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Monday, August 15, 2011

बिछड़े सभी बारी बारी........

          मुंबई के फोर्ट इलाके में स्थित है डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा पुरानी लाइब्रेरी J.N.Petit. सन् 1856 में बनी इस ऐतिहासिक लाइब्रेरी को मूलत: पारसी समुदाय के कुछ अध्ययन प्रेमी लोगों ने शुरू किया था। गोथिक कला शैली में बनी इस खूबसूरत इमारत के हर हिस्से में जैसे एक कलात्मक बौद्धिकता सी नज़र आती है। कुछ हिस्से तो ज्यों के त्यों अपनी मूल शैली में इतिहास को जैसे थामें हुए हैं। यहां लगे पुरानी शैली के पंखों को देख लोग एकाएक उन दिनों में पहुंच जाते हैं जब पंखों का लगना बस शुरू ही हुआ था। आम पंखे हों तो समझा भी जा सकता है लेकिन रीडिंग रूम की सीलींग ही तीस फूट उंची है और वहां से जो पंखे नीचे की ओर छड़ के जरिये लटकते हैं तो कुछ अलग ही अनुभव होता है । पिछले छह सात सालों से मैं इस लाइब्रेरी में अक्सर रविवार या शनिवार के दिन पठन-पाठन के लिये जाता हूं। आसपास ढेरों बच्चे दिखते हैं जोकि IAS, PCS, MBA, CA... आदि की तैयारी करते दिखते हैं। कुछ लेखक भी कभी-कभी नजर आते हैं जो फर्रे दर फर्रे लिखे जा रहे होते हैं तो कुछ लोग केवल पढ़ने के लिये शांत माहौल की ललक में वहां लगी तिरछी आराम कुर्सीयों पर लेटे नजर आते हैं। जब थक जाते हैं तो आंखें बंद कर सो भी जाते हैं। कोई रोक टोक नहीं। हां, शांत रहने की शर्त जरूरी है। यदि किसी का शोर हो सकता है तो केवल कबूतरों या चिड़ियों का वरना तो सभी अपने अपने में मस्त पठन पाठन में जुटे दिखते हैं।


        कल दोपहर मैं वहीं था। शनिवार- रविवार की छुट्टी के कारण मन हुआ कि कुछ लिखा जाय। लेकिन बच्चों की भी छुट्टियां थी तो घर में थोड़ा सा टिन्न पिन्न होने का अंदेशा था। सो मन हुआ चलूं अपनी उसी लाइब्रेरी में। वैसे भी एक महीने से ज्यादा हो गया था वहां गये। वहां के शांत माहौल में लिखना अच्छा भी लगता है। एक दिक्कत यह है कि अब  कुछ लिखना होता है तो सीधे लैपटाप पर लिखता हूं लेकिन पेटिट लाइब्रेरी के रीडिंग हॉल में लैपटाप के लिये पावर कनेक्शन नहीं है। वहां जो कुछ लिखना होता है  केवल पेपर कलम के जरिये ही लिखा जा सकता है। अच्छा है। कहीं तो ऐसी जगह बची है जो मोबाइल, लैपटाप आदि के टिकटिम्मे से दूर ले जाती है।

       तो रविवार वहीं अपनी धुनि रमाई। लिखने बैठा तो कुछ सूझे ही नहीं। हांय, ये क्या हो रहा है। थोड़ा सा अपने पुराने लिखे संदर्भ को देखा और फिर उससे तारतम्य बिठाते हुए अगली कड़ी लिखने की सोचा लेकिन कलम बढ़े ही नहीं। समझ ही नहीं आ रहा था। सोचा आंख बंद कर थोड़ा तिरछी वाली आराम कुर्सी पर लेट जाउं तो कुछ बात बने लेकिन आठ दस मिनट बाद भी कुछ बात नहीं बनी। जी उचट गया। मन हुआ थोड़ा गेटवे ऑफ इंडिया की तरफ पैदल हो आउं तो कुछ आइडिया आये लेकिन बाहर हो रही बारिश के कीच काच में जाने का मन नहीं किया। अब क्या हो। थोड़ी देर बैठे बैठे ख्याल आया कि अपने बैग में बहुत दिन से बिमल मित्र की किताब लिये घूम रहा हूं लेकिन पढ़ नहीं पा रहा। उसे ही देखता हूं। क्या पता मन लग जाय। झटपट बैग से वह किताब निकाली - बिछड़े सभी बारी बारी। किताब के कवर पेज पर गुरूदत्त की वही चिरपरिचित मुस्कान वाली तस्वीर थी। एक नजर कवर पेज पर डाल अंदर पढना शुरू किया तो देखा वाणी प्रकाशन वालों ने लिखा है कि - वाणी प्रकाशन का लोगो मशहूर चित्रकार एम एफ हुसैन ने बनाया है। अच्छी बात है। एम एफ हुसैन ने बनाया है तो और अच्छी बात है लेकिन यह बताने बुताने वाली बात कुछ समझ नहीं आई , खैर अपने अपने मार्केटिंग फंडे हैं। ऑथेंटिसिटी बरकरार रखने की छटपटाहट है। अपने को क्या........ पढ़ने से मतलब चाहे लोगो एम एफ हुसैन ने बनाया हो या लल्लू सिंह 'छटांक' ने।

       किताब को पढ़ना शुरू किया....एक पन्ना...दो पन्ना.....तीन पन्ना....आगे आगे और देखते देखते अस्सी फर्रे पढ़ डाले। इतने बेहतरीन अंदाज में बिमल मित्र ने गुरूदत्त के जीवन, उनके पारिवारिक जिंदगी, फिल्मों के प्रति दीवानगी आदि के बारे में लिखा है कि मुझे वह किताब छोड़ते न बनी। बड़ी ही रोचकता से बिमल मित्र ने गुरूदत्त से अपनी किताब 'साहब, बीबी और गुलाम' को लेकर मुलाकात का जिक्र किया है कि कैसे वो पाली हिल के अपने बंगले पर लुंगी और कुर्ते में मिले, कैसे वो उसी लुंगी और कुर्ते में गाड़ी चलाते लोनावला तक ले गये। कैसे वहां पर स्क्रिप्ट लिखी गई, रात रात भर गुरूदत्त के जागते रहने, किसी को बिठाकर बोलते बतियाते रहने का शौक आदि पर विस्तार से चर्चा की गई है इस किताब में।
गीता दत्त

          एक जगह बिमल मित्र लिखते हैं कि गुरूदत्त अपनी पत्नी गीता दत्त से गाना बंद करके घर गृहस्थी संभालने के लिये कहते थे जबकि गीता दत्त चाहती थीं कि वह पहले की तरह गाना गाती रहें। गुरूदत्त का तर्क था कि अब जब इतना पैसा आ गया है, करोड़ों रूपये बन गये हैं, बंगला है तमाम एशो आराम है तो गीता क्यों गाना गाना चाहती है। कायदे से घर गृहस्थी क्यों नहीं संभालती। इन बातों को पढ़ मुझे याद आ रही है एक इंटरव्यू की जिसमें कि तबस्सुम से किसी ने कहा था - एक औरत या तो अच्छी बीवी हो सकती है या फिर अच्छी एक्ट्रेस लेकिन दोनों एक साथ नहीं हो सकती।

      बहरहाल गीता और गुरूदत्त में आपसी कलह बढ़ता गया। जिसका असर था कि गुरूदत्त अपनी नींद खो चुके थे। रात रात भर जागते रहते। किसी को बोलने के लिये ढूंढते रहते ताकि उससे बातचीत कर समय बीतायें। ऐसे में बिमल मित्र ने कई बार उनका बातचीत में साथ दिया था। उधर दोनों के बीच टकराव केवल इन्हीं बातों को लेकर नहीं बल्कि और भी बातों को लेकर होता। वहीदा रहमान भी उन्हीं झगड़ों का कारण बनतीं थी। गुरूदत्त कहते थे कि इस लड़की वहीदा को उन्होंने स्टार बनाया है वह भी तब जब सभी लोगों ने उसके चयन पर बहुत ताने कसे थे, उसे साधारण नाक-नक्श और काम वाली बाई के समकक्ष ठहराया था, तब उन्होंने जोखिम लेकर इस लड़की को काम दिया। उसे आगे बढ़ाया। लेकिन शको-शुबहा ने तमाम गृहस्थी को गृहण लगा दिया है। ऐसे में बिमल मित्र ने उनसे सहानुभूति पूर्वक बातें की, गीता और गुरूदत्त के बीच कुछ बीच का रास्ता निकालने की सोची लेकिन बात बिगड़ी चली जाय। गुरूदत्त ने बिमल मित्र से कहा भी कि मैं गीता को अपनी फिल्मों में पार्श्वगायन के लिये काम तो दे ही रहा हूं लेकिन वो पूरी तरह से गायन में रम जाना चाहती है जो कि गृहस्थी के लिये ठीक नहीं। यह देख अमिताभ और जया की अभिमान फिल्म याद आ रही है।


गुरूदत्त

       खैर, आगे बिमल मित्र ने बताया कि कैसे गुरूदत्त ने पाली हिल में एक लाख में बहुत बड़ा बंगला खरीदा था, कैसे उसे सजाया संवारा था और कैसे पारिवारिक कलह से उबकर, कलह के प्रतीक उस बंगले को मिस्त्रीयों द्वारा पूरी तरह तुड़वा दिया। इसी बीच एक बात का जिक्र है कि बंगाल में आउटडोर शूटिंग के दौरान गाँव की लड़की का रोल करने के लिये गीता दत्त को जब साधारण साडी दी गई और मेकअप कम करने के लिये कहा तो दोनों में इसी बात को लेकर कलह फिर हुई । गीता शूटिंग में देर कर रही थी और गुरूदत्त देर बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। आउटडोर के कारण बारिश हो सकती थी, बादल घिर सकते थे, लाइट में कमी हो सकती थी, ऐसे तमाम कारण हो सकते थे कि शूटिंग में सही अनुपात न बैठता। इसी बीच अपने मैले कुचैले कपड़ों के कास्टयूम को देख गीता ने ताना मारा कि तुम मुझे वहीदा से कम अच्छा दिखाना चाहते हो, बस गुरूदत्त को बात लग गई। व्हिस्की पर विहिस्की चढाये चले गये, लापरवाही शुरू कर दी। बिमल लिखते हैं कि गुरूदत्त यूं तो खाने में पान्ताभात ( बासी चावल और पानी), लप्सी, लइया खाने के शौकीन हैं, सबसे प्रेम से व्यवहार करते हैं, मिलते जुलते हैं लेकिन सेट पर पूरी तरह से प्रोफेशनल होकर काम करते हैं। उस समय वो पति नहीं होते, न मित्र होते हैं, वो सिर्फ एक डायरेक्टर होते हैं, लेखक, प्रोडयूसर होते हैं और अपने पेशे के काम में पूरी निर्दयता से पेश आते हैं। इन्हीं सब बातों का असर था कि गुरूदत्त कटे कटे से रहते। कुछ न कुछ सोचा करते। उधर बिमल मित्र गीता दत्त से बात कर उन्हें भी समझाते थे कि इस तरह कैसे काम चलेगा।

      ऐसी ही कई ढेर सी बातों, विवादों, शूटिंग के दौरान चुहलबाजीयों आदि का जीता जागता दस्तावेज है यह किताब। गुरूदत्त द्वारा आत्महत्या की खबर, उससे जुड़ी यादें आदि काफी अलग अंदाज में लिखी गई हैं इस किताब में।  इसी में बिमल मित्र ने जिक्र किया है कि कैसे मद्रास में बिमल मित्र के नाम से नकली किताब लिखकर किसी बंदे ने एक दुल्हन को किताब भेंट की थी। आप भी हो सके तो इस किताब को जरूर पढ़ें। किकी हों तो भी, अन-किकी हों तो भी। वाणी प्रकाशन द्वारा पब्लिश हुई इस किताब का दाम ज्यादा ज्यादा नहीं, मात्र सौ रूपये है।

बिमल मित्र

किताब का एक अंश देखिये -

बिमल मित्र परिवार की कलह पर बतियाते हुए गुरूदत्त से कहते हैं -

- मियां बीबी में तकरार कहां नहीं होती ? किनके बीच नहीं होती ? जरा टॉलस्टॉय की जिंदगी याद करें। अब्राहम लिंकन की जिंदगी देखे। सुकरात की जिंदगी के बारे में सोचें।


मैं बारी बारी से इन सभी लोगों की जिन्दगी दुहरा गया। गुरू भौंचक्का -सा सुनता रहा। उसके बाद, मैंने उसे आखरी चोट दी।


मैंने उसे अपने बारे में बताया - आपको यह सुनकर अचरज होगा। हम मियाँ-बीवी में भी बीच बीच में मल्लयुद्ध छिड़ता है! जबरदस्त मल्लयुद्ध !

गुरू एकबारगी अचकचा गया। उसे जैसे कहीं उम्मीद की किरण नजर आई।

आप दोनों के बीच भी झगड़ा होता है ? उसने सवाल किया ।

हाँ होता है ! दुनिया के सभी पति-पत्नी के बीच झगड़ा होता है।

गुरू कुछ देर सोच में डूब गया

थोड़ा ठहरकर उसने कहा - मेरा ख्याल है मैंने वर्किंग गर्ल से शादी की है इसलिये यह हाल है।

    नहीं ! दो इन्सान जिन्दगी भर एकमन-एकप्राण रहें, यह क्या आसान बात है ? झगड़े झमेले नहीं होंगे ? अरे, झगड़ा तो स्वस्थ प्रेम का लक्षण है। आपस में झगड़ा न हो, तो समझना चाहिये कि रिश्ते में कहीं कोई मिलावट है, बनावटीपन है, झूठ है।


 - सतीश पंचम

12 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

इन पक्षों को पहली बार जाना, बहुत कुछ सोचने को प्रेरित करता यह घटनाक्रम।

अल्पना वर्मा said...

इस पोस्ट को पढ़ने के बाद ..इस किताब को पढ़ने की इच्छा है.

कविता रावत said...

गीता दत्त , गुरु दत्त और विमल मित्र जी के बारे भी बहुत बढ़िया जानकारी पढने को मिली..,इसके लिए आपका बहुत बहुत आभर!

Arvind Mishra said...

पहली बात तो क्या लिखने के लिए इतने ताम झाम की जरुरत सचमुच है ? अभिजात्य लेखन :)
बिमल मित्र एक सधे लेखक थे -मैं समझ सकता हूँ किस रो में वे बहा ले गए होंगे आपको ?
आखिर इस औरत नाम की चीज को चाहिए क्या -आखिर गुरुदत्त की जिंदगी लेकर ही जुल्मी शांत हुई!

नीरज गोस्वामी said...

ये किताब मेरी भी निजी लाइब्रेरी में है...जब मन करता है फिर से उठा कर पढने लगता हूँ...गुरुदत्त पर बेहतरीन किताब है...

नीरज

Rahul Singh said...

कागज के फूल सा प्‍यासा जीवन.

सतीश पंचम said...

@ पहली बात तो क्या लिखने के लिए इतने ताम झाम की जरुरत सचमुच है ?

----------

अरविंद जी,

हमेशा तो नहीं लेकिन कभी-कभी मैं इस तरह का एकांत ढूंढकर पठन पाठन करता हूं, अपनी किकीयाने की खुराक वहीं पूरी करता हूं :)

अनूप शुक्ल said...

रोचक पोस्ट!

काफ़ी चीजें नई थीं हमारे लिये।

ब्लाग जगत में झगड़े-फ़साद के नाम पर दुखी होने वालों को यह समझना चाहिये :
अरे, झगड़ा तो स्वस्थ प्रेम का लक्षण है।

वाणी गीत said...

थोड़े बहुत झगडे मन के मेल को साफ़ करते हैं , झगड़ते समय वे सब बातें बाहर आ जाती हैं , जिन्हें हम कहने से बचते हैं ...
लेकिन यह समझने की बात है की झगडा सार्वजानिक स्थानों पर होकर रिश्तों की कमर ही ना तोड़ दे ...

हमेशा सोचती थी यही , और वाणी प्रकाशन ने अपनी पुस्तक में विमल मित्र के हवाले से लिख ही दिया ...
गुरुदत्त के बारे में किश्तों में बहुत कुछ पढ़ा है , इस पुस्तक में एक साथ विस्तृत जानकारी की खबर साझा करने के लिए आभार !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

शुक्रिया मित्र! यह पोस्ट पढकर न जाने क्या-क्या याद आ गया।
- अमेरिका का पहली जनता पुस्तकालय भी उन्हीं दिनों (1848) में बना था।
- बरेली में हमारा घर वह आखिरी घर था जिसमें डीसी बिजली थी। एसी आने पर भी वे बडे सीलिंग फ़ैन जिनमें धुरी घूमती थी, जुगाड से चलाये जाते रहे थे
- अटल बिहारी वाजपेयी की पंक्तियाँ हैं, "जो जितना ऊँचा, उतना एकाकी होता है, हर भार को स्वयं ढोता है"
- तबस्सुम के पिता क्रांतिकारी पं. अयोध्यानाथ एचएसआरए के सदस्य थे।
- लल्लू सिंह छटांक को आज़ादी भारत के बाहर उस देश में दिखाई दी जहाँ उनके "टाइप" की चित्रकला गम्भीर धार्मिक हो सकती थी
- और पूर्वजन्म की कई यादें भी ...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

* गम्भीर धार्मिक अपराध हो सकती थी

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत यथार्थ परक और संग्रहनीय याद की पोस्ट,आभार.

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