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Tuesday, September 27, 2011

बर्ल्ड टूरिजम डे बजरिये चुल्ली गुरूजी :-)

  देखिये आझ 'बर्ल्ड टूरिज्म डे' है। जिस किसी को घूमने फिरने का मन हो तो घूम ऊम आये। न हो तो हमारे गाँव की बस में आ जाइये, घुमा देंगे। हां, थोड़ा सा भदेस रंग से जूझना पड़ेगा। उधर देख रहा हूँ अभिषेक ओझा भी पटना से हो आये। कुछ कुछ मेरा भी मन गाँव  जाने के लिये लहक आया है लेकिन फिलहाल मौका नहीं मिल रहा। देखता हूं कब तक अपने उसी खालिस परिवेश में पहुंच पाता हूं जहां पर पहुंचते ही लगता है कि असल भारत जैसे यही है, बाकि तो केवल टिकटिम्मा है।
        
वैसे  यह नया तो नहीं, लेकिन इतना पुन्ना भी नहीं। चाहे जिस ओर नजर घुमा दिजिए किसी गँवई बस में यही रंग दिखेगा।..... एकाध गाली-गुफ्तार है....हो सके तो झेल लिजियेगा औ न झेल पायेंगे तो भी कौन सा टैक्स लग रहा है,  सब्सिडी पर ही तो चल रहे थे, समझिये कि वही  वापस ले ली गई बस्    :-)

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        बस अड्डे पर खलासी का चिल्लमचिल्ल………..एक सवारी एक सवारी……रोक के.... रोक के…….चलाsss……ए भाई साईकिल उपर……अरे तनिक गठरी उहां रखिये…..हां किसका किसका बनेगा……अरे बच्चा है तो उसे गोद में लेकर बैठिए…….हां जी आप जाकर बच्चे वाली सीट पर बैठिए…….टिकस लिया है तो बच्चे का लिया है पूरे का नहीं……सीट पर आप बैठ जाईये मां जी…..हाँ…..कहां जाना है………ऐ रिक्शा……अरे तोहरी हरामी क आँख मारौं ……चाँपे चले आव सारे……..ए दाहिने कट के….थोड़ा और……. ए सारेsssss……..

       आज मुलैमा क रैली है…..मायावतीया भी कम नहीं है……लई मूरती….लई मूरती मार पाट दिया है लखनऊ को………अरे त रोजगारौ त मील रहा है……लांण रोजगार मिल रहा है……ससुर जा के देख त मालूम पड़ी……अदालती अस्टे क चक्कर में सिल्पकार लोग बदहाल हुए जा रहे हैं …….. बकि आंबेडकर भी त सिल्पकार……हां…..संविधान…….ए भाई तनिक गाड़ी इस्लो होने दो तब थूको…….हवा ईधरै का है …….
 
      काल सरजू बावन बो दिया……सोनालिका भी ठीक है…..उपज ठीकै है…….…चुल्ली गुरूजी पढ़ाते थे ….. चुल्ली…. उनका चिढ़ौना नाम रख दिया गया……एक निबंध लिखने कहे…..विज्ञान ने हमारे जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन किया है……..हमहूं लिखे...... बड़ी मार पड़ी……बताओ…..आमूल तो आमूल ये चूल क्या है…….…..रोक के….. रोक के……उतरना है …….ए भाई सामान आगे करो………आप वहां बईठो……..अरे तो आधे पर ही बैठो भाई……जल्दीऐ पहुंच जाओगे……..काहे जल्दियान हो……सामान पर जोर मत डालिए…..फूटेगा नही….. अरे चिंता मत किजिए………ओजिन नहीं हूं

       बीड़ी छूआ जाएगा….हाथ उधरिये रखिये……कुर्ता बड़ा रजेस खन्ना कट लिहल बा हो……समधियाने जात हऊवा का ……..अरे तोहरी बहिन क……… काहे भीड़ है आर…….बारात नाराज हो गई …….चार चक्का के बजाय दू चक्का ……बडा करेर दहेजा पड़ा……..…..अरे त हां भाई स्वागत सत्कार खूब किया कि………..


      का हो नईहरे से…….अरे तबै तोहार भऊजी नाराज हईन…… सास कुल सामान उठा के बिटियन के दई दिया….. सूप…..पिसान…..दउरी…..लूगा……नईहर से एतना लेकर आई हो…….केतना भी हो….पर बिटिया के लिये महतारी मयागर रहती है भाई………..बेटवा लोग के न पूछी ओतना………अरे का बिलाना……..पतोहिया बहुत तबर्रा बोलती है……...रोक के…….रोक के ssss……….


     हाँ भाई…….आ जाओ…..उतरिए जल्दी………उतर रहे हैं……कहां हवाई जहाज चला रहे हो……….


- सतीश पंचम

17 comments:

सञ्जय झा said...

mat tori ke bhore-bhore
aughar baba tare tare..
dihis mon mojiya-y.....
pancham post padhai....
dekhah gamak yaid abai."

jai ho.....

P.N. Subramanian said...

अपनी बोलियों में कितनी मिठास होती है! तबीयत तर हो गयी. आभार.

दीपक बाबा said...

ग्राम्य सीरीज मस्त आहे.. :)

नीरज गोस्वामी said...

maine baar kaha hai...aaj fir kahta hoon...aap lajawab hain...aapka lekhan...uff yu maa type hai :-)

mukti said...

ओह! हमारा भी मन गाँव जाने के लिए व्याकुल हो गया. जब से ब्लॉगिंग शुरू किये हैं, गाँव ही नहीं जा पाए हैं, न त इतना बढ़िया पोस्ट लिखते कि पूछिए मत.

प्रवीण पाण्डेय said...

असली प्यार तो वहीं छिपा है।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बजरिये चुल्ली गुरू बर्ल्ड टूरिज्म कs झांकी बहुते मस्त लिखे हो.. तबियत प्रसन्न होई गवा। एक बात बताई राजू तोहका..आजो जब लौटत रहे दफ्तर से तs गोदौलिया चौमुहानी से पहिले अंग्रेजवा उचक-उचक के खींचत रहा ऊ दुकान कs फोटू जेहमें गैया परमानेंट घुस के बैठल रहेली ।

Arvind Mishra said...

बैकुंठ मेल में कभी सदेह यात्रा किये हैं ?
यह सौभाग्य भी बगल की रूट पर कभी कभार मिलता था
जब किसी दिन कोई शव यात्रा में वू बसवा नहीं जाती थी पैसेनजर ढोकर पुन्य लाभ लेती थी ...
विश्व घुमंतू दिवस मुबारक !

ajit gupta said...

काहे हवाईजहाज चला दिए हैं भाई।

संतोष त्रिवेदी said...

जौन लोग गाँव मा रहे हैं वी सब यही तरा के जात्रा किहे हैं...बड़े नीकि नीकि सब्द सुनै का मिलति हैं...धंनि है महराज !

डॉ. मनोज मिश्र said...

झक्कास पोस्ट.

NISHA MAHARANA said...

दिल खुश हो जाता है गाँव के नाम से ही।

रंजना said...

पूरा रंग उतार दिए....

बहुते बढ़िया...लजबाब....

वाणी गीत said...

और सब ठीक है , मगर देसी बोलियों में गालियाँ आदत के रूप में क्यों बकते हैं लोंग!

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत ही दिलचस्प पोस्ट है...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

:)

rashmi ravija said...

@वाणी
मगर देसी बोलियों में गालियाँ आदत के रूप में क्यों बकते हैं लोंग!

सिर्फ देसी बोली में गालियाँ होती हैं...:)

सारे दृश्य साकार हो गए...लोगो के चेहरे भी पहनावे-ओढ़ावे के साथ..:)

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