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Saturday, September 17, 2011

भोज्य तक.......

       मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में भोजन जरूर है लेकिन देखा गया है कि मानव सभ्यता में इसकी पूर्ति हमेशा से ही कई किस्म की जद्दोजहद से होकर गुजरी है, गुजर रही है और आगे भी गुजरते रहने की संभावना है।  


     यूं भी महसूस किया है  कि लोगों को सबसे पहले धर्म-सम्मत खाद्य अखाद्य के मसलों से जूझना पड़ता है। शाकाहर है तो किस कोटी का शाकाहार है। तामसिक है, शीतल है, जड़ है या तना। समझना पड़ता है कि ज्ञानी-ध्यानी, पंडित आदि उसे किस कैटेगरी में विभक्त करते हैं। यदि उगने वाला खाद्य पदार्थ है तो जमीन के नीचे उगने वाला पदार्थ है या जमीन के उपर उगने वाला है ....लहसुन है...प्याज है....क्या है आखिर।

        इतने से भी मन न माने तो दूध और अण्डे को लेकर बहसें होती हैं। गाय के शरीर से निकलने वाला दूध मांसाहार की श्रेणी में आता है या शाकाहार के। यदि अण्डे में चूजा जनने की क्षमता है तो नॉनवेज हुआ, बाँझ अण्डा हो तो वेज हुआ। इतनी धुआँधार बहसें कि मानों हमारा धर्म अण्डों में सुरक्षित हो।

       उधर मौलवी इमाम भी अपने हिसाब से भोजन विभक्त करते दिखते हैं। फलां चीज हराम है या नहीं, मज़हब उसे मानता है या नहीं। उंट है तो क्या होना चाहिये, खस्सी हो तो कितनी उम्र होनी चाहिये, कलिया खाना है तो पता करो वह 'झटका' है या 'हलाल' है। यानि वो सभी बातें पहले धर्म की छन्नी से होकर गुजरें तो समझो खाद्य है वरना अखाद्य।

       इन्हीं सब चीजों को प्रदर्शित करती एक कलाकृति मुंबई के काला घोड़ा फेस्टिवल के दौरान प्रदर्शित हुई थी जिसे बाकी लोगों की तरह  मैंने भी  अपने कैमरे में कैद किया था। इस कलाकृति   में एक टेबल के चारों ओर कुछ लोग बैठे हैं और उनके बीच प्याज आदि खाद्य पदार्थ रखे गये हैं। ध्यान देने पर पता चलता है कि टेबल के किनारे किनारे कुछ धार्मिक चिन्ह हैं जो विभिन्न धर्मों के प्रतीक हैं। उसके पास ही रोजगार के औजार जैसे आरी, हथौड़ी, छेनी आदि रखे हैं। इन सारी चीजों को घेरे हुए लोग बहस मुबाहसों में तल्लीन हैं। यह बहसें किसी भी चीज पर हो सकती हैं, किसी भी मुद्दे पर हो सकती हैं - पूंजीवाद, गरीबी, जनसंख्या, दंगे-फसाद, लोग, धर्म, आस्था, कर्तव्य, निवेदन सभी विषयों पर। किंतु इन सभी चीजों में जो चीज जरूरी है वह है भोजन, अन्न,  जिसके बगैर सारी बहसें फ़िजूल होंगी। किंतु विडंबना यह है कि खेती के महत्व को जानते हुए भी खेती योग्य जमीनें पूंजीवाद, शहरीकरण की भेंट चढ़ रही हैं। विकास के नाम पर  प्रतिवर्ष खेतों के अधिग्रहण, मुआवजे के चक्कर में कृषियोग्य भूमि की कमी होती जा रही है किंतु बहसें हैं कि थमने का नाम नहीं ले रहीं। बहुत संभव है अंतहीन बहसों से ही पेट भरता हो।

मेरे फोटोब्लॉग - Thoughts of a Lens  में प्रदर्शित छायाचित्र 

-  सतीश पंचम

11 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

@@किंतु विडंबना यह है कि खेती के महत्व को जानते हुए भी खेती योग्य जमीनें पूंजीवाद, शहरीकरण की भेंट चढ़ रही हैं। विकास के नाम पर प्रतिवर्ष खेतों के अधिग्रहण, मुआवजे के चक्कर में कृषियोग्य भूमि की कमी होती जा रही है किंतु बहसें हैं कि थमने का नाम नहीं ले रहीं। बहुत संभव है अंतहीन बहसों से ही पेट भरता हो।
----सही कह रहे हैं.

Arvind Mishra said...

जीवः जीवस्य भक्षणं ....यही मत्स्य नाय आज भी जिन्दा है -बड़ी मछली छोटी को खायेगी ही भले ही दुसरे इफरात फोजन उसके सामने हो!
एक चित्र को परिभाषित करने के लिए पूरी पोस्ट ही या फिर पोस्ट को परिभाषित करने को यह चित्र -असलियत क्या है ? :)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

गज़ब का चित्र ।

सतीश पंचम said...

@ एक चित्र को परिभाषित करने के लिए पूरी पोस्ट ही या फिर पोस्ट को परिभाषित करने को यह चित्र ?

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दोनों ही बातें हैं अरविंद जी :)

दरअसल पहले फोटो ब्लॉग पर यह छायाचित्र पब्लिश कर दिया, फिर लगा कि नहीं इस पर कुछ लिखना चाहिये :)

P.N. Subramanian said...

सुन्दर चित्र. जब पेट के लाले पड़ेंगे तो लोग धर्म वर्म खाद्य अखाद्य सब भूल जायेंगे. मकसद पेट भरने मात्र तक सीमित हो जाएगा.

प्रवीण पाण्डेय said...

बहसें अच्छी हैं पर जिन पर हों, वे अन्त तक बचे रहें।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

विचारणीय!

uljheshabd said...

आज की व्यवस्था के चंद स्वार्थ ने ऐसी भूमियों को सुरशा के गाल में धकेल दिया है...ये विडंबना ही है की कोई सार्थक हल नहीं निकल प् रहा है इन सबका

वाणी गीत said...

भूखे भजन न होहिं गोपाला!
शानदार कलाकृति और तस्वीर!

मनोज कुमार said...

खुशी से बढ़कर पौष्टिक खुराक और कोई नहीं है। दूसरों को खुशी देना सबसे बड़ा पुण्‍य का काम है।

ajit gupta said...

कभी कहते हैं कि आदमी ही ऐसा प्राणी है जो सारे ही खाद्य और अखाद्य पदार्थों को उदरस्‍थ कर गया है लेकिन आपकी पोस्‍ट पढ़ने के बाद तो यह ही शब्‍द बचे हैं - बेचारा आदमी।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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A Photo from - Thoughts of a Lens

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