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Sunday, July 17, 2011

राजनीति के 'क़ोतल' घोड़े

        लगता है ‘क़ोतल’ घोड़ों का जमाना फिर लौट आया है। वह भी पूरे जोशो-ख़रोश से। बता दूं कि ‘क़ोतल’ उन जुलूसी घोड़ों को कहा जाता है जिन्हें सजा-धजा कर राजा अपने साथ लेकर चलता है ताकि जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल कर सके। ऐसे सजे-धजे घोड़ों पर कोई सवार नहीं होता। अब चूंकि राजशाही रही नहीं, और न ही घोड़ों पर कहीं आने-जाने का चलन ही रहा, सो ‘क़ोतल’ घोड़े रखने का प्रचलन भी लुप्त हो गया था।


         किंतु देख रहा हूं कि वे ‘क़ोतल घोड़े’ फिर लौट रहे हैं। झक्क सफ़ेद कपड़ों में सजे-धजे ये घोड़े जब राजनीति के एक्सप्रेस-वे पर निकलते हैं तो इनकी शोभा देखते ही बनती है। लोग-बाग इन सजे-धजे घोड़ों के करतब देख दंग होते हैं। उनका हिनहिनाना सुन अचरज से ताकते हैं, कि न उन घोड़ों पर कोई सवार है, न कोई भारी बोझ ही लदा है। तिस पर रंग-बिरंगे फुदकों, रेशमी पाजेबों से ढंके संवरे घोड़े आखिर इतना हिनहिनाते क्यों हैं। लेकिन लोगों को क्या पता कि यह घोड़े राजनीतिक घोड़े हैं। इनकी बयानबाजियाँ, इनकी टिल्लो मारती मुस्कानें अपने आप में कई-कई मायने रखते हैं, जिन्हें कि आम-जन की जुबानों में ‘शिगूफ़ा’ कहा जाता है। मजे की बात यह कि ऐसे ‘क़ोतल घोड़े’ हर पार्टी में हैं और समय समय पर अपने मुखारविंद से ऐसे शिगूफ़े छोड़ने में माहिर होते जा रहे हैं। पार्टी-हाईकमान भी इन क़ोतलों को अपने साथ रखने से परहेज़ नहीं करते क्योंकि उनकी अपनी उपयोगिता है, अपना आकर्षण है। उनकी बयानबाजियाँ, उनके शिगूफ़े वह सब बड़ी आसानी से लोगों के बीच पहुँच जाते हैं जिन्हें पार्टी हाईकमान अपनी पोजिशन के चलते खुले तौर पर नहीं कह सकते।

        अभी हाल ही में राहुल गाँधी से दिग्विजय सिंह के दिये बयानों के बारे में सफाई मांगी गई तो उन्होंने बड़ी ही मासूमियत से कहा कि वो दिग्विजय सिंह के अपने विचार हैं, मेरे अपने विचार हैं। मैं उनके बयानों के बारे में कैसे कहूँ। बहरहाल यही दिग्विजय सिंह हैं जो कि भट्टा पारसौल में राहुल गाँधी के साथ साथ चलते दिखे। पुलिस कप्तान से बहसबाजी करते दिखे। अपने तमाम बयानबाजियों से लोगों को हैरान परेशान करते दिखे लेकिन जब राहुल से पूछा जाय तो कहते हैं कि वो जानें उनके विचार जानें। क्या एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता के तौर पर राहुल गाँधी को इतनी भी समझ नहीं कि उनके साथ रहने वालों के बयानों से कुछ अलहदा किस्म के सन्देश भी जाते हैं जिनका कि प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष असर जरूर पड़ता है।

        राजनीति के इस ‘क़ोतलपंती’ में भाजपा भी कम नहीं है। उसके पास भी ऐसे कई ‘क़ोतल घोड़े’ हैं जो समय असमय अपने बयानों से लोगों के बीच गाहे-बगाहे अपने सन्देश देते रहते हैं। पार्टी आलाकमान से जब उन ‘क़ोतलों’ द्वारा दिये बयानों के बारे में स्पष्टीकरण मांगा जाता है तो बड़ी ही मासूमियत से कहा जाता है कि वो उनके अपने विचार हैं और प्रजातांत्रिक देश में हर किसी को अपनी राय रखने का हक है।

      जाने यह ‘राजनीतिक क़ोतलपंती’ कब तक चलती रहेगी और लोगों को लाशों की राजनीति करते क़ोतलबाजों से कब छुटकारा मिलेगा।  फिलहाल इस कोतल गाथा को यहीं विराम देता हूँ।  वैसे भी सुना है - इतिहास खुद को  समय-असमय दुहराता रहता है। कोतलों की वापसी संभवत:  इसी दुहराव की परिणति है।  

- सतीश पंचम


चित्र : नेट से साभार

15 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

क़ोतलबाजों से निकट भविष्य में छुटकारा नहीं मिलने वाला,ये लोकतंत्र के आभूषण है और इन्हें जनता की ताकत जो हासिल है?,आभार.

Kajal Kumar said...

क़ोतल घोड़े या क़ोतल गघे !

देवेन्द्र पाण्डेय said...

वाह! क्या नाम दिया है! राजनीति के 'क़ोतल' घोड़े
इसके आगे यह भी जोड़ने का मन कर रहा है...दूध के धुले....दूध के धुले राजनीति के 'कोतल' घोड़े।
..आनंद आ गया।

सतीश पंचम said...

@ Kajal ji

क़ोतल घोड़े या क़ोतल गघे !

------------------

काजल जी, क़ोतल गधों को आलाकमान के जूते चमकाने और चप्पल उठाने से फुरसत मिले तब तो वह घोड़े बनें :)

वैसे एक कैटेगरी और है जिन्हें कि 'बोतल वाले कोतल' कहा जा सकता है क्योंकि इनके घोड़े और गधे बनने का मोड इंटरचेन्ज बोतलों पर आधारित है :)

सतीश पंचम said...

काजल जी, 'बोतल वाले कोतल' पर मस्त कार्टून बन सकता है :)

एक घूँट अंदर जाते ही बंदा गधे से घोड़ा बन जाता है :)

प्रवीण पाण्डेय said...

कम से कम कोतल घोड़े आवाज तो नहीं करते हैं।

Kajal Kumar said...

:-))

Rahul Singh said...

कलात्‍मक घोड़े, क़ोतल परम्‍परा के बारे में अधिक विस्‍तार जानने की रुचि हो रही है.

Udan Tashtari said...

आप कोतल गाथा को विराम दे भी देंगे....तो रुकने वाली कहाँ है...

Arvind Mishra said...

कोतल दौड़ तो अब शुरू हुयी है -आगे आगे देखिये होता है क्या ?

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अपना तो कुछ नये शब्दों से परिचय हुआ।

anshumala said...

असल में दिग्गी राजा कांग्रेस की वो थूक लगी उँगली है जिसके जरिये वो हवा का रुख जानने का प्रयास करता है देखो कही आसोमा के लिए कोई सहानुभूति है तो उसे कैश करा लेते है हिन्दू आतंक वाद के नाम पर मुस्लिम वोट आते है तो उसे कैश करा लेते है हवा का रुख यदि अपने पक्ष में मिला था उनका बयान कांग्रेस का है यदि नहीं तो सारे बयान उनके माथे मढ़ हट जाओ |

अनूप शुक्ल said...

ये कोतल घोड़े/गधे तो शाश्वत हैं। हमेशा से रहे हैं। रहेंगे भी शायद। :)

रंजना said...

इनके जलवे तो दिनों दिन उत्थान पर ही रहेंगे...इनसे छुटकारा कहाँ ???

रंजना said...

वैसे नामकरण बड़ा ही सटीक किया है आपने....

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