सफेद घर में आपका स्वागत है।

Thursday, July 14, 2011

चल यार....ये तो रोज का है.

     कल शाम यहाँ मुम्बई में बम फटे, आज सुबह सब कुछ वैसे का वैसा। बच्चे स्कूल जा रहे हैं, लोग ऑफिसों में, कारखानों में अपने काम पर जा रहे हैं, बसें,कारें,मोटरसाइकिलें सब कुछ जैसे कल चल रहे थे वैसे ही आज भी चल रहे हैं। अब तो इस मुम्बई ने इतना ज्यादा दर्द झेल लिया है कि बम फटने जैसी घटनाओं से उसने तिलमिलाना लगभग छोड़ दिया है। कहीं कुछ ऐसा होता भी है तो यूँ बिहेव करती है मुम्बई जैसे कुछ हुआ ही नहीं। बस कुछ समय के लिये ठहरती है मुम्बई और फिर कहती है - चल यार ये तो रोज का है।

      कुछ लोग मुम्बई के इस अलहदा व्यवहार को मुम्बई वालों के जज्बे से जोड़ने लगते हैं तो कुछ लोग इसे उनकी मजबूरी कहते हैं कि आखिर करें क्या, कमाना तो पड़ेगा ही। बात काफी हद तक सच है। लोगों को झख मारकर ऑफिस जाना पड़ता है, न न करते हुए भी आज की बजाय कल को लेकर चलना पड़ता है। अब इसे कोई मुम्बई वालों का जज्बा कहे, स्पिरिट कहे तो यह उनका मुगालता है, लेकिन सच्चाई यही है कि लोग कुछ मजबूरी और कुछ पनप उठी बेपरवाह फितरत के चलते रोजमर्रा के ढर्रे में ढल गये हैं और ऐसे हादसों के बावजूद चलते चले जाते हैं। मुम्बई स्पिरिट और ब्ला ब्ला उन  लोगों के लिये है जिनके पास बहुत समय है यह सब बोलने बतियाने के लिये। असली मुम्बईकर तो फोन पर लगा होगा - हां, आ रहा हूँ ....इधर रेल्वे ट्रैक में पानी भरा है यार.....थोड़ा टाइम लगेगा......आ रहा हूं। 

    वैसे इन तमाम बातों से मुम्बई भले ही मुसीबतें झेलने के लिये अभिशप्त दिखे, लेकिन इन्हीं बार बार होने वाली मुसीबतों ने मुम्बई की रगों में ऐसी प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर दी है कि वह इन हादसों को अब 'पार्ट ऑफ लाइफ' की तरह ट्रीट करने लगी है।

        वैसे, तमाम मीडिया, राजनीतिज्ञ, सिम्पोजियम आदि सुरक्षा को लेकर सवाल जरूर उठायेंगे, उठा भी रहे हैं लेकिन लोग अब जान चुके हैं कि बाकी चीजों की तरह ये भी एक रोजमर्रा की होने वाली कांय कांय है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। लोग भुनभुनाएंगे, झल्लाएंगे, मोमबत्तीयां जलायेंगे, और बाकी सारी रस्में निभायेंगे....वैसे ही जैसे अब तक करते आये हैं इस तरह के हादसों के बाद।

       ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह कब तक चलता रहेगा, कब तक लोग यूं ही जान गंवाते रहेंगे, कब तक शोशेबाजीयां झेलते रहेंगे, तो मित्रो, इसका जवाब किसी के पास नहीं है, न कल था, न आज है न आगे कभी होने की संभावना लगती है। किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि 'आखिर कब तक' ?

       फिलहाल आज सुबह खिंचे गये इन चित्रों को  देखिये कि कैसे कल शाम के बम विस्फोट के बाद आज सुबह लोग चल पड़े हैं, कैसे भारी बारिश के बीच बम विस्फोट के सबूत मिट जाने वाले अंदेशों के बीच लोग छाता ताने चले जा रहे हैं, और एक शख्स ऐसा भी दिखा जिसकी टी-शर्ट के पीछे लिखा था - Being human.


    संभवत: इस 'आखिर कब तक' जैसे सवालों का यही जवाब भी हो.


- सतीश पंचम

16 comments:

Stuti Pandey said...

"सदैव आपकी सेवा में - आपकी नपुंसक सरकार"

Deepak Saini said...

सरदार जी में सरदारों वाले गुण नही है
नही अब तक तो आतंकवादियों की हिम्मत ही नही होती हमला करने की जैसे की अमेरिका में नही हुई

दर्शन कौर धनोए said...

तेरा-सात का मनहुस आंकड़ा ?
फिर हुआ मुम्बई पर प्रहार ?
होली खेली खून से ,
हो गई मुम्बई लाल,
लाल मिलाकर पानी में,
ज़ामो में दिया ढाल,
जश्न मनाया कसाव का,
काटे केक हजार,
परेशान मुम्बईकर,
अब क्या करेगी सरकार --
कहत'दर्शन ' कवीराय,एक दिन ऐसा आएगा --
पैदा होगा कोई 'भगत',
संहार कर सूली चड़ जाएगा !!!
कायरता के वाशिन्दो !
होगा बुरा हाल --
एक दिन तुमको भी खुद,
देना होगा खुदा को साक्षात्कार !!!
हम मुम्बईवासी सच में इन गीदड़ भभकीयो से डरने वाले नही हैं ..हर सुबह नई शुरुवात लेकर आती हैं .. ...जय हिंद ..जय महाराष्ट्र !!

दीपक बाबा said...

"सदैव आपकी सेवा में - आपकी नपुंसक सरकार"

क्या यही सत्य नहीं है....

Arvind Mishra said...

यह मुंबई ही नहीं हम लोगों की भी यही सोच होती रही है अब दो चार सौ का मरना कोई खबर नहीं है ......मीडिया ने हमें डीसेंसेटायिज़ कर दिया है!

Poorviya said...

आतंकी हमले को रोक पाना संभव नहीं: राहुल गांधी

Rahul Singh said...

जो बच गया है, उसके बचे रहने और चलते रहने के लिए चलना जरूरी होता है.

Anu Singh Choudhary said...

आखिरी तस्वीर ने जवाब दे दिया। अलबत्ता इंसानियत की भाषा कम ही लोगों को समझ आती है आजकल।

shilpa mehta said...

being human - doesn't only mean being sensitive and kind - unfortunately, it also means being helpless, compelled .

क्या करे कोई - और क्या करे सरकार भी ? क्या हम - नागरिक - ठीक से अपनी ज़िम्मेदारी निभाने को राजी हैं? क्या हम पब्लिक प्लेसेस में तलाशी ठीक से देते हैं - और जो वहां का तलाशी वाला कर्मचारी खानापूर्ति भर कर के तलाशी के नाम की हमारी लाइन में आगे के लोगों को (और हमें भी), आगे भेज देते हैं - तब हम में से कितने लोग उन्हें टोकते हैं - कि आप अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं कर रहे - ? नहीं - हम खुश हो कर आगे बढ़ जाते हैं - कि चलो - अपना टाइम बचा ! बल्कि - यदि सच में कोई ईमानदार कर्मचारी ठीक से तलाशी ले रहा हो - तो हम खीजते हैं उस पर - कि इडियट कितना समय खराब करवा रहा / रही है !!

रंजना said...

भाई जी, मेरी तो ईश्वर और ओबामा जी से प्रार्थना है कि भारत को अमेरिका में मिला लें...भारत वारत नाम मिटाकर चाहे जो अंगरेजी नाम दे दें...चाहे तो हम सब को एकै बार मैदान में बैठा कर पवित्र पानी पिलाकर इसाई बना लें...पर कीड़े मकोड़ों की तरह बिना कसूर हमें रोज हादसों में मरने से तो बचा लें...

प्रवीण पाण्डेय said...

बीईंग हुमन हैं तभी तो झेल रहे हैं।

डॉ. मनोज मिश्र said...

@मुम्बई और फिर कहती है - चल यार ये तो रोज का है।..
सही कह रहे हैं और वैसे भी कोई भी हादसा अब चौकाता नहीं है.

anshumala said...

बस मुंबई वालो की मजबूरी का ही तो फायदा उठाया जा रहा है जबरजस्ती उसके जज्बे को सलाम कर कर के उसे बेवकूफ बनाया जाता है भाई तुम तो बड़े हिम्मती हो तुम्हारे जैसा कोई नहीं है | पर यदि हम सब ने इसे अपनी नियति मान ली तो ये हमारा ही नुकशान होने वाला है नेताओ पर तो कोई भी असर नहीं होने वाला है |

Global Agrawal said...

इस संवेदनशील विषय पर आपका लेख वास्तविकता के सबसे ज्यादा नजदीक लगा ..... अंशुमाला जी के विचारों से सहमत

shilpa mehta said...

ये कुछ वैसा ही है - कि जब हम छोटे थे - गिर जाते थे - तो रोना बंद करने के लिए मम्मी बहला देती थी- मेरा बहादुर बच्चा - कुछ नहीं हुआ - चींटी मर गयी | चलो उठो - रोते नहीं बहादुर बच्चे | वैसा ही है यह "स्पिरिट ऑफ़ मुंबई"

AMIT MISHRA said...

सतीश जी मुंबईवालों का दर्द और जज्बे को आपने बखूबी उकेरा है। बेहद संतुलित लेख। पढ़ते हुए आंखे भर आईं। बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हूं।

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'

फोटो ब्लॉग 'Thoughts of a Lens'
A Photo from - Thoughts of a Lens

ढूँढ ढाँढ (Search)

© इस ब्लॉग की सभी पोस्टें, कुछ छायाचित्र सतीश पंचम की सम्पत्ति है और बिना पूर्व स्वीकृति के उसका पुन: प्रयोग या कॉपी करना वर्जित है। फिर भी; उपयुक्त ब्लॉग/ब्लॉग पोस्ट को हापइर लिंक/लिंक देते हुये छोटे संदर्भ किये जा सकते हैं।




© All posts, some of the pictures, appearing on this blog is property of Satish Pancham and must not be reproduced or copied without his prior approval. Small references may however be made giving appropriate hyperlinks/links to the blog/blog post.