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Sunday, July 31, 2011

काव्य गोष्ठी की कुर्सी से .........

इस वक्त सोमैया कालेज द्वारा आयोजित प्रेमचंद के 131 वें जन्मोत्सव की
एक काव्य गोष्ठी में बैठा हूँ। नक्श लायलपुरी जी अगोर रहे हैं अपने
काव्यपाठ के लिये लेकिन दीप प्रज्वलन, पुष्प गुच्छ वितरण के बाद अब
संभाषण चल रहा है। हर कोई कह रहा है कि मैं ज्यादा समय नहीं लूंगा, लेकिन
फिर भी लिये जा रहा है :)

नक्श लायलपुरी जी थोड़ा और अगोरें :) तब तक मैं नोकिया सी 3 से टिपिर
टिपिर टाप लूं :)

- सतीश पंचम

--
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- Satish Pancham

32 comments:

सतीश पंचम said...

अपडेट - बाहर तेज बरसात के बीच भीतर साहित्य की फुहार ने रफ्तार पकड़ ली है। होरी, धनिया, चमारिन सिलिया, कफन, पूस की रात का उल्लेख रोचक ढंग से हो रहा है। चाहता हूं कि यह फुहार और पड़े।

Kajal Kumar said...

यह कालेज कहां है, मुंबई में ?

सतीश पंचम said...

जी हां काजल जी, मुंबई के विद्याविहार मे है।

सतीश पंचम said...

अपडेट 2- प्रेमचंद रचित गाँव के लोग अलग किस्म के थे। रागदरबारी के लोग अलग। गांव के बेईमानों का सशक्त चित्रण रागदरबारी में हुआ है।

परिचर्चा चालू आहे........

डॉ. मनोज मिश्र said...

रपट का इंतज़ार ................

सतीश पंचम said...

अपडेट- 3

एक चमारिन से रिश्ता बनाये ब्राह्मण मातादीन के मुंह में हड्डी डालने जैसा दृश्य उस जमाने में रच देना किसी क्रांति से कम नहीं था। फिर प्रेमचंद दलित विरोधी क्यों कर।

परिचर्चा चालू आहे.......

डॉ. मनोज मिश्र said...

प्रेमचंद के 131 वें जन्मोत्सव में शिरकत कर रहे आदरणीय जनों को एक खबर भी बता दीजिये कि आज ऐसा भी समय आ चुका है कि आज उनके गांव लमही वालों और खुद ग्राम प्रधान को भी नही पता कि प्रेमचंद जी क्या थे .(कल के हिंदुस्तान समाचार पत्र में इस तथ्य का खुलासा किया गया था.)

सतीश पंचम said...

अपडेट 4 - गोबर लौटकर गाँव नहीं आया। माईग्रेशन ने गुल खिलाया ......

हमारे गांव का गोबर लखनऊ में है......पूंजीवाद सब सोख लेता है।

परिचर्चा चालू आहे

सतीश पंचम said...

अपडेट-

नक्श लायलपुरी, इब्राहीम अश्क, राजदान राज......

भरी बारिश में साहित्य की फुहार पड़ने का अंदेशा है :)

प्रवीण पाण्डेय said...

C3 का सफल प्रयोग। जय हो।

सतीश पंचम said...

टप टप चुए हमरी मड़इया
नैनवा में चुए मोरा लोर
कारी बदरिया में सजना संवरिया.....

- शैलेष थीवास्तव के काव्यपाठ से

सतीश पंचम said...

तेरी जमीं से उठेंगे तो आसमां होंगे
अब ऐसे लोग फिर कहां होंगे
******

परिंदे जब भी नये गीत गाने लगते है
तमाम दर्द के मौसम सुहाने लगते है
हमारी नींद भी हमको जगाये रखती है
पलक झपकते ही कुछ खाब से आने लगते है
........

तलाशे यार है दो चार दिन की बात नही है
ये वो सबर है जिसमें जमाने लगते हैं।
********
राह में रंज के असबाब बहुत सारे है
जिंदगी कम है मगर ख्वाब बहुत सारे है
......
हर कदम पर सैलाब बहुत सारे है
.......
लोग इस दुनिया में बेताब बहुत सारे हैं
.....

- इब्राहीम अश्क

Rahul Singh said...

एकदम लाइव, कितना बेसब्र बना दिया है इन सुविधाओं ने हमें.

सतीश पंचम said...

न घर अपना न दर अपना
जो कमियां हैं वो कमियां हैं
...........
मैं घुटने टेक दूं
तुम इतना मजबूर मत करना
........

मुझे बरबाद करने का जरा बीड़ा उठाओ तो
...ैं घुटने टेक दूं
तुम इतना मजबूर मत करना
........

मुझे बरबाद करने का जरा बीड़ा उठाओ तो
...

सतीश पंचम said...

पहले मैं पागल था यह समझा हूं अब मैं
अब मैं पागल हूँ यह समझूंगा कब मैं

- राजदान राज

सतीश पंचम said...

छलनी दिल की खाली झोली कौन अचानक कर जाता है
..........

राज इस दौर में इल्म है इतना
सबको सब मालूम है लेकिन
सबसे मिलकर ये जाना
किसी को कुछ मालूम नहीं

- राजदान राज

सतीश पंचम said...

तेज झोंके हैं हवा के
रस भरी बरसात है
सच तो ये है
उम्र के मौसम की ये सौगात है
........
.......
********
दिख रहे कितने भले
बदली हुई सी चाल है
हाथ मे बर्छे के पहले
अब न बिकती ढाल है
.....
.......
*********

आग बबूला कब तक न होता सूरज
चंदा भी सागर को क्यों न उकसाता
.......

- नेहा वैद्य बरसात है
सच तो ये है
उम्र के मौसम की ये सौगात है
........
.......
********
दिख रहे कितने भले
बदली हुई सी चाल है
हाथ मे बर्छे के पहले
अब न बिकती ढाल है
.....
.......
*********

आग बबूला कब तक न होता सूरज
चंदा भी सागर को क्यों न उकसाता
.......

- नेहा वैद्य

सतीश पंचम said...

पास मेरे कुछ भी नही
पर शराफत है तो है
बोलना सच भी अगर
बगावत है
तो है

है न गजलें
मगर वे फिर भी शायर बन गये
चीख कर माईक पर पढ़ना गर
हिमाकत है
तो है

जब वे तरन्नुम में हों तो लगे कि
बकरा गा रहा है
........
******

वो कुंआरे हैं इसकी न उन्हें फिक्र है,
जब पूरी हो जरूरत बाहर,
तो है,
तो है।

बोलना सच भी गर
बगावत है
तो है

सतीश पंचम said...

कोई संत नहीं होता है
खुशबू नही जड़ी होती है
एक विशिष्ट खुशबू होती है
बाकी तो लकड़ी होती है

- भोपाल के यादव जी का काव्य

सतीश पंचम said...

चलिये अब चली चला की बेला आ गई। डिनर शुरू, हम भी चले।

इति काव्य गोष्ठीयम .....यम यम गुलाब जामुनम्......बिरियानीयम्.......अचार पापड़म्...... :)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

वाह-वाह !!!
जब आप भोजन में मस्त हो लिए तो हम भी चलते हैं। नखलौ भी प्रेमचंद छाये रहे।

Arvind Mishra said...

वाह पूरी साहित्यिक गोष्ठी और काव्य चर्चा का आस्वादन करा दिया -और डिनर के समय चलता बने ..एकाध पोहा -उसल का भी तो चिर वित्र लेना था न ...मुम्बई में भी प्रेमचंद आज भी चर्चित होते हैं -साहित्य की विजय है यह -ब्लागिंग की विजय आप सरीखे युवाओं के हाथ है -रखना किश्ती संभाल के ....क्या खूब अपडेट दिए हैं !

सतीश पंचम said...

@ कितना बेसब्र बना दिया है इन सुविधाओं ने हमें.

----------

जी हां राहुल जी, कुछ यही भाव वहां मौजूद इब्राहीम 'अश्क' जी ने भी अभिव्यक्त किये थे कि -

हर कदम पर सैलाब बहुत सारे है
लोग इस दुनिया में बेताब बहुत सारे हैं

सतीश पंचम said...

मनोज जी,

मैंने एक बार सोचा जरूर कि इस बात को वहां शेयर किया जाय लेकिन बाहर हो रही तेज बारिश के बीच जल्दी जल्दी प्रोग्राम खत्म करने का आयोजकों का मन था। फिर यह भी आशंका लगी थी कि पता नहीं बारिश के चलते ट्रेन कहीं बंद न हो जाय।

सो वहां दूर दूर से आये उपस्थित लोगों के समय का ख्याल कर शेयर नहीं किया। अगली बार कभी इस तरह का कार्यक्रम हुआ तो लोगो को जरूर बताउंगा कि केवल उपस्थित सभागार के लोग ही नहीं बल्कि ब्लॉग के माध्यम से तत्क्षण.... जौनपुर, बनारस, बेगलुरू, रायपुर, दिल्ली आदि से लोग कमेंट के जरिये आप लोगो के कार्यक्रम में सहभागी हो रहे हैं :)

सतीश पंचम said...

प्रवीण जी,

इस हिंदी कीबोर्ड वाले नोकिया c3 के खरीदवाने में आपका ही योगदान है :)

जय हो !

सतीश पंचम said...

सिद्धार्थ जी,

कार्यक्रम के पहले गिरिजेश जी से फोन पर बात हुई तो पता चला आप भी नखलऊए में डटे हैं :)

फिर साहित्य रस तो बरसना ही था :)

सतीश पंचम said...

अरविंद जी,

इस स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिये बहुत आभार।

दरअसल मैं बिना डिनर के ही बाहर निकल रहा था लेकिन आयोजकों ने घेर कर कहा कि आप लोग नजदीक के हैं तब क्यों भाग रहे हैं।
दूर वालों को इसलिये भोजन की जबरी कर रहे हैं कि रास्ते में पता नहीं ट्रेन कितना लेट हो, कैसे पहुंचे, कब पहुंचे।

कम से कम जिन लोगों को कल्याण डोंबिवली जैसे दूरस्थ स्थानों पर जाना है उन्हें तो डिनर में साथ दिजिये वरना वो लोग अकता कर जल्दीबाजी में भोजन कम करेंगे :)

सो अपन भी डट लिये :)

सञ्जय झा said...

badhiya up-date.......

nokiya c-3

aur apka....

jai ho..

दीपक बाबा said...

वाह नवीन टेक्नोलोजी के नवीनतम प्रयोग कोई आपसे सीखे......


@होरी, धनिया, चमारिन सिलिया, कफन, पूस की रात का उल्लेख रोचक ढंग से हो रहा है

और हमारा मन भी उधर ही भटक गया.

Gyandutt Pandey said...

ट्विटर पर ठेले होते! :D

अनूप शुक्ल said...

अपडेट ठेले अच्छा किया। यहीं ठेले और अच्छा किया। जय हो!

सतीश पंचम said...

ज्ञान जी, अनूप जी

ट्विटर को मैं आत्मसात नहीं कर पाया इसलिये वहां नहीं ठेला।

चूंकि ब्लॉगरी रूचिकर लग रही थी और वहां बैठे बैठे मनचाहे साइज में अपडेट करने में आनंद भी आ रहा था इसलिये यहीं बना रहा :)

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