सफेद घर में आपका स्वागत है।

Saturday, August 6, 2011

रिस्से-सन.....रिस्से-सन

      बम्बई........तमाम शिकवों शिकायतों की बम्बई......सोते जागते सपने दिखाती बम्बई.......पचास से पांच लाख बनाती बम्बई....... करोड़ से हजार पर लाने वाली बम्बई...... यहां कौन कब कहां पहुँच जाय कोई नहीं जानता ......हर एक की अपनी मंज़िल...... कोई जल्दी पहुंचता है.....कोई देर से.....कोई पहुंच ही नहीं पाता......सारी उम्र  जांगर ठेठाते बीतती है......फुटपाथ पर सोते बीतती है.... लेकिन एक कफ़न तक के लिये तरसा देती है बम्बई......हां, अब तो मुम्बई हो गई है.......वही मुम्बई जहां गाते हुए नचनिया कहती है ....... डारलिन्ग आँखों से आँखे चार करने दो.....रोक्को ना रोक्को ना.......बुलबुलों को अभी इन्तजार करने दो...........

    हटाओ यार इस नैन-मिलौनी को ......किस तरह अँखिया चार करें.....ससुर अमेरिकौ का क्रेडिट रेटिंगवा गिर गया है.....ओही अमरिकवा जिसका कान्हे पर बइठ अटइची गाते मन नहीं थकता था......चचा सैम अब गाढ़े परे हैं.......रिस के मारे रिस्से-सन आ रहा है ....डपल डिप रिसेसन.....रिस्से-सन न हुआ डिप डिपी चाय होय गई बिलाने....


      औ देखो बम्बई के किनारे एक अउर जहाज डिप होने जा रहा है.......ससुरे जहाजों को भी यहीं डिप होने का मन करता है....संगम है क्या जो पबित्र होने आ जाते हैं......लेकिन एक बात है गुरू ......इन डूबते जहाजन पर कोई दांव लगाये तो मज्जा आय जाय.......माने.....जब कोई जहाज डूब रहा हो तो खरीद उठे और लायेबिलिटी खरीदन वाले पर डियू........जहाज बचा तो खरीदने वाले का और डूबा तो जहाजमालिक का रूतबा त दे ही देगा खरीदनहार को....औ कभी जो जहाज की परदरसनी के तउर पर रखने का मउका आ गया तो टाईटेनिक फेल .......कमा कर रख देखा डूबता जहाज.......

        ए बे.....उहां कहां सेयर मारकेट में ले जा रहे हो पइसा धरने .........देख नहीं रहे रिसेसन आवा है......मेहरारू से कहो गहना गुरिया रूपिया पइसा जो कुछ हो कहीं खन के गाड़ दे नहीं तो जो कुछ होई सरकारे क भरे में चल जायगा.....अरे है गहना ....तुम पहिले अपनी मेहरारू से पूछो तो....महिलायें गहना खरीदने में और उसे छिपाकर रखने में प्रियम्बदा होती हैं.....देखे नहीं रोज दुपहरीया को सर्राफे बाजार में कहीं चानी का पायल खरीदा जा रहा है तो कहीं सोने क करधन......ई सब चोरउथा का पइसा होता है.......रिस्सेसन आये चाहे फिस्से-सन..... महिलाएं अपना गहना गुरिया से घर थाम्ह लेन्गी.... बाकि तो पूंजिवाद में झुलनीया हिलोर मारे का बखत है.......औ हम तो कान में अंगुरी रख गायेंगे कि ........ पीछे कमर पर लतियाये गये बलमू....पूछले पर कबहूं न बताये मोहे बलमूं

       बाकि यही देखा है कि पतिदेव यदि पूंजिवादी अमेरिका का प्रतीक है तो सिरीमती इन्डिया औ भारत की मिसरित अर्थ-व्यवस्था.....कभी सोने चानी खरीदने के लिये अमीर उल उमरा बन जायेंगी तो कभी बचत करने के लिये सब्जी वाले से भी झिकझिक करती नजर आयेंगी ........कतर ब्योंत कर बचत करना कोई महिलाओं से सीखे.......आखिर रिस्से-सन में अमेरिकी चोला वाले पतिदेव जब डिपियायेंगे तो यही मिसरित अर्थ-व्यवस्था वाली उन्हें संभाल ले जायेंगी..... वरना तो कहा है साहिर लुधियानवी ने ........

 पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे
 कि मैं तन मन की सुध बुध गँवा बैठी
  हर आहट पे समझी वो आय गयो रे
  झट घूँघट में मुखड़ा छुपा बैठी.

 पूँजीवादी पिया को मन से निकालना मुसकिल है बबुनी.......मैकडोनल्ल....पिज्जा.....बरगर से लइके......पट्टा दुपट्टा तक निहाल होय गया है अर्थव्यवस्था के मुक्तांगन  में........कृषिजन्य उत्पादन, किलोज अर्थब्यवस्था औ परम्परावादी पिहर का कुछ सत् बचा ले जाय तो बचा ले जाय :)

Update :  अभी देख रहा हूं कि समुद्र में डूबे जहाज से हो रहे तेल रिसाव से कई समुद्री जीव मारे गये हैं। किनारे पर आ आकर दम तोड़ रहे हैं। तस्वीरें देख मन व्यथित हो उठा है :(

- सतीश पंचम

17 comments:

दीपक बाबा said...

रिस्से-सन.....रिस्से-सन
:)
हेडिंग ही मार गया......

पोस्ट बाद में पढूंगा.

दीपक बाबा said...

बाकि यही देखा है कि पतिदेव यदि पूंजिवादी अमेरिका का प्रतीक है तो सिरीमती इन्डिया औ भारत की मिसरित अर्थ-व्यवस्था...

:) वाह .... पंचामात्म्क इस्टाईल ..

rashmi ravija said...

एकदम आपके ओरिजिनल स्टाइल वाली पोस्ट...झक्कास लिखा है

अरुण चन्द्र रॉय said...

बढ़िया व्यंग्य...

Arvind Mishra said...

एक बम्बईया के दिमाग की अच्छी हलचल पेश किया आपने !

Vivek Rastogi said...

सेयर मारकेटवा का साँड ऊ अपने ही अमरीका वाले काके पर चढ़ लय है।

shilpa mehta said...

रिसेसंन्न को मारिये जी गोली - हमें तो इ बताइए कि ये रसोई गैस का क्या चक्कर है ?

खाली हमारे कर्नाटका में नचा रही है - रेसन कारड नहीं तो कनेक्शन सस्पेंड - या उधर भी येही हाल है?

सतीश पंचम said...

@ राशन कार्ड नहीं तो रसोई गैस नहीं.

इसमें देश की बाहरी शक्तियों का हाथ है :)

---------------

मेरे लिये तो यह नई जानकारी है शिल्पा जी, यहां मुम्बई में Exactly क्या नियम है पता नहीं लेकिन बिना राशन कार्ड वालों के यहां भी गैस सिलेंडर आते देखा है।

Kajal Kumar said...

बंबई में एक बात है. जो जहां है वहीं बिता देता है पूरी ज़िंदगी. मैंने Rags to Riches कहानियां नहीं सुनीं बंबई के बारे में.

सतीश पंचम said...

काजल जी,

बंबई के बारे में यह ज्यादातर सच है कि जो जहां है वहीं बिता देता है लेकिन ऐसे लोगों के बारे में यदा कदा जरूर सुनने में आता है कि वह बंबई आये थे तो जेब में एक पैसा नहीं था याकि दस रूपये लेकर चले थे और अब पचास लाख का फ्लैट है।

शेयर मार्केट वालों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है लेकिन एक दो हैं जो कि अपने पढ़ाई के समय बहुत उद्दंड माने जाते थे, बेहद गंदे बच्चे लेकिन इस समय करीब आठ-दस फ्लैटों के मालिक हैं।

और फिल्म इंडस्ट्री में तो ऐसे लोग भरे पड़े हैं जिन्होंने फुटपाथ से सफर शुरू किया और बंगले पर आ गये जैसे नौशाद, जिन्होंने अपने बंगले की गैलरी में खड़े होकर कहा था कि उस सड़क के उस फुटपाथ से इस बंगले तक आने में मुझे बीस साल लग गये। वहीं ऐसे भी हैं जो कि बंगले से झोपड़े में आ गये। भगवान दादा, बैजू बावरा का रोल करने वाले भारत भूषण ऐसे ही कुछ नाम हैं जिन्होंने अपने अंत समय में ये दिन भी देखे।

हांलाकि ऐसे लोगों की संख्या गिनती की होगी लेकिन हैं।

Khushdeep Sehgal said...

ए दिल, मुश्किल है जीना यहां,
ज़रा बच के, ज़रा हट के,
ये है बॉम्बे मेरी जान....

जय हिंद..

मनोज कुमार said...

हैप्पी फ़्रेंडशिप डे।

इसमें रिस्से-सन न हो!

प्रवीण पाण्डेय said...

हर आहट पर लगो, स्कैम आइ गयो रे,
मैं तो तन मन की सुधि बुधि भुलाय बैठी।

डॉ. मनोज मिश्र said...

@.....सोते जागते सपने दिखाती बम्बई.......पचास से पांच लाख बनाती बम्बई....... करोड़ से हजार पर लाने वाली बम्बई......
---आह मुंबई-वाह मुंबई.

रोहित बिष्ट said...

अच्छी पोस्ट,क्या यह पुरबिया भासा है?यह किलोज अर्थब्यवस्था क्या है?शुभकामनाएँ।

NiTiN Yadav said...

बढ़िया चित्रण किये है रिसेसन का :-)

डपल डिप रिसेसन , शेयर मार्केट और क्रेडिट रेटिंगवा , ई सब तो बड़े/माध्यम वर्ग के लोगो की टेंशन है. बेचारा गरीब तो महगाई से ही मरा जा रहा है. अब डपल डिप रिसेसन आये या फिर ट्रिपल डीप कौनो फरक नहीं पड़ता सर :-)

अनूप शुक्ल said...

मज्जे आ गये इसे बांचकर! मन का रिस्सेसन हवा हुइ गवा!

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.