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Sunday, September 18, 2011

तुम जो इतना टिप्पणिया रहे हो........

        अक्सर देखा है कि लोग टिप्पणी करते वक्त अपनी पोस्टों के लिंक बिखेरते चलते हैं ( 'लिंक बिखेरना' शब्द संजय अनेजा जी से उधार-अधिभार सहित  ले रिया हूं :)    किसी पोस्ट के विषय से संबंधित अपनी टिप्पणी में बात कहने के लिये लिंक देना तो एक बार समझ आता है और यह जरूरी भी है ताकि  लिंक आदि के जरिये विषय का विस्तार मिले। किंतु उनका क्या जो इस लिंक बिखेरू प्रवृत्ति पर ही आश्रित हैं।  देखा यह गया है कि लोग तब तक अपनी टिप्पणी नहीं करते जब तक कि खुद की कोई नई पोस्ट न लिखें हो। यहां उन्होंने नई पोस्ट लिखी और वहां दूसरे ब्लॉगों पर टिप्पणी चेपते चले। यह प्रवृत्ति तब भी थी जब ब्लॉगवाणी, नारद, चिट्ठाजगत जैसे संकलक थे और अब भी है।   हांलाकि यह लिंक बिखेरने वाली प्रवृत्ति कुछ कम जरूर हुई है लेकिन अब भी यदा कदा 'दृष्टगोचर'.........ओह...ये 'दृष्टिगोचर' तो कुछ ज्यादा ही क्लिष्ट हो गया लगता है ....थोड़ा नीचे उतरता हूं :) 

 इसे ऐसे पढ़ें - हांलाकि लिंक बिखेरने वाली यह प्रवृत्ति कुछ कम जरूर हुई है लेकिन अब भी यदा कदा  दिखाई दे जाती है।

      हां, ये वाक्य कुछ जमा है इस  'दिखाई दे जाने'  वाले शब्द में किसी के द्वारा कुछ 'दिये जाने का भाव' है :) 

        खैर,  इस प्रवृत्ति पर  मैंने सितंबर 2008 में अर्थ फिल्म के एक गीत पर आधारित  'पैरोडी टाइप' कटाक्ष किया था। हल्के फुल्के मूड़ में लिखी उस पैरोडी को फिलहाल आप भी हल्के फुल्के मूड़ में ही पढ़ें। ज्यादा सिरियस होकर पढ़ने से कपार में पीर हो जाय तो जिम्मेवार हम नहीं 'आपहि' होंगे  :)

   एक बात और जिसे मैं महसूस करता हूं कि संकलकों की कमी के चलते नये ब्लॉगरों द्वारा इस तरह टिप्पणियों में लिंक देना लाजिमी है,  किंतु कुछ पुराने हो चुके ब्लॉगर जब नयकों की तरह बिहेव करते हैं तो 'टहोकना' जरूरी हो जाता है, इन प्रवृत्तियों पर हल्की फुल्की मौज लेते रहना चाहिये :)

      वैसे भी  ब्लॉग, ब्लॉगिंग, ब्लॉगत्व पर आजकल कुछ जियादे लिखा जा रहा है तो हम सोचे इस घटाटोप में हमहूं तर-बतर हो लें। झूट्ठे ही याद कर लें कि अचानक हमको कुछ अपना पुराना याद आ गया है....याकि आज अलमारी साफ करते यह पंक्तियां हाथ लगीं....याकि....चलिये छोड़िये....आप तो बस इन पंक्तियों पर गौर फरमायें.....गुर्रायें.....घनघनायें :)

 तो मैंने  लिक्खा था कि........

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तुम इतना जो टिप्पणीया रहे हो,
क्या कोई पोस्ट लिखी जो  बता रहे हो।

हमने लंगडी-लूली पोस्ट लिखी बेकार ,
पर मुझे खूब जमा बता रहे हो,


बन जाएंगे लिक्खाड लिखते-लिखते,
ऐसा वहम क्यूं पाले जा रहे हो,


जिन मुद्दों को सबने छोड दिया,
तुम क्यूं उन्हें फिर छेडे जा रहे हो,


क्या कोई पोस्ट लिखा जो बता रहे हो।

लिखते हो पोस्टों में, खाया है मुर्ग-मुसल्लम,
गौर से देखा तो   दाल भात खा रहे हो


ब्लॉग जगत मे दहाडते हो शेर की तरह,
घर में देखा तुम लात खा रहे हो

टिप्पणीयों का खेल है ब्लॉगिंग,
टिप्पणीयों में ही मात खा रहे हो,

तुम इतना जो टिप्पणीया रहे हो,

क्या कोई पोस्ट लिखी जो बता रहे हो।

 तीन साल पुरानी  इस पैरोडी में जिसे भी 'किसी का' या 'खुद का'  अक्स -उक्स दिखे तो चुपै रहियेगा.....वो क्या है कि  'अक्स' अक्सर 'अक्स'  न होकर 'नुक्स' होते हैं जिन्हें हम अपने में पाकर 'झुठलाने' लगते हैं और दूसरों में पाकर 'खिलिखलाने' लगते हैं  :)

- सतीश पंचम

26 comments:

संजय @ मो सम कौन ? said...

जय हो पंचम बाबा की। तुलसी बाबा की तरह शुरू में ही खल वंदना कर गये, वो भी ’कर रिया हूँ’ इश्टाईल में। बिंदास लिखने वालों में आपको तब से पढ़\मान रहा हूँ जब मेरे पास याहू के अलावा कोई और ईमेल या ब्लॉग नहीं था। आज आपकी महफ़िल में अपना नाम आया, मजा आ गया।
लिंक की महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता अगर ये सिर्फ़ सिर्फ़ अपनी पब्लिसिटी के लिये होता है। पब्लिसिटी बुरी नहीं, लेकिन अपना ऐतराज उन्हीं महानुभावों से है जो बिना पोस्ट पढ़े कॉपी-पेस्ट लिंक चेपकर निकल लेते हैं। एक पोस्ट ’अपनत्व’ ब्लॉग पर ब्लॉग स्वामिनी ने किसी निकटस्थ के अवसान के बाद लिखी थी, उस पर एक उत्साही बंदी ने ’आपका ब्लॉग पढ़कर बहुत मजा आया’ टाईप का कमेंट मारा और दो तीन लिंक चिपका कर निकल लीं। ऐसे कितने ही उदाहरण मिल जायेंगे, पोस्ट की विषयवस्तु से अलग ही कमेंट लेकिन लिंक जरूर देंगे।
आप सस्ते में समेट गये, ये विषय और विस्तार मांगता है। ऐसा करने वाले कई श्रेणियों में विभाजित किये जा सकते हैं। लेकिन ये मानना पड़ेगा कि काम मिशनरीज़ की तरह करते हैं।

आजकल कुछ बात है जरूर, पहले आचार्य की पोस्ट पर आपका कमेंट और आब ये वाली पोस्ट, माईंडजैकिंग कर रिये हो गुरू।
पैरोडी चकाचक है, तीन साल के बाद भी नवविवाहिता की तरह जगर मगर:)

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सुभान अल्लाह! ये जुल्म? डॉ अमर कुमार की एक टिप्पणी याद आ गयी
=========

क्षमा करें, आपकी इस पोस्ट पर देर से आ पाया,
मेरी मौसी की छोटी बहन का विवाह था, पूरी रिपोर्ट मेरे ब्लॉग http://bhopu_pandit.blogspot.com पर पढ़ें और नवदम्पत्ति को अपने आशीर्वचनों से कृतार्थ करें !

आशीष श्रीवास्तव said...

'अक्स' अक्सर 'अक्स' न होकर 'नुक्स' होते हैं जिन्हें हम अपने में पाकर 'झुठलाने' लगते हैं और दूसरों में पाकर 'खिलिखलाने' लगते हैं

क्या कहने !

अनूप शुक्ल said...

लिंक बिखेरने की कहानी सुनाते-सुनाते पूरी (पुरानी) पोस्ट का थान फ़ैला दिया। भलमनसाहत भी कोई चीज होती है कि नहीं जी!

कुछ ब्लाग (हमारा भी है शामिल उन कुछ में) यह जुगाड़ होता है कि जैसे ही आप टिपियाते हैं वैसे ही आपकी सबसे ताजा पोस्ट का लिंक ,टाइटल दिखने लगता है। तो आप जैसे ही कोई नयी पोस्ट लिखें हमारे ब्लाग पर आकर किसी भी पोस्ट पर टीप सकते हैं- आज फ़िर से यह पोस्ट पढ़ी। उतना ही अच्छा लगा जितना पहले लगा था क्योंकि इस बीच मैंने नयी पोस्ट भी लिख ली है।

वाणी गीत said...

ब्लॉग जगत मे दहाडते हो शेर की तरह,
घर में देखा तुम लात खा रहे हो...
वाह!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

हमके तs ई स्टाइल बहुते नीक लगला कि ऐसन कमेंट करा कि अपने पोस्ट कs लिंक दिखाई दे जाये..! पर ससुरा हमें ई कैसे कियल जाला एकरे सहूर नाहीं हौ। कमेंट करत के बढ़िया बात कैसे करिया करल जाला यहू नाहीं आवला। कमेंट करिया कर के लिखा तs ब्लॉग में जे आई सब ओह के जरूर पढ़ी। ई कुल स्टाइल सीखे के जुगाड़ में रहली कि आप ऐसन एकर बुराई करी दियो कि मन खट्टा होई गवा।

रचना said...

छोटी छोटी नावो पर
ज्ञानी टिपण्णी जाल लिये बैठे हैं
ब्लोगिंग के ताल में
http://mypoeticresponse.blogspot.com/2011/09/blog-post_9584.html
मछली से मगरमच्छ तक
हर नए जीव को
प्रोत्साहन के नाम पर
टिपण्णी का चूरा डाल

प्रवीण पाण्डेय said...

आप इस गाने को गाइये, ढोलक हम बजा देंगे।

ajit gupta said...

गीत बहुत सशक्‍त है। वन्‍समोर की मांग है।

संतोष त्रिवेदी said...

बिलकुल सहिये बेमारी पकड़े हैं आप.सीधी बात जे है कि कोई नयका ब्लॉगर आपके हियाँ पधारता है और 'सुन्दर लगा,'बहुत अच्छा विवेचन' जैसी टीप (?) धरता है तो यह पता लग जात है कि बन्दे ने नयी पोस्ट लिख मारी है.चलो टीप भी दो पर अपना कुछ बिखेरो मत ,जिसके हियाँ गए हो वह इत्ता समझदार और तमीज़दार तो होगा ही कि आपको ढूँढ ले !
वैसे मैंने भी कल पोस्ट लिखी है पर अब टीप-अभियान पर नहीं निकलता,दू-चार मठाधीशों को पकड लिया है,उसी से काम चल जाता है !

Poorviya said...

jai baba banaras....

shilpa mehta said...

:)
:D
:) waah :)

P.N. Subramanian said...

सुन्दर. पंचम ताल ठोंक दी.

मनोज कुमार said...

इसे मैं ग़लत नहीं मानता।

* आपके पोस्ट की सूचना मेल में आ जाती है। हम भी जब मन हो जाता है आ जाते हैं।

** जब हम अपने बेटे-बेटी का विवाह ठीक करते हैं, तो एक कार्ड सभी दोस्त-रिश्तेदारों को भेज देते हैं। जिन्हें आना होता है आते हैं, शगुन (आशीष) दे जाते हैं। जिन्हें नहीं आना होता किसी माध्यम से शगुन भिजवा देते हैं। कुछ न आते हैं न शगुन भिजवाते हैं। यह तो नियम है।

*** अब मुझे ही देखिए, जिस रफ़्तार से अपने तीन ऑग्स पर पोस्ट लगाता हूं उस रफ़्तार से बताने आपके ब्लॉग पर आता ही नहीं। (अब आज का इशारा अगर समझ लिया जाए तो अर्थ तो यही हुआ न कि हम टिपिया रहे हैं, आप नाहक ही खिसिया रहे हैं।

rashmi ravija said...

और जो लोग चैट विंडो में बिना किसी हलो या नमस्ते के लिंक थमा जाते हैं..उनका भी जिक्र कीजिए और उनका भी जो दो-चार दिन गुजर जाने पर दुबारा लिंक भेजते हैं..अब तक आपकी टिप्पणी के इंतज़ार में :)

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत बढिया प्रसंग उठाया आपनें,काश इसे पढ़ कर लोग सुधर जाएँ,आभार.

anshumala said...

संजय जी सही कह रहे है विषय को और विस्तार की जरुरत है उन टिप्पणी कारो का क्या जो बस ये सोच कर बैठे रहते है की हम तो हर किसी को टिप्पणी नहीं करेंगे करेंगे तो बस खास ही लोगो को हर किसी को टिप्पणी कर कर के अपनी इज्जत क्यों घटाये आम ब्लोगरो को कभी कभी पढ़ लिया उनके लिए तो वही बहुत है और कुछ सोचते है की कही सभी को टिप्पणी देने लगे तो लोग हमें भी आम ब्लोगर समझ कर ख़ारिज ना कर दे सो काम टिप्पणिया दे कर हमेसा खास बने रहेंगे वैसे और भी बहुत है :)))
पैरोडी बढ़िया लगी |

नीरज गोस्वामी said...

SATISH JI

ब्लॉग जगत मे दहाडते हो शेर की तरह,
घर में देखा तुम लात खा रहे हो

टिप्पणीयों का खेल है ब्लॉगिंग,
टिप्पणीयों में ही मात खा रहे हो,

SACH KAHUN...AAP LAJAWAB HAIN.

NEERAJ

दीपक बाबा said...

@ rashmi ravija said...
और जो लोग चैट विंडो में बिना किसी हलो या नमस्ते के लिंक थमा जाते हैं..उनका भी जिक्र कीजिए और उनका भी जो दो-चार दिन गुजर जाने पर दुबारा लिंक भेजते हैं..अब तक आपकी टिप्पणी के इंतज़ार में :)


कई लोग नमस्ते करते हैं, और जब तक हम नमस्ते का जवाब दें, उससे पहले ही पोस्ट का लिंक थमा अंतरध्यान हो जाते हैं... :)

हरी अनंत हरीकथा अनंता

रंजना said...

ठिके कहे भाई जी....ई कटाक्ष कहाँ, एकदम सत्ये बात है...

Arvind Mishra said...

लोग न जाने क्यों विरोध करते हैं कि ब्लागिंग की आचार संहिता नहीं होनी चाहिए ...
ये बातें तो अचार संहिता से ही जुडी हैं ....
लिंक द्वारा अपना लिखा दिखाना ,चैट बाक्स में जैसा कि रश्मि जी ने खा बस धागा छोड़ बढ़ जाना
मेल से नयी पोस्ट का धागा टपका देना ....
पोस्ट का विषय कुछ भी हो अपनी अहमकाना असम्बद्ध बात के साध एक और धागा पकड़ा जाना .
आपका यह चिंतन कोई सकार्मक परिणाम लेकर आये -यही अभिलाषा है ...
और आपकी तुकबंदी पर मेरा मन भी लहक गया ..
झील में पानी कम है संभल कर तैरो बरखुरदार
डूबने की कोशिश की तो उतराते ही रह जाओगे :)

राजेश उत्‍साही said...

और उनकी भी याद कर ली जाए जो लिंक तो खेत की देते हैं और वहां जाने पर पता चलता है वे खलियान में ले आएं हैं। जहां आने का बिलकुल ही मन नहीं था।

शेफाली पाण्डे said...

जय हो........

रूप said...

अब तो हमहूँ कहेंगे की एक बार हमरो ब्लाग्वा पर पधारिये , लेकिन भईया , हम ओठ वाला कविता तो नहिये न लिखते हैं !

बी एस पाबला BS Pabla said...

सच्चाई के बेहद नज़दीक ले जाता आलेख

यह बिलकुल सही है कि लोग तब तक अपनी टिप्पणी नहीं करते जब तक कि खुद की कोई नई पोस्ट न लिखें हो

गूगल ब्लॉगर में यह प्रबंध है की लिंक छोड़ने वालों की टिप्पणी दिखाई ही नहीं दे

रश्मि जी वाली परेशानी से मैं भी हैरान होता हूँ

अपने पास भी यह प्रबंध है कि टिप्पणी देने वाले की नई (पुरानी) पोस्ट खुद-ब-खुद खींच कर दिखा दी जाती है भले ही अगले ने लिंक ना दी हो :-)
हमारा इस पोस्ट पर आना भी इसी तरीके से हुआ

बी एस पाबला BS Pabla said...

लोग तब तक अपनी टिप्पणी नहीं करते जब तक....
को
कई लोग तब तक अपनी टिप्पणी नहीं करते जब तक...

पढ़ा जाए

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