सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, October 9, 2011

रू कतिया करूं.....

      चरखा चलाना, सूत कातना  इतना रोमांटिक हो सकता है क्या ? कम से कम रॉकस्टार फिल्म के   शब्द तो यही कहते हैं

सारी रातें कतिया करूं....
कतिया करूं....
कतिया करूं
सारी रातें कतिया करूं.....

  बहुत पहले अपनी पंजाबी की किसी किताब में पढ़ा था कि - नीम  दे रूख थल्ले चरखा कत्तदी,  तेरी यादां नूं जप्पदी पई....

 पूरा याद नहीं लेकिन कुछ कुछ वही अंदाज लिये ये रॉकस्टार का गीत पसंद आया। साहित्य इसी तरह फिल्मों में पिरोया जाय तो नॉस्टॉल्जिक आनंद मिलना स्वाभाविक है। 

    ईरशाद कामिल के लिखे गाने को जिस खूबसूरती से  ए. आर. रहमान ने संगीतबद्ध किया है, काबिले तारीफ है। एकदम सहज।  हां, फिल्मांकन थोड़ा सा अटपटा जरूर लगा वह भी तब  जबकि मूत्रविसर्जन करते कुछ लोगों को लड़की जाकर डिस्टर्ब करती है। अब ये तो फिल्म देखने के  बाद ही पता चलेगा कि यह दृश्य किस संदर्भ में क्या कहना चाहता है।

   बहरहाल फिल्ल्ल्लम जब देखा जाएगा तो देखा जाएगा, अभी तो आप   इस राप्चिक गाने का आनंद लें।  नोश फरमायें। 





10 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बुनते रहिये, अपना जीवन बुनते रहिये।

मनोज कुमार said...

एक अच्छे गीत की झलकी देखना अच्छा लगा।

अनूप शुक्ल said...

गीत-वीत तो सब ठीक है! आज से कुछ सालों बाद की पीढ़ी के लोग जब इसे देखेंगे तो कहेंगे शायद -उन दिनों फ़िल्म निर्माता इतने गरीब होते थे कि हीरोइनों को पूरे कपड़े तक मुहैय्या नहीं करा पाते थे। :)

सतीश पंचम said...

अनूप जी,

इतिहास और मामलों में भले ही खुद को न दुहराये, फिल्मों के मामले में खुद को दुहराता दिखता है।

अब की पीढ़ी पुरानी फिल्मों को देख कहती है कि वे लोग बड़े शर्मीले थे। महिलाओं से ही पुरूषों के रोल करवाते थे। पत्नी भी महिला, पुरूष भी महिला।

बाद में जब महिलाएं रोल करने लगीं तो उन्हें शर्माते हुए पूरी बांह के कपड़े पहनवाते थे। बैलुन बांह वाली ब्लाउज पहनवाते थे।

बाद में तो बांह ही उचर गई, ब्लाउज से बिकनी का जमाना आ गया और वह भी बस जाने को हो आया है। यानि आदि मानव काल की तरह नग्न आखेट करते हीरो हिरोइन भी यदा कदा दिखने लगे हैं।

गरीबी का दर्शन फिल्म इतिहास में गौंण है , यहां गरीब हिरोइन लिपिस्टिक लगाये दिखती है।

बाकि तो इतिहास को फिर से दुहराते देखा जा सकता है। कुछ फिल्मों में फिर से पुरूष ही महिलाओं का रोल करने लगे हैं। गे फिल्में, दोस्ताना फिल्में उसी की पुनरावृत्ति करती लगती हैं :)

सतीश पंचम said...

Update :- अभय तिवारी जी ने करेक्शन करते हुए बज् पर बताया कि - रूप नहीं रू कातने की बात हो रही है.. रू यानी रूई.. ये एक परम्परागत मुखड़ा है जिस पर इरशाद ने नया गाना लिखा है.. नेट पर खोजने से इसी मुखड़े के दूसरे गाने भी मिल जायेंगे....।

सो करेक्शन कर दिया हूं। शुक्रिया अभय जी।

Vivek Rastogi said...

ये सु सु करते हुए छेड्ना और जंगली जवानी का तो फिल्ल्म देखने के बाद ही पता चलेगा :D

Kajal Kumar said...

सारी सारी रात रूई कातना और फ़िल्म के दृश्य का आपसी संबंध समझने के लिए बहुत ज्ञानवान होना ज़रूरी है जो मैं निश्चय ही नहीं हूं... फ़िल्म वालों के बलिहारी

डॉ. मनोज मिश्र said...

वाह,यह भी गजब है,आभार.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मस्त है...इतना तो टीवी में भी दिखाता है।

ajit gupta said...

गीत कुछ देर बाद सुनते हैं। आपने पसन्‍द किया है तो अच्‍छा ही होगा।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.