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Tuesday, August 9, 2011

थोड़ा सा फिल्मानी हो जाय.....

        हर दौर की तरह फिल्मों में भी कई दौर आते जाते रहते हैं। एक जमाना था कि पेड़ों की छांव में खड़े खड़े ही नायक गाना गाकर नायिका को लुभाता था और नायिका भी एक पांव पर खड़े खड़े कभी मटकी को कमर पर तो कभी सिर पर रख दो चार बोल कहके निभा लेती थी। आगे दौर बदला और गानों ने धीरे धीरे रफ्तार पकड़नी शुरू कर दी। नायक ने खत में फूल रखकर भेजना शुरू किया, यह कहकर कि फूल नहीं मेरा दिल है। उसे देख युवाटिक लोग भी खदबदाना शुरू किये और उन्होंने ने भी अपनी प्रेयसी को प्रियतम को खतों में कुछ रोमांस उड़ेलना शुरू किया। यही वही दौर था प्रेमियों ने खतों में रोमांस परोसते हुए लिखना शुरू किया

लिखती हूं खत खून से सियाही न समझना
मरती हूं तेरी याद में बेवफाई न समझना :)

बदले में नायक ने लिखना शुरू किया....

शीशी भरी गुलाब की पत्थर से तोड़ दूं...
अगर तू ना मिली मुझे तो सारी दुनिया छोड़ दूं

        ये वो दौर था जब गानों में शेरो-शायरी, पत्थर, खून, शीशी,आदि बहुत चलते थे। एकदम तोड़ फोड मचा देते थे। इन शायरीयों को पढ़ने पर आज भले हसीं आये लेकिन ये अपने जमाने में हिट्टम हिट की श्रेणी में आते थे। ...कुछ कुछ वैसे ही जैसे आजकल के सस्ताउ गाने आते हैं जिनके बोल होते हैं....पैसा पैसा क्या करती है....पैसे पर क्यू मरती है.....या फिर - चार बज गये हैं....पारी अभी बाकी है.....। न जाने कितने करोड़ कमा उठे हैं इन आज के गानों के चलते।

       खैर, आगे कई और दौर आये और - मैं करती हूं प्यार मिस्टर इंडिया से...जैसे गाने बनने लगे। हिरो का कुछ  पता नहीं, प्रत्यक्ष दिखता नहीं... कुछ नहीं लेकिन नायिका उससे प्रेम करती है। वर्चुअल प्रेम का ये संभवत: पहला उदाहरण होगा जब नायिका अपने नायक मिस्टर इंडिया को बिना देखे प्यार करना चाहती है। उस दौरान भी गाने बड़े इस्पेसल टाइप के बनते थे - शायद मेरी शादी का खयाल दिल में आया है इसलिये मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पे बुलाया है। अब आजकल की मम्मयों को तो दामाद खुद ही इन्वाइट करते हैं - आइये मम्मी जी, मैं विक्की....तुहाडी कुड़ी दा ब्वॉय फ्रैंण्ड....अस्सी ना फेसबुक ते मिले सी.....चैट नाल पत्ता लगिया कि ये तुआडी कुड़ी है....एस लई तुआडे कोल इसदा हथ्थ मंगण आइया वां. ........।   दौर है। यह भी चलता है। आजकल तो प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे को प्रपोस करने के लिये भी अलग स्टाइल से गाने गाते हैं।

        मसलन अभी कुछ साल पहले रिलीज हुई फिल्म लक्ष्य के गाने को ही देखिये जिसमें रितिक रोशन जब सीधे कहते हैं -

अगर मैं कहूं
मैं तुमसे मोहब्बत करता हूं
तो तुम क्या कहोगी

बदले मे प्रियंका चोपड़ा  प्रिति जिंटा कहती है -

इस बात को अगर तुम
जरा घुमा फिरा के कहते,
जरा और सजा के कहते
तो अच्छा होता।

     माने नायिका चाहती है कि ब्वॉय फ्रेण्ड थोड़ा रोमांटिक अंदाज में प्रपोस करे.....थोड़ा सा कविता टाइप में कहे तो अच्छा लगे। लेकिन ये उस दौर की बात थी जब नायिका ऐसा चाहती थी। आजकल की नायिका तो कुछ अलग ही कहती है। अब आरक्षण फिल्म के गाने को ही लिजिये। इसमें नायक कितनी खूबसूरती से घुमा फिराकर कविताओं के जरिये अपनी बात कह रहा है कि -


झटक कर जुल्फ जब तुम तौलिये से बारिशें आजाद करती हो
अच्छा लगता है
जरा सा मोड़कर गरदन जब अपनी ही अदा पर नाज़ करती हो
अच्छा लगता है


बदले में नायिका कहती है -

आँख में आँख डाल के कह दो, ख्वाबों में टहलाओ ना
हाथों को हाथ में लेके वो तीन शब्द टपकाओ ना
जरा शॉर्ट में बतलाओ ना
सीधे प्वाइंट पे आओ ना

     मतलब जो नायिका पहले लक्ष्य फिल्म में घुमा फिराकर प्रेमी की बातें सुनना पसंद करती थी वही अब आरक्षण फिल्म में सीधे शार्ट में प्वाइंट की बात करने कह रही है, वो तीन शब्द टपकाने की बात कर रही है जबकि नायक बेचारा अब भी नायिका के तौलिये और जुल्फों में उलझा हुआ है :)

     बहरहाल आप सब भी आरक्षण के खूबसूरत गाने को देखिये..... प्रसून जोशी द्वारा लफ्ज काफी सधे और मजे मजे में लिखे गये हैं।

- सतीश पंचम

17 comments:

नीरज गोस्वामी said...

कमाल दी पोस्ट है बाउजी...दिल खुश कर दित्ता...पुराने दिन याद आ गए...

नीरज

अल्पना वर्मा said...

बसों में ,टेम्पो,ट्रकों के पीछे ..लिही मिलती थी ऐसी शेरो -शायरी .
गीत भी समाज का दर्पण ही हैं.

अल्पना वर्मा said...

त्रुटि सुधार -उपरोक्त टिप्पणी में-'लिही'..को 'लिखी' पढ़ें.

सतीश पंचम said...

@ त्रुटि सुधार -उपरोक्त टिप्पणी में-'लिही'..को 'लिखी' पढ़ें.

-----------

अल्पना जी,

समझने में कोई परेशानी नहीं हुई, वैसे भी मराठी में 'लिखा' को 'लिहा' कहा जाता है :)

अरुण चन्द्र रॉय said...

अल्पना जी ने ठीक कहा कि गीत समाज का दर्पण होता है.. बहुत सुन्दर पोस्ट... गीतों से कविता कम हो रही है... ठीक वैसे ही जैसे जीवन से साहित्य...

NiTiN Yadav said...

बढ़िया पोस्ट, पढ़ कर अच्छा लगा

वैसे लक्ष्य फिल्म की हिरोइन प्रीती जिंटा है प्रियंका चोपड़ा नहीं :-)

सतीश पंचम said...

ध्यान दिलाने के लिये शुक्रिया नितिन जी,

मुझे तो सारी की सारी एक सी लगती हैं, वहीं नपी तुली मुस्कान, वही प्लास्टिक वाली हंसी...कम्बख्तियों को पहली नजर में पहचान ही नहीं पाता :)

करेक्शन करता हूं :)

rashmi ravija said...

मजा आया,पढ़कर.......पर पोस्ट थोड़ी और लम्बी होनी चाहिए थी..कुछ और गानों के पोस्टमार्टम करते तो और मजा आता..

दीपक बाबा said...

मुझे तो सारी की सारी एक सी लगती हैं, वहीं नपी तुली मुस्कान, वही प्लास्टिक वाली हंसी...कम्बख्तियों को पहली नजर में पहचान ही नहीं पाता :)

Abhishek Ojha said...

:)

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रेम में भी सीधे प्वाइण्ट पर, अब चाँद तारों का क्या होगा जी।

Global Agrawal said...

मेरे ख़याल से लक्ष्य फिल्म की नायिका का रवैया सदा बहार है :)

डॉ. मनोज मिश्र said...

@लिखती हूं खत खून से सियाही न समझना
मरती हूं तेरी याद में बेवफाई न समझना :)
इस पर वाह कहें या आह.
बहुत पाला पड़ा है इससे .
ई तो बहुत पुराना शेर सुनाय दिए भइया-एक दम चौचक जौनपुरी पोस्ट है.

Arvind Mishra said...

सीधे प्वायिंट पर आओ -सटीक बात है !बाकी तो सब फलसफा है !

Vivek Rastogi said...

यह सब आज की जनरेशन के लिये है, अपन तो लगता है कि वक्त के पहले ही बीप बीप हो गये हैं।

ajit gupta said...

अच्‍छी पोस्‍ट है जी, फिल्‍मों का इल्‍म कम ही है तो आगे क्‍या कहें?

अनूप शुक्ल said...

हमें भी अच्छा लगा! लगता है! :)

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