सफेद घर में आपका स्वागत है।

Sunday, August 28, 2011

कपिलौठी वाले बाबा v / s अन्ना हजारे

कड़क गड़न दुरजन बचन, रहे सन्त जन टारि ।
बिजुली  परै  समुद्र  में,  कहां   सकेगी  जारि ।।
       भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान अन्ना हजारे पर कबीर की यह उक्ति सचमुच साकार हो गई है। जिस तरह से सरकारी लण्ठों ने अपनी लण्ठई के चलते अन्ना पर तीखे वार किये, उन्हें भ्रष्ट बताया, उनपर विभिन्न संघटनों से सांठ-गांठ का आरोप लगाया वह सब कुछ झेलते हुए भी अन्ना हजारे ने जिस अंदाज में अपने आंदोलन को अहिंसक बनाये रखा और सरकार से अपनी बात मनवाई वह वाकई काबिले तारीफ है। वरना जिस भारी संख्या में लोग जुटे, गाँव-गाँव, शहर-शहर जुटते चले गये वैसे हालात में कहीं भी स्थिति बिगड़ने के अंदेशे थे। कुछ जगह हल्के फुल्के हुड़दंग भी देखने में आये लेकिन कुल मिलाकर आंदोलन शांतिपूर्ण रहा।

         अब जब कि आंदोलन का वर्तमान दौर खत्म हो गया है ऐसे में कुछ नई बातें भी सामने आ रही हैं जिनसे कि पता चलता है कि टीम अन्ना में कैसे घुसपैठिये आ जुड़े थे। ताजा घटनाक्रम स्वामी अग्निवेश से संबंधित है जिनके नाम के आगे स्वामी लगाना अनुचित लग रहा है। महाशय भगवा रंग में विवेकानंद की तरह ड्रेस पहन कर फोन पर किसी कपिल से आंदोलन की चर्चा बड़े हल्के ढंग से कर रहे थे और अन्ना की तुलना पागल हाथी से किये जा रहे थे। ये कपिलौठी छुपी रह जाती यदि किसी ने उसे रिकार्ड न कर लिया होता। इस तरह के भगवा लोगों के चलते ही साधु-सन्तों पर जल्दी मैं विश्वास नहीं करता और न ही विश्वास करने का आगे मन ही है। कबीर ने ही कहा है कि -

बहता  पानी  निरमला,  बन्धा  गन्दा  होय ।
साधु जन रमता भला, दाग न लागे कोय ।।

    लेकिन स्वामी (?) अग्निवेश और वो तमाम बापू-सापू कम्बख्त इसके ठीक उलट चल रहे हैं। बड़ी बड़ी कोठियों, जमीनों, सुविधाओं की उम्मीद में लोगों को भरमाते हुए नारंगी- भगवा हुए जा रहे हैं और लोग भी हैं कि उनके बारे में जानते हुए भी एक विश्वास के तहत कुछ कर नहीं पाते। अभी कुछ साल पहले किसी न्यूज चैनल ने धार्मिक गुरूओं के बारे में स्टिंग आपरेशन किया था जिसमें दिखाया गया था कि कैसे हर धर्म के गुरू लोग अनैतिक कामों में लगे हैं। भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। रूपये पैसे यहां वहां से दाब दूब रहे हैं। एक संत को देखा जिसे कि एनजीओ के नाम पर पैसे देते समय बंदे ने वाईट करवाने के लिये कहा तो संत जी बोले - आप फिक्र न करें, इतने के तो हम बाकायदा चटनी बनाकर आपको वाइट करके देंगे फिक्र न करें। आप आये आप का काम हो जायगा। ऐसे ही क्रिश्चियन, मौलवी आदि का भी स्टिंग हुआ था जिसमें उन्हें विभिन्न संघटनों, फतवों, डोनेशन के जरिये करोड़ों रूपयों को इधर-उधर से दबाते दिखाया गया था। उस विडियो को देखते हुए विश्वास करना मुश्किल होता था कि यह वही संत है जो रोज सुबह प्रवचन देता है। एक चंद्रास्वामी और उसका कोई मामा था जिन्हें देखते ही लगता था कि दोनों एक नंबरी सत्ता के दलाल है। समय बदलता गया और उसी के साथ ढेरों दलाल अपने अपने चेलों चपाटों के जरिये बनते बिगड़ते रहे। इस पूरे मामले में वही है कि जो पकड़ उठा समझो वही चोर है वरना तो सभी साधू संत हैं। ऐसा नहीं कि जनता ऐसे लोगों को नहीं समझती लेकिन वह भी अपने पुराने संस्कारों के चलते सीधे कुछ कहने करने से बचती है। नतीजा यह होता है कि शरद यादव जैसों को संसद में कहने का मौका मिल जाता है कि क्या देश अब बाबाओं की मध्यस्थता से चलेगा ? यह स्वामी (?) अग्निवेश जैसे कुछ लोगों के कपिलौठी के कारण ही अच्छे भले आंदोलन पर लोगों को उंगली उठाने का मौका मिलता है।

दूरदर्शी जनतंत्र : Strong to The FINISH
    बहरहाल इतना जरूर है कि इस भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन के चलते कइयों की माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई होंगी। पहले तो कपिलौठी विचारधारा वाले लोग जोकि अब तक अपने को निर्द्वद्व मान कर चलते थे अब थोड़ा सकुचायेंगे, न भी सकुचायें तो कम से कम प्रकट रूप में कुछ ऐसा वैसा करने से बचेंगे। कुछ ऐसे भी लोग होंगे जिनके अवचेतन में इस आंदोलन की कुछ बातें कहीं न कहीं असर किये हों जो कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के कम करने में सहायक होंगे। यदि कुछ न भी हो तो एक तरह की जनचेतना तो आई है लोगों में कि भ्रष्टाचार से दूरी बनाकर रखी जाय। अब यह तो समय बतायेगा कि आगे क्या और कैसे असर दिखेगा लेकिन वक्ती तौर पर हमें एक परिवर्तन के साक्षी होने का मौका जरूर मिला है। इतिहास को सामने बनते देखने का मौका मिला है। उम्मीद करता हूं आगे भविष्य एकदम से स्याह न सही कुछ उजला तो होगा ही।

- सतीश पंचम

12 comments:

Kajal Kumar said...

समाज में हर तरह के लोग हैं और हरेक की अपनी अपनी डगर है कुछ सही चलते हैं तो कुछ टेढ़ा चलकर भी सार्वजनिक जीवन में बने रह लेते हैं...

आज मीडिया, ट्रस्टों, राजनैतिक पार्टियों व NGO का धंधा बड़े जोरों पर है. मीडिया को तो टैक्स राहत नहीं है पर दूसरे तीनों तो टैक्सों से भी छूट लिए बैठे हैं. बस ऐरे-ग़ैरे ही नहीं हर काम धंधे वाला ट्रस्टों, राजनैतिक पार्टियों व NGO से या तो पैसा देने का नाम पर जुड़ा हुआ है या इनके अपने ही ये धंधे हैं.

बहुत कम लोग जानते हैं कि कई-कई उद्योगी घरानों के तो सैंकड़ों ट्रस्ट व NGO हैं जो केवल टैक्स बचाने का धंधा ही नहीं करते बल्कि किसी को भी मौक़ा मिलते ही हड़काने के काम आते हैं... सरकारों से कोई उम्मीद नहीं. हमें यहां भी अण्णा की ही ज़रूरत है.

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

बाबा गिरी के बड़े फायदे हैं, अगर कोई बाबा थोडा बहुत भी चर्चित हो जाता है तो उसके पीछे औद्योगिक घराने एवं सत्तासीन लोग लग लेते हैं. उसके ट्रस्ट को करोड़ों की भेंट चदा कर काले को सफ़ेद करने के लिए..........

डॉ. मनोज मिश्र said...

सही कह रहे हैं,पहले साथ थे फिर सरकार से जा मिले,और सरकारी भाषा में बात करने लगे.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मुझे भी अग्नि.. की आँच का भय था। कहीं जारि न दे संपूर्ण आंदोलन को। लेकिन वाह रे अन्ना! आपने बड़ी कुशलता से इन पर भी विजय पाई।
अभी भी एक संदेह बना हुआ है कि हम जैसे जब सशंकित हो उठते हैं तो टीम अन्ना जैसे विद्वानो ने उन पर किस कारण भरोसा किया ? वह कारण जान पाना जरूरी लगता है।

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रवाह इतना हो कि जो न सम्हाल पाये तो चुपचाप किनारे में बैठ कंकड़ फेंके।

Arvind Mishra said...

यह एक इतिहास रच गया -सहज और स्वयं स्फूर्त -हम इस घटना को आगे कई वर्षों तक विश्लेषित करते रह सकते हैं ....

अनूप शुक्ल said...

अरे भाई स्वामी जी को भी समाज के बारे में चिंतित होने का अधिकार है कि नहीं! संविधान के मौलिक अधिकार का उपयोग भी क्या कोई किसी से पूछ कर करेगा?

पंचपरमेश्वर में कहा है न -क्या बिगाड़ के डर से सच न कहोगे?

अकेले में कही गयी बातों का संकलन किया जाये तो तमाम लोगों ने ऐसी बातें कहीं होगी। अण्णा की टीम से भी और राजनीतिज्ञों की तरफ़ से भी।

वैसे खबर आई है कि स्वामीजी का वीडियो हेराफ़ेरी करके बनाया गया। बताओ भला लोकपाल का प्रस्ताव पारित होने के बाद भी लोगों में हेराफ़ेरी बची हुई है। :)

संजय @ मो सम कौन ? said...

उम्मीद पर ही दुनिया कायम है।
इस एपिसोड में भी सकारात्मकता देखी जा सकती है। भगवा कपड़े पहने होने के बावजूद, नाम के पहले स्वामी लगा होने के बावजूद हम-आप खुले मन से इनकी आलोचना कर पा रहे हैं।
सिर्फ़ स्वामी क्यों, आगे चलकर जो भी सिद्धाँतों से विचलन करता दिखे, उसे दरकिनार किया जाये और देर सवेर यह होगा ही। आपने तो संतुलित समीक्षा की है, वरना तो हर कोई सलाह-मशविरों, विश्लेषणों की सेल लगाये बैठा है।
बड़ी बात है कि परिवर्तन की आवाज है और हम सब इस घटनाक्रम के साक्षी हैं। जिन्हें किसी अजन्मे,अदृश्य मसीहा का इंतजार है, वे करें।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

कोई नहीं, बाबा को अपना गठबन्धन बदलते कितनी देर लगती है। चोगे का रंग मरून की जगह भगवा, हरा, नीला, लाल या सफ़ेद ही तो कराना है। हाँ कपिल का क्या होगा? उसे तो अन्ना ने दल बदलने के लायक भी नहीं छोडा।

rashmi ravija said...

आगे भविष्य एकदम से स्याह न सही कुछ उजला तो होगा ही।

बस यही उम्मीद है...कुछ तो अच्छा निकल कर आएगा...वर्ना सबने यथा-स्थिति स्वीकार कर ही ली थी.

anshumala said...

पहले मैने इनको देखा था बंधुवा मजदूरो बाल मजदूरों के लिए लड़ते हुए फिर नक्सलियों के लिए फिर अन्ना के साथ अब ये रूप | असल में ये राजनितिक सौदेबाजी करने के बड़े दलाल ज्यादा लग रहे है जो सौदा ना पटने पर अपना कमीशन नहीं मिलने पर परेशान है |

ajit gupta said...

मुझे गोस्‍वामी तुलसीदास जी की बात याद आ रही है। उन्‍हें गोस्‍वामी बना दिया गया था लेकिन जब उन्‍होंने वहाँ के घिनौने सत्‍य को जना तब वे बहुत ही शीघ्र उस पद को छोड़कर चले गए थे। अग्निवेश के बारे में तो पहले भी कहा जा रहा था कि यह व्‍यक्ति धोका देगा। उसने दिया यही अच्‍छा हुआ जिससे लोगों का विश्‍वास उसके आचरण के प्रति बना रहा। जल्‍दी ही पोल खुली नहीं तो पता नहीं कितना नुक्‍सान करता।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.