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Sunday, October 9, 2011

लेखन विधा में एक बीमारी ऐसी भी..........

         यूँ तो दुनिया में बहुत सारी लेखन विधाएं हैं। कोई कवित्त रचता है, कोई कहानी, कोई नाटक तो कोई उपन्यास। हर किसी की अपनी अपनी शैली है, अपना अपना मार्का है। लेकिन इन सभी के बीच एक अलग विधा है 'व्यंग्य लेखन' जिसे लोग या तो देखते नहीं या फिर नजर और दिमाग बचाकर निकाल जाने में ही भलाई समझते हैं। ऐसा होना लाजिमी भी है क्योंकि जहां तक मैं समझता हूँ कविता, कहानी लिखने की लत यदि किसी को लग जाय तो एक बार चलाया जा सकता है, उसके कविता लेखन या कहानीकारी का उसके जीवन पर सीधा असर नहीं पड़ता। लेकिन व्यंग्य के मामले में मामला तनिक धीर गंभीर हो उठता है। व्यंग्य करने वाला इस विधा का इतना लती हो जाता है कि उसे अपने हर काम में व्यंग्य करने की सूझती है, तरह तरह के फलसफे गढ़ दुनिया के सामने परोसने में एक खुशी सी मिलती है। और तो और कभी कभी वह अपने परिवार के लोगों, अपने गुरूजनों, अपने ईष्टों पर भी व्यंग्य कर बैठता है।


              मान लिजिये व्यंग्यकार की पत्नी यदि साड़ी खरीद रही हो और अचानक ही लेखक की व्यंग्यकारिता जग जाय तो लेखक सीधे ही पत्नी पर कटाक्ष करते हुए कहेगा - लगता है तुमने जो वो बड़े बड़े छाप वाली जो साड़ी ली थी, उसके छाप छोटे हो गये हैं। अब छाप कोई शर्ट या पैंट तो है नहीं कि पहनने से छोटे हो गये हों। छाप तो छाप ही हैं। ऐसे में पत्नी जले भुने न तो क्या हो। नतीजा बमचक के रूप में सामने आता है। कभी रोटी ज्यादा जल उठी तो कभी पापड़ कम सिंके। और उस वक्त का क्या कहना जब पति का व्यंग्यभाव उन जली रोटियों पर चल उठे। व्यंग्यकार महोदय हंसते हंसते कहेंगे - लगता है साड़ी की छाप रोटियों में उतर आई है तभी इतने रंगीन हो उठे हैं। सुनते ही पत्नी और आग बबूला,  एक तो साड़ी खरीदते समय ही टोके बिना न रहे और अब रोटियों पर भी व्यंग्य करने से नहीं चूक रहे। आग लगे इनकी व्यंग्यकारिता को। लोग कविता करते हैं, कहानी लिखते हैं तो अपने तक ही पक पुक के रह जाते हैं। कमसे कम उनके परिवारे को तो उनकी आदतों के चलते सिंकना तो न पड़ता होगा।

     वहीं एक बात और देखने में आती है कि व्यंग्यकार की व्यंग्यावलियों की आदत पा जाने पर उसके परिवार वाले भी व्यंग्य विधा में पारंगत होने लगते हैं। जैसे को तैसा जवाब सहज भाव से देने लगते हैं। पति यदि कहेगे -  "थाली में एक रोटी कम ही रखना आज भूख नहीं है" तो पत्नी भी कहने से नहीं चूकेगी - "अच्छा, मैंने अखबार में तो नहीं पढ़ा। कहीं टीवी में समाचार न बता रहे हों कि आज एक रोटी कम खाई जा रही है। तनिक टीवी चालू किजिए तो"।

        खैर, वह व्यंग्यकार ही क्या जो ऐसे छोटे मोटे रूकावटों पर रूक जांय। वो अपनी धुनकी में ही मस्त मिलेंगे। यार दोस्तों पर तो कभी साथी सहकर्मियों पर व्यंग्य कसते, हंसते ठठाते मिलेंगे। मान लिजिए कोई पान खा रहा हो तो व्यंग्यकार महोदय कहने से नहीं चूकेंगे - "और गुलफाम, लगता है एशियन पेन्टस वाले आजकल पान में भी रंग मिलाने लगे हैं, तभी लालिमा छा उठी है" । कोई चाय पी रहा हो तो कह बैठेंगे - "और भाईजान, कब लौटे आसाम से। सीटीसी वाले हाथ में ऑफर लेटर लेकर आपको ही ढूँढ रहे हैं चाय परखने वाली नौकरी के लिये। जाइये न कोई दूसरा रख उठेगा"

      कहने का अर्थ ये कि बंदा घर परिवार, यार दोस्त जहां कहीं भी हो अपनी व्यंग्यकारिता से बाज नहीं आता। कुछ न कुछ मौके बे मौके व्यंग्य के नशे में कसता ही चला जाता है। बल्कि मेरा तो यहां तक मानना है कि ऐसे लोगों को नशेड़ी, गंजेड़ी, लतेड़ी की तर्ज पर व्यंगेड़ी कहा जा सकता है। इस तरह अलग से कैटेगराइज कर देने से एक लाभ यह होगा कि जब कभी कोई व्यंग्यकार किसी पर व्यंग्य कसेगा तो लोग जिस तरह नशेड़ियों, गंजेड़ियों को यह कहकर मुंह नहीं लगाते कि जाने दो नशेड़ी है उसके मुँह भला क्या लगना, तो यही बात लतेड़ी  व्यंगकारों के लिये भी कह सकते हैं कि - " अरे जाने दिजिए, वो तो व्यंगेड़ी ठहरा, भला उसकी बात का भी क्या बुरा मानना"। इस तरह जहां एक व्यंगेड़ियों को बेखटके अपनी व्यंग्य विधा को आजमाने का मौका मिल सकेगा तो वहीं लोगों को भी ऐसे व्यंगेड़ियों से बचकर निकलने में सुभीता हो जायगा। टकराव, बिलगाव आदि की गुंजाइश ही न रहेगी।
     वहीं एक और साईड इफेक्ट यह हो सकता है कि जैसे सरकार नशेड़ियों, गंजेड़ियों के लिये सुधार योजनायें चलाती है, उनके लिये सुधार गृह का निर्माण करती है वैसे ही व्यंगेड़ियों के लिये भी व्यंगेड़ी सुधार योजनायें चालू किये जा सकते हैं। व्यंग्यकारों के लिये सुधार गृह खोले जा सकते हैं। इस वजह से सरकार को प्रत्यक्ष रूप से एक और लाभ मिल सकता है कि उन्हें अपनी हास्यास्पद योजनाओं के लिये एक बार कविता, कहानियों के जरिये भले विरोध झेलना पड़े, कम से कम व्यंग्यकारों द्वारा विरोध न झेलना पड़ेगा। अमूमन देखा गया है कि सरकारो पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्यंग्यकार ही ज्यादा मुखर होकर कुछ कहते हैं, टोकते हैं। यहां तक कि पिछले दिनों कुछ सरकारी कर्मचारी भी  व्यंग्य करते पाये गये। मौका था आर्थिक सर्वेक्षण का जिसके दम पर गरीबी अमीरी तय होनी थी। लोगों से जब उनकी आय स्त्रोत और खर्च आदि पर जानकारी मांगी जा रही थी तो कुछ लोगों ने जानकारीयां देने में आनाकानी की कि कहीं सरकार यह सारी जानकारी लेकर उन पर टैक्स न लगा दे। ऐसे में एक सरकारी अधिकारी ने सीधे सीधे जनता पर व्यंग्य कसते हुए कहा - "एक तो घर, गाड़ी, बैल, भैंस के बारे में बताते हुए कन्नी काटते हो, आय की पूरी जानकारी नहीं देते और जब 26 रूपये, 32 रूपये वाले अमीर घोषित हो जाते हो तो हल्ला मचाते हो"!

      जाहिर है सरकार के कान खड़े होने थे।  आम जनता का व्यंगेड़ी होना चल जाता है लेकिन एक सरकारी शख्स व्यंगेड़ी बनने की ओर अग्रसर हो जाय.....त्राहिमाम। सुना है सरकार अब एक टीकाकरण अभियान शुरू करने जा रही है जिसमें सरकारी और गैरसरकारी सभी जनों का टीकाकरण किया जायगा। यदि आप में भी व्यंगेड़ियों वाले लच्छन दिखें तो नजरअंदाज न करें, तुरंत अपने निकटतम स्वास्थ्य केन्द्र से सम्पर्क करें। वरना इधर आप केवल श्रीमती जी की साड़ी की छाप गिनते रह जाएंगे उधर सरकार आपका मुँह खुलते ही पोलियो ड्राप की तरह गिनकर मुँह में एन्टी व्यंगेड़ी ड्रॉप चुआ देगी - बस दो बूंद  व्यंग्यकारिता के। 


- सतीश पंचम

23 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

एकदम सही उकेरा है व्यंग्यकार का दर्द। व्यंग्यकार की दशा कभी-कभी तो धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का वाली हो जाती है। मजा तो सभी लेते हैं पर वह कितना झेलता है वही जानता है।

एक बार श्रीमती जी ने जल्दी में, दाल-भात-सब्जी-चटनी, सब एक ही थाली में परोस दिया। मेरे मुंह से निकल गया.."तुम सानी-पानी बहुत अच्छा दे देती हो..सोचता हूँ एक गाय पाल लूं!" उन्होने तपाक से उत्तर दिया.."रहने दीजिए एक घर में एक गाय ही ठीक है, दूसरी आयेगी तो बैल बिगड़ जायेगा!!"

rashmi ravija said...

" अरे जाने दिजिए, वो तो व्यंगेड़ी ठहरा, भला उसकी बात का भी क्या बुरा मानना"।

पर अक्सर ये व्यंगेड़ी भी सेलेक्टिव होते हैं....हर जगह व्यंग्य नहीं करते..कहीं तो चाशनी का ड्रम उंडेलते नज़र आते हैं :)

इसका मतलब...कोई भी कभी पूरा व्यंग्यकार नहीं होता...:)

और
कभी रोटी ज्यादा जल उठी तो कभी पापड़ कम सिंके।

जली रोटी...कम सिंके पापड भी मिले,ना...पानी पीकर तो नहीं सोना पड़ा...:)

प्रवीण पाण्डेय said...

सच कह रहे हैं आप, कई बार व्यंग में दर्शन ढूढ़ने के चक्कर में देर से हँसे।

डॉ. मनोज मिश्र said...

@@व्यंग्य करने वाला इस विधा का इतना लती हो जाता है कि उसे अपने हर काम में व्यंग्य करने की सूझती है, तरह तरह के फलसफे गढ़ दुनिया के सामने परोसने में एक खुशी सी मिलती है। और तो और कभी कभी वह अपने परिवार के लोगों, अपने गुरूजनों, अपने ईष्टों पर भी व्यंग्य कर बैठता है। ...
.....सही चित्रण .

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

:)

Rahul Singh said...

साड़ी की छाप में व्‍यंग्‍य कहां, इसमें तो कविता सुनाई पड़ती है.

अनूप शुक्ल said...

आपका लेख पढ़कर परसाई जी का लेख याद आ गया। इसमें उन्होंने विस्तार से व्यंग्य के बारे में लिखा है- व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है

उनका सवाल-जबाब यह भी है।

तो क्या पत्नी,साला,नौकर,नौकरानी आदि को हास्य का विषय बनाना अशिष्टता है?
-’वल्गर’ है। इतने व्यापक सामाजिक जीवन में इतनी विसंगतियाँ हैं। उन्हें न देखकर बीबी की मूर्खता बयान करना बडी़ संकीर्णता है।


परसाई जी के अनुसार आपकी पोस्ट और देवेन्द्र जी की टिप्पणी में’वल्गरिटी’ है। :)

बाकी आप पोस्ट पढिये। अच्छा लगेगा। :)

Arvind Mishra said...

धाँसू !बस आज तो छा ही गए ...
अपने पहले ही व्यंग लेख से व्यंगकारों के सर चढ़ गए :)इस पुच्छ विषाण हीनः नए व्यंगकार का फिफिहरी बजाकर स्वागत :)
व्यंग ,हास परिहास, कटाक्ष ,मनोविनोद ,आलोचना (समालोचना समाहित ),हाजिर जवाबी (प्रत्युत्त्पन मति ) के अपने सूक्ष्म अंतर होते हैं -मगर केवल व्यवस्था और लोगों में हमेशा नुक्स निकालने की प्रवृत्ति एक तरह का मानसिक विकार है .....सिनिक होते हैं ऐसे लोग ...हर बात को वक्र कर समझते हैं और अपनी वक्रता लोगों पर लादना चाहते हैं ! मुझे ऐसे लोग पसंद नहीं -मैं व्यंग के मनोविनोदी लहजे का तलबगार हूँ -जैसे यह पोस्ट ..
बधाई ! बेचैन आत्मा को भी जो उन्होंने सुनाया है !

वाणी गीत said...

व्यंग्यकार गंभीर बात को मजाक में हल्का कर सकते हैं तो मजाक की बात पर दंगे फसाद भी करवा सकते हैं , हालाँकि हम भी इसमें कुछ महारत रखते हैं मगर कोई हम पर व्यंग्य करे तो हमें बर्दाश्त नहीं होता ...समझे :)
आपकी भाषा में राप्चिक व्यंग्य!

सतीश पंचम said...

अनूप जी,

चलिये मैं अपने लिखे को एक बार वल्गर मान लेता हूं, तो भी देवेन्द्र जी की लिखी टिप्पणी को वल्गर कत्तई नहीं मान सकता।

वजह खुद परसाई जी ने बयां किया है - हमारे समाज में कुचले हुये का उपहास किया जाता है। स्त्री आर्थिक रूप से गुलाम रही ,उसका कोई व्यक्तित्व नहीं बनने दिया गया,वह अशिक्षित रही,ऐसी रही-तब उसकी हीनता का मजाक करना ‘सेफ’ हो गया।

अब देवेन्द्र जी की टिप्पणी को पढ़िये। उसमें कहीं से नहीं लगता कि वे कुछ इस भाव से मजाक कर रहे हैं। बल्कि उन्हें इसके एवज में उन्हीं की शैली में त्वरित और कुरकुरा जवाब भी मिल गया :)

यदि 'पत्नीवाद' वाला हास्यरस वल्गर श्रेणी में होता तो चार लाईना वाले सुरेश शर्मा जी अब तक सबसे वल्गर घोषित हो गये होते क्योंकि उनके चार लाईना में अक्सर उनकी पत्नी का जिक्र होता है :)

अनूप शुक्ल said...

सतीश जी,

मेरा उद्धेश्य इस बहाने आपको व्यंग्य के बारे में परसाई जी का लेख पढ़वाना है।

बाकी देवेन्द्रजी की टिप्पणी के बारे में क्या कहें! आप तो गांव घर में रहे हैं। वहां गाय बैल आराम से रहते हैं। गायों को बैलों या इसका उलट कोई खतरा नहीं होता। जिनसे फ़र्क पड़ता है वे कांजी हाउस में रहते हैं।

परसाई जी का मानना है कि व्यंग्य में करुणा की अन्तर्धारा होती है। यह विधा नहीं स्पिरिट है। :)

अनूप शुक्ल said...

आपकी पोस्ट और देवेन्द्रजी की टिप्पणी में वल्गरिटी वाली बात को निरस्त समझा जाये। :)

ajit gupta said...

व्‍यंग्‍य के तीर अब कहाँ झेल पाते हैं लोग, अब तो पंखुड़ियों से भी घायल हो जाते हैं।

संतोष त्रिवेदी said...

जो सबकी खबर ले,कोई उसकी भी तो ले.....घर में आग लगी घर के चिराग से !
व्यंग्य-विधा जैसी भी हो चलती रहनी चाहिए नहीं तो हँसने का संकट भी पैदा हो सकता है !सामने वाला चाहे तो व्यंग्यकार को उसी के औज़ार से मार सकता है !

जयकृष्ण राय तुषार said...

प्रथम बार आना हुआ लेकिन भाई सतीश पंचम जी बेहतरीन व्यंग्य पढ़ने को मिला रास्ता बताने के लिए डॉ० अरविन्द मिश्र जी का आभार |

जयकृष्ण राय तुषार said...

प्रथम बार आना हुआ लेकिन भाई सतीश पंचम जी बेहतरीन व्यंग्य पढ़ने को मिला रास्ता बताने के लिए डॉ० अरविन्द मिश्र जी का आभार |

shilpa mehta said...

:)

सञ्जय झा said...

rapchik istyle me tapchik post.......

व्यंग्यकार की दशा कभी-कभी तो धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का वाली हो जाती है। मजा तो सभी लेते हैं पर वह कितना झेलता है वही जानता है।

upar ke kament tap par hai.....

vyangakron pe vyang bole to 'mahavyang'........ achhi hai.......

jai ho.

Poorviya said...

अरे जाने दिजिए, वो तो व्यंगेड़ी ठहरा, भला उसकी बात का भी क्या बुरा मानना"

jai baba banaras....

नीरज गोस्वामी said...

Kya likhte aap...Waah...Bhai maza aagaya...Jai ho.

Neeraj

रंजना said...

बढ़िया कटाक्ष....

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की ११०० वीं बुलेटिन, एक और एक ग्यारह सौ - ११०० वीं बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

प्रतिभा सक्सेना said...

होंठों पर हँसी और आँखों में नमी - व्यंग्य की चरम स्थिति कम ही मिलती है.गुदगुदा कर जगा देना व्यंग्य की आदत है .

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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