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Sunday, October 16, 2011

दर्द का सरकारी रिश्ता......

         हाल ही में एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री को जेल में डालते ही उनके सीने में दर्द उठा। बेचारे जेल से अस्पताल ले जाये गये। ऐसे ही कई और भी राजनेता हैं जिन्हें जेल जाते ही सीने में, कमर में, अगल में बगल में दर्द उठने लगता है। समझ नहीं आता कि यह दर्द अदालती फैसले के आलोक में है या वास्तविक दर्द है। ऐसे लोगों की डॉक्टरी रिपोर्टें भी गजब अंदाज में आती हैं। सीधे सीधे गणित के विलोमानुपाती अंदाज में। मसलन, यदि सरकारें अनूकल हुई तो मेडिकल रिपोर्ट खराब आती है, शुगर, बीपी सब बढ़ जाता है, सरकार चिंता प्रकट करती है। और यदि सरकार प्रतिकूल हुई तो मेडिकल रिपोर्ट सब ठीक ठाक आता है। बीपी नॉर्मल होगा, शुगर लेवल सीमांत प्रदेश पर गुलछर्रे उड़ा रहा होगा और तो और डॉक्टर खुद ही कह देगा कि इन्हें कोई बीमारी नहीं है, वापस जेल ले जाया जा सकता है। ऐसे में उन मरीजों का दिल और बैठ जाता है, हांलाकि तब भी शिकायत होती है कि दिल ठीक से बैठ नहीं पा रहा, संभवत: उसे गठिया न हो गया हो। डॉक् साब जरा देख लेंगे तो अच्छा रहेगा, आपके बच्चे जियेंगे, पत्नी होगी तो खुश रहेगी और गर्ल फ्रेण्ड होगी तो सस्ते रेस्टोरेण्ट में भी निबाह लेगी। डॉक् साब.....डॉक् साब....


           अब ऐसे में उन डॉक्टरों की स्थिति समझी जा सकती है जिन्हें ऐसी रिपोरटें बनाने के लिये कहा जाता होगा। मसलन, जो डॉक्टर अपनी पांच साल की मेडिकल पढ़ाई और तमाम अनुभव आदि के जरिये पहली ही नजर में समझ जायेगा कि बंदा नाटक कर रहा है सीने में दर्द होने का वह पहले देखेगा कि दर्द सरकारी है या प्राइवेट। बंदा सरकार फ्रेण्डली है या एण्टी सरकारी। इसे ठीक ठाक बताने पर क्या प्रतिक्रिया हो सकती है, कहीं गाँव में पोस्टिंग न कर दी जाय। इन तमाम प्रश्नों के बीच उसे समझ आता है कि उसकी मेडिकल पढ़ाई में एक सब्जेक्ट जान बूझकर छोड़ दिया गया जिसमें इस तरह के लोगों के हैण्डल करने की विधि बतानी चाहिये थी। तमाम फिजूल की बातें पढ़ा दी जाती हैं - ये पैंक्रिया वाली बीमारी है, इसे ऐसे ठीक करना चाहिये, ये नसों की गड़बड़ी है, इसे फलां तरह से दवा देकर सक्रिय करना चाहिये लेकिन कहीं यह नहीं पढ़ाया जाता कि ऐसे हाई प्रोफाइल मरीजों के नकली दर्द को कैसे हैण्डल किया जाय। कैसे उनके चेले चपाटों से अपना गिरेबान बचा कर रखा जाय।

          उधर वार्ड ब्वॉय अलग परेशान होगा कि ऐसे नेता को कैसे वह संभाल कर बाथरूम ओथरूम ले जाय, कैसे उसकी सेवा टहल करे जबकि वह अच्छी तरह चल फिर सकता है, अच्छी तरह घूम नाच सकता है। नर्सें अलग परेशान कि ऐसे नाटक करने वाले मरीजों को कैसे दवा दे जोकि भले चंगे हैं। कुछ तो अपने पुराने अनुभव से जानती हैं कि ऐसे मरीजों के जाने के बाद सफाई करते वक्त फूलदान, बुके आदि की तलहटी में टेब्लैट्स जस के तस फेंके पाये जाते हैं, न उन्हें खाया जाता है न कुछ लेकिन मरीज भला-चंगा होकर जाता है। ये अलग बात है कि उनके स्वस्थ होने में जो समय लगता है वह न्यायिक हिरासत या पुलिस हिरासत के बीतने पर निर्भर करता है। इधर अदालत के द्वारा तय न्यायिक हिरासत की समय सीमा बीती उधर मरीज अपने आप भला चंगा हो जाता है।

         खैर, अब तो अस्पतालों में भी एलर्ट कर दिया जाना चाहिये कि जैसे ही किसी वी आई पी के गिरफ्तार करने की खबर आये तुरंत ही एम्बुलेंस, बिस्तर, आपरेशन थियेटर आदि तैयार रखें क्योंकि अभी उसके सीने में दर्द उठेगा और वह उठा पठाकर यहीं लाया जायेगा। सुना है अस्पतालों के सामने बैठते पानवाले भी अपनी त्वरित बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं और मण्डी से पान का तिगुना चौगुना स्टॉक लाकर रख देते हैं क्योंकि माना जाता है कि वहां जमा होने वाले नेता के चेले चपाटों का सर्वप्रिय खाद्य पदार्थ पान ही होता है। दूसरी कोई चीज उन्हें ऐसे में अच्छी नहीं लगती सिवाय पान के। और भला लग भी कैसे सकती है जब उनका नेता अन्दर जिन्दगी और मौत से जूझ रहा हो। यह अलग बात है कि अन्दर उनका नेता मजे से एसी कमरे में बैठ भांति भांति के व्यंजन भकोस रहा होता है।  सिर हिला-हिला कर कहता है....

- और दो रोटी रखो, चावल जरा सा रखना और सब्जी भी थोड़ा सा ही रखना...

- अरे थोड़ा बोला था ज्यादा रख दिया.....

- अच्छा रख दिया तो रखो अभी क्या बोलूं ...

- वो रसगुल्ला बोला था.........

- तो रखो ना

- अरे रखो यार...... रिपोर्ट की चिंता तुम काहे करते हो

- नहीं वो अचार मत रखना.... बहुत तीखा है, मत रखो...सुबह तफलीक होता है

- नहीं, उसका रिपोर्ट पब्लिक नहीं करना.....

- अरे यार समझा करो....कल को पब्लिक में खराब इमेज बनेगा ....अप्पोजीशन बवासीर-भगन्दर के नाम पर मजाक बनायेगा.......सो कीप इट प्राइवेट   :-)


- सतीश पंचम

15 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

मज़ा आ गया!

वाणी गीत said...

कहाँ कहाँ रख छोड़े हैं अपने जासूस , भीतर की सब खबर है!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

ब्लॉगर तो प्रेस रिपोर्टर से भी तेज हैं!
विषय रोचक है..कुछ और जासूसी कीजिए..कुछ और लिखिए।

प्रवीण पाण्डेय said...

हर जेल में एक अस्पताल अवश्य हो।

संजय @ मो सम कौन ? said...

अपन तो समझ जाते हैं फ़ौरन कि जेल का हुक्म होते ही अस्पताल का एक बैड और गया।

Ritu said...
This comment has been removed by the author.
Ritu said...

जेल जाने पर नेता भी अभिनेता बन जाते हैं

हिन्‍दी गालियों की परिभाषा

Arvind Mishra said...

परदे की पीछे की एक कहानी यह भी है -वी आई पी सफाखाना !

सञ्जय झा said...

surf excell ki dhulai......

jai ho.

ajit gupta said...

दर्द ऐसी चीज है जिसका कोई पैमाना नहीं। अब बेचारा डाक्‍टर क्‍या करेगा। वैसे भी ये नेता लोग बीमारी तो पाले ही रखते हैं, तो भर्ती होने का मौका मिल ही जात है।

anshumala said...

मुझे तो लगता है की इन बड़े नेताओ का जेल भेजते समय जजों को कहना चाहिए की इतने दिन की न्यायिक हिरासत या इनके सिने में दर्द हो तो फिर जितने दिन ये अस्पताल में रहे उन्हें जेल के अन्दर गिना ही न जाये जब ठीक हो तब इनको जेल में डालो उतने ही दिन के लिए |

नीरज गोस्वामी said...

"सीने में जलन...".शायद ये गीत ऐसे ही किसी नेता के लिए लिखा होगा...:-)

नीरज

P.N. Subramanian said...

सुन्दर कटाक्ष. यहाँ तो अदालत में हाजिरी होते ही दिल का दर्द होने लगता है.

abhi said...

अस्पताल वालों को ट्रेनिंग दी जानी चाहिए की ऐसे नाटक करने वाले मरीज से वो कैसे निपटे :)

शोभना चौरे said...

मेरे हिसाब से तो ऐसे रोगियों ? को जनरल वार्ड में रखने का सख्त नियम हो तो सीने का दर्द कभी नहीं उठेगा |
बहुत अच्छा आलेख |वकीलों के आमदनी भी काफी बढ़ गई है ?इस धर पकड से |

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