सफेद घर में आपका स्वागत है।

Saturday, September 24, 2011

'ओढ़नीया ब्लॉगिंग' चालू आहे........

        यूं तो तीन साल से ज्यादा पुरानी अपनी ब्लॉगिंग में कई रंग देख चुका हूं इस ब्लॉगजगत के और अब भी देख रहा हूं। आप लोगों को याद होगा कि एक 'पलक' वाला मामला था। 'पलक' नाम के छद्म प्रोफाइल से कोई शख्स हर ब्लॉगर के यहां ओठों वाली फोटो के साथ जा-जाकर कमेंट किया करता था और लिंक देकर अपना ब्लॉग देखने के लिये बाकायदा आमंत्रण देता था। लिंक के जरिये वहां जाने पर पता चलता कि किसी महिला के आकर्षक तस्वीर के साथ अड़ी सड़ी कविता चेंपी गई है। लोग देखते ही वाह वाह कर उठते। एकदम लहालोट। कोई कोई तो एकदम रूपा फ्रण्टलाईन पहन जैसे तैयार ही बैठे दिखते कि इधर 'पलक फर्नीचर मार्ट'  की पोस्ट आई उधर सबसे पहले वही रूपा बनियान पहने कमेंट करते दिखाई देते। जबकि कविता के नाम पर उसमें क्या था मैं आज तक नहीं जान पाया लेकिन लोगों को 'पलक' की कवितई खूब समझ आ रही थी :)


      खैर, पलक की कविताएं दनादन्न प्रचारित हो उठीं। जमकर लोगों ने वाह वाह की। इसी बीच कुछ लोगों ने बवाल किया कि पलक फर्जी प्रोफाइल है ये है वो है। एक महिला इस तरह खुलेआम ओठों की तस्वीर के साथ, फलां अंग के साथ कविता नहीं चेंप सकती। तब हुआ ये कि पलक ने हंगामा करने वालों के नाम अपनी कविताएं समर्पित करनी शुरू कर दीं।  "मेरी अगली पोस्ट फलां सर के नाम समर्पित"....... "मेरी पिछली पोस्ट ढेकां सर के नाम समर्पित है"।  उसका इस तरह कवितायें समर्पित करना था कि लोग एकदम से लहालोट हो उठे। एक से एक प्रबुद्धगण जाकर टिपिया आये। आनंदित हुए प्रमुदित हुए। मगन हुए छगन हुए कुल मिलाकर बहुत कुछ हुए।  आगे भी पोस्ट दर पोस्ट ब्लॉगरों को चुन चुन कर समर्पण जारी रहा। यह समर्पण देख  मुझे गाँवों में नाच नौटंकी के दौरान होने वाले नाच की याद आ गई। 
  नौटंकी के दौरान नचनीया नाचते नाचते अचानक ही स्टेज से उतर किसी के पास जाएगी और भीड़ में से ही किसी एक को अपनी ओढ़नी या घूँघट ओढ़ा देगी। आसपास के लोग तब ताली बजाएंगे और लहालोट हो जाएंगे। कुछ के तो कमेंट भी मिलने लगेंगे जिया राजा, करेजा काट, एकदम विलाइती।  और जो ओढ़नी के भीतर ओढ़ा दिया होगा वह अंदर ही अंदर नचनीया पर मुस्की मार रहा होगा और मुस्की मारते हुए जेब से पांच दस रूपए अपना नाम बताते हुए दे देगा। नचनीया फिर नाचते नाचते अपने स्टेज पर पहुंचेगी, हारमोनियम मास्टर तान पर तान छेडे रहेगा और इसी बीच वह घोषणा करेगी कि – ढेलूराम टेलर, केराकत चौराहा वाले की ओर से दस रूपईया इनाम और एही के लिए मैं अगला गीत उन्हें समर्पित करती हूँ कि – गर्मी के महीना, बाली उमरिया...... टप्प टप्प चुए पसीना बलम तनि पंखा चलाय द हो.......इतना कहना होगा कि भीड़ एकदम लहालोट.....सीटी बजने लगेगी, सुगंधित केवड़ा जल वाली पिचकारी भीड पर फौवारा कर रही होगी और जिसका नाम स्टेज पर से घोषित होगा और जिसके नाम पर गीत समर्पित होगा वह ढेलूराम टेलर अंदर ही अंदर मगन होगा कि चलो इसी बहाने मेरी दुकान का प्रचार हो रहा है।



       यही सब याद कर मैंने वो ओढ़निया ब्लॉगिंग वाली पोस्ट लिखा था जिसमें बताया था कि कैसे ओढ़निया ओढ़ा कर ब्लॉगिंग की जाती है, कैसे मजमा जुटाया जाता है, कैसे लोग लहालोट होकर अड़ी सड़ी पोस्ट, गली सिकुड़ी कविता पर टिप्पणी दर टिप्पणी चेपते जाते हैं।

        खैर, जब लिखा था तब लिखा था अब तो मजमा जुटाने के तरीके में भी गुणात्मक बदलाव आया है। अब मजमा छद्म नारीवाद पर भी जुटाया जाता है, अपने अबला होने पर गुहार लगाते भी जुटाया जाता है, हिन्दी भाषा पर संकट आने की हुड़क लगाई जाती है, मां - बाप, सखी सहेली की लिस्ट लगातार अपडेट करते हुए मजमा जुटाया जाता है। न कुछ हुआ तो किसी को समर्पित एक चुभती बिछलाती पोस्ट लिख दी जाती है, टंकी और गुंबद पर चढ़ जाने की बात की जाती है।

     हाल ही में अनुराग जी पर छींटाकशी करती पोस्ट लिखी गई।  मजमा जुटाया गया, जमकर टीका-टिप्पणी की गई। वैसे भी देखा गया है कि  यदि आरोप लगाने वाला पक्ष खुद को अबला के रूप में प्रचारित करे तो उसके फेवर में लोग बिना कुछ सोचे समझे ही तन कर खड़े हो जाते हैं, यह प्रवृत्ति यहां बखूबी दिखाई देती है।

       आप लोगों को यदि याद हो तो मुंशी प्रेमचंद जी की एक कहानी थी - 'बड़े घर की बेटी' . इसमें उन्होंने लिखा है - स्त्रियों के ऑंसू पुरुष की क्रोधाग्नि भड़काने में तेल का काम देते हैं।

    शब्दश:  वही बात यहां भी देखने मिली । महिला का छद्म प्रलाप सुन कोई खुद को गुण्डा बनाने पर तुल गया तो किसी को गुस्से से कंपकपी छूट गई तो कोई न जाने क्या अल्लम गल्लम सांट गया।  खूब विषवमन हुआ। लेकिन लोग यह भूल गये कि इस प्रकार के बेवजह  सपोर्टिंग  किसी  की  घनघोर आत्ममुग्धता बनाये रखने में एक कारक भी होते हैं। लोग कहेंगे कि थोड़ी बहुत आत्ममुग्धता तो सबमें होती है.....  हां होती है,  आत्ममुग्धता सभी में होती है, विशेषकर जो रचनात्मक कर्म से जुड़े हैं, लेखन, कला आदि से जुड़े हैं उन सबमें आत्ममुग्धता होती है।
  
    दूर क्यूं जाना आप अपने आप को ही देखिये।  जब आप-हम कोई लेख लिखते हैं, कोई पोस्ट लिखते हैं  तो  एक बार हल्के से जरूर  मुग्ध होते हैं कि वाह, इसे मैंने लिखा है। यह आत्ममुग्धता स्वाभाविक भी है। होनी भी चाहिये।  किंतु  एक हद तक ही सही लगती है ऐसी आत्मप्रशंसा/ आत्ममुग्धता।  एक हद से आगे जाने पर वही आत्ममुग्धता घातक साबित होती है। तब इंसान अपनी रचनात्मकता वहीं बिखेर बैठता है। धीरे धीरे प्रबल होती उसकी  आत्मप्रशंसा की भावना उसे यह अहसास कराने लगती है कि  उसका काम उच्च कोटि का है, उसका लेखन बहुत स्तरीय है, लोग उसे देखते हैं,  लोग उससे जलते हैं........ऐसे में जो अगला खटका होता है वह सीधे ही आलोचना से दुराव के रूप में सामने आता है। ऐसा शख्स आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाता और सही सलाह भी उसे अपने खिलाफ एक साजिश सी लगती है। नतीजतन अपने संपर्क क्षेत्र से एक एक को निकाल बाहर करता है, ब्लॉग हो तो बैन करता है, चैट हो तो ब्लॉक करता है, मेल आई डी हो तो स्पैम में डालने लगता है। यानि वो सारे काम करता है जिससे कि उसका आलोचक सामने न पड़े।

     ऐसे में जब जरूरत होती है कि लोगों तक अपनी बात पहुंचाने की, आत्मप्रशंसा की खुराक पूरी करने की तो हल्ला मचाया जाता है, कुछ न कुछ हंगामा खड़ा किया जाता है,  ध्यानाकर्षण किया जाता है।  जाहिर है लोग जुटेंगे ही।   तुर्रा यह, कि उसका हल्ला सुन लोग सहानुभूति भी जल्द प्रकट कर देते हैं, बहुत खूब, बहुत बढ़िया, सही कहा, पूरी तौर पर सहमति......। ऐसे में वह इंसान और गहरे में न धंसे तो क्या हो।  इस हालात में उस शख्स की मनोरूग्णता बनाये रखने में वही लोग ज्यादा दोषी हैं जो कि उसके शुभचिंतक बने फिरते हैं। सही सलाह देने की बजाय गुडी गुडी बातें करते हैं।  स्त्रीदुख: कातरता से चुपड़ी रोटीयां परोसी जाती हैं, जबकि  कड़वी दवाई की ऐसे में सख्त जरूरत होती है भले ही वह टिप्पणियों के माध्यम से हो या वैचारिक पोस्ट के जरिये। तब भी यदि डायबिटीज के मरीज की तरह परहेज न करते हुए चाशनी घोलकर पिलाई जायेगी तो आगे ईश्वर ही मालिक है। ऐसी  बद-दिमागियत  और ऐसी बेवजह  छींटाकशी का दौर चलता ही रहेगा और जो लोग अभी  शांति और सद्भाव बनाये रखने की बात करते हैं, बात बढ़ जाने पर तब बगले झांकते नजर आएंगे।


- सतीश पंचम

( सभी चित्र नेट से साभार )

(इस पोस्ट पर मुझे लगता है कि अब तक काफी कुछ कहा सुना जा चुका है। अब और कुछ कहना नाहक वाद विवाद को आगे खेंचने की कवायद होगी। अत: इस मसले को यहीं विराम देते हुए अब इस पोस्ट पर कमेंट ऑप्शन बंद कर रहा हूं ताकि आगे की ओर पठन पाठन चले, रचनात्मक उर्जा का अपव्यय न होने पाये। आप सभी की प्रतिक्रिया हेतु आभार! )

30 comments:

संतोष त्रिवेदी said...

ताबूत पर अंतिम कील ठोंक दिए हैं !!अब कृपया अपनी बारी का इंतज़ार करें,एकठो पोस्ट (?) आपके ऊपर भी आ जाएगी ! लाइन ज़रा लम्बी होती जा रही है,फिर भी कुछ लोग मुर्दनी ओढ़े सो रहे हैं !

Rahul Singh said...

एक गीत चेंपने की गुंजाइश बनती है क्‍या... 'इन्‍हीं लोगों ने ले लीन्‍हा...'

रूप said...

Ye sab blogging stunt hai. Popularity ka naya funda. Ab bahut hua ! Waise topic contemporary hai.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

ओढ़निया ब्लॉगिंग हर दौर में चालू रहेगी। उसके फायदे भी मिलते हैं। वो न होती तो यह पोस्ट कैसे आती...? लोगों को पहचानने और खुद की गलतियों को सुधारने का मौका कैसे मिलता ? दुनियाँ रंग बिरंगी है ..रंग इंद्रधनुश की तरह सजे हों तो सुंदर लगते हैं, बिना अनुपात उढ़ेल दिये जांय तो भद्दे।

रचना said...
This comment has been removed by the author.
प्रवीण पाण्डेय said...

छोटन छोटन बात बड़हिहैं,
उधौ, बहुत न टिकिहैं।

Arvind Mishra said...

बप्पा रे !की बोरडवा बचा की नहीं बच्चा -जान कुर्बान क्या मस्त लिखा है -एक युग को साकार कर दिया और उसकी वापसी को भी! यह पोस्ट एक मील का पत्थर बन गयी है हिन्दी ब्लागिंग में -मैं अनावरण करता हूँ 'वील' का ..आई मीन ओढ़नी का!
बड़ी पतुरिया के साथ एक छोटी भी होती थी न जो हसरत भरी नजर से कभी साज कभी हर दिलफेंक को भी देखती थी ...और सोचती रहती काश मुझे भी यह सब मिले एक दिन.... :) तब वह बीच बीच में गाने की कुछ बोल मुख्य पतुरिया के साथ दुहरा के चुप बैठ जाती थी .....तमाशा चलता रहता था जैसे इस ब्लागजगत में शो चालू आहे !

ajit gupta said...

विवाद को जितना बढ़ाएंगे उतना बढ़ता जाएगा। किसी भी विवाद को स्‍त्री और पुरुष की निगाह से नहीं देखा जाना चाहिए। मैं हमेशा ही कहती रही हूँ कि हम परिवार वाले लोग हैं प्रत्‍येक बात को परिवार की दृष्टि से ही देखनी चाहिए।

सतीश पंचम said...

रचना जी,

आप अपने ब्लॉगरीय मतभिन्नताओं / वाद विवाद को इस मामले से जबरिया न जोड़ें। देख रहा हूं आप बज् पर भी अपने मामले को लाकर इस मुद्दे में मिला रहीं थीं। आराधना चतुर्वेंदी 'मुक्ति' जी ने भी आपसे निवेदन किया था कि आप अपने मामले को इस वाकये से न मिलायें।

आपने कल बज् पर कमेंट भी किया था - अगर में किसी स्त्री के लिये खडी होती हूँ तो मै हर स्त्री के लिये खडी हूँ . मेरा मुद्दा साफ़ हैं ब्लॉग जगत में क़ोई अगर स्त्री के साथ नहीं हैं तो मै हूँ महज इस लिये की मै स्त्री हूँ और इसको अपना कर्तव्य मानती हूँ।

आपकी इसी बात पर PD का कमेंट था - मतलब, सही गलत जाए भाड़ में??

PD का कमेंट मेरा भी कमेंट माना जाय।

जबरी एक गलत बात को गलत पक्ष से जोड़ देने से वह सही नहीं हो जाती।

यहां बात एक आत्ममुग्ध स्त्री के द्वारा बेवजह दोषारोपण और आलोचना को दरकिनार कर छींटाकशी की हो रही है, और आप जबरन भले ही स्त्री का पक्ष लें लेकिन अंदर से आप खुद ही समझ रही होंगी कि वस्तुस्थिति क्या है।

Poorviya said...

aur jawan bai tawn bai gaon ka nautanki ka yaad aayel bahut maja aayel....wah raja Banaras ...kale gaon se lautai hai bahut mast mausam hai ...

e kul bujari chinarri agar na chale tab blogging main ........

jai baba banaras.........

रचना said...
This comment has been removed by the author.
सतीश पंचम said...

As u wish Rachna ji,

कमेंट रखना न रखना आपकी मर्जी।

मैं किसी का बुरा नहीं चाह रहा न ऐसा कभी चाहूंगा। मैंने केवल आत्ममुग्धता और उसे प्रोत्साहित करने वालों की वस्तुस्थिति कही है।

संतोष त्रिवेदी said...

@सतीश जी रचना जी की पुरानी आदत है,पहले अपना कह देंगी,फिर विवाद पैदा करके डिलीट भी करेंगी और अपने यहाँ माडरेट करेंगी ! हम भी ख़ूब भुक्तभोगी हैं !

Abhishek Ojha said...

और कई बार कुछ पिनकाह लोगों के नाम से पैसा देकर उनका नाम भी बुलवाया जाता है. :) सुना है एक बार ५०० रूपया दे दीजिए तो वो २० बार बोल देगा 'फलाने की तरफ से १०० रुपये का इनाम' :)
गजब उदहारण है सोच सोच हँसे जा रहा हूँ.

Abhishek Ojha said...

कल कहीं एक पोस्ट आएगी - "सतीश पंचम सुकिरिया आदा करती करती करती हूँ" :P

कानपुर के नानकारी गाँव में बाल्मीकि जयंती में होने वाले वार्षिक सांस्कृतिक रंगारंग कार्यक्रम में रात भर आईआईटी कानपुर के डायरेक्टर, डिप्टी डायरेक्टर और बड़े प्रोफ़ेसर के नाम से भी पैसे जाते हैं. कोई वहाँ का अलुम्नाई मिला तो डिटेल में बताएगा. :)

दीपक बाबा said...

भाई वाह,

यदि मुझे तो मात्र ११ रुपे की ऑफर दे तो मैं अपनी अगली पोस्ट उसको समर्पित करने को तैयार हूँ..... :)

क्या कहते हैं, जियो रज्जा..

सतीश पंचम said...

'पिनकाह' बड़ा आकर्षक शब्द है अभिषेक जी :-)

यहां मु्म्बई में एक बार किसी कार्यक्रम के दौरान ऐसे ही बिरहा गायिका को कोई बार बार दस रूपया दे रहा था। बार बार सुनाई पड़ता था - रम्दू मिस्त्री, साईकिल इस्टोर, जौनपुर की ओऱ से दस रूपईया इनाम।

बार बार गायिका द्वारा बिरहा रोक कर नाम सुनाने से तंग आकर एक बूढ़ा पिनक गया और जाकर रम्दू मिस्त्री की धुनाई कर दी, यह कहते कि - बुजरौ के खलल डारत हएन :-)

anshumala said...

क्या हुआ विषय ख़त्म हो गया पोस्ट लिखने के लिए या बर्बाद करने के लिए समय कुछ ज्यादा ही बचा है आप के पास या फिर बाकियों की पोस्ट पर टिप्पणी करके मन की पूरी भड़ास नहीं निकली है कब तक पुरा ब्लॉग जगत एक प्रकरण को खिचता रहेगा | क्यों अपने ब्लॉग को कुछ दूसरे ( अनुराग जी नहीं ) लोगों की निजी खुन्नस भड़ास कचरा निकालने का डंपिंग ग्राउंड बना रहे है जिनकी खुन्नस का कारण निजी है ब्लॉग जगत से उसका कोई सम्बन्ध ही नहीं है |

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

सुबह पढ़ा था, शेयर भी किया!
लाइलाज होती चीजों पर ऐसे ही लाजबाब लेखन की दरकार होती है।
.
वैसे इस सफेद घर वाली राइफल से जब कारतूस निकलती है तो बहुतों के जिस्म पीले पड़ जाते हैं, हाथ पसीज जाता है और कट्टे-तमंचे छूट के गिर पड़ते हैं।

rashmi ravija said...

इस हालात में उस शख्स की मनोरूग्णता बनाये रखने में वही लोग ज्यादा दोषी हैं जो कि उसके शुभचिंतक बने फिरते हैं।

अगर आप समझते हैं कि सचमुच कोई शख्स मनोरोगी है...तब तो उस से सहानुभूति रखनी चाहिए ना कि उसके आक्रोश को बढ़ावा देनेवाले आलेख लिखने चाहिए. अगर कोई भी आक्रोशित है...नाराज़ है..तो बजाए उसके आक्रोश पर ठंढे पानी के छींटे डालने के लोग घी डाल रहे हैं...अगर कोई उस क्रोध में कुछ कर बैठे तो जिंदगी भर माफ़ कर पायेगा कोई खुद को?

चाहे वो क्रोध जायज हो या नाजायज ..पर क्रोध तो है ना....ये तो सबको दिख रहा है.

सतीश पंचम said...

@ अगर आप समझते हैं कि सचमुच कोई शख्स मनोरोगी है...तब तो उस से सहानुभूति रखनी चाहिए ना कि उसके आक्रोश को बढ़ावा देनेवाले आलेख लिखने चाहिए
-------------

रश्मि जी,

यह पोस्ट किसी को क्रिटीसाइज करने के लिये नहीं बल्कि उन लोगों के लिये है जो केवल शुभचिंतकई दिखाने के बहाने और भी ज्यादा मामले को उलझा रहे हैं, बेवजह किसी की आत्ममुग्धता पॉलिश कर रहे हैं। यह उसी का नतीजा है कि चाहे जिस पर भी खुन्नस निकाल दी जाती है और सब 'समझदारगण' चुपचाप केवल तमाशा देखते रहते हैं।

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

आपने सही कहा, इस तरह की पोस्टें तभी लिखनी चाहिये जब बहुत समय हो, या कुछ विषय न मिल रहा हो, या जहां तक मैं समझता हूं ब्लॉग-ब्लॉग खेलना हो।

लेकिन कभी कभी इस तरह की पोस्टें लिखनी जरूरी हो जाती हैं।

डॉ. मनोज मिश्र said...

वाह भैया वाह ई त मज़ा आई गय.

प्रवीण शाह said...

.
.
.
महिला का छद्म प्रलाप सुन कोई खुद को गुण्डा बनाने पर तुल गया तो किसी को गुस्से से कंपकपी छूट गई तो कोई न जाने क्या अल्लम गल्लम सांट गया।

.... :))

मजेदार!


...

संजय @ मो सम कौन ? said...

चालू बोले तो? अभद्रता का आरोप लग सकता है आप पर।

ये हमेशा जारी रहेगी।

Kajal Kumar said...

मुझे तो अक़्सर पता ही नहीं चलता (इस बार ही की तरह) कि हुआ क्या है... ब्लागिंग से बीच-बीच में ग़ायब रहने का शायद यह भी एक सुख है :)

... भाई पंचम जी, अलबत्ता मुझे इतना ज़रूर समझ आता है कि यहां भी कुछ लोग हीनभावनाओं के भयंकर शिकार होने के कारण हर दूसरे मुस्कुराने वाले को अपना मज़ाक उड़ाने वाला समझने से कभी नहीं चूकते... इन्हें पता ही नहीं कि अपना ही मज़ाक उडाने के लिए ग़ज़क का जिगर (पंजाबी में हम इसे जिग्रा कहते हैं) चाहिये...
:)

Kajal Kumar said...

ग़ज़क=ग़ज़ब

सतीश पंचम said...

काजल जी,

अच्छा हुआ गज़क को स्पष्ट करते हुए लिख दिया कि गजब लिखा है वरना गज़क उसे भी कहा जाता है जो बोतल लेकर गला तर करते वक्त चपड़ चुपुड़ मुंह डोलाने के काम आता है, बोले तो - 'चखना' :)

कुछ पंक्तियां लिखा था इसी सफ़ेद घर में गज़क ( चखना से सम्बन्धित ) -

http://safedghar.blogspot.com/2010/04/blog-post_10.html

सतीश पंचम said...

इस पोस्ट पर मुझे लगता है कि अब तक काफी कुछ कहा सुना जा चुका है। अब और कुछ कहना नाहक वाद विवाद को आगे खेंचने की कवायद होगी। अत: इस मसले को यहीं विराम देते हुए अब इस पोस्ट पर कमेंट ऑप्शन बंद कर रहा हूं ताकि आगे की ओर पठन पाठन चले, रचनात्मक उर्जा का अपव्यय न होने पाये।

आप सभी की प्रतिक्रिया हेतु आभार !

सतीश पंचम said...

अनुराग जी की टिप्पणी मेल से प्राप्त हुई।

चूंकि पोस्ट में अनुराग जी का नाम है अत: उनकी प्रतिक्रिया को सादर रख रहा हूं।

------------------

पलक वाला किस्सा याद तो है और नौटंकी की अरदास/समर्पण/बलिहारी से उसकी तुलना भी एकदम सटीक ही है। आत्ममुग्धता वाला सन्दर्भ एकदम सही है उसके लगातार विस्तार के कारणों के विश्लेषण से भी सहमत हूँ। गान्धीजी के समय से ही देश में धरना, हड़्ताल, घेराव, विरोध, प्रदर्शन हमारे खून में समाता गया है। जहाँ सारी दुनिया स्रजन और रचनात्मकता के मार्ग को सही मानती है हम विघटन और विनाश की ओर प्रवृत्त हैं। हालिया घटनाक्रम के बहाने एक महत्त्वपूर्ण समस्या पर ध्यान दिलाने का शुक्रिया।


शुभकामनाओं सहित,
अनुराग

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.