सफेद घर में आपका स्वागत है।

Wednesday, October 19, 2011

कुरसी ले आओ आर....काहे खड़े खड़े ताक रहे हो......

.......

- कृपया आप लोग सांत हो जाइये.....अरे भाई शांत हो जाओ आप लोग...... क्यों बात नहीं मान रहे...सांत हो जाइये.....

- अरे तो चप्पल ही तो फेका है, इसमें इतना उतेजित न होइये.....उतेजना में काम सही नहीं होता....

- अब आप लोग उनको मारेंगे तो ई तो हि्ंसा हो जाएगी....फिर उनमें और हममे फर्क क्या होगा...

- नहीं देखिये आप लोग गलत कर रहे हैं..... छोड़ दिजिए, वह भी इंसान है.... गलती हो जाती है....

- अ त चप्पल फेक दिया तो उसी में कट गये कि एकदम बेहोस हो गये....बात करते हैं....

- त मारियेगाsss .....हैं...ई कौन बात हुई कि चप्पल फेंका तो आप भी मारेंगे ?

- ए जैबरधन जी, तनिक हटाइये उन लोगों को...

- नहीं, बिचार बिचार में भिनता आ जाती है, लेकिन इसका ए मतलब थोड़ी है कि उसने चप्पल फेका तो आप लगेंगे थपड़ियाने....

- अरे रामनरायन जी को कहिये थोड़ा पंखा चला दें....हां...टेबुलै वाला कह रहा हूं तब क्या एतना जल्दी सीलींग वाला फिट करोगे तब हवा चलाओगे....

- नहीं, हमारे कहने का मतलब ए है कि सामने वाला यदि अचेत है, नासमझ है तो क्या आप भी नासमझी दिखाओगे.....

- तो आप जाकर उनसे पूछिए न, उनकी पिटाई हुई तो उसके लिये वो जवाबदार हैं हम नहीं, अरे यार पंखा अब तक नहीं चालू किये...

- अरे भाई, दस आदमी जुटे हैं, किसी बात पर मतभेद हो जाता है, कोई उखड़ जाता है, कोई पखड़ जाता है....ऐसे में सबको न संभालकर एक साथ लेकर चलना पड़ेगा......

- नहीं हम ओ नहीं कह रहे, हमारा कहनाम ये है कि मानलिजिए जिस आदमी के पास दो ही पैर था तो चल लेता था, दौड़ता था, तमाम दुनियावी काम करता था। अब जैसे ही उसके पास मान लो पचास पैर और आ जांय तो सुरूवात में लड़खड़ईबै करेगा, कभी एक गोड़ दूसरे में बझेगा त कभी दूसरा गोड़ आठवें दसवें पैर में बझेगा, लन्गी लगायेगा.... समझे कि नहीं समजे...

- त वईसे ही है, सब को एक साथ लेकर चलने में, संभलने में थोड़ा समै लगता है....

- हां, बिलकुल, आप की बात से बिलकुल सहमत हूं भाई....ए त देखिये राजनीति है ये तो आप जानते ही है

- त राजनीति जो है सो कुल आपसे करवाएगी, आपको समय आने पर गदहा भी बनना पड़ेगा, समय आने पर चोर भी बनना पड़ेगा औ समय आने पर सदपुरूस भी बनना पड़ेगा

- नहीं, त आप ....हां लाइये....पान लेंगे रमणीक जी.....लिजिए...चूना अलग से है...

- हां त वही बात कि सब टैम पर सब राजनीति के अनुसार बनना होना पड़ता है, एकदम से टैट होने से नहीं चलेगा, आप को झुकना भी पड़ेगा, चार बात सुनना भी पड़ेगा, औ जरूरत पड़ने पर लातौ घूंसा खाना पड़ेगा...

- न त हम कहां मना कर रहे हैं.....लात घूंसा चलाना भी पड़ता है लेकिन ये कोई अच्छी राजनेति नहीं है....बाकि तो....लिजिये चाहौ आ गई...

- एक कप और लाइये....बिन्देस्वरी जी आप चाय पियेन्गे कि काफी.....त काफीये लाइये...चाय रोक दिजिए.....

- तो वही बात कि.....अ देखिये पंखा भी चल पड़ा हरहरा कर.....नहीं तीन पर किजिए 'फास' एकदम.....हाँ  'नोबवा' घुमा दिजिए जौने चारू ओर घूमे.....

- तो वही बात कि........नहीं जियादे नहीं, अइसे बिचारधारा वाले बहुत कमै हैं लेकिन हैं.....
 
- अरे यार बात समझा करो........ तो हम कहां कह रहे हैं कि कसमीर दे दो......हम कत्तई न कहेंगे कि कसमीर दे दो....उन लोगों की आजादी की मांग पूरी करो....कभी नहीं कहेंगे......... 
 
- अरे ई  कौनो साहरूख खान वाला फिलिमया थोड़े है ओ का कहते थे दिल वाले दुलहिनिया ले जायेंगे  जिसमें अमरीस पुरीओ था,  कौनो हिरोइन थी ओ यार वो जो कमर ओमर बड़ा नीक डोलाती थी....हां......ओही.....

- अ देखिये रमकैलास जी को लक्क से हिरोइन का नाम बता दिये.....अरे बहुत पुराना खिलाड़ी हैं कि.....
 
- तो जैसे  दिल वाले दुलहनीया में कहता है  - जा बेटी जी ले अपनी जिनगी.....जा तुझे साहरूखवा के जइसन चाहने वाला नहीं मिलेगा....तुझे आजाद किये......त ई बात कसमीर पर थोड़े लागू होगी.....न.....कत्तई नहीं.......न तो  कसमीर साहरूख है न सिमरन.....कसमीर कसमीर है.....
 
- हां,.... पुलिस वाले आ गये.....तब ठीक है..... उसी के हाथ में सौंप दिजिए उस चप्पलमार को बाकि अब का कहें....ससुर बड़ा नरक है राजनीति....
 
 
- सतीश पंचम

16 comments:

rashmi ravija said...

सच में सच्छात नरक है राजनेति ....अब मलाई मक्खन मिल जाता है...सात पुश्त के आराम का इंतजाम हो जाता है तो का हुआ ..कहना तो नरके पड़ेगा ना

Abhishek Ojha said...

पंखवा चल गया ये अच्छा हुआ ऊ भी हरहरा के !

'चाय रोक दिजिए' हा हा.
और ये तो 'कमर ओमर बड़ा नीक डोलाती थी.' मस्त है :)

नीरज गोस्वामी said...

बहुत कमाल लिखें हैं आप...पूरा आँखों देखा हाल सुना दिए हैं...बधाई स्वीकारेंगे...का कह कह रहे हैं? नहीं...अरे बधाई है इसमें कोनो भ्रष्टाचार का मुद्दा नहीं आएगा...यूँ बात बात पर न घबराइयेगा...स्वीकारिये...जी धन्यवाद.

नीरज

ajit gupta said...

आप नखलऊ में थे क्‍या?

सतीश पंचम said...

अजीत जी,

जूता चप्पल फेंकना यूनिवर्सल फिनामिना हो गया है और उसी हिसाब से प्रतिक्रियायें भी स्टीरीयोटाइप हो चुकी हैं :)

सो ऐंवे ही लिख डाला मुम्बईये में बैठे बैठे :)

प्रवीण पाण्डेय said...

काजल की कोठरी में....

संतोष त्रिवेदी said...

बोले तो एकदम झक्कास मार्का पटनिहा-पोस्ट !

संतोष त्रिवेदी said...

"अ देखिये पंखा भी चल पड़ा हरहरा कर.....नहीं तीन पर किजिए 'फास' एकदम.....हाँ 'नोबवा' घुमा दिजिए जौने चारू ओर घूमे....."

पइसा वसूल सरकार !

Arvind Mishra said...

यही सब नौटंकी शुरू है ..देखिये किस अंजाम तक पहुँचती है !

Ritu said...

चप्‍पलफेंक संस्‍कृति पर अच्‍छा व्‍यंग्‍य है

हिन्‍दी कॉमेडी- चैटिंग के साइड इफेक्‍ट

Poorviya said...

jab social se palitical banege tab yahi sab hoga ...vyang aacchha hai...


jai baba banaras......

सञ्जय झा said...

o mara papar wale ko.....

jai ho

देवेन्द्र पाण्डेय said...

हम तो नाम ही के बेचैन आत्मा हैं...असली तो आप हैं । फुर्र से पहुंच गये लकनऊ...! मजा ई है कि अपने गये तो गये संगी साथी को भी लिवा गये।

मिजाज बिगरा रहे तो अपने घर न जाके सफेद घर जाना अधिक सही रहता है।

मनोज कुमार said...

एक क्लासिकल कृति। ब्लागजगत में ऐसी रचनाएं बहुत कम पढ़ने को मिलती हैं।

अंत में जो कहे हैं वही अंतिम सत्य है कि नरके है राजनीति।

संगीता पुरी said...

सच में नरक ही है राजनीति .. अच्‍छा लिखा है !!

संजय @ मो सम कौन ? said...

थारी पोस्ट बड़ी है मस्त-मस्त:))

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