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Tuesday, September 13, 2011

क्लिष्टता के ठठेरे और हिन्दी डे सेलिब्रेशन

        कल 'हिन्दी डे' है। हां भई वही 'हिन्दी डे' जब  हर ओर हरर हरर हिन्दी की हवा बहवाई जाती है।   हिन्दी विभागों में तो इस दिन को पर्व के रूप में मनाया जाता है। ये अलग बात है कि रागदरबारी के रचियता श्रीलाल शुक्ल जी इसे हिन्दी दिवस न मानकर एक प्रकार का पाखण्ड पर्व कहते रहे और कुछ हद तक मैं उनसे सहमत भी हूँ। मैं ही क्या बहुतों की सहमति होगी कि एक दिन हिन्दी दिवस मनाने से या कुछ ज्यादा मयगर हुए तो पखवाड़ा मनाने से हिन्दी का भला भी कभी हुआ है। हां, ये जरूर हुआ है कि जो लोग हिन्दी के नाम पर संस्कृति या भाषा प्रचारक बनते हैं उन्हें जरूर ऐसे समय में फण्ड आदि की थोड़ी सी सुविधा हो जाती है।

      खैर, यह भी देखा गया है कि जिस किसी के नाम पर उसका डे मनाया जाता है उसी दिन उसकी ज्यादा से ज्यादा अवमानना भी होती है। पंद्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी के दिन पूरे देश में जहां सुबह के वक्त कागजों से बने तिरंगे को लोग सीने से लगाये सभा समारोहों में बड़ी बड़ी बातें करते दिखते हैं, शाम होते होते वही कागज के झण्डे जमीनों पर पाये जाते हैं। लोग देखते हुए भी अनजान बने उन पर पैर रखते, खांचते चले जाते हैं।  इसके उलट यहीं मुम्बई में मैंने कुछ ऐसे लोगों को भी देखा है जो 15 अगस्त या 26 जनवरी की शाम हाथ में प्लास्टिक का थैला लिये जगह जगह पड़े कागज के तिरंगों को बटोरते चलते हैं ताकि लोगों के पैरों के नीचे जाने से बचें, तिरंगे का अपमान होने से बच जाय। लेकिन यह और इस किस्म की कवायद कम ही हो पाती है।

          एक और उदाहरण है। जितने श्रद्धा - विश्वास से लोग गंगा को नमन करते हुए हरिद्वार-वाराणसी आदि के घाटों पर गंगा पूजा करते हैं, आरती उतारते हैं, गंगा नहाते हैं, पता चला गंगा सबसे ज्यादा प्रदूषित भी वहीं होती है। अधजले शव, मृत पशु, सूखे फूलों के ढेर आदि  मिलकर गंगा को बाकी क्षेत्रों के मुकाबले यहां ज्यादा ही प्रदूषित करते हैं। एक घटना का उल्लेख काशी का अस्सी में है जिसमें गंगा को प्रदूषण मुक्त करने हेतु गंगा किनारे विद्वजनों की ओर से एक कार्यक्रम का आयोजन होता है। खूब धुआंधार भाषण होता है, खूब बड़ी बड़ी बातें होती हैं कि गंगा को बचाना चाहिये, गंगा को प्रदूषण मुक्त करना चाहिये। फलां होना चाहिये, ढेकां होना चाहिये लेकिन कार्यक्रम के खत्म होने के बाद लोग समोसा खाकर, चाय पीकर, पैकेज्ड मिनरल वाटर वाली बोतलें खलिया कर चलते बने और पीछे रह गये पत्तलों के ढेर, प्लास्टिक की बोतलें, थैलियां, प्लेटें । जाहिर है ये सब जाकर वहीं गंगा जी में ही समाहित होंगे, आखिर चिंता भी तो उन्हीं के बारे में की गई थी।

         मुझे कुछ कुछ वही हालात हिन्दी के लगते है। इस दिन हिन्दी को लेकर भी खूब बढ़-चढ़कर कहा जाता है। लोग जगह जगह हिन्दी की पुड़िया बांटते मिलते हैं कि हमें हिन्दी सेवा करनी चाहिये, हमें हिन्दी में काम करना चाहिये। हिन्दी बढ़ेगी तो देश बढ़ेगा। ये अलग बात है कि कार्यक्रम के समापन पर हाथ मिलाते हुए - नाइसली मैनेज्ड कहकर Thanks कहना नहीं भूलते। इसके अलावा एक मुश्किल यह भी देखी गई है कि कर्मचारी जब हिन्दी में एक दिन के लिये काम करते हैं तो बात बात में हिन्दी पर तंज कसना नहीं भूलते - अरे पांडे जी देखिये 'र' है कि 'ख' .....हिन्दी दिवस क्या हो गया हमारे लिये 'इसकूलिहा दिवस' हो गया।

       खैर, बड़े बड़े हिन्दी सेवी देखे हैं जो अपने बच्चों को अंग्रेजी मिडियम में पढ़ाते हैं। मैं खुद उसी परिपाटी को जारी रखे हूं तो किस मुंह से उनकी निंदा करूं। हम अपने बच्चों को हिन्दी मिडियम में नहीं पढ़ाना चाहते क्योंकि वास्तविकता जानते हैं। मैं खुद हिन्दी माध्यम से पढ़ा हूं लेकिन तब की और अब की परिस्थितियों में जमीन आसमान का फर्क है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

फिर ?   हिन्दी का क्या कोई उज्जवल भविष्य नहीं है ?  या  हिन्दी एकदम से गई गुजरी हो चुकी है ?

नहीं,  हिन्दी का भविष्य जरूर है, किंतु आम लोगों के बोलचाल में ही, या बहुत हुआ तो विज्ञापन में, फिल्मों आदि में हिन्दी अभी खूब बढ़ेगी। सच मायनों में हिन्दी के प्रचार प्रसार में आमजनों का ही योगदान ज्यादा है न कि हिन्दी डे के नाम पर  फण्ड उगाहने वाले गाल बजाउ  खर-चिन्तकों के दम पर।  आज कोई दक्षिण भारतीय जब उत्तर की ओर जाता है तो हिन्दी जल्दी सीखता है। उसे पता है कि उसे दैनंदिन कार्यों में लोगों से सम्पर्क करने में यही हिन्दी भाषा सहज रूप से उपयोगी है।   दूसरी ओर दक्षिण भारत में हिन्दी फिल्मों के असर से कामचलाउ हिन्दी ने भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है।

     वहीं कुछ ऐसे हिन्दी वाले  ठठेरे  हैं जो जबरिया क्लिष्ट हिन्दी की ठकर-ठकर लगाये रहते हैं कि हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों का आना ठीक नहीं, इससे हिन्दी का नुकसान होता है, पवित्रता नष्ट होती है। जबकि सच्चाई यह है कि ऐसे लोगों के क्लिष्टता प्रेम से ही हिन्दी के प्रचार प्रसार पर लगाम सी लग जाती है। ऐसे लोग क्लिष्टता की कलगी लगाये समझते हैं कि बहुत विशिष्ट लग रहे हैं जबकि यही कलगी उन्हें आमजन से दूरी बनाने हेतु मजबूर करती है। जहां लोग सामान्य बोलचाल में अपना काम कर ले जा रहे हैं वहां भला वे 'खाता आहरण', आदि भयंकर शब्दों को क्यों तवज्जों दें। वह सीधे अंग्रेजी को सहज पाकर उसकी ओर आकर्षित हो लेते हैं।

अंग्रेजी पढ़ने के कारण विवाह में ज्यादा तिलक की मांग करता
एक वैवाहिक गीत  ...  (साभार: विवेकी राय) 
      जहां तक इंटरनेट पर हिन्दी के प्रसार प्रचार की बात है तो वह लोगों के शौक के वजह से बढ़ रही है न कि किसी हिन्दी सेवी के प्रवचनादि के बूते। लोग शौक से अपने लेख ब्लॉग पर लिख रहे हैं, कविता लिख रहे हैं, व्यंग्य लिख रहे है, उसे हिन्दी जैसे सरल भाषा के माध्यम से पेश कर रहे हैं। और जहां तक मैं समझता हूं हिन्दी इसी तरह बढ़ेगी, पनपेगी, फूलेगी, फलेगी बिना किसी सरकारी सहायता के जैसे कि अब तक फलती फूलती आई है। उसे किसी सरकारी क्लिष्टता से जितना दूर रखा जाय उतना अच्छा रहेगा। हां, इतना जरूर है कि 14 सितम्बर का दिन हिन्दी दिवस के रूप में मनाने से एक प्रकार की खुशफहमी जरूर मिलती है। लोग थोड़ा सा मिठाई-सिठाई खा लेते हैं। एकाध गरदनों में फूल मालाएं सुशोभित हो जाती है। फूलों के गुलदस्ते लिये-दिये जाते हैं, फोटू-फाटू खिंच जाता है, ताली-ओली बज जाती है..... बस और क्या चाहिये हिन्दी को।

    Afterall Hindi is the Language of the People, for the People and by the People... है, कि नहीं :)


-  सतीश पंचम

24 comments:

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

पता नहीं आगे क्या होगा, कब तक हिन्दी बची रहेगी?

आशीष श्रीवास्तव said...

केवल एक प्रश्न है?
हिन्दी को हिन्दी दिवस की आवश्यकता क्यों है ? हिन्दी के अतिरिक्त किसी और भाषा के लिए एक दिन निर्धारित हो तो मेरा ज्ञान वर्धन करें!

मनोज कुमार said...

संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को इस प्राजल भारतीय संपर्क भाषा एवं राष्ट्रभाषा को संघ की राजभाषा बनाने का संकल्प पारित किया।

अब चूंकि यह सरकारी काम काज की भाषा की बात थी तो इसे राजभाषा हिन्दी कहा जाता है, और उसी दिन को याद कर इस दिन को मनाया जा है।


“हिंदी भाषा की प्रसार वृद्धि करना, उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामसिक संस्‍कृति के सब तत्‍वों की अभिव्‍यक्ति का माध्‍यम हो सके, तथा उसकी आत्‍मीयता में हस्‍तक्षेप बिना हिंदुस्‍तानी और अष्‍टम अनुसूची में उल्लिखित अन्‍य भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और पदावली को आत्‍मसात करते हुए तथा जहाँ तक आवश्‍यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्‍द भंडार के लिए मुख्‍यतः संस्‍कृत से तथा गौणतः अन्‍य भाषाओं से शब्‍द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करना संघ का कर्तव्‍य होगा ।”

अनुच्‍छेद – 351

It shall be the duty of the Union to promote the spread of Hindi Language, to develop it so that it may serve as a medium of expression for all the elements of the composite culture of India and to secure its enrichment by assimilating without interfering with its genius, the forms, style and expression used in Hindustani and in other languages of India specified in the Eighth schedule, and by drawing wherever necessary or desirable for its vocabulary, primarily on Sanskrit and secondarily on other languages.”

Article - 351
इस रूप में इस दिवस को देखें
@ हिन्दी के अतिरिक्त किसी और भाषा के लिए एक दिन निर्धारित हो तो मेरा ज्ञान वर्धन करें!

* विश्व मातृ भाषा दिवस 21 फ़रवरी
** 21 नवम्बर को भाषाई सद्भावना दिवस

अरुण चन्द्र रॉय said...

सतीश जी आप ठीक कह रहे हैं आपसे सहमत हूं. जो लोग ड्राईंग रूम में टी वी सेट के सामने बैठे १५अगस्त को चिपके रहते हैं...या किसी नजदीकी हिल स्टेशन पर चले जाते हैं २६ जनवरी को उनको क्या पता देश में वे लोग भी इस पर्व को मानते हैं जो अखबार के टुकड़े को केसरिया और हरे रंग में रंग कर बांस की छड़ी में आते के लेई के साथ चिपका कर झंडा बनाते हैं... देश वहीँ है. इसी तरह हिंदी भाषा भी वहीँ है. उन्ही की भाषा को संसद में मान्यता के लिए एक संघर्ष हुआ था और उसके परिणाम स्वरुप १४ सितम्बर १९६५ को इसे अधिकारिक राजभाषा का दर्ज़ा मिला. देश में कई ऐसे बेफुजुल के दिवस मनाये जाते हैं जैसे वेलेंटाइन डे.. फादर्स डे...मदर्स डे.... कपुल्स डे... सीनियर सिटीजन्स डे... एन्वायर्नमेंट डे.... एनेर्जी डे....और ऐसे ही हिंदी दिवस भी मनाया जा रहा है....जिस क्लिष्ट हिंदी की बात आप करते हैं.. आप से कहना चाहूँगा कि सरकार की, विधि की अपनी भाषा होती है.. वो भाषा आम भाषा से पृथक होती है..सरकारी अंग्रेजी भी अलग है.. क्लिष्ट है... उसी तरह सरकारी हिंदी भी थोडा क्लिष्ट है... और केवल सरकार की बुराई मत कीजिये.... देखिये कि सरकार के क्षेत्र में हिंदी में कितना का हो रहा है..प्रकाशन विभाग और नेशनल बुक ट्रस्ट ने अकेले हिंदी में जितनी उत्कृष्ट पुस्तकों का प्रकाशन किया है वह अचंभित करने वाला है... गिलास मुझे तो आधा भरा हुआ दिख रहा है...

सतीश पंचम said...

अरूण जी,

मैं भी गिलास को आधा भरा हुआ ही देख रहा हूं और अच्छा होगा कि यह आधा ही भरा रहे क्योंकि पूरा भरने पर क्लिष्टता से लकदक सरकारी हिन्दी कुछ यूं होगी -

“जहां तक सम्पत्ति के किसी अन्तरण के निबन्धन निर्दिष्ट करते हैं कि उस सम्पत्ति से उदभूत आय (क) अन्तरक के जीवन से, या (ख) अन्तरण की तारीख से अठारह वर्ष की कालावधि से अधिक कालावधि तक पूर्णता: या भागत: संचित की जायेगी, वहां एतस्मिनपश्चात यथा- उपबन्धित के सिवाय ऐसा आदेश वहां तक शून्य होगा जहां तक कि वह कालावधि जिसके दौरान में संचय करना निर्दिष्ट है, पूर्वोक्त कालावधियों में से दीर्घतर कालावधि से अधिक हो और ऐसी अन्तिमवर्णित कालावधि का अन्त होने पर सम्पत्ति और उसकी आय इस प्रकार व्ययनित की जायेगी मानो वह कालावधि जिसके दौरान में संजय करना निदिष्ट किया गया है, बीत गयी है।”

यह क्लिष्टता का नमूना श्रीलाल शुक्ल जी ने अपने एक लेख में दिया था और अनूप जी ने उसे अपने ब्लॉग में उद्धृत किया था। वहीं से यह कापी- पेस्ट किया है।

यहां सवाल उठता है कि क्या जरूरी है कि आम लोगों के लिये इस तरह की दुरूह भाषा इस्तेमाल की ही जाय। इससे सरल ढंग से भी चीजों को अभिव्यक्त किया जा सकता था लेकिन तब उस सरकारी विशेषाधिकार का क्या होगा जो ऐसी ही क्लिष्टता के बूते अपना रौब दाब बनाये रखती है :)

वैसे बता दूं कि श्रीलाल शुक्ल जी द्वारा व्यंग्य के रूप में लिखे इस क्लिष्ट हिंदी का मैने सरल हिन्दी में तर्जुमा करने की कोशिश की लेकिन मुझसे न हो पाया। यदि किसी महानुभाव को इस क्लिष्ट हिन्दी का सरल अनुवाद करने का माद्दा हो तो कर दे, अपन उसके आभारी रहेंगे। हां, मिलने पर चाय समोसे की पार्टी पक्की :)

प्रवीण पाण्डेय said...

मेरी श्रद्धा के पुष्पगुच्छ अर्पित हैं।

anshumala said...

सतीश जी
पहले ये बताइए की हिंदी को व्यवसाय की भाषा हम बनाये ही क्यों उसे व्यवसाय से जोड़े ही क्यों इसकी जरुरत ही क्या है क्या ये बस प्रेम की भाषा नहीं हो सकती | दूसरी बात ये क्या हिंदी प्रेम बिना अंग्रेजी को कोसे पुरा नहीं हो सकता है कहने का अर्थ ये है की बार बार ये बात क्यों उठाई जाती है की हिंदी में कोई भविष्य नहीं है तो हिंदी में क्यों बच्चो को पढाये और हम सब अपने बच्चो को अंग्रेजी मीडियम में पढ़ते है तो ये गलत है ये हिंदी के साथ गलत व्यवहार है | मै हिंदी मीडियम से हूं और आज के समय में कई बार इसके कारण परेशानी भी झेल चुकि हूं बच्ची अंग्रेजी मीडियम में पढ़ती है मुझे इसमे कोई बुराई नजर नहीं आती है अंग्रेजी तो वो अपने भविष्य के लिए पढ़ रही है पढ़ने दीजिये जहा तक बात हिंदी की है तो उसे मैंने हमारे बीच की प्रेम की भाषा बना कर रखा है | हिंदी प्रेम का अर्थ मेरे लिए ये है की मै उसकी हिंदी अच्छी बनाने के सारे प्रयास करती हूं उसे मुंबई की चलताऊ हिंदी से दूर रखती हूं और कोशिश करती हूं की उसकी हिंदी अच्छी बनी रहे | मेरी नजर में हिंदी प्रेम और उसकी सेवा का अर्थ यही है की मेरे आगे की पीढ़ी को मै अच्छी हिंदी सिखाती रहू उसको भूलने ना दू वो भले उसे बाहर की दुनिया में ना बोले, प्रयोग ना करे पर उनकी जानकारी हिंदी के बारे में अच्छी रहे |
और ये आप का कठिन (क्लिष्टता शब्द ही लिखने में भी मुझे परेशानी होती है ) हिंदी वाला उदाहरन बिल्कुल सही है जब हम जैसे हिंदी भाषियों के लिए इसे समझना मुश्किल है तो किसी और की क्या बात करे |

डॉ. दलसिंगार यादव said...

हिंदी के बारे में एकांगी बातें करने से भ्रम ही फैलेगा। चूँकि पूरी बात न कोई करता है न कोई समय देता है पढ़ने समझने के लिए। अतः आपने क्लिषटता की जिस भ्रांति की चर्चा की है वह एकांगी है। मनोज जी और अरुण चंद्र रॉय ने कुछ प्रयास किए हैं परंतु इतने से ही काम नहीं चलेगा। आपसे अनुरोध है कि राजभाषा के शब्दावली निर्माण, भाषा की लेखन शैली के बारे में थोड़ा पढ़ लें फिर एक लेख लिखें।
आपने जिस श्रीलाल शुक्ल की बात की है, वे आई.ए.एस. ऑफ़िसर थे। हिंदी में लिख कर प्रसिद्धि प्राप्त की। परंतु कार्यालय में हिंदी का कितना प्रयोग कराया यह शोध का विषय है। ऐसे ही गोविंद मिश्र भी आयकर के कमिश्नर थे और बाद में सीबीडीटी के अध्यक्ष भी रहे। वे अच्छे कहानीकार हैं। कहानीकार के रूप में इनकी अच्छी छवि है। परंतु आयकर विभाग में कितनी हिंदी चलाई यह भी शोध का विषय है।
हिंदी दिवस हिंदी की स्थिति पर रोने या इसको याद करने का दिन नहीं बल्कि इसे राजभाषा बनाने के लिए किए गए संकल्प को दोहराने और अपने अंदर झाँकने का दिवस है कि हम हिंदी के बारे में क्या सोचते हैं और इसके प्रयोग के लिए क्या करते हैं?

डॉ. दलसिंगार यादव said...

टिप्पणी लिखते लिखते अरुण चंद्र रॉय की टिप्पणी पर आपकी टिप्पणी आ गई। अतः आपने जो उदाहरण उद्धृत किया है हालाँकि इसमें वर्तनी के कुछ दोष हैं जो अनवधानवश होंगे, जानबूझकर नहीं।
यह भाषा आम जनता या कम पढ़े लिखे व्यक्ति के लिए नहीं है। यह वकीलों, जजों और विधि से संबंधित प्रोफ़ेशनल के लिए है। मुझे तो इसे समझने में कठिनाई नहीं आई क्योंकि मैं विधि की हिंदी शब्दावली को पढ़ता हूं। बिना पढ़े समझ में आजाए ऐसा तो सहजात गुण किसी में नहीं है। कठिनाई (क्लिष्टता) शब्दों में नहीं वाक्य की संरचना में होती है। अनुवाद किसी विधि विशेषज्ञ द्वारा कराया जाना चाहिए, मात्र हिंदी भाषा के विशेषज्ञ द्वारा नहीं। इस अनुच्छेद में आपको ऐसा ही लग रहा होगा। परंतु अर्थ स्पष्ट है।

shilpa mehta said...

:)

रंजना said...

भाई जी , एगो बात बताएँगे....?

चौदह तारिख को हिन्दी दिवस मानाने का परंपरा कौन और कब से शुरू किया....इतिहास नहीं पाता, तनी मदद कीजिये...

वैसे अभी पितिरपख भी चल रहा है,क्या संजोग है...

हिन्दी दिवस सुन के न जाने काहे लगता है जैसे जनम दिवस नहीं मरण दिवस का बात हो रहा है...

बाकी आप एकदम दुरुस्त कहे...पूरा सहमति है आपसे...

डॉ. दलसिंगार यादव said...

भारत का संविधान भी इसी पितिरपख में बना था। उसकी श्राद्ध तो नहीं मनाते। हिंदी दिवस का इतिहास राजभाषा विकास परिषद की साइट पर है। यदि सचमुच इतिहास में रुचि हो तो।

सतीश पंचम said...

@ यह भाषा वकीलों, जजों और विधि से संबंधित प्रोफ़ेशनल के लिए है।

दलसिंगार जी, वही तो मैं भी कह रहा हूं कि यह भाषा आम लोगों के लिये नहीं है सरकारी है। किंतु तब क्या किया जाय जब आम लेखन के वक्त होने वाले मात्रा, व्याकरण आदि की गलती के लिये आम लिखत पढ़त करने वाले को टहोका जाता है कि भाषा की पवित्रता, शुद्धता बनाये रखिये। उसमें अंग्रेजी मत मिलाइये, उसमें फलाना मत 'प्रकटाइये' :)

इस मसले पर काफी लोगों की बहसें चली हैं कि हिन्दी कैसी होनी चाहिये, शुद्धता कैसी होनी चाहिये ऐसे में जो आम हिन्दी का पाठक होता है वह भकुआया सा देखता रहता है कि ई विद्वान लोग क्या कह रहे हैं....कहीं कुछ गलत सलत तो नहीं न हो गया हमसे। और ऐसे ही समय में क्लिष्टता की ठठेरपंती पर हंसी आती है कि जो लोग जैसे तैसे बोल बतिया ले रहे थे, लिख पढ़ रहे थे वह भी बिचारे क्लिष्टता से आक्रांत हुए जा रहे हैं :)

सतीश पंचम said...

और हां डॉ. दलसिंगार जी, मैंने आपकी लिखी कम्पयूटर पर आधारित किताब हिन्दी भाषा में पढ़ी हुई है और उसी भाषा शब्दावली आदि के जरिये मैं आपकी बात बखूबी समझ रहा हूं कि क्यों प्रोफेशनल अंदाज में हिन्दी का पठन पाठन होना चाहिये।

मुश्किल यह है कि कुछ तकनीकी किताबें हिन्दी में होने के बावजूद उनकी क्लिष्टता कई बार अंग्रेजी किताबों से भी दूरूह लगती है, काफी कठिन प्रतीत होती है। संभवत: यही कारण है कि हिन्दी पट्टी के छात्र भी तकनीकी-कम्पयूटर आदि किताबें अंग्रेजी में ही पढ़ना पसंद करते हैं। बाकी तो आप इस मामले में बेहतर बता सकते हैं कि छात्र अंग्रेजी की ज्यादा पढ़ते हैं या हिन्दी की।

चंदन कुमार मिश्र said...
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चंदन कुमार मिश्र said...
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चंदन कुमार मिश्र said...

आदरणीय सतीश जी,

फिर एक बार आपसे बात हो रही है। एक सवाल का जवाब चाहिए कि अगर मुझे कभी अंग्रेजी में कुछ पढ़ने को न मिले और कम्प्यूटर की किताब हिन्दी में पढ़ने को मिलती तब मैं कभी सोचता कि भाषा क्लिष्ट है या नहीं? क्या आपने कभी हिन्दी माध्यम से विज्ञान पढ़ते हुए मैट्रिक तक या इंटर तक के छात्र को यह कहते सुना है कि अमुक शब्द जटिल है या इसका सरलीकरण किया जाना चाहिए? मैंने तो नहीं सुना। क्योंकि पढ़ने वाले को विषय और उससे संबंधित चीजों के अलावा भाषा से मतलब होता ही नहीं। और वैस एभी क्लिष्टता की बात सिर्फ़ उन्होंने की है जिन्होंने दोनों माध्यमों में पढ़ा है और कुछ दिनों तक हिन्दी से दूर रह गये हैं। क्लिष्टता पर मैं समय हूँ वाले समय ने बेहतर प्रकाश डाला है। आप वहाँ देख सकते हैं। आखिर कोई क्यों यह उम्मीद करता है कि स्नातकोत्तर की पढ़ाई चौथी कक्षा के शब्दों से कर लेगा? बहस का कोई इरादा नहीं क्योंकि इस विषय पर इतना लिखा गया है और मैंने भी लिख लिया कि अब बार-बार लिखना मेरे बस का नहीं रहा।

एक और बात। क्या मुझे कोई सातवीं और आठवीं का विज्ञान भी या भूगोल-इतिहास भी सामान्य बोलचाल की भाषा में पढ़ा सकता है। परमाणु और संरचना शब्द भी बोलचाल के नहीं हैं। शब्दों का स्तर तो होगा ही। हाँ इससे जरूर सहमति है कि सरकारी दस्तावेजों के घोर मूर्खतापूर्ण अनुवाद होते आए हैं। जैसे भारतीय दंड संहिता में मारने की जगह मृत्यु कारित करना।

डॉ. मनोज मिश्र said...

@@ मुझे कुछ कुछ वही हालात हिन्दी के लगते है। इस दिन हिन्दी को लेकर भी खूब बढ़-चढ़कर कहा जाता है। लोग जगह जगह हिन्दी की पुड़िया बांटते मिलते हैं कि हमें हिन्दी सेवा करनी चाहिये, हमें हिन्दी में काम करना चाहिये। हिन्दी बढ़ेगी तो देश बढ़ेगा। ये अलग बात है कि कार्यक्रम के समापन पर हाथ मिलाते हुए - नाइसली मैनेज्ड कहकर Thanks कहना नहीं भूलते। इसके अलावा एक मुश्किल यह भी देखी गई है कि कर्मचारी जब हिन्दी में एक दिन के लिये काम करते हैं तो बात बात में हिन्दी पर तंज कसना नहीं भूलते - अरे पांडे जी देखिये 'र' है कि 'ख' .....हिन्दी दिवस क्या हो गया हमारे लिये 'इसकूलिहा दिवस' हो गया।
----सही है,इस हाल पर हंसा जाय या रोया...क्या कहें अपनें लोंगों नें ही इस भाषा को राजनीति से जोड़ दिया-अब राजनीति है तो दुकान चलाने के लिए मुद्दे को टालना तो पड़ेगा ही.

रोहित बिष्ट said...

ऐसे इंग्लिश मीडियम स्कूल के बारे में क्या ख्याल है आपका जो कस्बों,छोटे शहरों अौर यहाँ तक की गांवो की शोभा बड़ा रहे हैं,जहाँ से पड़ाई करने वाला मासूम पूछता है 'Sir may I 'drink' water? बहराल एक अर्जी है-जिला स्तरीय वाद-विवाद प्रतियोगिता का विषय है-
'घर के दैनिक कामकाज में माता-पिता दोनों की भूमिका समान होनी चाहिए'ब्लॉग जगत के माननीय लेखकों,पाठकों से आग्रह है कि यदि उपर्युक्त विषय आपको तनिक भी संवेदनशील प्रतीत हो तो अपनी मूल्यवान विवेचना,प्रतिक्रिया से लाभान्वित कर विचार-फलक को नवीन आयाम
प्रदान करें।

bhuvnesh sharma said...

कानून की शब्‍दावली हिन्‍दी में बहुत ही क्लिष्‍ट होती है... हालांकि उपयोग करते-करते वकील लोग भी ऐसी ही भाषा बोलने लगते हैं... हालांकि आम-जन के लिए ये सब समझना कठिन ही रहेगा

सतीश पंचम said...

आप लोगों के द्वारा इस पोस्ट पर आई टिप्पणीयां जब पढ़ रहा हूं तो सामने ही टीवी पर इरशाद कामिल का लिखा गाना चल रहा है जिसे सुनते हुए मुग्ध हूं। कुछ इसलिये भी कि ये बोल जिस तरह इश्क आदि पर फिट हो रहे हैं, कुछ कुछ हिन्दी भाषा पर भी लागू हो रहे हैं ....तनिक पढ़िये :)

कोई बोले दरिया है
कोई बोले सेहरा है
कोई सोने सा तौले रे
कोई माटी सा बोले रे
कोई बोले चांदी का है छुरा
.....
......

अब इसे हिन्दी भाषा पर लागू करें जिसके बारे में तरह तरह के विचार सुनने मिलते हैं।

कोई हिन्दी को बहती सरिता से तुलना करता है, कोई माथे की बिन्दी समतुल्य आंकता है तो कोई इतना लजा कर हिन्दी बोलता है मानों सोना तौल रहा हो। तो कुछ लोग हिन्दी को आधुनिक दौर में फिजूल भी मानते हैं।

खैर, इस हल्के फुल्के मूड में लिखी पोस्ट से उपजे विभिन्न सवालों का एक एक कर जवाब देने से बेहतर होगा कि अपने अंतस् की बात कहूं.... - जहां तक हिन्दी के प्रति मेरी प्रतिबद्धता की बात है मैं हिन्दी शौक से पढ़ता हूं, शौक से लिखता हूं, हिन्दी में लिखते हुए एक सूकून पाता हूं। क्लिष्टता एक हद तक झेलना अच्छा लगता है,ज्यादा हो जाय तो पन्ना पलटना ज्यादा रूचिकर लगता है। रही बात अंग्रेजी को तवज्जो देने न देने की तो वह मजबूरन बोलना पड़ता है, मजबूरन झेलना पड़ता है। न झेलूं तो अपनी हिन्दी से इश्क जताने लायक रोकड़ कहां से पाउं......उसके भी तो नाज नखरे हैं....महंगा साहित्य है, महंगा समय :)

दूसरी ओर जिन लोगों की रोजी रोटी हिन्दी पढ़ाने से चलती है, हिन्दी लिखने से चलती है उन्हें मैं खुशकिस्मत मानता हूं कि स्वभाषा की जहां वे सेवा कर पा रहे हैं वहीं उसके जरिये अपनी दैनंदिन जरूरतें भी पूरी करे जा रहे हैं। ऐसे लोगों की तुलना मैं उन लोगों से करूंगा जो कि अपने गाँव देहात में रहकर नौकरी पाते हैं और आमदनी के साथ साथ अपने माता-पिता की सेवा भी कर रहे हैं........ लेकिन हम जैसों का क्या जो अपनी मातृभाषा को छोड़ अंग्रेजी का दामन पकड़ दूर देश में आ बसे हैं। हमें तो वह सेवा आदि का अवसर ही नहीं मिल पाता जो हिन्दी पठन पाठन से रोजगार वालों को मिलता है।

इसलिये जैसे भी हो,जहां भी हो हिन्दी के प्रति मेरा सदैव आकर्षण बना रहा है। बहुत संभव है आप लोग भी हिन्दी पढ़ते लिखते उसी आकर्षण, उसी मिठास का अनुभव किये हों :)

चलिये...अब अपन भोजन कर लूं.....टीवी पर फिर इरशाद कामिल का ही गीत बज रहा है.......मिल जा कहीं समय से परे :)

Arvind Mishra said...

हा हिन्दी हाय हिन्दी .....यह रस्मी त्यौहार बन गया है ....

अनूप शुक्ल said...

बढिया है जी!

श्रीलाल शुक्ल और और गोविंन्द मिश्र जी ने अधिकारी की हैसियत से अपने विभागों में क्या किया यह तो सही में शोध का ही विषय है क्योंकि इस तरह के आंकड़े अभी कहीं दिखे नहीं लेकिन श्रीलाल और गोविंद मिश्र जी ने जो रचा-लिखा है वह बहुत बड़ा काम है लोगों की रुचि हिन्दी लिखने-पढ़ने में रुचि जगाने का।

हिंदी दिवस मुबारक हो जी!

यह अंश रागदरबादी से:
एक लडके ने कहा,"मास्टर साहब,आपेक्षिक घनत्व किसे कहते हैं?"
वे बोले,"आपेक्षिक घनत्व माने रिलेटिव डेण्सिटी"
एक दूसरे लडके ने कहा,"अब आप देखिये ,साइंस नहीं अंग्रेजी पढा रहे हैं"
वे बोले,"साइंस साला बिना अंग्रेजी के कैसे आ सकता है?"
लडकों ने जवाब में हंसना शुरु कर दिया.हंसी का कारण ,हिंदी-अंग्रेजी की बहस नहीं ,'साला'का मुहावरेदार प्रयोग था.

rashmi ravija said...

बहुत ही रोचक तरीके से लिखी पोस्ट ...

हिंदी का प्रचार-प्रसार हो रहा है...पर ये भी कोशिश होनी चाहिए कि ये सिर्फ बोल-चाल की भाषा बनकर ही ना रह जाए...संपर्क भाषा से आगे बढ़कर लोग इसमें लिखने-पढ़ने में भी रूचि लें.... और क्लिष्ट शब्दों से परहेज नहीं पर वो वाक्य में इस तरह गुंथी हुई होनी चाहिए कि अलग से थोपी हुई ना लगे और आसानी से समझ में आ जाए.

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

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