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Saturday, July 30, 2011

'गटारी' सेलिब्रेशन

     कहा जाता है कि शराब ऐसी चीज है जिसे लेकर शायर लोग तनिक ज्यादा ही भावुक होते हैं, कोई शराब को खराब बताये तो अगिया बैताल हो जाते हैं।  ताना मारते हुए कह भी देंगे कि तुम क्या जानों शराब क्या चीज है।  आये तो हो बड़े शुचितावादी बनकर, लेकिन जिस सड़क पर खड़े हो उसमें आबकारी टैक्स से मिले पैसों का भी हिस्सा है। न जाने देश के कितने बांध, कितनी सड़के शराबियों के टैक्स देने के बल पर बने हैं और अब भी बने जा रहे हैं। 

  इतना ही नहीं, कुछ अति संवेदनशील कवि तो तमाम मौजूदा चीजों से तुलना कर साबित करने लगेंगे कि शराब बहुत बढ़िया चीज है, इसे वो न समझो,  फलां न जानो। ऐसा ही किसी शायर ने कभी कहा था कि -  अरे यह मय है मय, मग़स ( मधुमक्खी) की कै तो नहीं।

   बहरहाल इस वक्त जब मैं यह लेख लिख रहा हूं तब यहां मुंबई तमाम शराब की दुकानें, बार, पब गुलज़ार हैं। मौका है विशेष शराब सेवन का जिसे कि स्थानीय भाषा में 'गटारी' कहा जाता है। यह गटारी अक्सर श्रावण महीने से जोड़कर देखा जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि श्रावण महीने में  मांस-मदिरा आदि का सेवन नहीं करना चाहिये।  दाढ़ी और बाल काटने से भी बचने की कोशिश होती है। इसलिये जो पियक्कड़ होते हैं वह श्रावण आने के पहले ही जुट लेते हैं क्योंकि अगले एक महीने तक सुखाड़ रहेगा। यह अलग बात है कि कुछ लोग 'गटारी' वाले दिन को एक्सट्रा लेने के बाद पूरे श्रावण महिने में भी डोज लेते रहने से नहीं चूकते। उनका डोज मिस नहीं होना चाहिये। कई शराबी तो यह कहते पाये जाते हैं कि न पिउं तो हाथ पैर कांपने लगते हैं। कोई काम नहीं होता :)  

   दूसरी ओर 'गटारी' शब्द को लेकर भी बड़ी मौजूं बात सुनने में आई है जिसके अनुसार शराबी इसे गटारी अमावस्या इसलिये कहते हैं क्योंकि इस दिन ढेर सारी शराब गटक कर  गटर में गिरने का दिन होता है। यह अलग बात है कि मुंबई के गटर अब कंक्रीट के जंगलों से ढंक चुके हैं।  इस गटारी अमावस्या के बारे में यहां तक प्रचलित है कि कुछ कम्पनियों में वर्करों को इस दिन के लिये विशेष भत्ता दिया जाता है। उस भत्ते को 'खरची' का नाम दिया जाता है। कहीं भी गटारी शब्द का उल्लेख नहीं होता। बाद में मिली हुई इस 'खरची' को वर्कर की तनख्वाह में से एडजस्ट कर लिया जाता है। यह सिलसिला काफी पहले से चला आ रहा है।

  इस गटारी के कुछ साइड इफेक्ट भी दिखते हैं जैसे कि थर्ड शिफ्ट में काम करने वालों की संख्या में उस दिन भारी कमी आती है। लोग एब्सेंट ज्यादा होते हैं। प्रॉडक्शन घटता है। निर्माण क्षेत्र से जुड़े कार्यों पर भी असर पड़ता है। दूसरी ओर पुलिस को भी काफी मुस्तैदी रखनी पड़ती है। बार आदि अलग से टेबल लगवाते हैं या कुछ इंतजाम करते हैं। कुल मिलाकर वह सारा कुछ होता है जो शराब के धंधे, उससे जुड़े फायदों नफा नुकसान आदि से जुड़ा होता है।

     एक चलन यह भी देखा गया है कि पहले जहां गटारी केवल एक शाम की होती थी अब उसमें तीन चार शामें होने लगी हैं। पीने वालों की संख्या बदस्तूर बढ़ती जा रही है। बस मौका होना चाहिये। वैसे भी माना जाता है कि पीने वालों को पीने का बहाना चाहिये :) 

      चलते चलते कुछ शराब से जुड़ी पंक्तियां ।  जहां तक मैं समझता हूँ शराब अच्छी चीज है या बुरी यह अलग बात है लेकिन शराब को लेकर जो शेर बने हैं वो काफी दिलकश हैं। मसलन,  

देखा किये वो मस्त निगाहों से बार बार
जब तक शराब आये, कई दौर हो गये

************

मेरी तबाही का इल्जाम अब शराब पे है
मैं करता भी क्या तुम पे आ रही थी बात
************

रह गई जाम में अंगड़ाइयां लेके शराब
हमसे मांगी न गई उनसे पिलाई न गई

************

जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर
या वो जगह बता जहां पर खुदा ना हो

************


   फिलहाल प्यासा फिल्म देख रहा हूँ।  गजब की पंक्तियां हैं इस फिल्म में।

आज सजन मोहे अंग लगा लो जनम सफल हो जाय......ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है.....हम आपकी आँखों में इस दिल को बसा दें तो......वाह साहिर लुधियानवी.....वाह !

- सतीश पंचम 

13 comments:

rashmi ravija said...

अच्छा हुआ आपने लिखा...मैं चाहती थी..महाराष्ट्र की इस अनोखी प्रथा के बारे में लोग जानें...'गटारी'शब्द की उत्पत्ति भी बहुत ही रोचक है...

पर हमारे उत्तर भारतीय साथी..इस 'गटारी' में उनका साथ नहीं दे पाते ...क्यूंकि उनका श्रावण तो पंद्रह दिन पहले ही शुरू हो जाता है..:)

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

गटारी के बारे में पहली बार जाना, शुक्रिया।

प्रवीण पाण्डेय said...

हमारे विकास का सुदृढ़ आधार, शराब। नशा ही नशा, सड़कें ही सड़कें।

Arvind Mishra said...

गटारी और गटर का रिश्ता रोचक है!

Udan Tashtari said...

गटारी के बारे में जानना रोचक रहा!!

Kajal Kumar said...

आपने तो यह बता कर धर्मसंकट में ही डाल दिया कि सड़कें भी गटारी-कर से बनाई जाती हैं...अब समझ आया कि इन सड़कों पर आए दिन झूमती-झामती गाड़ियों में टक्करें क्यों होती रहती हैं.. कुछ असर तो टायरों पर भी होता ही होगा न !
:)

मनोज कुमार said...

गटारी के बारे में जानकारी मिली।

पोस्ट के बाक़ी भाग के लिए कुछ अर्ज़ है ...

* पिन्हा है मस्तियां जो किसी के शबाब में,
वो क़ैफ़, वो सुरूर, कहां है शराब में।

**औरों के लिए गुनाह सही, हमारे शबाब बनती है,
लाख ग़मों को निचोड़ने के बाद एक क़तरा शराब बनती है।

*** मैं भी कहां उलझ गया

अभी तो हाथ में जाम है
तौवा कितना काम है ।

फुरसत मिलेगी तो देखा जाएगा ।
दुनिया के बार में सोचा जाएगा ।

अनूप शुक्ल said...

मजेदार है गटारी कथा।

Rahul Singh said...

पूरी संभावना कि पोस्‍ट प्रेरक साबित होगी.

Vivek Rastogi said...

चलो आज यह तो पता चल गया कि सड़कें बाँध वगैराह इन शराबियों की देन है, धन्य हो शराबी ।

"गटारी" के बारे में पहली बार सुना । हालांकि खरची शब्द सुना हुआ था।

डॉ. मनोज मिश्र said...

@ 'गटारी' ---
एक नया ज्ञान ,आभार.

Gyandutt Pandey said...

अच्छा लगा गटारी। मुझे आशा थी कि यह गटर से निकला (या गटर में घुसा) होगा! :D

GGS said...

GGShaikh said:

पाबंदियाँ हमें पसंद नहीं,
पवित्र दिनों में अपवित्र दिन याद न आए
इसलिए आज गटारी पर कोई पाबंदी नहीं...
हमारे यहाँ ज़्यादा पीने वालों को 'गराड़ी' कहते हैं
उसका शायद इस 'गटारी' (देवदास) से कोई
संबंध हो.

दो शेर और शराब पर:

- "देहरो हरम में बसने वालो
मैख़ानों में फूट न डालो"

-"शब(रात)है इस वक़्त कोई दर न खुला पाओगे
आओ मैख़ाने का दरवाज़ा खुला है यारो"

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