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Saturday, August 27, 2011

डॉ. अमर.....मेरी नज़र से.

       डॉ. अमर के निधन की खबर पढ़कर पहली बार इस वर्चुअल दुनिया में कहीं गहरे तक असहज हो उठा। ऐसा पहली बार हुआ कि जिनसे मैं प्रत्यक्ष न कभी मिला न कभी आमने सामने देखा लेकिन उनके निधन की खबर से भीतर तक बिंध गया। उस दिन सुबह काफी देर तक अनमने रहने के बाद धीरे धीरे सामान्य क्रियाकलापों में लग गया लेकिन मन अब भी डॉ. अमर के बारे में सोच रहा था। उनसे हुई मीठी नोक-झोंक, तीखे तंज, उनकी टिप्पणियों में मिलने वाली एक अलग किस्म की बेबाकी।


          टिप्पणियां तो खैर वे काफी पहले से मेरे ब्लॉग पर यदा कदा देते रहे थे, मैं भी उन्हें पढ़ता रहता था लेकिन दिसंबर 2008 में कुछ ऐसा घटा कि मैं उनसे खुलकर हंसी ठिठोली करने लगा। उन्हें मस्त अंदाज में पढ़ने लगा।  दरअसल दिसंबर 2008 का  यह वह दौर था जब लोगों ने अपने ब्लॉग पर ताले लगाना शुरू किया था। ताले से तात्पर्य 'राइट क्लिक प्रोटेक्टेड' जिससे कि कोई उनके ब्लॉग पर से कॉपी पेस्ट न कर सके। अमर जी ने भी अपने ब्लॉग पर ताला लगाया था जिससे चिट्ठाचर्चा के दौरान अनूप जी वहां से कापी पेस्ट न कर पाते थे। मौज लेते हुए अनूप जी ने  चिट्ठाचर्चा में  लिखा कि -

    कापी प्रोटेक्टेड का चलन अभी कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। डा.अमर कुमार, प्रत्यक्षा और अन्य तमाम साथी भी जिनका लिखा कभी कापी करके सबको पढ़ाने का मन करता है वह सब ताले में बंद है।


   डा.अमरजी, कित्ता तो फ़न्नी बात है कि फ़ौज के युद्दाभ्यास की फोटो कहीं न कहीं से लाकर आप अपने ब्लाग पर सटा दिये और उस पर अपना ताला लगा दिये। कहीं कोई चुरा न ले। ये वैसा ही है भाई जान कि आप खलिहान से अनाज लाकर अपनी बखारी में जमा करके उस पर अलीगढ़ी ताला सटा दिये।
मुझे दूरगामी परिणाम पता नहीं लेकिन अगर आप सच में चाहते हैं कि हिंदी का प्रचार-प्रसार हो तो आपको अपना लिखा सब कुछ सबके लिये सुलभ रखना चाहिये।


     उनके इस पोस्ट पर कॉपी प्रोटेक्शन को लेकर लंबी बहस हुई और उसी दौरान मैंने कमेंट किया -

सतीश पंचम said... @ December 07, 2008 10:41 AM

अपने लिखे को प्रचारित-प्रसारित करने के लिये Microsoft की Policy अपनानी चाहिये, जितना ज्यादा नकल होता है, पायरेटेड सॉफ्टवेर बनता है बनने दो, जाने-अनजाने वह Microsoft का ही प्रचार कर रहे हैं और उससे जुडे हैं। अपने सॉफ्टवेर की लोगों को इतनी आदत डाल दो कि क्या पायरेटेड और क्या ओरिजिनल सब एक बराबर, जिसके बिना लोगों का काम न चले। यही वह पॉलिसी रही जिसके कारण आज ज्यादातर कम्प्यूटर Microsoft based हैं।

हाँ थोडा कंट्रोल जरूरी है ताकि कोई आपके लिखे को सीधे-सीधे अपने नाम से न छाप डाले।


उसके बाद अमर जी का अपने ब्लॉग पर की गई तालाबंदी को लेकर कमेंट आया

डा. अमर कुमार said... @ December 07, 2008 12:18 PM

ताले का कोई महत्व भी होता है क्या ? मैं स्वयं ही नहीं जानता, फिर भी यह लगा तो है, ही ?

सही है, क्या लेकर आये हैं, क्या लेकर जायेंगे .. और मैं तो अपना सबकुछ लगभग दान कर चुका हूँ !


अब तो समेटने की तैयारी है , फिर ?
फिर.. बीते हुये समय और श्रम को लौटाया तो नहीं जा सकता, न ?
पर, यही मेरे कुछ तो है, के साथ हो चुका है..
कैसा लगता है, जब आप एक दिन सुबह उठ कर पाते हैं,
कि आपके अपने ब्लाग का एडमिनिट्रेटिव प्रिविलेज़ आपके पास है ही नहीं !
आप अपना ही कुछ भी एडिट कर सकने में अक्षम हैं, तो ?
......

.....

     आगे भी यह बहस लंबी चली जिसमें सभी ने कुछ न कुछ योगदान दिया। लेकिन डॉ साहब ने मुझे चौंका दिया जब उन्होंने मेरी बात को मुझ पर ही बूमरैंग करते हुए मेरी एक पोस्ट को अपने ब्लॉग पर छापते हुए लिखा -

 
अब ढूँढ़िये, इसका मूल लेखक ?
यदि आप जागरूक पाठक हैं, तो पहचान ही जायेंगे..
इस पोस्ट के मूल लेखक को… नहीं पहचाना ? कोई बात नहीं., फिर तो..
यह रचना मेरा हिन्दी के प्रसार में योगदान माना जाये


      उस पोस्ट की टिप्पणियों में कुछ लोगों ने उसे अमर जी की ही पोस्ट माना और तब अमर जी ने मेरी Microsoft पायरेटेड Policy वाली टिप्पणी के एवज में हंसी ठिठोली करते लिखा -


@ भाई सतीश पंचम जी,


अब कुछ कुछ समझ आ रहा है, भाई जी ?
अब तक के 50% आगंतुक इसे मेरी पोस्ट होने का श्रेय दे रहे हैं,


       दरअसल इस कॉपी पेस्ट के जरिये अमर जी ने बताया कि कैसे लोग किसी के लिखे को अपने नाम से छाप सकते हैं, ऐसे में ज्यादा नहीं तो कुछ तो अपने से उपाय करना चाहिये कि ब्लॉग कंटेट लेखक के नाम ही बना रहे। इस घटना से पता चलता है कि अमर जी लेखन और उसके स्वामित्व को लेकर कितने संजीदा थे।
 
     इस घटना के बाद मैं उन्हें और पढ़ने लगा। कई बार उनके लिखे में एब्सट्रैक्ट भी होता था। यदा कदा अमूर्त तत्वों की बहुलता की वजह से उनके कुछ लेख मुझे कम समझ में आते लेकिन अच्छा लगता था उन्हें पढ़ना। वैसे भी उनकी टिप्पणियां अलग तरह की होती थीं। अरविन्द मिश्र जी ने उन्हें ब्लॉगजगत का एक तरह से स्फिंक्स कहा है और काफी सही कहा है। उनकी टिप्पणियाँ अपने बेबाकी के लिये जानी जाती हैं। कभी उनमें तंज होता, कभी मीठी झिड़की तो कभी उत्साह बढ़ाने वाली बातें भी।

  खैर, विधि को यही मंजूर था। उनका हमारा साथ यहीं तक लिखा था।ईश्वर उनकी आत्मा शान्ति दे और परिवार को इस हादसे से उबरने की शक्ति.

अंत में डॉ अमर की एक टिप्पणी का अंश जिसे उन्होंने चिट्ठाचर्चा पर लिखा था जिसे पढ़ते हुए लगता है जैसे डॉ अमर अब भी हमारे बीच हैं -


अब आपलोग चलिये.. चलिये,
ऎसा कुछ नहीं हुआ है..
आप सब अपने अपने ब्लाग पर चलिये
जाकर कुछ सार्थक लिखिये-पढ़िये..
लंतरानी फ़ेंक कर टिप्पणी बटोरने का मोह छोड़िये ।
चर्चित न हुये, तो क्या आपके ब्लाग का अस्तित्व मिट जायेगा ?
अग़र अपना ही मोहल्ला शरीफ़ न हुआ,
तो टिप्पणीकार ब्लागर को सतायेगा
और चर्चाकार ? वह बेचारा अल्ल्सुबह ताला-पुराण लिखेगा,
उसकी भी मज़बूरी समझें, वह स्वांतः सुखाय टाइम खोटी कर रहा है..
हर ब्लागर और हर पोस्ट को शामिल किये जाने की अपेक्षा ही क्यों की जाये ?
बस, जाकर कुछ ऎसा उछालिये, कि आप भी चर्चा में दिखें..
बस्स, यही तो ? सो, चलिये चलिये.... मौज़ मत लीजिये
अपने अपने ब्लाग पर जाकर पोस्ट लिखिये !

---------------------

- सतीश पंचम

12 comments:

आशीष श्रीवास्तव said...

ऐसा पहली बार हुआ कि जिनसे मैं प्रत्यक्ष न कभी मिला न कभी आमने सामने देखा लेकिन उनके निधन की खबर से भीतर तक बिंध गया।

मेरे साथ भी ऐसा पहली बार ही हुआ !

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

उफ़्फ़्‌....! यह दुखद समाचार तो मैं अभी-अभी आपकी पोस्ट से ही जान पाया हूँ।

डॉ.अमर हिंदी ब्लॉगजगत के कबीर थे। फक्कड़ भाषा लेकिन गहरे अर्थों वाली।

उन्हें हमारा प्रणाम। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

इस दुखद समाचार के बाद बहुत से ब्लॉगरों की हालत कुछ आप सरीखी ही है। जिसने कभी डॉ. साहब को देखा, सुना नहीं, वह भी उन्हें मिस कर रहा है।

Arvind Mishra said...

अग्रीगेटर में इस पोस्ट की सूचना देखी तो सहसा यही लगा कि लो एक और आ गयी डॉ.अमर पर ..मगर आपकी यह पोस्ट पढने पर सहज ही यह अहसास हो गया कि कितनी पीड़ा और अंतर्मंथन के बाद यह निःसृत हुयी है ....और बेशकीमती संस्मरण -इनपुट लेकर आयी है -जाहिर है वे टिप्पणियों पर माडरेशन के खिलाफ थे,मगर लेखकीय अधिकारों के प्रति सजग थे -यह सचमुच बहुत महत्वपूर्ण बात है!
यह उनका स्फिंक्सपना ही है कि आज उन पर कितने ही ब्लॉगर अभिव्यक्त होने को तत्पर हो उठे हैं ....कहीं कुछ अनजाना पण भी हमें उकसाता है ,उद्वेलित करता है ...
मैं मानस की यह पंक्ति पुनः उद्धृत करना चाहता हूँ -कैसा था उनका व्यक्तित्व ?-
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे अर्थ अमित अति आखर थोरे ....
एक साथ ही सुगम किन्तु कुछ अगम भी,मृदु ही नहीं कहीं कहीं कठोर भी (एक ब्लॉगर को तो उन्होंने लखनऊ में निपट लेने की धमकी तक दे दी थी जब उसने राष्ट्रध्वज का अपमान कर दिया था )..कभी कभी गहरी बात बहुत कम शब्दों में कर जाते थे (अर्थ अमित अति आखर थोरे )
मैं तो अभी भी सदमें से नहीं उबार पाया लोग बाग़ कितने प्रक्टिकल हैं ,बहारों की तोह लेने लग गए हैं ! :(
विनम्र श्रद्धांजलि !

रचना said...

डॉ अमर किसी भी मठ {ब्लोगिंग } के सदस्य नहीं थे और पढते थे ब्लॉग किसी का भी कभी भी . उनके कमेन्ट किसी ग्रुप के नहीं होते थे . जब भी मुद्दा रहा उन्होने वाद विवाद किया और करते रहे . ना जाने २००७ से लेकर अस्वस्थ होने तक उन्होने कितने मुद्दों पर बहस की हैं पर केवल एक ब्लॉगर बन कर .
जैसे जैसे बिमारी बढी उनके कमेन्ट में बदलाव आया , वो बहुत भावुक होते गए . उनके अन्दर का वाद विवाद धीरे धीरे कैंसर की भेट चढ़ गया .
उनको मुक्ति मिले और वो जहां भी दुबारा जनम ले अपना जीवन पूर्णता से जिये
मै यही कामना करती हूँ .
ॐ शांति शांति शांति

रचना said...

डॉ अमर जैसे व्यक्ति ने भी एक बार अपने सारे कमेन्ट एक ब्लॉग से मिटा दिये क्यूँ कह नहीं सकती पर १०० से ज्यादा कमेन्ट अलग अलग पोस्ट पर मिटाना कुछ तो कारण रहा ही होगा . ना जाने क्यूँ मुझे आप सबका इस प्रकार उनके कमेन्ट को सहेजना सही नहीं लग रहा हैं . क्युकी उनके कमेन्ट जहां हैं वहा इन्टरनेट उसको सहेजे ही हुए हैं पर इस को मेरी व्यक्तिगत पसंद /न पसंद समझे आक्षेप नहीं क्युकी याद करने और याद भुला कर मुक्त कर ने के सबके अपने तरीके हैं

प्रवीण पाण्डेय said...

जल और वायु को कौन बाँध सका है, साहित्य की सरलता और तरलता इसी रूप में बना रहे।

rashmi ravija said...

ब्लॉग जगत उनकी प्रखर टिप्पणियों को हमेशा ही मिस करता रहेगा...

डॉ. मनोज मिश्र said...

विनम्र श्रद्धांजलि !

दिगम्बर नासवा said...

श्रधांजलि है डाक्टर अमर को ... बहुत देर तक यद् किये जायंगे वो अपनी विशिष्ट शैली के कारण ...

संतोष त्रिवेदी said...

डॉ. अमर कुमार को मैं उनके आखिरी दिनों में जान पाया और मिल भी पाया.कोई छः महीने पहले हमारा उनका संपर्क उनकी टीप द्वारा हुआ था.चूंकि वे हमारे ही जनपद के थे ,सो लगाव और गहरा हो गया.कई बार दूरभाष पर वार्ता हुई और इसी बारह अगस्त को मैं उनसे पहली और आखिरी बार मिला था.
बहुत भावुक इंसान और अनूठे ब्लॉगर थे वो.अपने लेखों से ज्यादा वे अपनी 'मारक-टीपों'के लिए जाने गए.उनने लिखने से ज्यादा एक रिश्ता कायम करने में ज्यादा विश्वास किया.
उनकी स्मृति को शतशः नमन !

अनूप शुक्ल said...

डा.साब का जाना बहुत तकलीफ़देह है। एक बेहतरीन इंसान होने के साथ-साथ वे ऐसे ब्लागर थे जिनकी किसी भी से बिना यह सोचे सहमत-असहमत हुआ जा सकता था कि वे इसको किस तरह लेंगे।

ब्लागजगत से जुड़ी तमाम यादे हैं। चिट्ठाचर्चा के मामले में तो उनकी भूमिका एक मास्टर सरीखी थी। कुछ दिन चर्चा न करने पर वे ऐसे टोकते थे जैसे मास्टर लोग बच्चों को होमवर्क न करने पर टोंकते हैं।

उनकी स्मृति को नमन!

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