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Friday, September 30, 2011

नरगिसी चिन्तन...... अहमक बतियाँ.....

          आज सुबह ऑफिस जाते समय FM चैनल पर महिला RJ ने चहकते हुए कहा - You Know नरगिस फकरी,..... She is coming with रणवीर कपूर in Rockstar. पुरूष RJ ने कहा - hey, b carefull while Taking her name.....नरगिस फक्करी.....


      और दोनों ही खिलखिला उठे।

         जेहन में बात आई कि ये नरगिस कोई अमरीकी मॉडेल है, आधी पाकिस्तानी, आधी चेक रिपब्लिकन। पिछले दिनों काफी सुनने में आ रहा था कि बेहद बोल्ड मॉडलिंग के लिये कुख्यात रही है। इसी सोच विचार के बीच मौसम का वो बेहद खूबसूरत गीत बजने लगा जिसमें शाहिद कपूर गाँव के दिलकश माहौल में अपनी प्रेमिका को निहारते हैं। छत पर दौड़ते भागते नजर आते हैं, एक ओर कंडे रखे हैं तो एक ओर कुछ सुखाया जा रहा है। हिट रहा यह गाना। वैसे मैंने एक बात नोटिस की है कि जिस किसी गाने में छत का जिक्र हो या लोकेशन छत पर हो वह गाना हमेशा से ही हिट रहा है। चाहे वह छत पर लाल मिर्ची का अचार बनाते ससुराल गेंदा फूल गीत हो या प्यासा फिल्म का गुरूदत्त पर फिल्माया 'कशिश' गीत।

       याद किजिये गुरूदत्त की 'प्यासा' फिल्म जिसमें गुरूदत्त छत पर खड़े हुए गहन सोच में डूबे हैं और नायिका गुरूदत्त के करीब जाना चाहती है। उसी वक्त वैष्णव भक्तगणों की एक टोली नीचे गा बजा रही होती है जिसके बोल होते हैं -


आज सजन मोहे अंग लगा लो, जनम सफल हो जाय
हृदय की पीड़ा देह की अग्नि सब शीतल हो जाय

यह गाना अपने समय में खूब चला था।

      इसी तरह 'मेरा साया' फिल्म के हिट टाईटल गीत में भी कुछ अंश महल की छत पर फिल्माये गये थे। चुपके चुपके का एक गीत जिसमें जया छत पर गा रही होती हैं - चुपके-चुपके चल री पुरवाई वह भी हिट रहा था। ऐसे कई गाने बरबस ही याद हो आते हैं। कुछ में लोकेशन भले ही छत की बजाय लैंडस्केप हो, इनडोर हो लेकिन वहां यदि छत शब्द का इस्तेमाल हुआ है तो वह भी हिट रहा है। गुलज़ार का लिखा मौसम फ़िल्म का ही - दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन - गाने में भी छत शब्द का इस्तेमाल हुआ है। गुलज़ार लिखते हैं -


ठंडी सफ़ेद चादरों पे जागें देर तक
तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुये

           वहीं दिलीप कुमार अपने समय के हिट फिल्म नया दौर में नायिका से गुजारिश करते दिखे कि - तू छत पर आ जा गोरिये, तुझे चांद के बहाने देखूं । यह अलग बात है कि नायिका इन्कार करते हुए कहती है कि - अभी छेड़ेंगे गली के सब लड़के कि चांद बैरी छुप जाने दे......

इस तरह के ढेरों गीत हैं।    खैर,   आगे कई और भी गीत बजे, कुछ अच्छे कुछ बुरे, कुछ ढिंका चिका, तो कुछ छम्मकछल्लो टाइप। उसी दौरान एक विज्ञापन भी आया - Oral Contraceptive Pills यानि गर्भनिरोधक गोलियों का। वैसे भी इस तरह के विज्ञापन अब आम हो चले हैं लेकिन इधर कुछ दिनों पहले तक इनका आना कुछ कम हुआ था अब फिर से दिखाई सुनाई देने लगे हैं। तभी याद आया कि आजकल नवरात्री का मौसम है, युवक युवतियां डांडिया खेलने जाते हैं। काफी देर रात तक गरबा-डांडिया का कार्यक्रम चलता रहता है। ऐसे में मार्केटिंग कम्पनीयां भी जरूर चाहेंगी कि इस तरह के उनके उत्पाद जरूर बिकें, भले ही नाम जागरूकता का ही क्यों न लिया जाय।

        अभी पिछले साल कहीं अखबार में पढ़ा था कि नवंबर, दिसंबर में अबॉर्शन केसेस बढ़ जाते हैं जिसके मूल में होता है यही नवरात्री के गरबा-डांडिया वाली उछृंखलता। बड़े बड़े कॉरपोरेट हाउसेस ये शो ऑर्गेनाइज करते हैं, दस दस हजार रूपये के टिकट दिये जाते हैं, तमाम हाई फाई डीजे, लाठी लक्कड का इंतजाम खूब लाखों करोड़ों का बिजनेस। जिसे लेकर बाल ठाकरे ने भी टीका-टिप्पणी की थी कि संस्कृति का इस तरह बाजारीकरण उचित नहीं। यूं भी देख रहा हूं कि पहले मुम्बई में बहुत कम दुर्गा पूजाएं होती थी। कम लोग मूर्तियां प्रतिस्थापित करते थे। जिस किसी को पूजा करनी होती अपने घर में ही दुर्गा जी के चित्र आदि के आगे अपनी पूजा करता था। न इतना गरबा-डांडिया का शोर शराबा होता था न कुछ। कहीं होता भी था तो हल्के से जमावड़े के रूप में। अब तो ये हाल है कि FM चैनलों पर एक ओर गरबा-डांडिया के 'कपल पासेस' दिये जाने की घोषणा होती है और उसके पीछे ही पीछे गर्भनिरोधक गोलियों का विज्ञापन भी आता है।

      अभी थोड़ी देर पहले फिर वही 'नरगिस फकरी जी' उच्चारित की जा रही थीं....... खिलखिलाहट के साथ महिला RJ बता रही थीं - मैं डांडिया के कपल पासेस देने जा रही हूं.....आपको बताना है कि नरगिस फकरी किस फिल्म में रणबीर कपूर के अपोजिट आ रही हैं..... 'कप्पल डांडिया पासेस' जीतने के लिये कॉल करें या SMS ब्ला ब्ला ब्ला........

       सोचता हूं - ये सारे बदलाव ये सारी 'घोषित उच्छृंखलताएं' कहीं उस 'घोटुल' परंपरा के बिगड़े हुए रूप तो नहीं जिसमें कि कुछ आदिवासी समूहों में विवाह योग्य नवयुवक-नवयुवतियां अपने जोड़े बनाने के लिये जंगल में आयोजित उत्सव में शामिल होते हैं, जोड़े चुनते हैं, परखते हैं, एक दूसरे का साथ निबाहने की बातें कहते हैं और फिर निकल पड़ते हैं नये जीवन सफर की ओर। अपने आप में ये घोटुल परंपरा उपर से भले ही उच्छृंखल नजर आए लेकिन आदिवासीयो की जरूरतों, उनके रीति रिवाजों के हिसाब से उनके लिये यह विवाह परंपरा का आवश्यक अंश है जिसके तहत गोल घेरा बनाकर नाचने, गाने, एक दूसरे को परखने आदि मौके के रूप में देखा जाता है।

       खैर, इतिहास दुहराये चाहे एकहर ही रह जाय, किंतु इतना जरूर महसूस होता है कि इस तरह से सांस्कृतिक बाजारीकरण और उसके अपशिष्ट कहीं न कहीं भक्ति भावना पर चोट करते हैं। कहीं न कहीं देवी की आराधना हेतु बरती जाने वाली शुचिता को आहत करते लगते हैं।

      वैसे भी अब यह मान्य हो चला है कि परंपराओं और आधुनिकीकरण के बीच झूलते हुए पीढ़ीयों का संघर्ष यूं ही चलता रहेगा, फर्क रहेगा तो केवल उन साधनों में, माध्यमों में जो कि समय के साथ साथ परिष्कृत (?)  होते रहेंगे,  कहीं गाढ़े तो कहीं तिक्त होते रहेंगे।

इन हालात को देखते हुए  अकबर इलाहाबादी का यह  शेर बेहद सटीक लगता है जिसमें  वह फरमाते हैं 

पुरानी   रोशनी  में  और  नई  में  फ़र्क   है    इतना
उसे कश्ती नहीं मिलती,  इसे साहिल नहीं मिलता


- सतीश पंचम

17 comments:

rashmi ravija said...

पहले मुंबई में डांडिया -गरबा सुबह चार बजे तक हुआ करते थे...जब मुंबई में नई थी...सजी-धजी लड़कियों के एक गुरप को रात के दो बजे..सड़क पर आइसक्रीम खाते देख आश्चर्य से भर गयी थी...तब पता चला था, ये लोग गरबा से लौट रही हैं...
पर पोस्ट में व्यक्त की गयी आशंकाओं की वजह से अब समय सीमा रात के दस बजे तक कर दी गयी है...गुजरात में तो लोग जासूस भी हायर करने लगे हैं, बेटे-बेटियों पर नज़र रखने के लिए .

छत पर फिल्माए हिट गानों का उल्लेख भी खूब रहा....अब निर्माता-निर्देशकों को भी हिंदी ब्लोग्स पढ़ने चाहिए....हिट आइडियाज़ मिलेंगे यहाँ से ..(फीस की रकम पर विचार करना शुरू कर दीजिये :))

rashmi ravija said...

ग्रुप *

रंजना said...

सुचिता ,सात्विकता ??? ई का होता है...

ग्लोबल वार्मिंग के ज़माने में ई सब का कामना जिन करो भाई जी...

आपही न कहे, विख्यात नहीं कुख्यात...अब तमस के मार्ग पर चलने में ही किक मिलता है सबको जिन्दगी का...

पूजा वूजा...माई फुट...

मस्ती का तो बस मौका मिलना चाहिए..चाहे बहाना पूजा हो, न्यू इयर या वेलेंटाइन डे का..

रंजना said...

छत परका गाना हिट होने वाला बात आपका काबिले गौर है...

ajit gupta said...

छत पर आजा गौरिया में ही हम तो खोए थे कि आपकी नसीहत भरी पोस्‍ट आ गयी। छोटे शहरों में भी गरबा का चलन तेजी से चला लेकिन जैसे ही ऐसी उच्‍छृंखल घटनाएं होने लगी, बस गिने-चुने गरबे ही रह गए। घोटुल परम्‍परा उनके जीवन का हिस्‍सा है जबकि हमारे यहाँ ऐसी उच्‍छृंखलता जीवन का हिस्‍सा नहीं है। वहाँ गर्भपात नहीं कराए जाते, बस घोटुल वाले दिन अपने जोड़े बनाए जाते हैं।
वैसे देखा जाए तो इंसान भी एक प्राणी ही है, लेकिन हमारे यहाँ सामाजिक प्रतिबंध इतने हैं कि प्रकृतिस्‍थ प्राणी कहीं छिप जाता है लेकिन जैसे ही वातावरण मिला और वही प्राणी हम पर हावी होने लगता है।

Arvind Mishra said...

दमित इच्छाओं के लिबरेशन हेतु ये आयोजन? कहीं कोई कमी तो है :(

रोहित बिष्ट said...

हर युग की अपनी असहमतियाँ होती हैं,जो बदलते मौसम और रंगीनियों को देख मुखर हो उठती हैं।

anshumala said...

काफी समय से ये गरबा वाली बात सुनती आई हूं समझ नहीं आता की जिन युवाओ को कुछ करना होगा तो क्या वो नवरात्र का शुभ मुहर्त आने का इंतजार करते है | जिन्हें कुछ करना होगा उनके लिए क्या दिन क्या रात आज वो जब चाहे तब कर सकते है | जिन्हें गरबा में रात को जाने की छुट मिलती है वो घरो में बंद तो रहती नहीं होंगी पूरे साल , मुझे ये बात कुछ सही नहीं लगती है | रही गर्भ निरोधक गोली की बात तो बता दूँ की विज्ञापन तो अब आना शुरू किया है बाजार में पहले से ही इस तरह की ६-७ दवा पहले से ही बिक रही थी और विज्ञापना आने से पहले एक साल अखबार में पढ़ा की सरकार खुद इन दवाओ की जानकारी युवाओ तक पहुँचाना चाह रही थी ताकि इनके प्रयोग ना करने से जो बड़ी समस्या आ जाती है उससे छुटकारा मिल सके | और रही संस्कृति वाली बात तो मुझे लगता है की मौजमस्ती के नाम पर ही सही यदि हमारे युवा देश की किसी त्यौहार परपरा से जुड़े रहते है तो क्या बुरा है उससे बिल्कुल दूर हो जाने और भूल जाने से तो अच्छा ही है की वो उसे किसी तो रूप में याद रखे , वैसे मंदिर जाने वाले भी कितना घ्यान पूजा में लगाते है ये तो सभी को पता है |

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

@ जिन युवाओ को कुछ करना होगा तो क्या वो नवरात्र का शुभ मुहर्त आने का इंतजार करते है | जिन्हें कुछ करना होगा उनके लिए क्या दिन क्या रात आज वो जब चाहे तब कर सकते है | जिन्हें गरबा में रात को जाने की छुट मिलती है वो घरो में बंद तो रहती नहीं होंगी पूरे साल , मुझे ये बात कुछ सही नहीं लगती है

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एक बार मान भी लिया जाय कि इस तरह की बात गलत है तो भी जो नवंबर दिसंबर में बढ़े हुए अबार्शन केसेस क्या इंगित करते हैं और वे भी केवल उन्ही क्षेत्रौं में जहां बड़े पैमाने पर डांडिया गरबा चलता है। इसे क्या माना जाय ?

वैसे एक खास शहर के बारे में पिछले काफी समय से सुन रहा था कि वहां के लॉज इन दिनो बुक रहते हैं, काफी तगड़े रेट चलते हैं, ये होता है वो होता है, सब कुछ यूं ही तो नहीं होता होगा। और फिर मां बाप जासूस किस लिये हायर करते हैं वो भी तो देखिये।

एक खबर देखिये जब पुलिस ने किसी मामले में एक जगह छापा मारा था तो अखबार में क्या छपा था - "People were being invited through advertisements for massages; they struck up a relationship with the girls and often went to a hotel. The place was also rented to young boys and girls during Navratri."

http://newbombayplus.mumbaimirror.com/index.aspx?page=article&sectid=1&contentid=2009101520091015171448531954cf77f&sectxslt=&comments=true&pageno=1

ढूंढा जाय तो ऐसे ढेरों प्रसंग देखने में आयेंगे। बाकि तो जब यही मानना हो कि - इसमें क्या बुराई है, युवक युवती मेलजोल कर रहे हैं, अच्छी बात है, इसी बहाने ईश्वर-संस्कृति से जुड़े हैं तो भई आगे बात ही खत्म.... फिर क्यों नाहक की बोर्ड खटखटाना :)

प्रवीण पाण्डेय said...

कौन जाने उच्चारणों का अर्थ क्या है?

Udan Tashtari said...

गज़ब!! जिया रज्जा!

संतोष त्रिवेदी said...

एफ एम रेडियो भी फूहड़ हास्य टीवी सीरियल की तरह 'दादा कोंडके' बन रहे हैं...आपका चिटठा कई तरह की पोल खोलता है.अब पूजा-पाठ का कार्यक्रम बहुत सारे लोगों के लिए मौजमस्ती या पिकनिक-पिल बन गए हैं.ऐसी नाच-नौटंकी हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है !

anshumala said...

सतीश जी
सबसे पहले ये स्पष्ट करू की मै युवाओ के नैतिक पतन को सपोर्ट नहीं कर रही हूं मैंने कहा है की यदि वो नाचगाने के बहाने नवरात्र या गरबा आदि से जुड़े है तो इसमे कोई बुराई नहीं है | जहा तक रही नैतिकता की बात तो इस बारे में मुंबई आने के बाद सोच बदल गई है मेरी नैतिकता मेरे पास बाकि सभी लोगो पर उसे नहीं थोपती बाकि लोग अपनी मर्जी का करे मै उन्हें अच्छा या बुरा नहीं कहती | सभी का अपना जीने का तरीका और सोच होता है समय के साथ सब बदलता है हम वैसा ही व्यवहार करते है जैसा हमने अपने समय में देखा है जिस वातावरन में हम पले है समय बदल जाता है हम नहीं बदलते है तो इसका ये मतलब नहीं मानती की आज का समय और सभी चीजे बेकार है, हा मुझे नहीं पसंद है तो ये बस मुझ तक ही सिमित होगा किसी और को मेरी सोच के हिसाब से चलाना चाहिए ऐसा नहीं मानती कम से कम इस विषय में |
एक और बात बताऊ ऐसी खबरों को ज्यादा महत्व नहीं दिया करे जैसा आप ने कहा की अचानक से कंपनी अपना विज्ञापन फिर से शुरू कर दी शायद कमाना चाहती है, इसी तरह आप को बता दू की इस तरह की रिपोर्ट और जासूस हायर करने जैसी खबरे प्रायोजित होती है जो जानबूझ कर खबर की तरह दी जाती है ताकि लोगो में और शक बने और लोग उनको काम दे या फिर जो युवा कुछ नहीं कर रहे है उनके दिमाग में भी ये सब डाला जाये | कुछ साल एक अख़बार में काम किया है उस अनुभव से बता रही हूँ की कैसे टेबल पर बैठे बैठे बिकनी वाली और पैसे ले कर खबरे बनाई जाती है विश्वास ना हो तो ब्लॉग जगत में पत्रकार भरे पड़े है उनसे पूछ लीजिये |
वैसे दूर क्यों जा रहे है क्या आप को बलोग पर खूब तीपनिया पाने वाली या पाठक खीचने वाली पोस्टे या शीर्षक नहीं दिखाई देती है :)

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

नैतिकता की बात का कुछ ऐसा है कि इसे सुविधानुसार इस्तेमाल किये जाने का लायसेंस सभी के पास होता है। हां कोई उस लायसेंस को जेब में छुपाकर रखता है तो कोई लहराता चलता है :)

इसलिये अपन भी नैतिकता फैतिकता के बारे में ज्यादा नहीं सोचते। जब जैसा मूड बना नैतिक हो लिये वरना कौन सा अनैतिकता के चलते चालान कटने जा रहा है :)

वैसे एक परंपरा यह भी देखी गई है कि जब कभी नैतिकता का सवाल उठता है तो लोग रागदरबारी का एक अंश उद्धृत करने का कर्तव्य जरूर पूरा करते हैं। सो मैं भी वही कर्तव्य पूरा करते हुए रागदरबारी का अंश यहा साभार अधिभार सहित दे रहा हूँ -

"नैतिकता, समझ लो कि यही चौकी है। एक कोने में पड़ी है। सभा-सोसायटी के वक्त इस पर चादर बिछा दी जाती है। तब बड़ी बढ़िया दिखती है। इस पर चढ़कर लेक्चर फ़टकार दिया जाता है। यह उसी के लिए है।"

रही बात प्रायोजित खबरों की तो अब तो यह जगजाहिर हो गया है कि कैसे न्यूज बनाई जाती है कैसे चाशनी में लपेट कर पेश किया जाता है। खबरें सुनते ही पहला सवाल मन में आता है कि आखिर ये न्यूज रीडर बता क्यूं रही है, आखिर कहना क्या चाहती है।

झलकी देखिये -

- करीना ने सैफ को विश किया.....
- दीपिका पादुकोण जब रैम्प पर चलीं तो लोग तो बस देखते ही रह गये.....

इन खबरों को सुनने के बाद एहसास हुआ कि दीपिका का रैम्प पर न चलना अब तक कोई बहुत बड़ी राष्ट्रीय समस्या थी जो उनके चलने से हल हो गई है।

उसी तरह संभवत: करीना द्वारा सैफ को विश न करना अब तक देश के विकास में बाधा पहुंचा रहा था। करीना ने सैफ को विश कर दिया अब देश आगे बढ़ जायेगा :)

P.N. Subramanian said...

सुन्दर, सामयिक पोस्ट. बिलकुल सही कह रहे हैं.

वाणी गीत said...

गरबा माँ को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है , मगर इन कार्यक्रमों में किसकी पसंद से किसके लिए किया जाता है , समझ आ रहा है ..
सारे भारतीय त्योहारों की इसी तरह वाट लगी हुई है , का कीजे!

मुनीश ( munish ) said...

All these fucking bastards spoiling our culture deserve hell man...they are plain shit and nothing else !They are scum of universe...and deseve gutter only!! To the gutter......

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