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Wednesday, August 31, 2011

छुई-मुई सांसदगिरी बजरिये चच्चा जेम्स वॉट

      सुनने में आया है कि संसद में अभिनेता ओम पुरी और किरण बेदी पर विशेषाधिकार हनन के सिलसिले में कार्यवाही करने की बात हो रही है। हमारे छुईमुई सांसदों को उनके द्वारा अपनी खिंचाई करना अखर गया है। कुछ सांसद लोग इस पक्ष में हैं कि उन लोगों के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिये क्योंकि उन्होंने विशेषाधिकार हनन किया है। 

  इस घटना से पता चलता है कि बड़े नाजुक हैं हमारे सांसद गण। एकदम गुलाब के पंखुड़ियों की तरह। जिस तरह पाकिजा फिल्म में मीना कुमारी के पांव देखकर राजकुमार ने कहा था - अपने पाँवों को जमीन पर मत उतारना, मैले हो जायेंगे....कुछ उसी तरह हमारे सांसदों के बारे में भी कहा जा सकता है - कि कृपया हवा में ही बने रहें, जमीन पर कदम रखते ही मैले हो जाएंगे...जमीन या सांसद ये आप तय करें।

      खैर, इस प्रकरण से जिन्हें अब तक नहीं पता था कि विशेषाधिकार नाम की कोई चिड़िया भी होती है, उन्हें भी पता चल गया कि यह क्या चीज है। अब लोग डरेंगे सांसदों का मजाक उड़ाते हुए, उन पर व्यंग्य करते समय सोचेंगे कि कुछ कहें या न कहें....कल को कहीं संसद में न बुलवा लिया जाय। वैसे ये संसद भवन के स्थापत्य को निहारने का स्वर्णिम मौका है। जिन लोगों ने अब तक संसद को अंदर से न देखा हो वे इस तरह के छुई-मुई हननादि के जरिये जुगाड़ बना सकते हैं।

       उधर देख रहा था कि शरद यादव संसद में बहस के दौरान बढ़ चढ़ कर बोल रहे थे। बोल रहे थे - ऐसा कहा जा सकता है। बाकि तो मान्यतायें हैं.....कहां तक तर्क ढूँढियेगा। हां तो मैं कह रहा था कि शरद यादव संसद में बोल रहे थे। उनके अनुसार सांसदों का इस तरह पब्लिक में मजाक उड़ाया जाना अच्छी बात नहीं है। इसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिये। चलिये, हम भी मानते हैं, हम ही क्या सभी लोग मानते हैं कि सांसदों का पब्लिक में मजाक नहीं उड़ाना चाहिये लेकिन उनका क्या जो मजाक मजाक में ही सांसद बन जाते हैं, मजाके-मजाक में पूरा पांच साल खींच ले जाते हैं। इतना ही नहीं, अगली बार फिर मजाक करने के लिये मुंह लेकर खड़े हो जाते हैं। काम करो चाहे न करो लेकिन मजाक जरूर करो। अब ऐसे में थोड़ा बहुत मजाक जनता भी आप लोगों से कर ले तो इससे आप लोग चिढ़ जाते हैं। कल को कहीं जनता ने सिरियस होकर सोच समझकर वोट देना शुरू किया तो आप लोगों का संसद पहुंचना मुश्किल हो जायगा बंधुओ। इतने भी न इतराओ कि फिल्मी हिरोइनें इनफिरियरिटी कॉम्पलेक्स से घिर जांय।

       फिलहाल मेरा मन आप लोगों को गंगा-जमुना फिल्म दिखाने का हो रहा है। गंगा-जमुना फिल्म तो देखे होंगे। अरे वही जिसमें बड़ा भाई गंगा एकदम गंवार है, मेहनत मजूरी करके छोटे भाई जमुना को पढ़ाता है ताकि उसका भाई 'निसपिट्टर' बने , बड़ा आदमी बने ताकि दोनों भाई मिलकर घर को संभाल ले जांय, गरीबी दूर हटे, मुफलिसी के दिन बीतें। यही सब सोच कर गंगा अपने छोटे भाई जमुना के लिये अलग से 'फउन्टन पेन' का इंतजाम करता है, दूध दही से लेकर वो तमाम चीजें उसके लिये मुहैय्या कराता है जो उसकी पढ़ाई में मदद करे, उसे निसपिट्टर बनाये।

       यहां तक तो फिल्म की कहानी थी। अब मान लिजिये कि एक ट्वीस्ट आ जाय। छोटा भाई जमुना पढ़ने की बजाय मटरगश्ती करने में लग जाय, यहां वहां घूमने टहलने लगे, भाई के मेहनत से कमाये पैसों पर मौज उड़ाने लगे तब बड़े भाई को गुस्सा आएगा कि नहीं.....। इसी बीच पता चले कि सारी सुविधाओं के बावजूद जमुना फेल हो गया, तब ? तब तो और गुस्सा आयेगा। पढ़ा लिखा सब बेकार, पैसा गया सो अलग।

        इसके बावजूद बड़े ने छोटे पर विश्वास बनाये रखा, सोचा कहीं कुछ गड़बड़ हो गई होगी, न पढ़ पाया होगा, चलो अगली बार पास हो जायगा। फिर से जमुना की पढ़ाई की तैयारी हुई। फिर से बड़े ने मेहनत मजूरी करके, बोझ ढोकर, जांगर ठेठाकर उसे पैसे दिये। लेकिन नतीजा सिफर। तंग आकर एक दिन बड़े भाई गंगा ने छोटे को भला बुरा कह दिया, उसके खर्चों-उसके नाज नखरों को लेकर सवाल उठाया तो छोटा उखड़ गया। उसने यह कहकर बड़े को आश्चर्य में डाल दिया कि दूध-दही, अलग से कमरा, लालटेन और वो तमाम सुविधाएं उसके विशेषाधिकार हैं, ये सब पढ़ने लिखने के लिये जरूरी हैं। पढ़ाई लिखाई कोई हल-बैल तो नहीं हैं, कि बैल को जुए में सटाया, हल नाधा और चल पड़े खेत जोतने। पढ़ाई के कलम लगती है, किताब लगती है, इंसानी दिमाग इस्तेमाल करना पड़ता है। ऐसे में उसके विशेषाधिकारों पर दखल न दिया जाय।

        बड़े ने अब अपने अधिकार का उपयोग किया। एक झन्नाटेदार चांटा छोटे के गाल पर पड़ा। प्यार के समय प्यार, दुलार के समय दुलार लेकिन उसके सामने विशेषाधिकार की बात वही छोटा भाई करे जिसके सुख सुविधा के लिये उसने मेहनत मजूरी की, उसे पढाया लिखाया तो यह तो ठीक नहीं है बंधुगण। आप लोगों की हालत उसी छोटे भाई जमुना सी है। कितना भी सुख सुविधा दे दो, दूध दही खिला दो लेकिन नतीजा वही सुन्न बटा सुन्न। ऐसे में रात दिन खटने वाला जांगर ठेठाने वालों का प्रतीक गंगा, यदि दो चार बात बोल दे तो आप लोगों को सुनना पड़ेगा, न सिर्फ सुनना बल्कि उसी हिसाब से अपने काम काज के तौर-तरीकों को बदलना पड़ेगा।

        आज दो चार जनों को संसद में बुलाकर आप लोग लताड़ लगाकर खुश हो लेंगे लेकिन भविष्य का क्या। अच्छा है कि थोड़ा थोड़ा भाप जनता के भीतर से प्रतिक्रिया के रूप में निकलने दिया जाय। यह दोनों ही पक्षों के लिये उचित है। वरना तो जेम्स वॉट चच्चा ने केतली के ढक्कन के जरिये बताया ही है कि भाप की शक्ति क्या क्या कर सकती है। अच्छा होगा केतली के उपर लगे ढक्कन की ठकर ठकर को सुना जाय, उस पर तवज्जो दी जाय न कि विशेषाधिकार का बहाना बनाकर खुद की लुटिया डुबोई जाय।


- सतीश पंचम

21 comments:

ajit gupta said...

सतीशजी, कमाल कर दिया आज आपने! बस एक झन्‍नाटेदार झापट की ही आवश्‍यकता है अब तो। जनता लगा ही देगी अब विश्‍वास हो चला है।

Kajal Kumar said...

अपनी नाक़ामयाबियों को यूं दबाए रखने के लिए ही बनाए जाते हैं इस तरह के विषेशाधिकार....so that people do not dare call a spade, a spade

indu puri said...

हिंया तो हम जनता खुदे को 'गंगा' समझे बैठे हैं.पेट काट काट के देस का नाम पर तन मन धन सब दिए गए साथ साल तक.कुर्सी गिरा गिरा कर कई बार चेताया भी अपने जमुना और ब्रह्मपुत्र को (दो ही तो है हमरे खास) सुधर जाओ.जो तुम्हे हम बनाये हैं तो दो मिनट में सीधा भी कर देंगे.हमरे तमाचे की गूँज दोनों ने उनके बाल बच्चो ने भी सुन ली होगी.
कमी एको है हम में हमरी याददाश्त बहुत कमजोर है.जल्दी सब भूल जाते हैं.आँख,कान बंद कर मेहनत करते रहते है बैल की माफिक या सो जाते हैं जनता है न.पर... साय्ड हमरे उबाल को समझ ले जमुना और.... हा हा हा
बहुत सटीक लिखे हो बाबु!
हमरा आईडी क्या ब्लोक हुआ.सबसे बिछुडी गए....तुम तो याद किये नही हमरे सरीखे बहुत है तुम्हारी बाए किन्तु हमरे पास गिनती के भतीजा भतीजी हैं.सो मनमोहन देसाई के पात्रों की तरह भीड़ में खो गए थे.पर देखो आपको ढूंढ लिए.हाँ यह फिलिम का एंड नही...सुरुआत है जैसे अन्ना-आंदोलन.

प्रवीण पाण्डेय said...

अधिक उधाड़ियेगा तो अगला नम्बर आपका।

सञ्जय झा said...

o ho.......tabhi to.....ye aapas me
hi 'tu-tu....main-main karta' hai...
thik hai unka visheshadhikar o jane
.....suna hai aaj kal public ka vishe
shadhikar 'chappal-jute' chalane ka
ho gaya ho.....

jai ho....

देवेन्द्र पाण्डेय said...

हे देखो..! ओमपुरी से ढेर तो इहाँ लिखा है..!! का आप समझ रहे हैं कि घुमा के लिखेंगे, सुंदर शब्दों का प्रयोग करेंगे तो समझेंगे नहीं..? संसद भवन के स्थापत्य को निहारने का स्वर्णिम मौका मिला ही समझिए...बधाई।

संजय @ मो सम कौन ? said...

गुरू, कैमरा लेकर जाना संसद में। वो क्या है thought for a lens टाईप, उसके लिये सही मसाला मिलेगा:)
खरी खरी लिखी है एकदम।

बी एस पाबला BS Pabla said...

निस्पिट्टर नासपीटे हो गए लगता है :-)

एक कानून बनने के पहले आशंका जताई जाती है कि आधी संसद जेल में होगी
लेकिन
विशेषाधिकार का प्रयोग होगा तो आधा देश जेल में होगा!
नहीं?

(नई प्रोफ़ाईल के साथ)
बी एस पाबला)

indianrj said...

सतीशजी मैं आपका लिखा नियमित रूप से पढ़ती हूँ. आपका लेखन रोचक तो होता है साथ ही आप व्यंग्य भी खूब करते हैं. आप ऐसे ही लिखते रहिये. शुक्रिया

दीपक बाबा said...

touch me note

:)

दीपक बाबा said...

note नहीं यार not :)

कभी कभी इंग्लिश सही लिख लेते तो निस्पिट्टर हो जाते :)

सतीश पंचम said...

इंदु जी,

इतने दिनों बाद आपको फिर से ब्लॉगिंग में देखना अच्छा लगा।

जहां तक भूलने की बात है इस पर क्या कहूं, कल श्रीमती जी के साथ बाजार में कुछ सामान खरीद रहा था। मोल भाव मैं ही कर रहा था। भूल गया कि बगल में श्रीमती जी भी हैं और ये डिपार्टमेंट उनका है। भूल से दाम ज्यादा ही बोल बैठा मैं। घर पहुंचने पर आंखे तरेरते हुए दो बात भी सुननी पड़ी - क्या जरूरत थी आपको इत्ते पैसे देने की...बड़े आये देतादान बनने वाले :)

सतीश पंचम said...

@ अधिक उघाड़ियेगा तो अगला नंबर आपका...

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प्रवीण जी,

अपन तो तैयार बैठे हैं कोई संसद से बुलाये तो सही। अकेले इसी अनुभव पर दो चार पोस्टें बन जाएंगी। और खुदा न खास्ता कहीं जेल वेल हो गयी तो वहीं से जेल डायरी भी लिखने का मौका मिलेगा।

- आज मेरे बगल में कलमाड़ी आकर बैठे। उन्होंने चाय बिस्कुट खाया। अपना हिस्सा तो खाये ही, मेरे वाले बिस्कुट भी जेब में डाल कर मुंह पोंछते चल दिये।

- आज ए. राजा मिलने आये, बहुत दुखी लग रहे थे, बार बार उंगलियों पर कुछ गिन रहे थे। मेरे पूछने पर बोले - लिये तो कुछ ज्यादा ही थे लेकिन मेरे अड़तालीस करोड़ का हिसाब नहीं बैठ रहा कि मैंने लिये हैं कि दिये हैं।

- आज मेरे बगल में पप्पू यादव शिफ्ट हुए - कह रहे थे तुम भी आ गये, अब देश कौन संभालेगा :)

सतीश पंचम said...

@ एक कानून बनने के पहले आशंका जताई जाती है कि आधी संसद जेल में होगी
लेकिन
विशेषाधिकार का प्रयोग होगा तो आधा देश जेल में होगा

-----

बिल्कुल यही बात होगी पाबला जी, किस किस का मुंह बंद करेंगे सांसदगण।

आखिर इन्हीं आलोचनाओं, समालोचनाओं के कारण ही तो एक दूसरे की कमियां उजागर होंगी, आगे के लिये रास्ते बनेंगे वरना तो केवल गरिमा, गरिमा गाने से और मान रखना चाहिये कहने से इज्जत नहीं मिलती। उसके लिये कर्मठ होना पड़ता है, अपने कार्यों से जनता के बीच संदेश देना पड़ता है। जबरिया इज्जत नहीं बटोरी जा सकती।

Arvind Mishra said...

पूरी दुनिया में यह कौम ऐसी ही है -अमेरिका के नए आये तूफ़ान इरीन ने कई राजनीतिज्ञों का घर उड़ा दिया -लोग कह रहे हैं अच्छा हुआ यह उन्ही के पापों का फल है -भारत में भी नेताओं की आम छवि ऐसी ही है -न जाने ॐ पुरी माफी क्यों मांग रहे हैं -उखाड़ने देते इन्हें जो उखाड़ना देते -सारा देश फिर थू थू करता .....

डॉ. मनोज मिश्र said...

@@ इस घटना से पता चलता है कि बड़े नाजुक हैं हमारे सांसद गण। एकदम गुलाब के पंखुड़ियों की तरह। जिस तरह पाकिजा फिल्म में मीना कुमारी के पांव देखकर राजकुमार ने कहा था - अपने पाँवों को जमीन पर मत उतारना, मैले हो जायेंगे....कुछ उसी तरह हमारे सांसदों के बारे में भी कहा जा सकता है - कि कृपया हवा में ही बने रहें, जमीन पर कदम रखते ही मैले हो जाएंगे...जमीन या सांसद ये आप तय करें।
-----देखा भइया ई सांसद लोग इस बात पर भी न नोटिस दे दें??

ZEAL said...

इन छुई मुई सांसदों को तो बहाने चाहिए आरोप लगाने के और लोगों को मुद्दे से भटकाने के। रोना तो जैसे इनकी आदत बन गयी हो।

Vivek Rastogi said...

एक अच्छी बात यह है कि इन गिने चुने सांसदों को फ़ेसबुक और ट्विटर का उपयोग पता नहीं है, नहीं तो संसद विशेषाधिकार प्रस्ताव करते करते थक जाती।

वाणी गीत said...

विशेषाधिकार के साथ विशेष कर्तव्य भी होते हैं !
वो इन्हें याद नहीं !

शेफाली पाण्डे said...

bilkul sahee kaha...meree post isee ka saar hai...

तुषार राज रस्तोगी said...

ऐसा ज़ोरदार तमाचा अगर हर नागरिक रसीद करता तो आज स्तिथि कुछ और ही होती समाज की |

कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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