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Saturday 20 August 2011

कवचों, ढक्कनों, रैपरों से युक्त लोकायुक्त........

मैं जब कभी कालजयी लेखकों के बारे में सोचता हूं तो मन में यह जरूर आता है कि क्या ये लेखक हमेशा ऐसे ही कालजयी रहेंगे ?   उनकी लेखनी कभी  तो अप्रासंगिक होती होगी ?  कभी तो काल, परिवेश से परे उनकी लेखनी रूक जाती होगी ?   लेकिन नहीं,  मैं  जितना ही इन प्रश्नों के बारे में सोचता हूं, उतना ही इसका जवाब एक सीधे सपाट धरातल पर आकर मिलता है कि - काल, परिवेश, लोग भले बदल जांय लेकिन कालजयी लेखन  की आत्मा सदैव अमर रहती है। वह अपना असर हर दौर में  दिखाती है। 

 कुछ इन्हीं बातों से रूबरू हुआ जब मैं अपनी  पिछली पोस्ट  के लेखन के दौरान शरद जी के व्यंग्य को पढ़ रहा था। उसमें लिखी बातें पढ़ते हुए लगा ही नहीं कि ये कोई पुराना लेख है, बल्कि कुछ यूं लगा मानो हाल फिलहाल में ही लिखा गया है और सब्जेक्ट भी क्या - लोकायुक्त....जिससे संबंधित बातों को लेकर आजकल बवाल मचा हुआ है।  शरद जी ने यह आलेख तब लिखा था जब लोकायुक्त का पद बस बनने के दौर में ही था या बन चुका था। आज ठीक वही परिस्थितियां लोकपाल को लेकर हैं। ठीक वही दौर चल रहा है। ऐसे में शरद जी के इस आलेख लोकायुक्त को पढ़ना मुझे जरूरी लग रहा है। पेश है उन्हीं के व्यंग्य संग्रह - नावक के तीर से यह आलेख जिसे पढ़ शरद जी के कालजयी लेखन को नमन करने का मन करता है।

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                                                       लोकायुक्त

       सरकारी नेता अक्सर किसी ऐसे शब्द की तलाश में रहते हैं जो लोगों को छल सके, भरमा सके और वक्त को टाल देने में मददगार हो। आजकल मध्यप्रदेश में एक शब्द हवा में है - लोकायुक्त। पता नहीं यह नाम कहाँ से इनके हाथ लग गया, कि पूरी गवर्नमेंट बार-बार इस नाम को लेकर अपनी सतत बढ़ती गंदगी ढंक रही है। इसमें पता नहीं, लोक कितना है और आयुक्त कितना है, पर मुख्यमंत्री काफी हैं। इस शब्द को विधानसभा के आकाश में उछालते हुए मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने कहा था कि लोकायुक्त यदि जरूरी हो, तो मुख्यमंत्री के विरूद्ध शिकायत की भी जांच कर सकता है। अपने लोकायुक्त पर पूरा भरोसा हुए बिना कोई मुख्यमंत्री ऐसा बयान नहीं देगा। तभी यह शुभहा हो गया कि लोकायुक्त कितना मुख्यमंत्री के पाकिट में है और कितना बाहर। जाहिर है, यह शब्द सत्ता के लिये परम उपयोगी है। वह इसके जरिये किसी भी घोटाले को एक साल के लिये आसानी से टाल सकते हैं। इसके सहारे अपने वालों को ईमानदार प्रमाणित करवा सकते हैं और अपने विरोधियों को नीचा दिखा सकते हैं।

  •   विधानसभा के सदस्य जब मामला उठाएँ, उनसे कहा जा सकता है कि मामले को लोकायुक्त को भेजा जाएगा।
  • दूसरे सत्र में जब सवाल करें तब कहें - मामला लोकायुक्त को भेजा जा रहा है।
  • तीसरे सत्र में उत्तर यह कि मामला लोकायुक्त को भेज दिया गया है।
  • चौथे सत्र में उत्तर यह कि मामला लोकायुक्त के विचाराधीन है।
  • पाँचवे में यह कि अभी हमें लोकायुक्त से रिपोर्ट प्राप्त हो गई है, शासन उस पर विचार कर रहा है। .......इस तरह हर उत्तेजना को समय में लपेटा जा सकता है। धीरे- धीरे बात ठंडी पड़ने लगती है। लोग संदर्भ भूलने लगते हैं। तब आसानी से कहा जा सकता है कि वह अफसर, जिस पर आरोप था, निर्दोष है।


       आज से 15-20 वर्ष पूर्व (आलेख लेखन काल से) मध्यप्रदेश में ऐसे ही एक सतर्कता आयोग था विजिलेंस कमीशन की स्थापना की गयी थी। उसके भी बड़े हल्ले थे। तब कहा जाता था कि बस इस आयोग के बनते ही राज्य से भ्रष्टाचार इस तरह दुम दबाकर भागेगा कि लौटने का नाम ही नहीं लेगा। बड़ी ठोस तस्वीर पेश की गई शासन की। अब उस बात को कई बरस बीत गये। बदलते समय में लोगों को भ्रमित करने के लिये नया शब्द चाहिये ना। अब लोकायुक्त का डंका बजाया जा रहा है।

       बहुत पहले मैंने एक चीनी कथा पढ़ी थी। गुफा में एक अजगर रहता था, जो रोज बाहर आकर चिड़ियों के अंडे, बच्चे और छोटे-मोटे प्राणियों को खा जाता। जंगल के सभी प्राणी अजगर से परेशान थे। एक दिन वे सब जमा होकर अजगर के पास आये और अपनी व्यथा सुनायी कि आपके कारण हमारा जीना मुहाल है। अजगर ने पूरी बात सुनी। विचार करने का पोज लिया और लंबी गर्भवती चुप्पी के बाद बोला - हो सकता है, मुझसे कभी गलती हो जाती है। जब भी मेरे विरूद्ध कोई शिकायत हो, आप गुफा में आ जाइए। मैं चौबीसों घंटे उपलब्ध हूं। यदि कोई बात हो तो मैं अवश्य विचार करूँगा।

    जाहिर है, किसी पशु की हिम्मत नहीं थी कि वह गुफा में जाता और अजगर का ग्रास बनता।

   तंत्र जब अपने चेहरों को छुपाने के लिये एक और चेहरा उत्पन्न करता है, उस पर वे सब कैसे आस्था रख सकते हैं, जो तंत्र के चरित्र और स्वभाव से परिचित हैं।

     मान लिजिये एक अफसर ने खरीद में घोटाला किया। कमीशन खाया, रिश्तेदारों, दोस्तों को टेंडर-मंजूरी में तरजीह दी, खराब माल खरीदा। रिद के रिद रहे, हाथ से जन्नत न गई। विधानसभा के सदस्य इस प्रकरण पर शोर मचाते हैं, सवाल पूछते हैं, बहस खड़ी करते हैं। आपका चक्कर जो भी हो, मुख्यमंत्री उस अफसर को बचाना चाहते हैं, तो इसके पूर्व कि विधानसभा की कोई कमेटी जाँच करे, वे उछलकर घोषणा कर देंगे कि मामला लोकायुक्त को सौंपा जाएगा। चलिए करतल ध्वनि हो गई। अखबारों में छप गया। लगा कि सरकार बड़ी न्यायप्रिय है।

      अब दिलचस्प स्थिति यह होगी कि वह अफसर, जिसके विरूद्ध सारा मामला है, उसी कुर्सी पर बैठा है, जिस पर बैठ उसने घोटाला किया था। उसी को अपने खिलाफ मामला तैयार कर लोकायुक्त को भेजना है और यदि जाँच हो तो अपनी सफाई भी पेश करनी है। वह मामला बनाता ही नहीं, क्योंकि स्वंय के विरूद्ध उसे कोई शिकायत ही नहीं है। वह कह देगा कि विधायकों के भाषणों में शिकायतें स्पष्ट नहीं हैं।

    लोकायुक्त एक सील है, प्रमाणपत्र देने का दफ्तर है । यहाँ से उन अपनेवालों को, जो भ्रष्टाचार कर चुके और आगे भी करने का इरादा रखते हैं, इमानदारी के प्रमाणपत्र बाँटे जायेंगे। लोकायुक्त एक खाली जगह है जो भ्रष्टाचार और उसकी आलोचना के बीच सदा बनी रहेगी। यह सरकार का शॉक एब्जॉर्बर है, जो कुरसियों की रक्षा करेगा। एक कवच है, ढक्कन है, रैपर है, जो सरकारी खरीद, टेंडरी भ्रष्टाचार, निर्माण कार्यों में कमीशनबाजी, टेक्निकल हेराफेरी से ली गई रिश्वतें आदि लपेटने, छिपाने और सुरक्षित रखने के काम आएगा। यह विरोधियों के विरोध का मुँहतोड़ सरकारी जवाब है। एक स्थायी ठेंगा है, जो मंत्री जब चाहे तब किसी को दिखा सकता है। विजिलेंस कमीशन ने 15 साल भुलावे में रखा। अब 15 वर्ष लोकायुक्त काम आएगा। सरकारी बाग की एक कँटीली बाड़ है, जिसमें भ्रष्टाचार के पौधे सुरक्षित हैं।

    जब विजिलेंस कमीशन उर्फ सतर्कता आयोग बना था तो एक व्यापारी से मैंने कहा था - जब सतर्कता आयोग बन गया है, अब क्या करोगे ? वह लंबी सांस लेकर बोला - क्या करेंगे। टेंडर में पाँच परसेंट उसका भी रखेंगे। लोकायुक्त के लिये भी वह शायद ऐसा ही कुछ कहेगा।
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शरद जोशी के व्यंग्य संग्रह - 'नावक के तीर' ( किताब घर प्रकाशन) से साभार.

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प्रस्तुति - सतीश पंचम

13 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

सही है,यह लोकायुक्त की कहानी देश में बहुत पुरानी हैं,समय-समय पर नाम जरूर बदलते रहे लेकिन मांग वही पुरानी है.
शरद जी के जरिये रोचक पोस्ट,आभार.

Khushdeep Sehgal said...

सतीश जी,

शरद जोशी जी के इस व्यंग्य को आज ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को पढ़वाने की ज़रूरत है...

आपका आभार इसे पढ़वाने के लिए...

जय हिंद...

rashmi ravija said...

सचमुच कालजयी रचना....आज के परिप्रेक्ष्य में भी बिलकुल सटीक..

और महान लोगों की रचनाएं तो हमेशा ही प्रासंगिक होती हैं...क्यूंकि लोग...उनकी भावनाएं...उनकी कमजोरियां...तो एक सी ही होती हैं..हर काल में...बस परिदृश्य बदल जाते हैं

बहुत आभार इसे पढवाने का...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

जय हो! समय चला पर हिले नहीं हम!

Arvind Mishra said...

यही तो है एक कालजयी कृति -समय /स्थान निरपेक्ष -बस मानवीय वृत्तियों का दस्तावेजीकरण

प्रवीण पाण्डेय said...

यही छलास तो सर्वव्यापी है, भेजने वाले के लिये भी, प्राप्त करने वाले के लिये भी।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बढ़िया संदर्भ ढूंढ कर निकाला आपने।
व्यंग्य का कालजयी बने रहना किसी भी राष्ट्र के शर्मनाक है। शरद जोशी इस बात के लिए दुखी ही होते कि मेरे लिखने का कोई असर आज तक नहीं हुआ।

आशीष श्रीवास्तव said...

यदि ये लेख आज लिखा गया होता तो शरद जोशी जी को इस लेख के लिए कांग्रेसी घोषित कर दिया जाता !

हमें नए कानूनों की जरूरत नहीं, यदि वर्त्तमान के कानूनों को कड़ाई से लागू किया जाए, भ्रष्टाचार से निपटने वे काफी हैं. भ्रष्टाचार अपने घर से शुरू होनी चाहिए, ट्राफिक पोलिस , रेल्ल्वे रिजर्वेशन, बच्चो के एडमीशन , बाबुओ की घूस से …, खरीदे सामन की रसीद से...

दीपक बाबा said...

@जब सतर्कता आयोग बन गया है, अब क्या करोगे ? वह लंबी सांस लेकर बोला - क्या करेंगे। टेंडर में पाँच परसेंट उसका भी रखेंगे। लोकायुक्त के लिये भी वह शायद ऐसा ही कुछ कहेगा।



तभी लेखक अपनी लेखनी के साथ अमर हो जाता है... क्योंकि देश काल और स्थिति बदलते रहते हैं पर कहानी एक सी ही होती है.

शोभना चौरे said...

बहुत बहुत आभार इस कालजयी रचना को पढवाने के लिए |
कालजयी रचनाये सदा प्रासंगिक ही रहेगी हर युग में रहन सहन बदल गया है किन्तु मानवीय गुण अवगुण सत्ता में या सत्ता के पार वही रहेंगे |

Vivek Rastogi said...

टेंडर में पाँच परसेंट उसका भी रखेंगे।

सही है नहीं तो वो किसी को भी हाईकोर्ट में चक्कर लगवा सकता है।

सञ्जय झा said...

'garvhwati chuppi' aur 'unka bhi paanch percent' rakhenge.........

bole to tapchik lekh ko rapchik mod
me.........

jo ho 'anna'

ravikumarswarnkar said...

रोचक...
खुशदीप जी सही कह गये हैं...

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