सफेद घर में आपका स्वागत है।

Saturday, August 13, 2011

शानदार रही बम्बईया - 'कथा'

सई परांजपे
             महिला निर्देशिका सई परांजपे द्वारा 1983 में निर्देशित एक फिल्म आई थी 'कथा'। बेहद साधारण कहानी, बेहद आम लोकेशन पर फिल्माई गई फिल्म थी कथा। नसीरूद्दीन शाह, फारूख शेख और दीप्ति नवल के इर्द गिर्द बुनी गई इस फिल्म को आज सुबह ही देखा। बहुत पहले इसे टीवी पर देखा था लेकिन ब्लैक एण्ड वाइट में। तब दूरदर्शन पर केवल शाम का प्रसारण आता था और उसी दौरान इस तरह की फिल्में प्रदर्शित होती थीं। तब हम बच्चे इस तरह की फिल्मों को देखते ही नाक-भौं सिकोड़ते थे। एक तो हफ्ते में एक ही हिन्दी फिल्म देते हैं और वह भी ऐसी जिसमें न अमिताभ बच्चन है न विनोद खन्ना। तब ऐसी फिल्मों का असल स्वाद न पता था। अब जाकर हम उन्हीं फिल्मों को देखते हैं तो पता चलता है कि कितनी शानदार फिल्में थीं।

            कथा फिल्म में  मुम्बई की एक चॉल में रहने वाला साधारण सा क्लर्क है राजाराम ( नसीरूद्दीन शाह). उसकी इच्छायें बहुत बड़ी बड़ी नहीं है, साधारण कपड़े पहनता है, साधारण सा रहता है। दूसरे लोगों की मदद करने में हमेशा आगे रहता है। ऑफिस से जाते आते सरकारी बस में धक्के खाता है लेकिन जैसे ही पता चलता है कि बॉम्बे हॉस्पिटल में किसी को ओ-नेगेटिव खून चाहिये, तुरन्त टैक्सी पकड़ कर बॉम्बे हॉस्पिटल भागता है कि उसका खून ओ-नेगेटिव है और यह बहुत कम लोगों के पास है। पास पड़ोस में जिसे भी जरूरत पड़ती है वह मदद ही करता रहता है। राजाराम की ही पड़ोसन है संध्या ( दीप्ति नवल) जिसे कि राजाराम बहुत चाहता है लेकिन कह नहीं पाता। संध्या के घर में कभी साबूदाने के वड़े या पकौड़ी आदि बनते हैं तो संध्या के पिता थोड़ा सा राजाराम के यहां भी भिजवाते रहते हैं, उनका मन होता है कि राजाराम को अपना दामाद बनाउं।

दीप्ति नवल
    उधर संध्या राजाराम से थोड़ा तेज है, चपल है। उसकी इच्छा है कि उसका दुल्हा स्मार्ट होना चाहिये, अच्छा दिखना चाहिये। अब साधारण सा क्लर्क राजाराम अपने में वो सब बातें कहां से लाये। सो मन ही मन अपनी बात को रखे रहता है। इधर संध्या को गुड़हल का फूल बहुत पसंद है। हमेशा अपने बालों मे एक गुड़हल का फूल लगाये रहती है। राजाराम ने तो चुप्पे से एक गुड़हल का फूल अपनी किताब में भी दबा लिया, भले ही वह सूखकर लाल से काला क्यों न हो गया लेकिन प्यार तो प्यार है।

फारूख़ शेख
             इसी तरह की जिंदगी चल रही होती है कि एक दिन राजाराम का बेहद चालू दोस्त बाशुदास ( फारूख शेख) आता है। अच्छे-अच्छे कपड़ों का शौकीन, फितरत से जुगाड़ू और चालाक किस्म का बाशुदास राजाराम के सीधेपन का लाभ उठाने की सोचता है। उसके यहां ही रहने लगता है। राजाराम भी मना नहीं करता। स्वभाव ही ऐसा है। इधर राजाराम काम पर गया नहीं कि बाशु अपने अच्छे कपड़ों, शातिराना लहजे में आस पड़ोस के लोगों से मेल-जोल बढ़ाना शुरू करता है। चाल में रहने वाले आस पास के लोग भी बाशु से प्रभावित होते हैं। इसलिये और कि राजाराम जैसे विश्वासी आदमी का मित्र है, अच्छे कपड़े पहनता है, मीठी बातचीत करता है तो इससे क्या परहेज। पड़ोसी उसे अपने घर ले जाते हैं, उसकी खातिर तवज्जो करते हैं। बाशु उन सबसे बड़ी बड़ी बातें करता है, अपने आप को किसी दिवान का बेटा बताता है और वो तमाम तिकड़में करता है जिससे कि खानदानी रइस लगे। लोग उसे अपने चॉल में पाकर खुश होते हैं कि इतने बड़े खानदान का लड़का हमारे झोपड़ों-चॉलों में रहने आया है।

         बाशु के बातचीत से, उसके कपड़ों आदि से संध्या प्रभावित हो जाती है। चूंकि राजाराम के घर में संध्या कभी कभार कटोरी लेने, चाय देने के लिये आती रहती है तो बाशु उसपर डोरे डालना शुरू करता है। दोनों में निकटता बढ़ती है। इधर राजाराम अपनी जिंदगी में रमा रहता है। वही ऑफिस, वही घर। लोगों की मदद भी रह रहकर करता ही रहता है। एक दिन बाशु से राजाराम कुछ नौकरी करने के लिये कहता है ताकि कुछ उसका भला हो। सुनकर बाशु जुगत में लग जाता है। यह जानकर कि राजाराम का बॉस गोल्फ में बहुत दिलचस्पी लेता है बाशु किताबों से गोल्फ के बारे में हल्की फुल्की जानकारी लेता है और जा पहुंचता है वहीं जहांपर कि राजाराम का बॉस गोल्फ खेला करता है। वहां जाकर जुगाड़ु बाशु बॉस को अपनी बातों में फांसता है और अपने आप को इंग्लैंड रिटर्न और न जाने क्या क्या बता कर इम्प्रेस करने में कामयाब होता है। राजाराम का बॉस उसे अपने घर इन्वाइट करता है। वहां पता चलता है कि बॉस की यह दूसरी बीवी है और पहले वाली से एक बेटी है। सौतेली मां बेटी में उम्र का ज्यादा फासला नहीं है। पहली नज़र में ही बाशु भांप जाता है कि बॉस की बीवी बॉस से खुश नहीं है और कुछ दिलफेंक है। सौतेली बेटी तेज जरूर है लेकिन उसे भी पटाया जा सकता है। उधर राजाराम का बॉस बाशु से प्रभावित हो उसे नौकरी पर रख लेता है। अब राजाराम और बाशु दोनों एक ही ऑफिस में काम करते हैं लेकिन बाशु ऑफिस में राजाराम से इस तरह व्यवहार करता है जैसे दोनों पहली बार मिले हों। राजाराम भांप तो जाता है कि यह आदमी तिकड़मी है लेकिन दोस्त की नौकरी का सवाल था इसलिये चुप रहता है।

       इधर बाशु का दूसरा सिलसिला शुरू होता है। चॉल में रहकर वह संध्या को पटाता है, बॉस के यहां जाकर उसकी बेटी को पटाता है। इतना ही नहीं बॉस की दिलफेंक बीवी की तरफ चारा फेंकता है और उसे भी अपने लपेटे में ले लेता है। यानि एक साथ तीन-तीन लोगों के साथ चक्कर शुरू होता है। उधर ऑफिस में बाशु के काम का हर्जा होने लगता है तो राजाराम बाशु का भी काम निपटा दिया करता है। अभी यही सब चल रहा होता है कि संध्या के माता पिता बाशु से उसकी शादी करना तय करते हैं। राजाराम दुखी हो जाता है। मित्र के वजह से पहले वह दुखी था लेकिन अब प्रेमिका भी दूसरे की होने जा रही है। उधर राजाराम के कपड़े, जूते आदि का इस्तेमाल करने वाला बाशु एक दिन के पैसे भी चुरा लेता है और पता चलने पर कहता है कि दोस्त का है समझ कर उठाया था। अगले महीने ले लेना। इन सब बातों को देख राजाराम अपनी प्रेमिका संध्या, मित्र बाशुदास, संध्या के माता-पिता, पड़ोसियों का विश्वास...इन सबके बीच वह अपने आप को 'फंस चुका' मान लेता है। इधर मित्र बाशु और संध्या के विवाह का दिन नजदीक आने लगता है।
            उधर बॉस की बेटी को पता चल जाता है कि बाशु का चक्कर उसकी सौतेली मां से है। दोनों की साथ-साथ तस्वीर खेंचकर वह तस्वीरें अपने पिता के पास पोस्ट से भेज देती है। नतीजतन बाशु की नौकरी चली जाती है। रास्ते में राजाराम उससे पूछता है कि अब तो नौकरी रही नहीं, संध्या के साथ शादी का क्या होगा। तब बाशु बड़ी लापरवाही से जवाब देता है जिससे राजाराम को गुस्सा आ जाता है। वह अब भी संध्या को पसंद करता है और उसका कुछ बिगाड़ हो यह नहीं चाहता। राजाराम जानता है कि इस लम्पट, झूठे इंसान के साथ संध्या का विवाह ठीक नहीं।

         इधर बाशु और संध्या के विवाह का दिन आ जाता है लेकिन बाशु का कहीं पता नहीं। अपने मित्र राजाराम के नाम चिट्ठी लिखकर जाता है कि संध्या अच्छी लड़की है लेकिन वह उससे विवाह नहीं कर सकता। जा रहा है। पत्र पढ़कर संध्या के घर में कुहराम मच जाता है। ऐसे में राजाराम संध्या से विवाह का प्रस्ताव रखता है और थोड़ी बहुत हील-हुज्जत के बाद दोनों विवाह करने के लिये राजी हो जाते है।

        फिल्म का खास आकर्षण रहे मुम्बईया चॉल के पुराने ढर्रे के दृश्य, सुबह पानी आने पर होने वाली सुर्ररर..सों.....दूध लेने के लिये खाली बोतलों का बदलना, बंद हो चुके शीतल पेय 'GOLD SPOT' की बोतल, फारूख शेख द्वारा चॉल के लोगों को अश्लील जोक सुनाकर मजमा जुटाते समय स्क्रीन पर आवाज रोककर 'CENSORED'  लिखकर आना। एक और खास चीज दिखी जब दोपहर के वक्त एक पड़ोसी फारूख शेख से कहता है - चलो तुम्हें अपने घर टीवी दिखाउं।

 तब फारूख अपनी घड़ी देख कर कहते हैं - इस वक्त ?
        वजह, 1983 में केवल शाम के तीन घंटे टीवी प्रसारण होता था, बाकि पूरा दिन टीवी पर झिलमिलाती बारिश होती थी :)

         खैर, यदि आपको मौका मिले तो कथा फिल्म जरूर देखियेगा। फिल्म के डॉयलॉग्स की एक बानगी देखिये कि जब राजाराम प्रमोशन होने पर अपने नाम की तख्ती देवनागरी में लिखकर दरवाजे पर लगाना चाहता है तो उसकी पड़ोसन संध्या और राजाराम के बीच  कुछ बातचीत होती है।

        संध्या तख्ती पर राजाराम का पूरा नाम पढ़ते हुए कहती है

- राजाराम पु. जोशी

-    राजाराम पु. जोशी नहीं, पूरा पढ़ो ...राजाराम पुरूषोत्तम जोशी। पूरा नाम अंट नहीं रहा था इसलिये ऐसा लिखाया।

-    अच्छा पढ़ती हूं - राजाराम पुरूषोत्तम जोशी। लेकिन नाम अंग्रेजी में क्यों नहीं लिखवाया ?


-    क्यों इसमें क्या खराबी है ?


-   अंग्रेजी में लिखवाने से रौब पड़ता है।


-    रौब जब मुझमें ही नहीं है तो तख्ती में कैसे आ सकता है ?


- सतीश पंचम

21 comments:

रूप said...

good one, keep continued PANCHAM !

देवेन्द्र पाण्डेय said...

किसी जमाने में यह फिल्म देखी थी। भूल चुका था। आपने इतने बढ़िया ढंग से रपट लिखी है कि चल चित्र आँखों के सामने नाच गया।
..आनंद आ गया।..आभार ।

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

सतीश भाई, आपने फिल्म का अंत नहीं बताया, मै उसे भूल चुका हूं.

दीपक डुडेजा said...

भाई हमने तो ये फिल्म ही नहीं देखि...... पर पढ़ कर लगा कि अपुन के टेस्ट की है और देखने पड़ेगी.

सतीश पंचम said...

निशांत जी,

फिल्म के अंत में राजाराम और संध्या का विवाह हो गया।

फारूख शेख किसी अरबी शेख को अपने बातों में फंसा, रूपये एंठ विदेश की ओर उड़ चला।

बस यही था अंत।

kshama said...

Haan...ye film dekhee thee maine! Bahut badhiya lagee thee!

अरुण चन्द्र रॉय said...

किसी जमाने में यह फिल्म देखी थी। भूल चुका था। आपने इतने बढ़िया ढंग से रपट लिखी है कि चल चित्र आँखों के सामने नाच गया।

rashmi ravija said...

सतीश जी,
मेरी भी फेवरेट फिल्म है यह...इतना सहज अभिनय..इतना वास्तविक परिवेश...लगता है कुछ लोगो की जिंदगी का एक हिस्सा देख रहे हैं...कोई फिल्म नहीं..याद तो नहीं कब देखी थी..पर फिल्म पूरी की पूरी याद है..:)
और राजाराम की एक और खूबी नहीं लिखी आपने...वो ये कि उसे पता चल जाता है....संध्या प्रेग्नेंट है...फिर भी उस से शादी के लिए हाँ कर देता है.

वैसे मुझे वो सीन सबसे अच्छा लगा था...जिसमे राजाराम..कल्पना करता है..संध्या से इस अधिकार से चाय बनाने के लिए कहेगा...ये कहेगा..वो कहेगा...पर एक आम युवक की तरह..संध्या के सामने कुछ नहीं कह पता...

Poorviya said...

aaj ke din puri ki puri film hi dikha dee......

dhanviyad..

jai baba banaras....

प्रवीण पाण्डेय said...

फिल्म देखी थी, बड़ा आनन्द आया था।

Arvind Mishra said...

यह फिल्म न देख पाने की कमी अपने पूरी कर दी -पूरा इत्मीनान से पढता गया और दृश्यों की कल्पना करता गया -लिखा ही आपने इतना लाजवाब है -मुझे ब्लोग की दुनियां में कुछ चरित्र फारूख मियाँ सरीखे लगे -काया आपको भी लगे ? ईमानदारी से बताईयेगा? :) आश्चर्य तो यह है कि लोग फिल्मों से भी कुछ सीख नहीं लेते और फंस ही जाते हैं !

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

पूरी तरह से फारूख शेख तो नहीं ( वर्चुअली संभव भी नहीं) किंतु हां,ऐसे लोग जरूर इस ब्लॉगिंग में हैं जो बड़ी बड़ी बातें करके, महानता आदि ओढ़कर संध्या नामक चिड़िया ढूँढते फिरते हैं।

ऐसे ही लोगों के मिलते जुलते स्वभाव को देख कर मैने वो पलटदास वाली पोस्ट लिखा था :)

यह रहा लिंक -

http://safedghar.blogspot.com/2010/12/blog-post_07.html

anshumala said...

यदि मै गलत नहीं हूं तो इस फिल्म के कास्टिंग में दादी माँ खरगोस और कछुए की कहानी सुनती है जिसमे बताया जाता है की खरगोस तो दौड़ता ही नहीं है वो तो कछुए की पीठ पर बैठ जाता है और सो जाता है जब विजय की लाइन आती है तो कूद कर उस तरफ जा कर रेस जीत जाता है :)
और दूसरी बात अच्छे से याद है वो ये की फारुख सेक का हर समय एक चाभी का गुच्छा उंगलियों पर घुमाना जिसके बारे में वो बताते है की ये फलाने की चाभी है और ये हेमामलानी की इससे वो दूसरो को इम्प्रेस करते है |
एक चीज याद दिलाइये जो बिल्कुल याद नहीं आ रही है की बास की बेटी की भूमिका शायद साईं परांजपे की बेटी ने किया था घुंघराले बालो वाली उनका नाम क्या है |

Khushdeep Sehgal said...

सतीश जी,
हिंदी सिनेमा में स्वस्थ और निर्मल हास्य की बेमिसाल प्रस्तुति थी ये फिल्म...इसमें मुख्य पात्रों के अलावा सहायक पात्रों को भी बड़े प्रभावशाली ढंग से उकेरा गया था...

मसलन चाल की सीढ़ियों पर सब्जी का थैला लेकर एक बुज़ुर्गवार चढ़ रहे होते हैं...उनसे पड़ोसी पूछता है...क्यों आज भाभी जी की मदद कर रहे हैं...इस पर बुज़ुर्ग सज्जन कहते हैं...क्यों वो मेरी मदद नहीं करती बर्तन मांजने में...

जय हिंद...

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

आपने सारा कुछ सही सही याद किया है।

राजाराम द्वारा अपने प्यार के रूप में प्रेग्नेंट संध्या से विवाह करने के बाद, दादी मां बच्चे को कछुआ खरगोश की कहानी की तर्ज पर कहती है कि इस तरह - कछुआ जीत गया....लेकिन ये जीत भी कोई जीत हुई ।

फारूख शेख चाभीयों का गुच्छा लहराता रहता है, वह भी सही याद किया।

और हां, बॉस की बेटी की भूमिका सई परांजपे की बेटी विनी परांजपे ने ही की थी।

सतीश पंचम said...

खुशदीप जी,

सीढ़ियों वाले सीन से याद आया कि जब संध्या का पिता घर में सब्जी की थैली आदि लेकर सीढ़ियां चढ़ रहा होता है तब जुगाड़ू फारूख शेख तब तक इंतजार करते हैं जब तक कि संध्या का पिता पूरा वजन लेकर सीढियां चढ़ नहीं जाते। जैसे ही सीढियां खत्म होती हैं फारूख सामने आकर कहते हैं लाइये मैं सामान उठा लूं :)

Khushdeep Sehgal said...

अंशुमाला जी,
आप ठीक कह रही हैं...साई पराजंपे की बेटी विनी परांजपे भूमिका निभाई थी...साथ ही कथा में साई परांजपे के पति अरुण जोगलेकर ने भी एक रोल किया था...

जय हिंद...

सतीश पंचम said...

लिजिये, खुशदीप जी ने तो मेरी एक और जानकारी में इजाफा किया कि सई परांजपे के पति ने भी इसमें एक रोल किया था।
बढ़िया!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

पढकर अच्छा लगा। कथा की कथा, कलाकार आदि सभी मिलकर इसे मेरी पसन्दीदा फ़िल्मों में से एक बनाते है।

डॉ. मनोज मिश्र said...

पुनः स्मृति दिलाने के लिए आभार.

Rahul Singh said...

यहां तो पूरी कथा है.

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.