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Saturday, November 12, 2011

गूँगा जहाज.......

     फेसबुक पर रवीश जी ने चील गाड़ी (विमान)  को इंगित करते हुए स्टेटस लिखा जिसे पढ़ते ही मुझे विवेकी राय का गूँगा जहाज वाला लेख याद आ गया। बेहद दिलचस्प ढंग से विवेकी राय जी ने उस गँवई माहौल के कोलाज को रचा है। प्रस्तुत है उनके उसी लेख का  अंश ......  

                                        गूँगा जहाज   -  डॉ. विवेकी राय

          मेरे विचारों के सिलसिले को सामने से आती हुई बैलगाड़ी के चरचर-मरमर शब्द ने खंडित कर दिया। सबसे पहले मैंने रास्ता छोड़कर एक बगल हट जाना उचित समझा। मैं दोनों लीकों के बीच में चल रहा था। वास्तव में चलने लायक नहीं रास्ता है। इधर-उधर दोनों बगल तो बैलगाड़ी के पहियों से घुटने भर धूल हो गयी है। यह धूल की मोटी तह खूब फैलकर जमी हुई है। पैदल चलने वाले का जूता डूब जाय, साइकिल पर चलने वाले को उतर कर खींचना पड़े और नंगे पैर चलने वाले के लिए यह जमी तरावट खूब रही। मरदाना गाड़ी है यह बैलगाड़ी। धीरे धीरे चलती है तो भी धूल उड़ाती है। जोर से या तेजी से इससे चला नहीं जाता। इसी प्रकार हचकती मचकती कोस-दो-कोस और चार-छ: कोस तक इधर-उधर जमीन पर बिछी इस धूलवाली छवर को धाँगती रहती है।


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       बैलगाड़ी पर बड़े बड़े बोरों में धान लदा है। मुँह पुआल से बन्द कर सी दिया गया है। कुछ कपड़े में बन्द छोटी गठरियाँ भी हैं। धान तो बन्द है, पर गठरी पर, बोरे पर और उसके मुँह पर कहीं से झाँक-झाँक कर बताता है कि मैं धान हूँ। सुनहरा धान, धरती के अंचल को धानी करने वाली शान हूँ, परम पवित्र प्रिय खुरखुरा चान हूँ और साक्षात ब्रम्ह हूँ। भला सोना कही छिपाया जा सकता है ? यही सब बात थी कि बिना पूछे मुझे ज्ञात हो गया कि बोरों में धान है। किसी सेठ साहुकार का माल होता तो शायद इतनी तेजी से उधर ध्यान नहीं जाता, पर यह धान गाड़ी के पीछे पीछे चुपचाप मैली लुगरी में आती चली उन अन्नपूर्णाओं का था, जिनके हाथों ने इस धान के एक एक पौधों को छुआ है, एक-एक बालियों का सत्कार किया है और एक-एक दाने को सँभाला-सहेजा है। वे लगभग एक दर्जन जीवात्माएँ।


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   अचानक गाड़ी रूक गयी। मैंने जाना कि हल्ला करके पीछे आती स्त्रियों ने उसे रोकवाया था। मैं भी रूक गया। किसी कारण वहाँ एक बोरा एक जगह कुछ खुल गया और धान झड़ने लगा था। झपट कर एक स्त्री ने बोरे का मुँह बन्द किया और धूसर धूल पर गिरे सुनहरे धान को बटोरने लगी। धूल का प्रयत्न यह था कि अधिक से अधिक अन्न को अपने भीतर छिपा ले और स्त्री का प्रयत्न था, यदि धूल उसके अन्न को नहीं छोड़ती है तो वह धूल सहित उसे उठा लेगी। उसने आँचल पसार कर धूल सहित धान बटोर लिया। धूल-धान का यह विचित्र संयोग रहा। वह अंचल-आश्रय पाकर धन्य हुई। जब वह खड़ी हुई तो उसकी पाँच वर्षीय लड़की ने ध्यान दिलाया कि धान पीछे कुछ दूर से गिरता आया है। वह लड़की एक फ्रॉक पहने थी, परन्तु वह किस कपड़े का था, कहा नहीं जा सकता। उसके गरदन के पास फट जाने पर गाँठ दी गयी थी, जिससे पीछे की ओर से वह टँग गया था। वह अधिक मैला था या फटा-पुराना अधिक था, कहा नहीं जा सकता, परन्तु उस फ्रॉक की इज्जत धूल बचा रही थी।
      यह धूल ऐसी है कि जहाँ जम जाती है, वहाँ एक ऐसी पवित्रता आ जाती है कि और किसी बात की ओर ध्यान नहीं जाता।


      बड़े मनोयोग से एक-एक गिरे दाने को माँ-बेटी ने बीन-बीन कर इकट्ठा किया। साथ ही स्त्रियों ने भी उनके इस कार्य में सहायता की। इस बीच फुरसत पाकर गाड़ीवान ने सुर्ती मल कर ठोंक ली। वह भी एक लोहे का आदमी था। काठ-बाँस की गाड़ी पर उसी प्रकार काठ बना बैठा था। शरीर काला था या हो गया था, कहा नहीं जा सकता। एक काले जीर्ण कम्बल के ऊपर वह बैठा था। शरीर में बिना बटन का एक ऐसा कुर्ता था जिसकी बाँहें आधे पर से उड़ गयी थीं। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और सिर के बालों पर धूल छायी हुई थी। यह इसी प्रकार रात-दिन गाड़ी हांकता है। उसके लिये जाड़ा-गरमी सब बराबर। उसे बरसात की परवाह नहीं। खडे़ खड़े खा लेता है। बैठे-बैठे सो लेता है। बिना खाये-सोये भी उसके काम में कोई बाधा नहीं आती। हाँ, उसके बैल उसे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं।


     गाड़ीवान ने यह जानना चाहा कि किसके बोरे से धान झड़ रहा था, परन्तु बिना बताये आँचर में धूल-दान देखकर उसने समझ लिया कि किसका बोरा बढ़ रहा था। बेचारी माँ-बेटी ने एक महीना में एक बोरा धान कमाया है। उसने खूब जोर से कहा - "देखते चलना जी, नहीं तो बैलगाड़ी पर माल बढ़ जाता है। सब लोग अपनी-अपनी गठरी-मोटरी देख लो। अब गाड़ी चलती है।"


और उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी।


       मैं उस बैलगाड़ी को देख रहा था। उस पर लदे माल को देख रहा था और देख रहा था उसकी मालकिन लोगों को। एकदम मामूली और साधारण दृश्य था, परन्तु एक गजब की आकर्षण बात थी जो कथन की पकड़ में नहीं आ रही है।


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   तभी सड़क पर खेलते कुछ लड़के चिल्ला उठे - "गूँगी जहाज ! गूँगी जहाज !! गूँगी जहाज !!! "


   मैने देखा उत्तर पश्चिम में के कोने वाले क्षितिज पर एक चाँदी की सुनहरी मोटी लकीर उठी है और नि:शब्द आगे बढ़ रही है। अभी उसकी कुल लम्बाई एक लट्ठा के करीब है।


ओह ! यह तो जेट विमान था। परन्तु लड़के क्या चिल्ला रहे हैं ? गँगी जहाज ! एकदम सार्थक बात !

    गाड़ी के पीछे वाली स्त्रियों ने चिहा-चिहाकर देखा और बहुत आसानी से देख रही थीं। भला वह छिपने वाली चीज है ?


"देख रही है रे ? यह क्या 'बढ़निया' की तरह रोज उग जाता है ?"


गाँवों में 'बाढ़न' पुच्छल तारों को कहते हैं। बाढ़न का अर्थ है झाडू और उसकी शकल झाडू की तरह होती है।

"बढ़निया नहीं है, सखी" दूसरी स्त्री ने उत्तर दिया, "यह तो सगरे बदरी घड़ियाल की पूँछ की तरह छेंक लेती है।"


"मत टोको," एक अँधेड़ स्त्री बोली, "यह हरसू ब्रम्ह है। अपने संगी भैरवा के ब्रम्ह के पास मिलने जा रहे हैं।"


"जै हो बरम-बाबा," एक स्त्री ने गुहराया।


"अरे बाबा-साबा नहीं जी। रेलगाड़ी है। अब ऊपरे-उपर चलेगी।" एक ने कहा। इस कथन के बाद एक दूसरी स्त्री ने हँसकर कुछ लयात्मक ढंग से एक गीत-कड़ी उठाया -


छपरा के बाबू धरमचन रसिया -
धुआँ पर गाड़ी चलवले बा ।


अरे बाबा ! धुआँ की सड़क पर गाड़ी ! एक ने आश्चर्य प्रकट किया।


अकिल में रंगरेज (अंग्रेज) को कोई नहीं जीत सकता, एक अन्य स्त्री ने कहा।


हमारी बात सुना, एक स्त्री आगे बढ़कर बोली - एक अच्छा आदमी बता रहा था कि यह रावन का हुक्का है।


यह सुनकर गाड़ीवान का ज्ञान गरज उठा -


अरे मूर्खों यह रावन का हुक्का नहीं है। यह हनुमान की पूँछ है।


और बैलों को टिटकारी देकर गाड़ी तेज करते हुए उसने कहा - अब लंका दहन होगा।


इसके बाद गाड़ीवान ने निम्नलिखित चौपाई को खूब जोर से गाया -


रहा न नगर बसन घृत तेला,
बाढ़ि पूँछ कीन्ह कपि खेला ।


    और लड़के उसी प्रकार चिल्ला रहे थे - गूँगी जहाज...गूँगी जहाज। और विमान के पीछे बनी वह धुएँ की सड़क चूपचाप बीच आसमान में दक्षिण पूरब की ओर बढ़ती चली जा रही थी।


     मैंने मन में प्रश्न किया कि वास्तव में कौन गूँगी जहाज है ? और क्या इतिहास वास्तव में यहाँ रूक नहीं गया है ?

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 पुस्तक अंश - गूँगा जहाज
अनुराग प्रकाशन
चौक, वाराणसी - 221 001
मूल्य - 120/-
 
 प्रस्तुति - सतीश पंचम  

10 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

@@"यह हरसू ब्रम्ह है। अपने संगी भैरवा के ब्रम्ह के पास मिलने जा रहे हैं।"..
सही है मगर अब ई बात कहाँ समझ में आयेगी.

Arvind Mishra said...

मजेदार प्रसंग और ग्राम्य बतकहीं ..मन कहीं लौट गया पीछे !

ajit gupta said...

ग्राम्‍य जीवन का एकदम सटीक चित्र खेंचा है। बहुत अच्‍छी रचना।

नीरज गोस्वामी said...

ह्म्म्म...ये किताब तो पढनी पड़ेगी बॉस....

वाणी गीत said...

सुन्दर ग्रामीण दृश्य साकार हुआ !

Kajal Kumar said...

एक अच्छी कहानी पढ़वाने के लिए धन्यवाद.

प्रवीण पाण्डेय said...

जितना डूब के कथा सुनायी, उससे कहीं अधिक मन में समायी।

Gyandutt Pandey said...

पढ़ते पढ़ते अपने गांव देस की छवियां आ गयीं। कितने बरम, कितने बीर, कितने हनुमान जी आ गये मन में।
अपना खुद का पुराने हवाई चप्पल पहना बिवाई फटा पैर याद आ गया।

रंजना said...

मन मौन हो गया जी...का कहें...???

अब सगरे पढ़े बिना चैन कैसे मिलेगा...

देवेन्द्र पाण्डेय said...

यह नहीं पढ़ी थी..नदी वाली भी नहीं..सिर्फ वो गन्ने और खोइया वाली पढ़ी थी..तू क्यों सोया। आज सुबह एक के बाद एक तीनो पढ़ता चला गया..। नदी पर आपका कमेंट बहुत अच्छा लगा।..आभार।

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