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Friday, September 9, 2011

जेंडर बायस के गुलगुलौवे में एक मुश्किल ऐसी भी

         हाल ही में मुझे मुम्बई के एक नामी कॉलेज में ऑफिस की ओर से एक सॉफ्टवेयर आदि के सिलसिले में जाना पड़ा। वहां जाने पर पता चला कि कल कॉलेज में एक फंक्शन है जिसके सिलसिले में कॉलेज के लड़के-लड़कियाँ तैयारी कर रहे हैं। उसी फंक्शन में हमारी कंपनी के सॉफ्टवेयर को प्रदर्शित करना था। कॉलेज का आयोजन बड़े पैमाने पर था, इसलिये वहां हर कोई काम में लगा था। कोई पोस्टर बना रहा था, कोई परदे आदि का इंतजाम कर रहा था। कोई वालंटियर लाइटें ठीक से लगा रहा था। काफी तामझाम था।

( कतिपय कारणों से मुम्बई के उस कॉलेज का नाम और फंक्शन के डिटेल्स आदि यहां नहीं लिख सकता, उम्मीद है पाठक समझ बनाये रखेंगे : )

      तो  ऐसे ही माहौल में एक ओर मेरे ऑफिस के कलिग्स के साथ मैं सॉफ्टवेयर आदि के काम में जुटा था, इंस्टालेशन टेस्टिंग आदि का काम जोरों पर चल रहा था। तभी मेरी नजर हॉल में एक ओर बैठी कुछ लड़कियों पर गई। वे लोग थर्माकोल को कट करके, उसे गोंद आदि के जरिये रंगीन पेपरों से सजा संवार रही थीं। रह रहकर उनकी हिंग्लिश भी सुनाई पड़ती। Hey, did u see my कैंची.....hey...just get that गम्स.....hey give me little bit चिवड़ा....इसी तरह की मिली जुली आधुनिक बोली वे बच्चियां बोल रही थीं। उनकी कॉन्वेन्ट स्टाईल की हिन्दी इंग्लिश सुनकर जहां अजीब सा लगता वहीं उनकी मेहनत देख अच्छा भी लग रहा था। पूरे हॉल को इन लड़कियों ने तरह तरह से सजाया था। कहीं रंगीन फीते लगे थे तो कहीं कुछ। मैंने उन लोगों पर थोड़ा ध्यान दिया तो पता चला कि सभी मध्यम वर्गीय परिवारों से हैं। कोई जीन्स पहने थी तो कोई पंजाबी सूट। वहां कुछ लड़के भी थे, लेकिन लड़कियों के मुकाबले कम संख्या में थे। वे लोग भी काफी भागमभाग कर हॉल को सजा रहे थे।

           इसी बीच कैफेटेरिया की ओर जाना हुआ तो वहां बैठी लड़कियों  के कपड़ों में दो चार के कपड़े काफी भड़कीले लगे। मेरी मध्यवर्गीय मानसिकता ने वहां अपनी औकात से सोचना शुरू किया जिसका पहला जुमला यही होता है कि - ये लड़कियां यहां पढ़ने आती हैं या फैशन करने :)  वहीं कुछ लड़के ऐसे भी दिखे जो कि स्प्राईट के मॉडल लगते थे....थ्रीफोर्थ पहने हुए....झकड़ा दाढ़ी रखे हुए.....कोई- कोई तो तिल्लीनुमा दाढ़ी रखे हुए था तो किसी की हेयर स्टाईल रॉक स्टॉर की तरह थी। किसी को तो देख लगता कि यह सोकर उठा होगा और सीधे कॉलेज चला आया होगा।

           इन्हीं सब के बीच होते होते शाम के सात बजने आ गये। अब जो बच्चियां हॉल में लगी थीं वे अपने अपने घर जाने को उतावली होने लगीं। उनके चेहरे के हाव भाव से लग रहा था कि उन्हें देर हो रही है । इस बीच एकाध के घर से फोन भी आ गया कि कितनी देर लगा रही हो, जल्दी घर आओ। उधर लड़कियों के जी जान से मेहनत करने के बावजूद अभी भी कुछ पोस्टर लगने बाकी थे। उधर हम लोग भी फ्री नहीं थे कि उन्हें मदद कर सकें। दनदनाकर सॉफ्टवेयर का काम चल रहा था....चैट पर फाइलें डाउनलोड अपलोड की जा रही थीं....तमाम आपाधापी वाला काम चल रहा था। अगले दिन के फंक्शन के लिये पूरा सेटअप रेडी करना था।

           इसी सब में साढ़े सात पौने आठ होने को आये और लड़कियां चिंतित नजर आईं कि इतना काम बाकी है। उपर से घर वाले फोन पर फोन करे जा रहे थे। ऐसे में मुझे कॉलेज के लड़कों पर गुस्सा आ रहा था कि कहां मर गये कम्बख्त, जरा भी मदद नहीं कर रहे इन लड़कियों की। सारे के सारे पता नहीं कहां चले गये थे। उसी दौरान उस कॉलेज के प्रोफेसर भी देखने आये कि कल के लिये तैयारी पूरी हुई कि नहीं। काफी कुछ देख ताक कर वे बाकी के काम निपटाने के लिये चले गये। उन्हें भी गेस्ट आदि की तैयारी में दुपहर से लगे देखा था।

            इधर एकाध लड़की ने दूसरी से कहा कि - 'तू जा हम लोग देख लेंगे'। 'तू निकल तेरी मम्मी 'वरी' कर रही होगी। एकाध और को ऐसा कहा गया। मन मारकर दो तीन लड़कियों ने अपना बैग उठाया और कल सुबह जल्दी आउंगी कहकर जाने लगीं। जो बची रह गईं वो लोग फिर जुट गईं अपने काम में। इस बीच एक दो के घरों से और फोन आये। वो लोग भी अपने घर वालों से मनुहार करती लगीं कि बस थोड़ा सा काम और रह गया है मम्मी...... बस half an hour.... उन लोगों की बेबसी देख मुझे महसूस हो रहा था कि इन लड़कियों को कितना कुछ झेलना पड़ रहा है भले ही वो एक अच्छे और नेक काम में क्यों न लगी हों, किन्तु उन्हें घर वालों की चिंताओं के बीच अपनी क्रियेटिवीटी, अपनी पढ़ाई, अपने प्रोजक्ट्स आदि पूरे करने हैं।

         याद आता है मेरे घर का वाकया। बेटी को स्कूल में एनूअल डे के लिये डांस आदि की तैयारी करनी थी। उसने मूझसे पूछा कि पापा डांस में जाउं.....ज्यादा नहीं बस आधा घंटा रोज ज्यादा लगेगा। उसकी पढ़ाई और तमाम बातों को ध्यान रखते हुए मैंने मना कर दिया। उसने फिर भी जिद की लेकिन मैं नहीं माना, उसके एक्जाम नजदीक थे सो ऐसा करना ठीक भी लगा। बाद में चार पांच महीनों बाद कोई बात उभरी तो उसने बताया कि पापा मैं तो डांस में फर्स्ट आई थी। मैंने सुना तो पहले समझ ही नहीं आया कि ये कब गई थी डांस में, इसे तो मना किया था। पूछने पर उसने बताया कि वह रिसेस पिरियड में स्कूल में डांस सेक्शन में जाती थी। वहीं उसकी बाकी सहेलियां भी प्रैक्टिस करती थीं । सुनकर मैं श्रीमती जी का मुंह देख रहा था वो मेरा मुंह देख रही थीं। तब तक छोटे बेटे ने कहा कि उसको पता था कि पूजा डांस सेक्शन में जाती है लेकिन उसने नहीं बताया। जब उस बारे में पूछा गया तो पता चला कि पूजा ने अपने छोटे भाई को टॉफी का लालच दिया था घर में न बोलने के लिये। उन दोनों भाई-बहन की बातें सुन जहां एक ओर हंसी आ रही थी वहीं बिटिया के टैलेंट को देख अच्छा भी लग रहा था कि बिना प्रोत्साहन के डांस कम्पटीशन में वह फर्स्ट आई और उस एक्जाम में नंबर भी अच्छे लाई।

            खैर, यहां कॉलेज की उन लड़कियों द्वारा सुबह से लेकर रात आठ बजे तक जुटे रहने, उनकी मेहनत से तमाम हॉल के अरेंजमेंट आदि करता देख मन ही मन उनके प्रति आदरभाव सा लगा कि कितना तो सहती हुई अपना काम किये जा रही हैं। उपर से घर वालों के फोन, तमाम डिस्टर्बेंस....सचमुच बहुत मेहनत की उन लड़कियों ने।

         दूसरी ओर अभिभावकों का अपनी लड़कियों के प्रति चिन्ता करना कुछ हद तक जायज भी लग रहा था। आजकल माहौल ही ऐसा है। बताया न कि वहीं कैफेटेरिया में कुछ लड़कियां बड़े बोल्ड कपड़े पहने हुए थीं। सो रात साढ़े दस बजे हम लोग अपना काम खत्म कर जाने लगे तो एक उसी बोल्ड ग्रुप वाली दिखी कॉलेज के कॉरीडोर में किसी लड़के के साथ खड़े हुए। बहुत संभव है उसने भी घर पर कॉलेज में फंक्शन की तैयारी आदि की बात कही हो, बहाना बनाया हो जबकि असल मेहनती लड़कियां रात आठ, साढे-आठ बजे तक अपने अपने घरों को रवाना हो गई थीं। इन सब चीजों को देखने पर यही लगता है कि जहां एक ओर अभिभावकों की चिंता जायज है तो वहीं लड़कियों की पढ़ाई और उनकी मेहनत को मान देना भी जरूरी है। बहुत संभव है अभिभावक अपने बच्चों के प्रति विश्वास रखते हों कि वह कोई गलत काम नहीं करेंगे लेकिन माहौल और दूषित मनोवृत्तियों से दूरी बनाये रखना जरूरी भी है। कहां कब क्या घट जाय कोई नहीं कह सकता। एक ओर विचलन वाला माहौल है, दूषित मनोवृत्तियां हैं, तो दूजी ओर लड़कियों की पढ़ाई है, उनकी आगे बढ़ने की जद्दोजहद है....तिस पर अभिभावकों की स्वाभाविक चिंताएं.....।


- सतीश पंचम

20 comments:

संजय @ मो सम कौन ? said...

आप लिखें कितने भी मस्तमौला अंदाज में,उसके पीछे एक मननशील मस्तिष्क हमेशा दिखता है। सही विवेचना की है। वैसे ये सच है कि जिसकी जैसी नीयत है, वो उसके लिये वैसा मौका निकाल ही लेते हैं। घर परिवार का समझदारी भरा सहयोग मिले तो संभावना यही रहती है कि ’ऑल इज़ वैल’ रहेगा बाकि बिगड़ने का जोखिम और आगे बढ़ने के अवसर, दोनों, हमेशा उपलब्ध रहते हैं।

Arvind Mishra said...

इन्ही उधेडबुनों के बीच जिन्दगी थाह और राह पाती चलती है, वरी नाट !

Kajal Kumar said...

आपकी कंपनी भी ग़ज़ब है कि साफ़्टवेयर इंस्टाल करते-करते ही रात कर दी...

प्रवीण पाण्डेय said...

अच्छा है, युवा का मन जिस दिशा में लग जाता है उसका रूप निखरने लगता है। मेहनत, फैशन और माता पिता की चिन्ता, इसमें समन्वय बिठाती देश की लड़कियाँ।

वाणी गीत said...

बच्चों के सशक्त और आत्मनिर्भर होने के दौर से गुजरते अभिभावक इसी कशमकश में जीते हैं !

Gyandutt Pandey said...

सच है बन्धु, बहुत कठिन है डगर पनघट की।
हर तरफ फिसलन। और भरी गगरी उठा कर चलना है कुछ भी कर गुजरने के लिये।

mukti said...

अच्छी लगी आपकी ये पोस्ट सतीश जी. पहले से काफी कुछ बदला है. पर अभी बहुत कुछ बदलना बाकी है. लड़कियों के सामने आने वाली इन्ही छोटी-छोटी मुश्किलों को दूर करने की जद्दो-जहद में तो हमलोग लगे हुए हैं. लड़कियाँ जबर्दस्त कम्पटीशन, तेजी से बदलती टेक्नॉलजी और पिछड़ी सामाजिक व्यवस्था के बीच पिस रही हैं.
माता-पिता की चिंता भी जायज है और लड़कियों की आगे बढ़ने की जिद भी, लेकिन दोषी वो सामाजिक माहौल है, जिसे हम आज भी लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं बना पाए हैं.
इलाहाबाद में हमलोग ऐसे ही सेमीनार वगैरह से लौटते कुढ़कर रह जाते थे, जब लड़के कहते थे कि तुम लोग जाओ हमलोग अभी यू.रोड पर जाकर चाय पीयेंगे. बहुत छोटी सी बात है. ये नहीं कि हमारा आवारागर्दी करने का मन होता था, पर यही लगता था कि आखिर समाज ऐसा क्यों नहीं है कि लड़कियाँ भी निश्चिन्त होकर घूमते-फिरते आराम से घर जा सकतीं? क्यों सेमीनार में बैठे होने पर भी आधा ध्यान हॉस्टल या घर जाने पर लगा रहता है?

shilpa mehta said...

mukti ji se sahmat

रचना said...

for a change refreshing post to read satish

अनूप शुक्ल said...

ये वाली पोस्ट पढ़कर बहुत अच्छा लगा! बच्चियों के सामने सच में बहुत चुनौतियां हैं।

सञ्जय झा said...

yeh......kai din se sidhe padh ke tip likh kar-mitakar chala jata tha......

aaj namrashi bhaijee ne apni tip dekar hame sahmat hone ka mauka de
diya........

badhiya chintan....

jai ho.

anshumala said...

पोस्ट की तारीफ तो सभी ने कर ही दी है अब मै क्या करू एक दिन में इतनी ज्यादा तारीफे सुनना अच्छी बात नहीं है :)
लड़कियों को खासकर के मध्यम वर्ग की लड़कियों को ऐसे ही रोज के जीवन में एक एक बात के लिए संघर्ष करना पड़ता है समाज ख़राब है वाली बात नहीं चलेगी क्योकि समाज को ख़राब बनाता कौन है, हम सभी ही, जो अक्सर दूसरो की लड़कियों की बात आते है ताने मारने के मुड में आ जाते है जैसा आप ने कहा की "पढ़ने आती है या फैशन करने " जब घर गई होंगी तो हम जैसे ही कोई पड़ोसी ताने मरा होगा की इतने रात तक कौन सा कालेज चलता है कालेज जाती है या आवारागर्दी करने | कई बार सोचती हूं की यदि हमें समाज को ठीक करना है तो बेटियों के बजाये बेटो को सुधारना शुरू कर देना चाहिए बेटी को सिखाया पढाया तो अपनी ही बेटी सुरक्षित होगी उसकी भी गारंटी नहीं है किसी के बेटे और भी उदंड हो सकते है किन्तु यदि अपने बेटे को सुधार दिया तो समाज की कई बेटिया सुरक्षित हो जाएँगी |

anshumala said...

और एक सवाल आप से क्या बच्चे चौबीस घंटे पढ़ते है उसके आलावा और कुछ नहीं करते है ? एक आधा घंटा किसी और चीज के लिए कोई बुराई नहीं है आज जमाना आलराउंडर बनने का है सभी बच्चे एक साथ कई क्षेत्रो में जाना चाहते है अब तो उन्हें अपने परिवार के प्रोत्साहन की भी जरुरत नहीं है वो स्वस्फूर्त प्रोत्साहित होते है हमें तो बस उनकी मदद ही करनी होती है |

नीरज गोस्वामी said...

रोचक और समझदारी भरी पोस्ट...आप का लेखन...लाजवाब.

नीरज

Khushdeep Sehgal said...

एक देश में दो देश (...शायद तीन देश) की त्रासदी...

जय हिंद...

सतीश पंचम said...

आप सभी की उत्साह बढ़ाती बतियां पढ़ मेरी देह में दू किलो हिमोग्लोबिन जरूर बढ़ गया होगा :)

काजल जी, साफ्टवेयर तो पांच मिनट में इंस्टाल हो गया था लेकिन बेहद शॉर्ट नोटिस पर एक खास फीचर वहां प्रदर्शित करना था जिसके लिये वहीं ऑनसाइट R & D करनी पड़ी ( जिसे कि पहले ही लैब में निपटा लेना चाहिये था), सेटअप की ऐसी तैसी करनी पड़ी और यही वजह थी कि पूरा दिन निकल गया :)

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी, आप की बात सच है कि बच्चों को केवल प्रोत्साहन की जरूरत है ....वो तो खुद ब खुद आगे बढ़ने की ललक लिये हैं।

यदि अपनी बात कहूं तो एक पिता के तौर पर रोक-छेंक लगाने से खुद को रोक नहीं पाता, अंदर ही अंदर चाहता भी हूं कि बच्चे अपने करियर में हर क्षेत्र में आगे बढ़ें लेकिन बाहरी माहौल से सशंकित भी हूं।

मुम्बई जैसे आधुनिक और बोल्ड माने जाने वाले शहरी में देखा है कि मुंह अंधेरे ही सुबह पांच साढ़े पांच बजे ऑफिस जाने वाली महिलाओं को उनके भाई या पति बस स्टॉप तक साथ चलके छोड़ने आते हैं और जब बस चली जाती है तब ही लौटते हैं। देखकर भले अजीब लगे कि जो महिला ऑफिस जा सकती है क्या वह घर से बस स्टॉप तक अकेले नहीं जा सकती.... लेकिन नहीं....करना पड़ता है.... क्या किया जाय। असुरक्षा की भावना।

हम कितने भी निडर, बोल्ड और ब्ला ब्ला दिखें लेकिन अंदर से सशंकित हैं कि क्या पता कोई चेन स्नैचर इस मुंह अंधेरे में आ जाय, क्या पता कोई लफंगा कुछ उल्टा सीधा राह चलते न कह बैठे। ये और इस तरह के तमाम बातें हैं जो हमें कदम कदम पर सोचने-ठिठकने को मजबूर करती हैं।

रंजना said...

बहुत सही तस्वीर खींची आपने....

स्त्री जहाँ रहेगी,वहीँ आपने लिए स्थान बना लेगी...घर में रह कर यदि वह घर संवार सकती है तो बाहर जाकर दुनियां...

बस अवसर मिल जाए...

SINGH said...

मानसिक उलझन वाला विषय उठा लिया आपने..२१ वी सदी में बेटो को तो ले जा सकते है
लेकिन बेटियों को नहीं | मानसिकता बदलना मुश्किल है ..कई पहलू है .. अंततः तो शादी
कर कर दुसरे घर में तो भेजना ही हैं...यह दुसरे की अमानत है...ज्यादा उच्च शिक्षा दिला दी
तो वैसा वर कहा से खोजेगे ...दहेज़ की समस्या ..इत्यादि इत्यादि ... समाधान उतना आसान
नहीं है...बिटिया का पिता होना ...जहा रहो सुखी रहो ... गिरीश

deepakchaubey said...

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