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Sunday, September 25, 2011

वह जो एक रेखा है

 आज देखा विदेश में प्रधानमंत्री जी भाषण दे रहे थे,  इधर चिदम्बरम पर लोग लट्ठ लेकर पीछे पड़ गये हैं कि तुम भी 2जी मामले में इस्तीफा दो,  चिदम्बरम अपनी सफ़ेद तहमद लपेटते लुपुटते कह रहे हैं मैं क्यों दूँ.....उधर भाजपा बोल रही है नहीं,  दो....  हमको चाहिये :)

 खैर, चिदम्बरम इस्तीफा दें या न दें लेकिन इधर  हाल ही में योजना आयोग के द्वारा गरीबी के लिये जो मानक तय किये गये उसे पढ़कर एकबारगी लगा गलती से सन् इक्यावन वाली रपट सन् ग्यारह की रपट के साथ नत्थी होकर आ गई होगी और समझने में कुछ भूल हुई होगी लेकिन नहीं, सारे अखबार सारा मीडिया चीख चीख कर कह रहा था कि यही रपट है। यही है जिसमें कहा गया है कि रोज का 32 रूपये कमाने वाला शहरी और 26 रूपये कमाने वाला गाँवई गरीब नहीं माना जायगा। मैंने भी सोचा जब बेचारा इतना चीख चीख कर कह रहा है तो सच ही होगा, वरना अब तक तो बैन लग गया,  प्रसारण अधिकार छिन गया,लायसेंस कैंसल हो गया होता इस तरह बिना सेंस के 'लाय' बोलने के लिये। 

     खैर,  ये रपट रूपुट बना ओना कर आयोग फिर से जुट गया होगा अपनी नई योजना से सम्बन्धित विमर्शों में। आखिर योजना बनाने में दिमाग लगता है। चपरासी को इत्तला दी गई होगी -  सादा वाला बिस्कुट मत लाना वो मन की शक्ति तन की शक्ति जगाता बिस्कुट आता है न, वही लाना और हां देखना वो शंखपुष्पी वाला बोरा खाली हो गया हो तो भरवा लेना, मीटिंग के दौरान कम नहीं पड़ना चाहिये। वो क्या है कि याददाश्त मजबूत रखनी पड़ती है आंकड़ों का मामला ठहरा। उधर मीडिया में डायस पर खड़े होकर चार नेता बहस कर रहे होंगे - अरे आप बताइये....अरे आप...आप मेरी सुनिये....पहले आप बताइये कि कैसे कोई 32 रूपये में भोजन कर सकता है, कैसे उसे अमीर माना जा सकता है, कैसे उसे अरे आप चुप रहिये....आप मुझे बोलने ही नहीं दे रहे....आप...आप..... चुप साले (पीं.ईई)......

    Anyway, ये सब तो चलता ही रहेगा।  आप लोग तनिक शरद जोशी जी के एक लेख 'वह जो एक रेखा है'  का अंश पढ़िये जिसे 'नावक के तीर' से साभार पेश कर रहा हूँ।      

शरद जी लिखते हैं -

     सत्ताधारी, जैसा मौसम होता है, रेखा की उँचाई और निचाई का वैसा भाष्य करते हैं। जब वे भीख माँगने या उधार लेने विदेश जाते हैं, वे बताते हैं कि रेखा ऊपर है और भारत के लोग उसके काफी नीचे हैं। जब वे चुनाव लड़ने आते हैं, वे कहते हैं कि रेखा काफी नीचे है और हम उसके ऊपर आ गये हैं। अभी-अभी आये हैं। इन पाँच सालों में ही आये हैं। और सत्ताधारी प्राय: इन दो बातों में से किसी एक पर उलझे रहते हैं। या तो वे उधार माँगते रहते हैं या चुनाव की तैयारियां करते रहते हैं। इसलिये कभी समझ नहीं आता कि गरीबी की रेखा हमारी शर्ट या पतलून की जेब से कितने उपर या कितने नीचे खिंची है। गरीबी की यह रेखा अजीबोगरीब रेखा है। गरीब कितने हैं, पता नहीं, अजीब जरूर है। 

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.......

हमारा जीवन गरीबी की रेखा से पिरोया-सा लगता है। यदि इस रेखा को एक डोरा मान लें, तो हमारा हर फटा उसी से सिला है। 
.....

आँगन में बँधी एक डोर है गरीबी की रेखा। मध्यवर्गीय एक कुरते या किसी पाजामे की तरह उस डोर पर लटका हुआ है। उसका अधिकांश भाग नीचे है, फिर भी कहने को वह डोर के ऊपर है। बड़ी मजेदार स्थिति है। 
...........

   ये सब पढ़कर लगता है कि योजना आयोग तब भी उतनी ही 'मुस्तैदी' से काम कर रहा था जैसा कि अब कर रहा है। एक तरह की कंसीस्टेंसी है। लेकिन यह 'मुस्तैदी' असल में होती क्या है यह आजतक किसी की समझ नहीं आया। जिस दिन समझ आयेगा उस दिन मुझे लगता है मीडिया वाले कैमरा लेकर चिल्ला चिल्ला कर कहेंगे - मैं फिर से कहूंगा....ध्यान से देखिये  यही है वो 'मुस्तैदी' जिसकी सबको तलाश थी...जिसे देश की एजेंसियां ढूँढ रही थीं। 

-  सतीश पंचम

8 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सीधी साधी प्रजा होने का अवसर न जाने कितने पापकर्मों से बचा लेता है हमें।

संजय @ मो सम कौन ? said...

अपने देश महान में लोगों को बस बोलने से मतलब है और दूसरों की बुराई करने से। योजना आयोग के पीछे पड़ गये हैं सारे। क्या झूठ कहा है जी उन्होंने?
हर आदमी अपने अनुभव से ही सत्य को जानता है। देखिये जरा यहाँ -
http://business.bhaskar.com/article/18-rupee-thali-in-parliyament-2452829.html?HF-7=

जनता ख्वामख्वाह शोर मचाती है, आईटम दस की जगह आठ हो जायें तो बन गया न छत्तीस का बत्तीस या और भी कम? कित्ता तो आसान गणित है।

संतोष त्रिवेदी said...

कागज की रेखा और असली रेखा में ज़मीन-आसमान का अंतर है पर नेताओं को दिखकर भी नहीं दिखता

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

चिदम्बरम पर इससे पहले भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं और भूत में उन्हें शायद अपने पद से इस्तीफ़ा भी देना पड़ा था।

ajit gupta said...

सच इसी मुस्‍तैदी की तलाश हैं हमें।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

सरकार एक काम बड़ा अच्छा कर रही है। रोज बुद्धिजीवियों को एक झुनझुना पकड़ा दे रही है। लो आज ए राजा वाला बजाओ..! लो आज लोकपाल वाला बजाओ..! लो आज चितंबर वाला बजाओ..! बोर हो गये ? लो आज गरीबी वाला बजाओ..! चुनाव वाला तो हैये है।

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत सटीक.

नीरज गोस्वामी said...

रेखा ओ रेखा जबसे तुम्हें देखा...खाना पीना सोना दुश्वार हो गया...मैं आदमी था काम का बेकार हो गया...हो..रेखा ओ रेखा...

नीरज

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