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Saturday, July 30, 2011

फिल्मी बतकूचन

       अभी उस दिन गिरिजेश जी से चैट के दौरान चर्चा चली कि डेल्ही बेली में जिस तरह गालियों की भरमार है कहीं वह फिल्मजगत की 'काशी का अस्सी' न बन जाय। बता दूं कि काशी का अस्सी में भी गालियां खूब हैं लेकिन अपने सहज सरल अंदाज में। भोसड़ी के, गंडउगदर....ऐसे तमाम शब्द हैं जो कॉमन लेवल पर खुलकर लिखे गये हैं।  इस पर गिरिजेश का कहना था कि मंटो पढ़ने में और कर्नल रंजीत पढ़ने में फर्क है। बात में काफी दम लगा। मंटो को पढ़ते हुए एक किस्म की चकित और आसन्न उघढ़पने का अंदशा रहता है कि जाने कब मंटो अपने लेखन में अंग विशेष को ले सामाजिक तानेबाने को उधेड़ देंगे। दूसरी ओर कर्नल रंजीत पढ़ते हुए लगता है कि बंदा नाभि केन्द्रित लेखन की ओर लुढ़का  है, जान बूझकर जगह अजगह घेर घेरकर चफनउवल दर्शाया गया है। 

     खैर, अभी हाल ही में मुझे भी डेल्ही बेली देखने का मौका मिला। अरविंद जी ने तो चेता दिया था कि खराब है, गलीज किस्म की फिल्म है लेकिन जब मूड बना कि देखा जाय तो देख लिया। देखने पर यही लगा कि फिल्म अकेले या यार दोस्तों के साथ तो देखी जा सकती है लेकिन परिवार के साथ नहीं। गालियां जो हैं सो आम स्टाईल वाली ही हैं लेकिन देखा गया है कि जो बंदे इतने बेबाक होकर एक दूसरे से मेलजोल रखते हैं, कपड़े शेयर करते हैं,  उनके बीच गालियों का एक पैटर्न होता है जोकि यहां नहीं दिख रहा। लगा कि जहां गाली दे सकते थे वहां न देकर किसी और जगह पर जबर्दस्ती गाली ठूंसी गई है। फिल्म की एक और खामी लगी कि कुछ फालतू के टॉयलेट सीन घुसेड़े गये हैं जिनकी कि जरूरत नहीं थी। हास्य के नाम पर फूहड़पन को ज्यादा तवज्जो दी गई। 

    शुरूवात में नेमिंग के आसपास वाले दृश्य काफी अच्छे से रखे गये जिनमें नल से टपकते पानी और बैकग्राउण्ड में के.एल.सहगल की स्टाइल में किसी का गाना रोचक रहा। पूरी फिल्म देखने के बाद लगा कि अमेरिकन पाई का कमजोर इंडियन वर्शन है।  जिस तरह से कहानी थी उस हिसाब से अश्लीलता कम करके भी फिल्म के कुछ दृश्य बेहद रोचक बनाये जा सकते थे लेकिन उद्देश्य जब फूहड़ता और अश्लीलता दिखाने का ही हो तो दृश्य और तकनीक गई तेल लेने, उन्हें जो दिखाना था वह दिखाया उन्होंने, जिसे देखना होगा देखेगा, न देखना होगा तो नहीं देखेगा। सीधा सा फंडा है। 

       बाकि, मुझे तो इस फिल्म का एक फायदा यह जरूर दिख रहा है कि इसके आने से चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी द्वारा 'काशी का अस्सी' पर बन रही फिल्म को  सेंसर बोर्ड से पास कराना आसान हो जायगा और होना भी चाहिये।  कहा जा सकता है कि जब डेल्ही बेल्ही अपनी फट्टू गालीयों के साथ पास हो सकती है तो सहज अंदाज में लिखी गई 'काशी का अस्सी' वाली गालियां क्यों नहीं। एक तरह से डेल्ही बेल्ही ने सेंसर के दरवाजे तक एक गालीयों भरी  पगडंडी तैयार की है जिसपर आगे आने वाली ढेरों फिल्मों के लिये रास्ते आसान हो गये है।  देखते हैं, यह पगडंडी आगे किन किन तरह की फिल्मों के लिये  रास्ते का काम करती है।  

 फिलहाल तो चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी के काशी के अस्सी का बेसब्री से इंतजार है।
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  चलते चलते -

 मेरे फोटो ब्लॉग Thoughts Of a Lens से पेश है एक छायाचित्र जिसे मैंने एक सुबह गाँव में खेंचा था 




- सतीश पंचम

8 comments:

Kajal Kumar said...

फ़िल्म के बारे में तो पता नहीं. पर हां, अगर आपकी यह पोस्ट देश के प्रख्यात people against animal cruelty वालों ने देख ली तो... बस आप तो गए समझो
:)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अरविंद जी के बाद आपकी पोस्ट ने अब यह पक्का कर दिया कि देल्ही बेली की ओर मेरे जाने का कोई आसार नहीं है। बढ़िया बता दिया आपने।

प्रवीण पाण्डेय said...

न देखी है, न देखने का मन है। चित्र पर गजब का है।

Arvind Mishra said...

लगा कि जहां गाली दे सकते थे वहां न देकर किसी और जगह पर जबर्दस्ती गाली ठूंसी गई है। फिल्म की एक और खामी लगी कि कुछ फालतू के टॉयलेट सीन घुसेड़े गये हैं जिनकी कि जरूरत नहीं थी। हास्य के नाम पर फूहड़पन को ज्यादा तवज्जो दी गई।
बिलकुल यही बात! यह एक भोंडी फिल्म है !

सतीश पंचम said...

@ अगर आपकी यह पोस्ट देश के प्रख्यात people against animal cruelty वालों ने देख ली तो... बस आप तो गए समझो
:)
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काजल जी,

अपन तो ऐसे वजहों से जेल वेल जाने के लिये तैयार हैं, लेकिन वोइच कलमाड़ी जैसी फैसिलिटी मांगता.....कलमाडी के पास जैसे चाय पिलाने वाले अफसर थे वैसे अफसर मेरे पास भी होने चाहिये तब तो मैं जेल जाउंगा वरना आपके उस 'मुकर क्यों नहीं जाते' वाले कार्टून की तरह मुकर जाउंगा कि इस तोते को किसी ने भी अपने कब्जे में नहीं रखा बल्कि इस तोते ने ही पिंजरे पर कब्जा कर रखा है। सुबह पिंजरा खोल दिया जाता है, शाम तक यह लौट कर फिर वापस आ जाता है। पिछले कई महीनों से इसी तरह तोते द्वारा पिंजरे पर कब्जा चालू है। और तो और तोते ने किराया भी नहीं दिया। जब मांगो तो किसी पक्षी प्रेमी द्वारा धर पकड़ करा दिये जाने की धमकी देता है। इसलिये कार्यवाही करनी हो तो तोते पर करें :)

bhuvnesh sharma said...

काशी के अस्‍सी पर फिल्‍म बन रही है..बहुत अच्‍छी बात पता चली...
शुक्रिया

डॉ. मनोज मिश्र said...

@देखने पर यही लगा कि फिल्म अकेले या यार दोस्तों के साथ तो देखी जा सकती है लेकिन परिवार के साथ नहीं।
-----अस्सी के होली मिलन का भी यही हाल है,आभार.

Gyandutt Pandey said...

सुग्गा बड़ा मस्त पकड़े हयेन! बिटिया के हाथे होत त अऊर मस्त फोटो लागत!

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