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Saturday, September 3, 2011

खड़े-खड़ समिती बजरिये 'बैलही' ठसक.....

      सुन रहा हूं कि बैल क्म्यूनिटी नाराज है कि उसको कभी कोई कोट क्यों नहीं करता, अब उसकी उपमा क्यों नहीं दी जाती किसी को। ट्रैक्टर से खेत जोता जाता है इसका मतलब ये थोड़ी है कि बैलों की घटती संख्या के चलते उन्हें अपनी उक्तियों, मुहावरों से भी बेदखल कर दिया जाय। उनका मुख्य गुस्सा इंग्लैंड के खिलाड़ी पर था जिसने भारतीय खिलाड़ियों में से एक दो को गधा कह दिया था। उस खिलाड़ी ने गधा कह दिया तो कह दिया लेकिन उसके चलते सचमुच के गधों का तो रंग ही नहीं मिल रहा है, एकदम हवा में है आजकल उनका दिमाग कि देखो वो हमारी ही कम्यूनिटी का है और आज लाखों-करोड़ों कमाकर रख दे रहा है। जाहिर है गधों की यह खुशी बैलों से नहीं देखी जा रही।


     उधर विद्वजनों का मानना है कि बैल कम नहीं हुए हैं बल्कि बढ़ रहे हैं। बैलों का नाराज होना किसी राजनीतिक साजिश का नतीजा है, जरूर उन्हें किसी ने बहकाया है। यह सूचना बैलों को पहुंचा भी दी गई कि विद्वजनों के अनुसार उनकी संख्या बढ़ रही है लेकिन वे मानने को तैयार नहीं हैं। इस देश का यही दुर्भाग्य है कि विद्वानों के द्वारा कही गई बातों को कोई जल्दी मानता नहीं वरना देश कहां से कहां पहुंच जाता। वैसे भी सुना है देश अभी हाल्ट पर है। जिस किसी को चायपानी करनी होती है, वह देश की चिंता करता हुआ सामने की दीवार की ओर लपक लेता है और वहां खड़े खड़े चिंता करता है कि स्टैंडिंग कमेटी में कौन आया कौन गया। एक दो को तो ये भी चिंता थी कि सितंबर आ गया, हिंदी-उन्दी लिखने पढ़वाने का समय नज़दीक है लेकिन सरकार अब भी अंग्रेजी में ही स्टैंडिंग कमेटी कहती है। क्यों नहीं उसके लिये कोई हिन्दी शब्द लोकप्रिय बनाती। इस जायज चिंता पर एक नाजायज चिंतक ने कहा कि स्टैंडिंग कमेटी के लिये हिन्दी शब्द उपलब्ध है लेकिन वह जनता को समझ में आ जायगा इसमें संदेह है अत: बिना सन्देह वाला शब्द ही इस्तेमाल किया जा रहा है।

         उधर सुनने में यह भी आ रहा है कि और भी चौपायों ने अपनी अपनी बिरादरी से पक्षपात करने का आरोप लगाया है। भैंसों को यह शिकायत है कि आजकल कोई किसी को भैंसा नहीं कहता जबकि एक समय था कि लोग किसी को भी जब जी चाहता भैंसा कह देते थे और सामने वाला हंसते हुए उसकी बात को कुछ यूं लेता मानों भैंसे की उपमा उसके खाते पीते घर से होने की ओर इंगित हो। वहीं कौआ और गिद्ध भी कुछ इसी तरह के प्रश्नों से जूझ रहे है, न सिर्फ जूझ रहे हैं बल्कि कुछ ने तो खड़े-खड़ कमेटी भी बना ली है कि जैसे ही कोई मामला आए तुरंत खड़े खड़े उसका निपटान कर दिया जाय, उसे बैठने की जरूरत ही न पड़े। अब जहां इतनी सारी हलचल मची हो, कोलहर मची हो वहां लोग क्रिकेट पर ध्यान केन्द्रित करें यह थोड़ा अजीब लगता है। तब तो और जब हमारे बहादुर खिलाड़ी एक दूसरे की शर्ट पकड़े छुक छुक गाड़ी खेल रहे हों और पूरी सीरिज बुरी तरह से हारने के बाद भी गधा कह दिये जाने से नाराज हों। समझ में नहीं आ रहा कि आखिर क्या बात हो गई कि अभी चंद महीनों पहले वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम लगातार हारते चले गई।

        बैलगण, आप लोग दुखी न हों, इतना कहने सुनने के बाद भी जब भारतीय खिलाड़ियों पर कोई असर न पड़ेगा तो लोग सहज भाव से उन्हें बैल कहने लगेंगे। ऐसे में जरूरी है कि आप लोग अपना स्वभाविक धैर्य बनाये रखें......  :)

- सतीश पंचम

6 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

जो बैल थे, वे सीधे हो गये हैं और जो सीधे थे...

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

खेल-मंत्री की तुलना किस चौपाये से करेंगे जो कई महन्तों से एक साथ ही लोहा लेने चल पड़े हैं?

Arvind Mishra said...

न न ऐसा मत कहिये नंदी न नाराज हो जाय

दीपक बाबा said...

स्वभाविक धैर्य :)

ajit gupta said...

भाई हम तो कुछ न कहेंगे आजकल विशेषाधिकार हनन का चलन चल निकला है।

डॉ. मनोज मिश्र said...

@बैलगण, आप लोग दुखी न हों, इतना कहने सुनने के बाद भी जब भारतीय खिलाड़ियों पर कोई असर न पड़ेगा तो लोग सहज भाव से उन्हें बैल कहने लगेंगे। ऐसे में जरूरी है कि आप लोग अपना स्वभाविक धैर्य बनाये रखें...... :)
यह बढ़िया सलाह है...

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