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Monday, July 25, 2011

लाखों की बात

     अक्सर समाचारों में पढ़ने मिलता है कि फर्जी मेडिकल बिल के जरिये लोगों ने इंश्योरेंस कंपनियों को चूना लगाया याकि किसी ने जान बूझकर कम्पेन्सेशन लेने के लिये चोट लगने या अंग भंग होने का बहाना बनाया। ऐसे लोग  इंश्योर्ड अमाउंट वसूलने के लिये बीमार और असहाय बनने से लेकर वो सारी तिकड़में अपनाते हैं जो कि इंश्योरेंस कंपनी से मोटी रकम दिला सके ।  यह अलग बात है कि कुछ ऐसे भी हैं जो कि इस तरह के हथकंडे इसलिये नहीं अपनाते क्योंकि उनका मानना है कि झूठ-मूठ की बीमारी के जरिये लाभार्जन करने पर कल को कहीं सचमुच ही कोई बीमारी न गले पड़ जाय। इस तरह की मानसिकता वाले लोगों की संख्या अच्छी खासी है जो कि ईश्वरीय दंड के अंदेशों के चलते ऐसे हथकण्डों से दूर रहते है। लेकिन उनका क्या जिनका खर्चा पानी ही इस तरह के कम्पेन्सेशन दावों के चलते निकल रहा होता है ? ऐसे लोग यह नहीं देखते कि क्या सही है क्या गलत, बस उन्हें मतलब है कम्पेन्सेशन के पैसों से चाहे असल चोट हो या बनावटी। कुछ इसी सब्जेक्ट को लेकर बनी थी फिल्म 'लाखों की बात' जिसमें कि संजीव कुमार और फारूख़ शेख के जरिये बासु चटर्जी ने इस मसले को बड़े ही मनोरंजक अंदाज में पेश किया था। अभी जब इस फिल्म को दुबारा डीवीडी पर देखा तो लगा कि इस फिल्म की चर्चा करनी चाहिये क्योंकि कमलेश्वर द्वारा लिखी यह फिल्म बेहद अलग सब्जेक्ट पर बनी है।

     फिल्म की कहानी में आलोक ( फारूख़ शेख) एक प्रेस फोटोग्राफर है जो कि एक अखबार में स्पोर्टस सेक्शन के लिये तस्वीरें कवर करता है। आलोक का जीजा प्रेम ( संजीव कुमार) एक वकील है जिसकी कि वकालत कम चलती है इसलिये  खर्च निकालने के लिये अक्सर ऐसे लोगों का केस लेता है जोकि किसी चोट के चलते किसी से हर्जाना आदि वसूल करना चाहते हों। यहां तक कि केले के छिलके से फिसल कर गिरे एक शख्स को भी हर्जाना दिलाने के लिये तैयार हो जाता है क्योंकि वह केले का छिलका एक दुकान के बाहर था और यह उस दुकान वाले  की गलती थी कि उसने अपनी दुकान के सामने से केले का छिलका नहीं हटाया था। यहां भी वकील प्रेम की चिंता यह थी कि थोड़ा आगे वाली नामी फर्म के सामने पड़े केले के छिलके से फिसलकर ये शख्स  गिरा होता तो फर्म से ज्यादा पैसे ऐंठे जा सकते थे।

  खैर, एक दिन आलोक महिला हाकी का मैच कवर करने जाता है और हाकी की गेंद सीधे आलोक के सिर पर आ लगती है। आलोक थोड़ी देर के लिये बेहोश हो जाता है। उसे अस्पताल ले जाया जाता है। आलोक के जीजा प्रेम को जब पता चलता है तो वह इस मामूली चोट के बदले अखबार वालों से हर्जाने के तौर पर रूपये ऐंठने का प्लान बनाता है। आलोक की मां से पता चलता है कि बचपन में आलोक को स्पाइनल कॉर्ड में चोट लगी थी। आलोक की मेडिकल हिस्ट्री जानने के बाद वकील प्रेम अपने साले आलोक के अखबार से बीस लाख के हर्जाने का दावा करता है क्योंकि उसी के कवरेज करते समय नौकरी करते समय आलोक को चोट लगी और उसके स्पाइनल कॉर्ड पर चोट लगी। 

रुंगटा सेठ ( Pinchoo Kapur)
   इधर आलोक होश में आ जाता है और अस्पताल से घर जाना चाहता है। प्रेम उसे समझाता है कि थोड़ा चोट लगने की एक्टिंग करो ताकि तुम्हारे अखबार  से कुछ रूपये मिल सकें ताकि तुम्हारा भी काम बने मेरा भी। लेकिन आलोक तैयार नहीं होता। इसी बीच आलोक की तलाकशुदा पत्नी शोभा ( अनीता राज) को पता चलता है कि आलोक को चोट लगी है, वह उसे अस्पताल में देखने आती है। आलोक हांलाकि शोभा को तलाक दे चुका है लेकिन अब भी उसके मन में शोभा के लिये प्यार है और वो चाहता है कि वह फिर से वापस आये। आलोक का जीजा प्रेम इस सॉफ्ट कॉर्नर को समझ जाता है और साले को समझाता है कि तुम यदि इसी तरह चोटिल बने रहो तो शोभा तुम्हें यूं ही मिलने आया करेगी और तुम फिर से उसे पा सकोगे। अखबार से पैसे मिलेंगे सो अलग। आलोक किसी तरह तैयार होता है। 

  इसके आगे शुरू होती है अखबार के मालिक रूंगटा सेठ और वकील प्रेम के बीच रस्साकशी। रूंगटा सेठ पीसा (  हां पैसे को पीसा ही बोलते हैं अभिनेता पिंछू कपूर :)  देने से इन्कार करता है। प्रेम यह खबर रूंगटा सेठ के प्रतिद्वंदी अखबार के पास दे देता है कि रूंगटा अपने चोटिल कर्मचारी को हर्जाने के पैसे नहीं दे रहा। रूंगटा सेठ इससे नर्म पड़ जाता है क्योंकि प्रतिद्वंदी अखबार में यह खबर चल गई थी। अब वकील प्रेम से रूंगटा सेठ मोलभाव शुरू करता है लेकिन अपने एक जासूस मगन  (उत्पल दत्त ) को आलोक के पीछे लगा देता है कि पता करो कहीं आलोक की चोट फर्जी न हो। आलोक की चोट के बारे में और ज्यादा तस्दीक करने के लिये रूंगटा सेठ अपने डॉक्टरों का पैनल भेजता है। डॉक्टरों की जांच से बचने के लिये चालाक वकील प्रेम को अंगुली सुन्न करने वाला इंजेक्शन तिल वाली जगह पर लगवाता है ताकि जांच करने वाले डॉक्टरों को पता न चले कि कहीं  इंजेक्शन लगा है। डॉक्टर आलोक के बारे में तय नहीं कर पाते कि इसे चोट वाकई लगी है या नहीं। रूंगटा सेठ पर दोहरी मार तब पड़ती है जब जांच करने वाले डॉक्टर भारी भरकम फीस का बिल भेजते हैं। 

   दूसरी ओर जिस महिला हाकी खिलाड़ी की गेंद से आलोक को चोट लगी थी वह भी अस्पताल में आलोक का हाल चाल जानने के लिये बेचैन रहती है, आलोक को मिलना चाहती है लेकिन वकील प्रेम उन दोनों को ज्यादा देर तक मिलने नहीं देना चाहता क्योंकि आलोक की नकली चोट की पोल खुल सकती है। इसी बीच आलोक की पूर्वपत्नी शोभा ( अनीता राज) उससे बराबर मिलने आती है। वकील प्रेम भांप लेता है कि शोभा का  इन दिनों आलोक को मिलने आना केवल उस हर्जाने से मिलने वाले पैसों के लिये है जो कि रूंगटा सेठ से मिलने वाला है। उधर आलोक इस नकली चोट के नाटक से दूर रहना चाहता है, उसे यह अच्छा नहीं लगता कि कोई इस तरह का गलत रास्ता अपना कर पैसे बनाये जायें।  लेकिन शोभा को आलोक खोना भी नहीं चाहता, वह अब भी इस  मुगालते में है कि उसकी पूर्वपत्नी उससे अब भी लगाव रखे है और उसकी चोट की वजह से ही विह्वल हो मिलने आती है। 

    उधर  वकील प्रेम यह नाटक अभी कुछ दिन और कम्पेन्सेशन के चेक मिलने तक जारी रखना चाहता है और इसीलिये शोभा को बता देता है कि चोट नकली है और यदि कुछ हिस्सा तुम भी चाहती हो तो आलोक से मिलने आया करो ।  इधर महिला हाकी खिलाड़ी नीला जिसकी गेंद से आलोक चोटिल हुआ था खुद को आलोक की चोट के लिये जिम्मेदार मानती है और पछतावे के फलस्वरूप चाहती है कि वह आलोक की कुछ तीमारदारी करे ताकि कुछ उसकी मानसिक पीड़ा कम हो।

    इस बीच आलोक अस्पताल से घर लाया जाता है व्हीलचेयर पर और हाकी खिलाड़ी नीला उसकी देखभाल करने के लिये बीच बीच में आती रहती है। एक दिन आलोक की पूर्वपत्नी शोभा हाकी खिलाड़ी नीला को आलोक के घर का काम करती देख लेती है और गुस्से में हर्जाने के पैसे मिलने की बात बोल जाती है जिससे आलोक  को एहसास होता है कि उसकी पूर्वपत्नी का लगाव हर्जाने के पैसों से है न कि उसके चोट और दुख तकलीफ से। 

  उधर प्रेम अखबार के मालिक रूंगटा को अंतत: बीस लाख की बजाय दस लाख के चेक देने पर मना लेता है और चेक लेकर आलोक के पास आता है । सामने वाले बिल्डिंग की खिड़की से जासूस मगनभाई अपने कैमरे से आलोक की हरकतें कैद कर रहा होता है कहीं आलोक नाटक तो नहीं कर रहा। आलोक को भी पता होता है कि सामने की खिड़की में कैमरा लगा है जो उसकी एक एक हरकत को कैद कर रहा है रूंगटा सेठ के लिये। अपनी पूर्व-पत्नी के लालच और बेवफाई से व्यथित आलोक शोभा को मजा चखाना चाहता है और व्हील चेयर से खड़ा हो जाता है। लगता है कूद फांद करने। कभी टेबल उठाता है कभी कुर्सी। सामने कैमरा उसकी इस हरकत को लगातार कैद कर रहा होता है जिसके जरिये बताया जाने वाला था कि आलोक को स्पाईन में कोई चोट नहीं लगी और न ही कोई गंभीर हादसा हुआ है।  दस लाख का चेक लिये प्रेम खड़े रह जाता है।

        जासूस मगनभाई ( उत्पल दत्त) जब इस बात को कैमरे में कैद कर रहा होता है तो प्रेम ( संजीव कुमार ) उसी कैमरे को संबोधित करते हुए दस लाख का चेक फाड़ते हुए कहते हैं - चूंकि इस प्रकरण में कहीं कोई रूपयों का लेनदेन नहीं हुआ है इसलिये ये मामला यहीं समाप्त होता है और आलोक या प्रेम पर किसी किस्म के धांधली का कानूनी केस नहीं बनता। लेकिन एक केस जरूर बनता है जासूस मगनभाई पर क्योंकि वो किसी के कमरे में कैमरा लगा कर झांक रहे थे। यह इंडियन पैनल कोड.....फलां फलां के तहत कानूनन....जुर्म दफा फलां फलां के तहक निहायत ही घटिया हरकत है.......। 
 
  
     पूरी फिल्म एक तरह से सटायर है उस व्यवस्था के प्रति जिसमें कि चोट को लेकर बहस, मुबाहिसा, तमाम तिकड़में अपनाई जाती हैं। यहां एक चीज जिसने मेरा ध्यान आकर्षित किया वह थी फारूख शेख द्वारा बोली गई एक तारीख। दरअसल फारूख शेख जब अस्पताल में होते हैं तब अपनी पूर्व-पत्नी को याद करते समय अपने जीजा प्रेम ( संजीव कुमार) से  जिक्र करते हैं कि -  याद है उस दिन 26 जुलाई की तेज बारिश में कैसे भीगते हुए मैं और शोभा मिले थे। फारूख शेख के इसी संवाद पर ध्यान अटकता है क्योंकि बासु चटर्जी ने जब फिल्म बनाई थी तो 1984 में बनाई थी और यहां मुंबई में जिस 26 जुलाई की बारिश ने सैकड़ों की जान ले ली वह 2005 में हुई थी।

       अब भी मुंबई वासी 26 जुलाई का नाम सुनते ही उस बारिश को याद करते हैं जिसने हर किसी सिहरा दिया था। लोग तीन तीन दिन तक अपने जगहों पर फंसे रहे, जिन्होंने हिम्मत की उनमें से ढेर सारे लोग या तो चोटिल हुए या जान से हाथ धो बैठे। बहुत संभव है कि फिल्म लाखों की बात में 26 जुलाई का जिक्र आना और वह भी तेज बारिश के साथ महज़ एक संयोग ही हो सकता है बाकि कुछ नहीं।

       कमलेश्वर द्वारा लिखी गई इस फिल्म को एक अलग ही टेस्ट, अलग किस्म के सब्जेक्ट को  मनोरंजक तरीके से देखा जा सकता है।  मारवाड़ी अंदाज में रूंगटा सेठ बने पिंछू कपूर का संवाद बेहद सशक्त है। इस रूंगटा सेठ के जरिये ही बासु चटर्जी ने अखबारों की वो हकीकत भी बयां की है जिसके तहत अखबार का मालिक अपने संपादकों को कुछ नहीं समझता और उनकी स्वतंत्र लेखनी, बड़ी बड़ी ठसक जैसी बातों को अपने जूतों की नोक पर रखता है। उसे ....'रे भरूचा' वाली 'रेरी' वाली जुबान से बुलाता है। एक बेहद संतुलित और सशक्त अदाकारों से सजी है फिल्म 'लाखों की बात'।   


- सतीश पंचम     

12 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

क्या कर सकते हैं, यह सुनते सुनते कान पके जा रहे हैं। व्यवस्था के नाम पर सरकारों का गठन होता है, प्रभाव भी दिखना चाहिये।

अनूप शुक्ल said...

बहुत सुन्दर काम किया इस फ़िलिम के बारे में बताकर! जय हो!

Arvind Mishra said...

सफ़ेद घर के बाईस्कोप से दुबारा इस फिलम को देखना अच्छा लगा

Rahul Singh said...

सिलसिलेवार, संयोजित बयान.

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा इस तरह!!

shilpa mehta said...

'लाखों की बात' .... :)

दीपक बाबा said...

लाखां दी गल अस्सी वी देखांगे ........

वैसे बातों बातों में बात आप लाखों की कर गए.

Gyandutt Pandey said...

वाह! यह पोस्ट पढ़ी, मानो फिल्म देख ली! आपका वर्णन बहुत पिक्चरस्क है!

Kajal Kumar said...

इन्हीं घाल-मेलों के चलते दुखी होकर सरकार ने 1971 में बीमा उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था पर आज उदारीकरण के ढकोसले के चलते सरकारी कंपनियां आज फिर 1971 के मुहाने पर खड़ी हैं...

अरुण चन्द्र रॉय said...

samiksha bhi, charcha bhi... badhiya narration hai...

डॉ. मनोज मिश्र said...

सही बताये आप,आभार.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

लाखों की बात देखनी पडेगी।

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