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Wednesday, August 10, 2011

कतरन झूठ न बोले

      करीब तीन साल पहले  New York Times में एक लेख छपा था जिसमें भारतीयों के बढते वर्चस्व को लेकर एक महत्वपूर्ण बात कही गई, कि भारतीय बच्चे अमरीकीयों के लिये एक नये किस्म की चुनौती बनते जा रहे हैं।  उस लेख की एक कतरन E-Mail के जरिये मेरे पास आई थी। उस पर मैंने पोस्ट भी लिखा था।

कतरन में लिखा था -

"When we were young kids growing up in America, we were
Told to eat our vegetables at dinner and not leave them.
Mothers said, think of the starving children in India
And finish the dinner.'

And now I tell my children:
'Finish your homework. Think of the children in India

स्कूल जाते हुए  मेरे गाँव के बच्चे
Who would make you starve, if you don't.'?"

Thomas L Freidman















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सपनीली आँखे....

    अभी सुन रहा हूं कि अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा ने अमरीकी बच्चों को चेताया कि पढ़ो नहीं तो  भारतीय और चीनी बच्चों से आप लोग पिछड़ जाओगे। Thomas Freidman ने जब कहा था तब केवल भारत के बच्चों का उल्लेख किया था। 
तीन साल बाद ओबामा जब कह रहे हैं तो उसमें चीन भी जुड़ गया है। 


       न जाने इन  अमरीकियों को और किन किन का डर सताये जा रहा है। 


 - सतीश पंचम


14 comments:

अल्पना वर्मा said...

चीनी छात्रों के लिए कहा गया ओबामा का कथन सही है.यह पूर्ण सत्य है कि अगर चीन के लोग अंग्रेज़ी जानते तो आज भारतियों से आगे होते.भारतीय छात्र अंग्रेज़ी जानते हैं और आसानी से बाहर के देशों में नौकरी पा लेते हैं..जब कि चीनी लोग भारतीयों की तरह ही बुद्धिमान और शिक्षित होते हुए भी अंग्रेज़ी की वजह से मात खा जाते हैं.
चीनी सबसे अधिक हिम्मतवाले[परिश्रमी ] माने जाते हैं,कनाडा के बर्फीले इलाकों में रेल मार्ग बनाने का श्रेय इन्हीं को जाता है.अमेरिका /कनाडा में बड़े कॉलेजों में बहुत से चीनी प्रोफ़ेसर हैं .चीन में आज भी सारी शिक्षा चीनी भाषा में होती है.
जिस दिन वहाँ अंग्रेज़ी माध्यम शुरू हो गया तब भारतीय बच्चों को भी ग्लोबली कड़ी टक्कर मिलेगी.

पत्रकार-अख्तर खान "अकेला" said...

bhtrin prstuti ..akhtar khan akela kota rajsthan

Poorviya said...

dunia ko darane wala bachhoo se dar raha hai ........

jai baba banaras...

shilpa mehta said...

बस अब हमारे बच्चों को जीतना सीखना है ... खुद पर भरोसा करना सीखना है ... और स्व नियंत्रण भी ...

प्रवीण पाण्डेय said...

फ्रीडमैन जी की दो किताबें जीमें हैं, अच्छा लिखते हैं भारतीयों की प्रशंसा करते हैं पर भय भी खाते हैं।

Vivek Rastogi said...

ये तो केवल भारतीय छात्रों ने अपने दिमाग के बल पर हाल किया हुआ है। अगर अमेरिका जैसी शैक्षिक सुविधाएँ यहाँ हों तो शायद हरेक जगह केवल भारत का ही बोलबाला होगा।

Arvind Mishra said...

भारत और अमेरिका में एक मूलभूत अंतर है -यहाँ प्रतिभाएं विपन्नता में भी अंकुरित हो वाट वृक्ष बन जाती हैं अमेरिका में बिना सुविधा सम्पन्नता के परतिभा पल्लवित नहीं होती -मंदी की आशंकाओं से अंकल सैम परेशान हैं -उन्हें लगता है ऐसे में कहीं विदेशियों की अधिक तादाद वाहना हावी हो जाय....अब आया है ऊँट पहाड़ के नीचे!

anshumala said...

पहले भारत की जनसँख्या देखिये
यहाँ पर निराक्षिरो की संख्या देखिये
स्कूल छोड़ने वाले बच्चो की संख्या देखिये
अमेरिका को चिंता में डाल रहे बच्चो की संख्या भारत के कुल बच्चो की संख्या का बहुत ही छोटा सा भाग है | सैम अंकल डरते है तो डरे, पर भारत का पुरा हाल देखे तो ये हमारे लिए कही से भी गर्व करने की बात नहीं है |

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

इस बात से सहमति है कि बच्चों की संख्या, उनकी शिक्षा, तमाम सुविधाओं आदि को देख कहीं से भी गर्व करने लायक बात नजर नहीं आती।

लेकिन इन तमाम घटाटोपों के बीच कुछ बच्चे एकदम से निकलकर छा जा रहे हैं। उनमें आगे बढने की जीजिविषा है, भले ही परिस्थितियां कितनी भी खराब क्यों न हों। यहां तस्वीरों में जो गाँव के बच्चे हैं उन्हें यदि ध्यान से देखा जाय तो आधों के पैरों में चप्पल नहीं है, किसी के कपड़े ठीक नहीं है तो किसी की किताब ही नहीं है लेकिन ऐसे ही विषम परिस्थितियों से गुजर कर कई सारे बच्चे बड़े बड़े पदों पर पहुंचे हैं, IT और तमाम क्षेत्रों में नाम कमा रहे हैं।

बाकि तो रोज रोज की नेगेटिव खबरों के बीच एकाध इस तरह की पॉजिटिव खबरें आ जाती हैं तो मन हरियर हो जाता है :)

वन्दना said...

विचारणीय आलेख्।

डॉ .अनुराग said...

जिजीविषा कहकर ताली पीटने का वक़्त अब गया सतीश जी...केवल शिक्षा ओर शिक्षा ही इस देश का भला कर सकती है ..भारतीयों विशेष तौर पर माध्यम वर्ग के भारतीयों के पास केवल बौद्दिक सम्पदा ही गर्व करने के लिए है .....हाँ अंशुमाला ओर अल्पना जी की बात गौर करने लायक है

अनूप शुक्ल said...

बच्चों की फोटो गजब की है। खुशनुमा भी है मामला कि वे हमारे बच्चों से डरते हैं। :)

डॉ. मनोज मिश्र said...

सारे जहाँ से अच्छा......

देवेन्द्र पाण्डेय said...

मैने अपनी एक पोस्ट में लिखा था....

दवा-दारू, खान-पान, शिक्षण-प्रशिक्षण का रखा जाय भरपूर ध्यान तो देसी भी हो सकते हैं विलायती से अच्छे फिर चाहे कुत्तों के पिल्ले हों या गली में घूमते ...अनाथ, लावारिस, आदमी के बच्चे।
http://devendra-bechainaatma.blogspot.com/2010/06/blog-post_06.html

...मेरी समझ से मुख्य बात यही है। अच्छे संस्कार, परवरिश, सुख-सुविधा, किसी भी देश के बच्चों को तेज बना सकती है। मैं देश, जाति या किसी भी प्रकार के नस्लीय भेद भाव को नहीं मानता। इसका सही परीक्षण तो तभी हो सकता है कि पैदा होते ही सभी प्रकार के बच्चों को एक समान अवसर प्रदान कर देखा जाय कि उनमे कौन श्रेष्ठ है।

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