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Wednesday, August 17, 2011

इमरजेंसी मोहन-जोदड़ो, हड़प्पा काल में भी लगी थी प्यारे :)

                आजकल जिसके मुँह से सुनो इमरजेंसी को याद कर रहा है। कुछ इस तरह मानों इमरजेंसी में वो भी एक भुक्तभोगी रह चुका है।  हद तो तब हो जाती है  जब कोई  आह भरते हुए कहता है यदि इमरजेंसी न होती  तो मेरे  दो चार भाई-बहन और  होते। कम्बख्त  संजय गाँधी ने पिता जी को रास्ते में घूमते धर लिया और नसबंदी कर दी :) 

 खैर, अपने-अपने दुख, अपनी-अपनी यादें। कोई उस काल को स्वर्ण काल कहते हुए वापस इमरजेंसी की हिमायत करता है तो कोई इतने साल बाद भी इंदिरा गाँधी को कोसता दिखता है। वैसे यह शोध का विषय है कि तब के लोगों के मन में इमरजेंसी के बारे में क्या विचार थे। उस जमाने में ट्विटर और फेसबुक का चलन भी तो नहीं था कि कोई लिखता - आज नुक्कड़ पर मैं धर लिया गया.......कम्बखतों ने कहीं का न छोड़ा। नसबंदी करके ही माने।   कोई लिखती -  मैं छज्जे पर कपड़ा उतारने गई थी कि  नसबंदी वालों की जीप आती दिखी, मैंने झट से चुन्नू के बापू को भूसा घर में  घुसा दिया।

    उस जमाने में फिल्म स्टार लोग ट्वीट करते हुए लिखते -  आजकल फिल्मी डायलाग तक इमरजेंसी के डर में लिखने पड़ रहे हैं। कोई भी हिरोइन यह नहीं कह सकती कि -  "रमेश बाबू,  मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ"

तुरंत कैंची चल जायेगी :)

            बहरहाल मुझे उस जमाने में लिखे शरद जोशी का एक लेख पढ़ने का मौका मिला जिसे उन्होंने अक्तूबर 1977 में 'नावक के तीर'  स्तंभ में  लिखा था।  अपने लेख में शरद जोशी जी इमरजेंसी की मौलिकता और उसके इतिहास पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि  - 
  
यह कहना गलत है कि इमरजेंसी इंदिरा गाँधी की भारतीय राजनीति को मौलिक देन है।


मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से शुरू किजिए। वे खँडहर क्यों हो गये ? उन्हें किसने तोड़ा, क्यों तोड़ा ? जाहिर है वे अनऑथराइज्ड कंस्ट्रक्शन रहे होंगे। जब  इमरजेंसी लागू हुई, तुड़वा दिये गये।

     .......मोहनजोदड़ो में एक स्विमिंग पूल निकला है। निश्चित ही किसी स्मगलर के बँगले में रहा होगा। इमरजेंसी में स्मगलरों पर क्या गुजरती है, सब जानते हैं। घर वीरान हो गये, स्वीमिंग पूल सूख गये। मुझे तो मोहनजोदड़ो की सील देख कर ही शक हो गया था। लिपि समझ में नहीं आई किसी के, अर्थात कोड वर्ड में है। सील पर साँड बना है। इमरजेंसी में प्रशासन की यही प्रकृति हो जाती है। साँड बने घूमते हैं। तब की सरकार ने इमरजेंसी लागू करने के बाद ही यह सील बनाई होगी। .....


       शरद जोशी जी यहीं तक नहीं रूके। आगे उन्होंने वैदिक काल को भी लपेटते हुए लिखा है कि -

वैदिक काल में भी इमरजेंसी लगी थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छिन गयी थी और सेंसरशिप लागू हो गयी थी। स्पष्ट है, अन्यथा चार वेद लिखे जाने के बाद पाँचवा, छठा और सातवाँ वेद क्यों नहीं लिखा गया ? सरकारी बंदिश और संविधान की धारा बदल दी जाने के अतिरिक्त और कोई कारण नहीं हो सकता कि एक अच्छा खासा चलता हुआ काम रूक जाये। तब की सरकार अपने आपातकाल जन्य थोथे अहंकार में नहीं चाहती होगी कि लोग सरकारी सूत्रों के अतिरिक्त किन्हीं अन्य सूत्रों से भाष्य करें। सो वेद की लिखाई आगे से रूकवा दी गई।


   इसके आगे उन्होंने रामायण काल को टटोला। रामायण काल के बारे में शरद जोशी जी लिखते हैं कि - 

        माना, कैकेयी बड़ी पावरफुल थी, पर भरत कोई संजय गाँधी थे कि साहब राजगद्दी पर वही बैठेंगे, कोई दूसरा नहीं बैठ सकता, चाहे वह भगवान राम ही क्यों न हों। राम-न्याय की खातिर मुकदमा लड़ने कचहरी क्यों नहीं गये ? जाते कैसे ? अनुशासन पर्व जो लागू था। धाराएं रद्द हो जाने से वकील ने कहा होगा, राम जी, फिलहाल कोई उम्मीद नहीं, आज्ञा मान जाइये, वरना अंदर हो जायेंगे। ऐसी जेलों से तो वनवास अच्छा। घर से दूर रहोगे मगर खुली हवा में घूमोगे तो सही।
जरा सोचिए कि चौदह साल बाद जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस हद तक हो गयी थी कि एक साधारण धोबी सीता के चरित्र पर कमेंट कर सकता था, जबकि उस जमाने में अयोध्या का रामप्रेमी पुरजन कैकेयी के खिलाफ नारे भी नहीं लगा सकता था।.........


    खैर, ये तो हुई रामायण की बात। आगे महाभारत काल के बारे में भी शरद जी अपने विचार कुछ यूँ प्रकट करते हैं।


     महाभारत काल के असल मूल में किस्सा कुर्सी का था। बारह साल बाद पांडव वनवास से लौटे तो पता चला कि दुर्योधन ने अंधे धृतराष्ट्र से दस्तखत करवाकर अध्यादेश जारी कर दिया है कि दस साल से जमीन पर जिसका कब्जा रहा, वही जमीन का असल मालिक है। अंधे धृतराष्ट्री की स्थिति राष्ट्रपति की तरह थी। जिस कागज पर बोलो, जहां बोलो, दस्तखत कर दे। पांडवों ने कहा जमीन हमारी है। दुर्योधन ने कहा, भूमि सुधार के नये कानून बन गये हैं। अब आपका कोई हक न रहा। छिड़ गया महाभारत, क्योंकि कचहरी में जाने में कोई तुक नहीं था। कानून दुर्योधन के पक्ष में थे।

   इतना सारा विश्लेषण करते हुए अंत में शरद जी अंत में कहते हैं कि   अभी तो मौर्यकाल, मुगलकाल नहीं आया है। तब तो इमरजेंसी के और प्रमाण मिलेंगे :)

   बहरहाल आप लोग तैयार रहिये। अपने-अपने ट्विटर, फेसबुक, ब्लॉगर फ्लॉगर अकाउंटों को  धो- माँजकर,  सुखा लिजिये, धूप बत्ती, अगरबत्ती आदि दिखा दिजिये। क्या पता आप लोगों को भी इस सरकार के कर-कमलों से इमरजेंसी का स्वाद मिले और आप ट्विटियायें -  Hey dude....Lets celb Emergency......After all, Z.N.M.D..............Zindagi Na Milegi Dobara,  dude   :)

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UPDATE -   एक चीज मैंने ऑबजर्व की है कि संभवत: मोहनजोदड़ो हड़प्पा काल के दौरान भी एक कलमाड़ी था क्योंकि यदि उत्खनन के दौरान पाई चीजों को देखा जाय तो उसमें एक दाढ़ी वाले की मूर्ति भी है, साथ ही ढेर सारे खेल से संबंधित अवशेष भी मिले हैं :)


- सतीश पंचम
( सभी चित्र : गूगल  बाबा से साभार ) 

18 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

इतिहास की समुचित व्याख्या।

दीपक बाबा said...

@कम्बख्त संजय गाँधी ने पिता जी को रास्ते में घूमते धर लिया और नसबंदी कर दी :)

बाकि अभी पढता हूँ.... हंसी रुक जाए.

दीपक बाबा said...

सलाम शरद जोशी

P.N. Subramanian said...

सुन्दर व्यंग. एक आदमी इत्ते सारे फल्लोवर्स बना ले वह भी अकेले दम पर, बड़ी नाइंसाफी है. भूतकाल की दुहाई देनी पड़ सकती है.

डॉ. मनोज मिश्र said...

शरद बाबू की यह थ्योरी तो अपुन की समझ में न आयी ?.

Udan Tashtari said...

जय हो पढवाने के लिए आभार!!

Kajal Kumar said...

शरद जी को पढ़वाने के लिए आभार. शरद जी को सुनना तो और भी सुखदायी हुआ करता था. उनका अंदाज़ एकदम सौम्य व आराम से पढ़ने वाला था.. बिना किसी नाटकीयता के लेकिन हंसी के फ़व्वारे छुड़वा देने वाला. वे अपने समय की सबसे दुधारी क़लम थे...

जहां तक सांड वाली सील की बात है, इसमें दो परस्पर विरोधी बाते हैं.
(1) सील पर 'सरकारी सांड' लिखा है (मैंने छुप कर इस लिपी को जान लेने काम किया है, किसी को नहीं पता). इस सांड को मोहनजोदड़ो वाले नस्ल सुधारे रखने व पर्याप्त जनसंख्या बनाए रखने के प्रतीक के रूप में देखते थे.
(2) जहां तक इस सील के अपने ही अस्तित्व की बात है, यह इमरजेंसी के दौरान ही अस्तित्व में आई थी (इसके मोहनजोदड़ो से मिलने की बात झूठ है, पक्का). यह प्रतीक थी इस बात की कि सभी सांड़ों (खुले पाए गए सहित) की वह इंद्री सील कर दो जहां से अंडकोष अपना उत्पादन जनसंख्या बढ़ाने के लिए बिना बात ही निर्यात करता रहता है. नसबंदी वालों ने आदमियों की ग़िनती भी सांडों में करने की सरकारी शपथ ले ली, यह बात दीगर है :)

संगीता पुरी said...

बहुत अच्‍छी पोस्‍ट .. आपके इस पोस्‍ट की चर्चा अन्‍ना हजारे स्‍पेशल इस वार्ता में भी हुई है .. असीम शुभकामनाएं !!

Rahul Singh said...

शैलाश्रयों में इमरजेन्‍सी के प्रमाण पर शोध प्रस्‍ताव आने वाला हो सकता है.

Dr (Miss) Sharad Singh said...

शरद जोशी जी को पढ़वाने के लिए आभार.
अच्छी प्रस्तुति.

Poorviya said...

aabhjar...


jai baba banaras....

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

बहुत खूब रहा ये लेख तो।

Arvind Mishra said...

इस मौके पर लोगों को क्या क्या न याद आ गया मगर आपको शरद जोशी याद आये अच्छी बात है ....
मुझे अपने मास्साब याद आये जिनका चश्मा बद्मली में कहीं गिर गया और वे उसी और बार बार भागते जिधर पोलिस लोगों को खदेड़ रही थी -अंत में उन्हें हल्ला गाडी में बैठा ही लिया गया ..
समय आपात काल के पश्चात ....
जौनपुर में एक जनसभा में इंदिरा जी को काला झंडा दिखाने पर भड़की पुलिस !
मैं भी झंडा दिखाने वालों में शामिल था .... बिचारे मासाब को नहीं संभाल सका ..वे पोलिस की दिशा के उलटे आये ही नहीं ..:)

सतीश पंचम said...

@ इस मौके पर लोगों को क्या क्या न याद आ गया मगर आपको शरद जोशी याद आये
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अरविंद जी,

शरद जी तो कालजयी हैं, याद तो आना ही था :)

इस पोस्ट को लिखते समय मुझे एकाध और चीज शरद जी की फिर से पढ़ने मिली और लगा कि इसे भी आप लोगों से शेयर करना चाहिये। संभवत: आगामी पोस्टों में शरद जी के उस लेख की चर्चा करूं।

सतीश पंचम said...

काजल जी,

जोरदार कमेंट है :)

वैसे एक चीज मैंने ऑबजर्व की है कि संभवत: मोहनजोदड़ो हड़प्पा काल के दौरान भी एक कलमाड़ी था क्योंकि यदि उत्खनन के दौरान पाई चीजों को ध्यान से देखा जाय तो उसमें एक दाढ़ी वाले की मूर्ति भी है, साथ ही ढेर सारे खेल से संबंधित अवशेष भी मिले हैं :)




संदर्भ के लिये उसका चित्र भी लगा देता हूं।

AMIT MISHRA said...

बहुत खूब लिखा है आपने। हमेशा कि तरह इस बार भी छक्का लगाया है आपने।

रोहित बिष्ट said...

शरद जोशी को नवभारत टाईम्स में पढ़ा करते थे
आपने याद ताजा कर दी।

Vivek Jain said...

बहुत बढ़िया,
मजा आ गया,

विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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