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Thursday, October 27, 2011

प्रेमी जोड़ों का लोकपाल.....

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- जानूं तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो...


- और तुम मुझे अच्छी लगती हो...

- लेकिन तुममें एक कमी है

- कैसी कमी...

- तुम कंजूस बहुत हो....

- इसमें सरकार का दोष है...

- सरकार ?

- हाँ सरकार, वो लोकपाल नहीं ला रही....

- उसका तुम्हारी कंजूसी से क्या रिश्ता...

- लोकपाल होता तो सारे भ्रष्टाचारी अंदर होते....जमाखोर जेलों में होते....

- तो

- तो क्या...नेचुरल है कि चीजों के दाम तब कम होते.....और मुझे कंजूस न होना पड़ता...

- लेकिन प्रियवर मुझे आपकी ये कंजूसी जरा भी अच्छी नहीं लग रही....ऐसे में हम लोगों का मिलन होना मुश्किल है...

- नहीं प्रिये...ऐसा न कहो....मैं जी न पाउंगा.... हम दोनों के बीच लोकपाल की दीवार ही तो है....

- ये दीवार हटानी होगी प्रियवर...अन्ना से कहिये लोकपाल के लिये थोड़ा और जोर लगायें

- अकेले अन्ना क्या क्या करें प्रिये....उनकी टीम के लोग विभिन्न प्लान के तहत भोथरे किये जा रहे हैं...

- मतलब...

- किसी को प्लान 'ए' के तहत तो किसी को प्लान 'बी' के तहत तो किसी को 'सी'.....

- ये भोथरई बंद नहीं हो सकती क्या...

- कैसे बंद होगी प्रिये.....धार लगाने वाली मशीनों का लाइसेंस सरकार के पास है.....

- फिर सरकार...

- हां प्रिये....इसलिये मैंने शुरू में ही कह दिया था कि सब सरकार का दोष है...

- तो क्या हमारा मिलन न होगा....

- होगा क्यों नहीं प्रिये...बस थोड़ा चुनावों तक इंतजार करो.....

- तो क्या चुनावों से हमारा मिलन हो जायगा...

- उम्मीद रखी जा सकती है कि लोकपाल समर्थक सरकार चुन कर आएगी...

- और यदि लोकपाल समर्थक सरकार न आई तो.....

- तो हम फिर इसी तरह बाग बगईचा में, पार्क-बस इस्टैंण्ड में मिलते रहेंगे.....इन्टरनेट पर.... फेसबुक पर.........

- तब तो हमें लोकपाल के लिये उठ खड़े होना होगा.....पूरा  जोर लगाना होगा.....
......

......

- ए चलो उठो यहां से.....चल रे ए छोकरी....चलो अपना-अपना घर जाओ.....

- तुम लोग कॉलेज छोड़ के इधर क्या मज्जा कर रेला है क्या..... चल ए चिकने.......

- चल बोला तो....चल निकल.... ए शाणें....तेरे को अलग से बोलना पड़ेगा क्या.....चल फुट इदर से....

- ए लाल दुपट्टा..... तेरे को क्या लिख के देना पड़ेगा क्या.....चल निकल....

- आईला आशिकी स्टाइल....चल रे ए कोट वाले ....ओ मैडम.....तुम लोग को क्या नोटिस-बिटिस देना पड़ेगा क्या ..चलो निकलो....

- ईधर दस दिन हो गया अउरत का ठीक से मुँह नहीं देखा.....रोज कुछ न कुछ खिटखिट.....कभी ये त्योहार...कभी वो रैली....कभी वो बंद ये बंद.....छुट्टी नईं....कुछ नहीं......उपर से ये छोकरा-छोकरी लोग का खिटखिट.....

- चल रे ए शाणें उठ.....

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- सतीश पंचम

19 comments:

sanjay kr said...

अईसे ही मिलने के चांस रहेंगे बॉस।

आखिरी लाईनें देखकर वो लोग याद आ गये जिनका बिजली जाने का गम पड़ौसी कालोनी में जगमग करती लाईटों को देखकर और बढ़ जाता है:)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मस्त हैं।
पोस्ट भी और गार्डेने....।

डॉ. मनोज मिश्र said...

वाह क्या झकास लिखें हैं भाई.

प्रवीण पाण्डेय said...

सब मर्जों की एक दवा, लोकपाल।

अनूप शुक्ल said...

ये क्या इस्टाइल है जी! कल को लोग कहेंगे- क्या हाल बना रखा है! लोकपाल क्यों नहीं लेते? :)

Ramakant Singh said...

श्‍श्‍श्‍श्‍श्‍श्‍श..... कोई है.

rashmi ravija said...

पर आपको कैसे पता....कि पुलिस वाले लड़के-लड़कियों को ऐसे डायलॉग बोल कर भगाते हैं....आप वहाँ क्या कर रहे थे??...:):)

संगीता पुरी said...

हर समस्‍या की जड लोकपाल ..
हर समस्‍या से राहत लोकपाल ..

Gyandutt Pandey said...

अमराई में आई, गार्डनवा में आई!
धीरे धीरे आई भइया, लोकपाल आई!!!

आशीष श्रीवास्तव said...

रश्मि जी के प्रश्न का उत्तर दिया जाये!

Kajal Kumar said...

लोकपाल बिल आ जाता तो हथेली खुजाने की उम्मीद रखने वाला पुलिसिया यूं न भगा पाता चिकने-चिकनियों को

सतीश पंचम said...

@ पर आपको कैसे पता....कि पुलिस वाले लड़के-लड़कियों को ऐसे डायलॉग बोल कर भगाते हैं....आप वहाँ क्या कर रहे थे??...:):)


@ रश्मि जी के प्रश्न का उत्तर दिया जाये!
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रश्मि जी, आशीष जी

कृपया पोस्ट की गहन बातों की ओर इशारा करते प्रश्न न पूछें...... इससे मौलिकता पर असर पड़ेगा...... लोग आइंदा किसी और पर ओढ़ा कर पोस्टें लिखना शुरू करेंगे....मसलन 'मैं-वाद' से हटकर 'दूसरे' या 'तीसरे पक्ष' को आगे रखते लिखने लगेंगे :)

My freinds आपबीती.......My relatives Garden era......Sitting in the Garden......Park Talk....etc etc...

इसलिये जैसा भी लिख रहा हूं लिखने दिजिए.....वैसे भी जरूरी थोड़ी है कि चाँद पर लिखने के लिये चाँद पर जाया ही जाय :)

सतीश पंचम said...

वैसे आप लोग किसी से कहियेगा मत, ये आपस की बात है.....

मन तो मेरा भी हो रहा है कि कुछ ऐसा ही अनुभव लेकर फिर पोस्ट लिखूं....मौलिकता के जरिये लेखन क्षेत्र को समृद्ध करूं लेकिन डर लग रहा है कहीं पुलिस के मौलिक डंडे न झेलने पड़ें और तो और क्या पता श्रीमती जी बेलन लेकर वहीं.....मौलिक कुटाई न कर डालें...अब ज्यादा क्या कहना आप लोग खुदै समझदार हैं :)

संजय अनेजा जी 'गुत कटाई' से पूर्व परिचित हैं....ज्यादा जानना हो तो उनसे सम्पर्क किया जा सकता है :)

shilpa mehta said...

satish ji - zara aapki shrimati ji ka mail id dijiye na - kuchh batana hai unko :) :) :)

सञ्जय झा said...

@satish ji - zara aapki.....

bhaichare me kahi hue baat aise thore
bhabhiyon ko bataya jata hai.........
this is not fare......

jai ho..

Arvind Mishra said...

लोकपाल ने आने के पहले ही लोगबाग की बगिया हरी कर रखी है उसके आने पर यह मुद्दा तो हाथ से चला जाएगा ...कौनो बात नयी फिर होंगे कोई नए वैलेंटायींन पैदा

sanjay kr said...

अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार(पहले कमेंट) का..

हम ठहरे जरा बड़बोले तो सबके सामने कह बैठे थे ये ट्रेड सीक्रेट, व्ररना इस ’कटाई’ से परिचित तो आप सहित बहुतेरे हैं। हमरी न मानो तो नीरज गोस्वामी जी, सोमेश सक्सेना, दीपक बाबाजी आदि के कमेंट भी याद होते।
ले लो मजे गुरू, आयेगा कभी हमारा भी टैम, तो पूछेंगे बात :))

सतीश पंचम said...

:)

मनोज कुमार said...

लोकपाल पर यह जोकपाल भी अच्छा रहा।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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