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Wednesday, August 3, 2011

ब्लॉगिंग में 'क्या-वाद'

      जिस तरह साहित्य में छायावाद, आशावाद और तमाम  ब्ला-ब्लावाद आते रहे हैं, वैसे  ही ब्लॉगिंग में भी विभिन्न वाद आते जाते रहते हैं।  इन दिनों देख रहा हूं कि ब्लॉगिंग में ‘क्या-वाद’ आया है।  जहां देखो वहीं....... क्या हम ऐसा नहीं कर सकते.......क्या हमें ये हक नहीं है.....क्या ऐसा करना उचित है.....क्या लोगों को सोचना नहीं चाहिये.....क्या हमारा कर्तव्य नहीं बनता ....क्या ....क्या।


       इतने सारे ‘क्या’ देखकर कभी कभी आशंका होने लगती है कि – कहीं मैं किसी ‘क्याराष्ट्र’ में तो नहीं पहुंच गया जहां पर कि हर दो लाइन बाद क्या की क्यारी खुदी दिखती है :)

     खैर, लोगों के लिखने का अपना अपना स्टाइल है। कोई- कोई  'क्यावादी ब्लॉगर' सवाल पूछने के बाद उसका समाधान भी बताते चलता है, तो कोई 'क्यावादी'  केवल क्या क्या करते  सवाल पर सवाल दागता चला जाता है , समाधान गया तेल लेने।  वैसे जहां तक मुझे लगता है ये 'क्यावाद' कॉलेज के दौरान निबंध, वाद विवाद के लिये बड़े काम के थे । सामने वाले को दौड़ा कर पूछा जाता है – क्या भ्रष्टाचार रोकने की हमारी जिम्मेदारी नहीं है......क्या स्कूलों में डोनेशन लेकर एडमिशन कराना गलत नहीं है। पता चला जो छात्र यह सब पूछे जा रहा है, उसी के पिताजी कॉलेज के प्रिंसिपल हैं जिनपर कि पैसे लेकर एडमिशन देने और संस्था में भ्रष्टाचार का आरोप लगा है। शाम को घर जाने पर छात्र की कुटाई होती सो अलग। ससुरौ के.....ताली बटोर रहे थे....क्या क्या....कर रहे थे। देख नहीं रहे थे कि एनके बाप उहीं बइठे हैं और ईनको  क्या.... क्या....वाला कीड़ा काटा था :)

     सोचता हूं यही क्यावाद यदि संसद में आ जाये तो क्या हो। विपक्ष प्रधानमंत्री से कहेगा

– क्या भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते आपको कुर्सी नहीं छोड़नी चाहिये ?
– क्या जरूरी है कि सरकार पांच साल चलाया ही जाय, छोड़ क्यों नहीं देते ?
- क्या आपकी जिमेदारी नहीं है कि महंगाई कम हो ?

बदले में सरकार कहती....

- क्या आप लोगों को अब भी सरकार की नीयत में खोट दिखता है ?
- क्या कलमाड़ी और राजा से आप लोगों का पेट नहीं भरा ?
- क्या येदुरप्पा के बाद भी आप खुद को पाक साफ मानते हैं ?

और यही सब करते करते प्रश्नकाल ओवर :)

    चलिये, अब ऑफिस के लिये निकलूं, न बॉस कहेंगे -  क्या आप समय पर आने में शरमाते हैं,  क्या आपके समय पर आने से कहीं कुछ  बिगड़ जायगा..... क्या ...क्या क्या    :)

- सतीश पंचम

36 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

बढियां प्रसंग,यह भी खूब जमेगा,आभार.

प्रवीण पाण्डेय said...

हम तो क्यावादी पाठक हो गये हैं, हर घोटाले के बाद क्याआआआआआआआआआआ जैसा मुँह बा कर खड़े हो जाते हैं, विस्मयादिबोधक वाला।

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

क्या यह पोस्ट थोड़ी लंबी नहीं होनी चाहिए थी?

रचना said...

क्या !! ? आप के पास विषयों की कमी होगयी हैं ??

Poorviya said...

क्या ...क्या क्या :)


क्या yahi aap ki sabse umda post hai...

jai baba banaras.....

सञ्जय झा said...

kya.....pancham da'.......patsan ko
fintch ke jo resha niklte hain......
wysane nikal diye ? ja 'kyvad'.....


tapchik 'kavayad'.....'kyvad'

jai ho....

वाणी गीत said...

क्या हमेशा प्रश्न ही नहीं होता! कई बार जवाब भी क्या? की शक्ल में ही दे दिए जाते हैं , समझने की बात है !

सतीश पंचम said...

वाणी जी,

ज्यादातर 'क्यावादिता' में जवाब प्रश्नों के भीतर ही होता है :)

सतीश पंचम said...

निशांत जी, पोस्ट लंबी हो तो सकती थी लेकिन ज्यादा समय नहीं था इसलिये......:)

सतीश पंचम said...

रचना जी,

जानता हूं कि इस तरह से ब्लॉग ब्लॉगिंग ब्लॉगरी आधारित पोस्टें तब ही लिखी जाती हैं जब या तो लिखने को कुछ न हो या फिर प्रेम, भाईचारा डे मनाने का मन हो :)

लेकिन देख रहा था कि लोग 'क्यावादिता' को समझने के बावजूद कुछ लिख नहीं रहे, इशारा भी नहीं कर रहे कि शांत गदाधारी भीम शांत :)

....... तो मन में मौज लेने की बात आई और नतीजा सामने है :)्लॉग ब्लॉगिंग ब्लॉगरी आधारित पोस्टें तब ही लिखी जाती हैं जब या तो लिखने को कुछ न हो या फिर प्रेम, भाईचारा डे मनाने का मन हो :)

लेकिन देख रहा था कि लोग 'क्यावादिता' को समझने के बावजूद कुछ लिख नहीं रहे, इशारा भी नहीं कर रहे कि शांत गदाधारी भीम शांत :)

....... तो मन में मौज लेने की बात आई और नतीजा सामने है :)

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज 03- 08 - 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
____________________________________

anshumala said...
This comment has been removed by the author.
रचना said...

आज कल लोग "क्या" को खाने भी लगे हैं
मेरा 'क्या ?" अंशुमाला उदरस्थ कर चुकी हैं
और देखिये उसके बाद रचना , रचान बन गयी पर जी सही हैं

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी,

कभी कभी मेरा नोकिया सी 3 रजनीकांत की तरह बिहेव करता है :)

"मय येक बार बोलेन्गा तो मल्टीपल टेम समजणे का" :)

इसलिये कभी कभी एक बार लिखे कमेंट को दो बार परोस देता है :) संभवतः इसी वजह से वह कमेंट दुहरा उठा ।

varsha said...

KYA TIPPANIYA HAIN ????
dhyaan se padhiyega donon hi bhaav nazar aaenge.

vidhya said...

बढियां प्रसंग,
लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

rashmi ravija said...

क्या इन टिप्पणियों ने पोस्ट को रोचक से अति-रोचक नहीं बना दिया...:)

रोहित बिष्ट said...

सहमत हूँ टिप्पणियाँ पढने का आनंद आया,भई क्या बात है?

Deepak Saini said...

वाह, क्या "क्या" है

मीनाक्षी said...

क्या...'क्यावादिता' समझना ज़रूरी है?
क्या...समझ कर फिर लिखना ज़रूरी है?
क्या...हम 'क्या-वाद' के बिना नहीं रह सकते ?

अनामिका की सदायें ...... said...

kya aap bhi pancham daa ...

ha.ha.ha.

Gyandutt Pandey said...

एल्लो, हम सोचते थे बकवाद ही चल रहा है। क्यावाद आ गया! :)

anshumala said...

रचना जी माफ़ी चाहती हूँ मैंने ध्यान नहीं दिया की आप के नाम का अनुवाद ( लिखते तो रोमन में है ना ) गलत हुआ है |
क्या रचना जी को एक बार जवाब लिखना काफी नहीं था
क्या एक ही जवाब दो बार लिखना जरुरी था :))
क्या क्यावादी पोस्टे पढ़ना जरुरी है
क्या उनके सवाल पढ़ने लायक होते है
क्या उनके समाधान भी समाधान कहलाने लायक होते है
क्या - - - - -
क्या - - - ---
क्या - - - - -

Vivek Rastogi said...

ये सब "क्या" चल रहा है । अब तो हम भी क्यावाद को समझने लगे हैं.. और आप क्यावाद के जनक ।

सतीश पंचम said...

अंशुमाला जी / रचना जी,

मुंबई के (BEST) वाले लाईट बिल में एक स्टार (*) के साथ लिखा होता है - भूल चूक लेणी देणी :)

फिलहाल टिप्पणियों में जो नाम लिखते हुए भूल चूक हुई, इसे देख BEST का बिल बरबस याद आ गया :)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

क्या दूसरे नम्बर पर उपदेश वाद है?

Arvind Mishra said...

क्या आपने सुश्री रचना जी के प्रशन का संतोषजनक और सम्मानजनक उत्तर दे दिया है ? :)

ajit gupta said...

यह संशयवाद है। कुछ लोग हमेश्‍ाा संशय में ही बने रहते हैं।

मनोज कुमार said...

अगर क्या न होता तो क्या होता, ... न जाने क्या-क्या होता!

रचना said...

क्या से पहचान क्या हुई
बात लेने देने पर ख़तम हुई
क्या हर भूल
क्या हर चूक
का सार
बस लेना और देना हैं

सतीश पंचम said...

ये तो रचना जी आपने अच्छी खासी कविता रच दी :)

Dilbag Virk said...

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है , कृपया पधारें
चर्चा मंच

अनूप शुक्ल said...

आप पर कोई भी क्या-वाद का जनक होने का आरोप लगा सकता है। लेकिन आप अपने बचाव के लिये रघुवीर सहाय जी को इसका दोषी ठहरा सकते हैं आखिर किसी वाद के जनक का डी.एन.ए. टेस्ट तो होता नहीं है। रघुवीर सहाय जी ने लिखा था-

अगर कहीं मैं तोता होता
तोता होता तो क्या होता?
तोता होता।
होता तो फिर?

होता, 'फिर' क्या?
होता क्या? मैं तोता होता।
तोता तोता तोता तोता
तो तो तो तो ता ता ता ता
बोल पट्ठे सीता राम

Khushdeep Sehgal said...

क्या टिप्पणी देना ज़रूरी है...

जय हिंद...

अरुण राजनाथ / अरुण कुमार said...

ek baar maine 'kya' kahne ke liye munh khola to patni daant ke boli, "Kya munh kholte ho, aise munh Italy me paye jaate hain aur log unme raakh jhadte hain, band karo munh !"

Rahul Singh said...

ये क्‍या-क्‍या, क्‍या हो रहा है?

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