिति में पहुंचेगा यह वर्णन उसे याद आएगा और जबरदस्त संबल भी देगा..

नस तडकना यूँ तो आम बात है,लेकिन उल्टी के स्तर तक पहुँच जाना सचमुच चिंताजनक है...सीटी स्कैन भी तो मशीने न है...देखिएगा,कभी दुबारा ऐसा हो तो किसी अच्छे न्यूरो वाले से जरूर संपर्क कर लीजियेगा...

देवांशु निगम said...

इरादे नेक कीजिये, केयर को टेक कीजिये....
अच्छी खबर ये है कि सबकुछ ठीक है...

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